"पुलिस#वकील#विवाद"
हर भैईया का बङा भैईया होता है,--- पारंपरिक मान्य तथ्य है, अब यह बात न तो खाकी वर्दी वाले को मंजूर है और ना ही काले कोर्ट वाले को----
तानाशाही प्रवृति जब व्यैक्तिक रूप से चरमोत्कर्ष पर होता है तो उस व्यक्ति विशेष का मनोवैज्ञानिक पहलू यह कहता दिखता है --"एको अहं दुजो नास्ति"--सिर्फ मैं ही मैं हूँ, दुसरा कोई नहीं अर्थात मैं जो कहूँ या करूँ मेरी मर्जी ।
आमतौर पर खाकी वर्दी और काला कोर्ट, यह जिस बदन पर चढता है ,उसे अतिरिक्त ताकत और गौरव के एहसास का बोध होता आया है और यह लगभग अस्सी से नब्बे प्रतिशत परिस्थितियों में देखा जाता आया है।
मुझे आज तक व्यक्ति गत रूप से किसी भी पुलिस या वकील से बकझक नहीं हुआ है और अगर हुआ भी तो यह लेख कहीं से भी पूर्वाग्रह पर अधारित और प्रभावित नहीं है और ऐसा किसी भी रचना में दिखना भी नहीं चाहिए ,तभी हम एक लेखक धर्म का निर्वाह कर पा रहे होते हैं ।
02नवम्बर को मोटरसाइकिल पार्किंग के आपसी विवाद पर दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट परिसर में एक विवाद हुआ , आपसी हाथापाई हुई, विवाद इस कदर बढ गयी की -- पुलिस द्वारा फायरिंग की नौबत आ गयी ,
बात यहीं कहाँ थमने वाली थी,
प्रतिक्रिया इस कदर से प्रबल रूप में दृश्य है -- कि लाक अप रूम का ताला तोड़ना, पुलिस को घिसटना, बर्बरता पूर्ण पिटना, गंभीर रूप से घायल करना, मिङिया कभरेज के लिए आये हुए पत्रकारों के साथ बदतमीज़ी, मोबाईल छिना जाना, और इससे भी बढकर आतंकवादियों के माफिक एक सीनियर आई पी एस पदाधिकारी का पिस्टल छिन लिया जाना,---
ये सभी बातें आज प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में जोर शोर से चर्चा में आ रहा है।
पुलिस संगठन निरंतर धरना और दबाब के माध्यम से माँग कर रही है -- वकील चिन्हित हो, संदर्भित वकीलों का लाइसेंस रद्द हो, मीडिया फुटेज के आधार पर अविलम्ब उन वकीलों की गिरफ्तारी हो,---
निश्चित रूप से भारतीय संविधान और कानून किसी को भी मन मर्जी करने का अधिकार नहीं देता है,
बार काउंसिल आफ इंडिया के अध्यक्ष 'मनन कुमार मिश्रा' माँग करते हैं-- मीडिया रिपोर्ट के प्रसारण को रोका जाय , आरोपी पुलिस कर्मचारी का अविलम्ब निलम्बन हो और उनकी गिरफ्तारी हो, तथा वकीलों पर कोई कार्यवाही ना हो , अन्यथा गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं । देश भर के वकील अपने आन बान सान की मर्यादा रक्षा हेतु हड़ताल पर हैं तथा न्यायालय गत सारा काम ठप सा हो गया है।
अब बात उठता है वकील और पुलिस इन दोनों पक्षों के प्रभावी नेतृत्व समूहों को स्वयं में मंथन करने चाहिए, देश हित और मानव हित में आवश्यक रूप से सोचना चाहिए----
मोटर सायकल पार्किंग पर इतना बड़ा विवाद होता जा रहा है --
लेकिन क्या आम पब्लिक को अपने मान सम्मान के साथ जीने का अधिकार नहीं है---?
फिर पुलिस प्रशासन बात बात पर आम पब्लिक के साथ गाली गलौच , लाठी भाजना , कैसे उचित ठहरा सकती है--?
प्रचलित कहावत है -- जस्टिस ङिलेङ मिन्स जस्टिस ङिनाई -- न्याय में देरी मतलब ही अन्याय होता है।
आये दिन न्यायालय स्तर पर अनेकानेक चर्चित फैसले इन्हीं वकीलों के माध्यम से आते रहे हैं,
उदाहरणार्थ किसी हत्या के मामले में दस बीस साल तक तारीख पर तारीख मिलता है तब उक्त आदमी को बेगूनाह ठहराया जाता है,
लेकिन पुलिस और वकील दोनों की जिम्मेदारी यह भी तो बनती है की अगर अमुक व्यक्ति इस हत्याकांड में बेगूनाह है तो हत्यारा फिर कौन था यह भी तय हो।
अस्तु उच्च न्यायालय , पुलिस कमिश्नर, और गृह मंत्रालय इस स्थिति पर गंभीर और पैनी नजर से मुयाना करते दिख रहे हैं और हमारी अपेक्षा है कि इस टकराहट के कुछ् सुखद परिणाम जल्दी ही दृश्य पटल पर दिखे और आवश्यक कठोर कदम मनचलों पर लगाम लगाने के लिए उठायें जायेंगे अन्यथा यह टकराहट -- "जिसकी लाठी उसकी भैंस " के रूप में अपनी पहचान स्थापित करती दिखेगी ।
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जिम्मेदारी वहनकर्ता रचनाकार -- पवन मिश्रा (दुमका)