UCC---
UNIFORM CIVIL CODE
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समान नागरिक संहिता
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एक देश एक कानून
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अंग्रेजो के गुलामी की दास्ता भारत के इतिहास में कठोरतम और चतुराई से स्वहित की व्यवस्था को हम भारतीयों पर थोपने के निरंतर प्रयास की कहानी है और इसी कङी में हमने कूछ आत्मसात कर लिया और कूछ का विरोध किया।
वस्तुतः हमारे सास्कृतिक परंपरा को भी अंग्रेजो ने अपने हित के नजरिए से देखा , फायदे और नुकसान की गणना के पश्चात ही अपने प्रतिक्रियात्मक कदम को उठाया ।
खैर वो अंग्रेज़ थे, हम उनके गुलाम लेकिन आज स्थिति अलग है, हम स्वतंत्र है---जनता का ,जनता के लिए, जनता द्वारा शासन के सिद्धांत पर धर्म निरपेक्ष संविधान और शासन संचालित हो रहा है।
अब बात उठता है धर्म निरपेक्ष राष्ट्र में धर्म अधारित नियम कानून कैसे--?
हमारे यहाँ न्याय वयवस्था को
दो प्रकार से - दीवानी मामले और फौजदारी मामले के तहत देखा जाता है ।
फौजदारी मामलों में संपूर्ण देश में एक समान कानून सभी नागरिकों पर अमल होता है। फौजदारी मामलों के तहत --हत्या, चोरी ,डकैती, अपहरण,बलात्कार लुट-पाट, रंगदारी जैसे मामले आते हैं ।
दीवानी मामलों में हिन्दू पर्सनल ला, मुस्लिम पर्सनल ला, क्रिश्चियन पर्सनल ला जैसे विविध धर्मावलम्बियों के पारम्परिक कानून के तहत ही मामलात दर्ज होते हैं और कानूनन फैसला होता है । दीवानी मामलों में उत्तराधिकार, विवाह,तलाक,घरेलू हिंसा, जैसे मामले देखे जाते हैं ।
संविधान के भाग 4अनुच्छेद 36से 51मे राज्य के नीति निर्देशक तत्व का वर्णन है जिसमें विविध तथ्यों के साथ अनुच्छेद 44 मे समान नागरिक संहिता की बात दर्ज है । उक्त धाराओं को न्यायालय के द्वारा राज्य में लागू करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है ,लेकिन सरकार से अपेक्षा रहती है कि उनके सत्ता संचालन की मूल भावना में उक्त धाराओं का पालन हो।
अभी वर्तमान में कई एक मंदिरों में नारी प्रवेश निषेध है , तो मुस्लिम समुदाय के महिलाओं द्वारा मस्जिद में नमाज अदायगी निषिद्ध है । इस प्रकार से देखा जाय तो हर धर्म और सम्प्रदाय में औरतों के साथ भेदभाव ही नहीं बल्कि नाइंसाफ़ी किया जाता रहा है। बङी चतुराई से औरतों को धर्म शास्त्रों में पुरूष से कमतर क्षमता वाले के रूप में दर्ज किया गया है,उन्हें कम अधिकार दिया गया है । मुस्लिम समाज में उनका धर्म एक पुरूष को चार औरत से निकाह करने को और साथ में इन्हें निरंतर रखने की इजाजत देता है , लेकिन क्या यही धर्म एक औरत को चार पुरूष से शादी करने को और निरंतर रखने की इजाजत देता है--?
फिर इक्विटी आफ ला - कानून के समक्ष समानता का अधिकार का क्या हुआ--?
मेरा मानना है शिक्षा ही इसके समाधान हैं । एक मुस्लिम औरत को इस्लाम धर्म में 'बुर्का' आवश्यक बतलाया गया है, अंग प्रदर्शन नहीं, इसे पर्दा मे रहने को आवश्यक बताया गया है । लेकिन क्या बालीवूङ की हीरोइनो पर यह शरीयत लागू नहीं होता--?
उनके लिए क्या इस्लाम की परिभाषा अलग है--?
बात यहाँ शिक्षा और जागरूकता की है।
इसी समान नागरिक संहिता के तहत लिंग भेद को भी निषिद्ध करने की बात है ।
जम्मू-कश्मीर से धारा 370 का हटना, तीन तालाक जैसे पारंपरिक गैर युक्ति संगत कानून का खात्मा, बाबरी मस्जिद- राम मंदिर जैसे जटिल मामलों का निपटारा अगर हो सकता है तो समान नागरिक संहिता भी जल्द लागू होने की महती अपेक्षा देश की जनता कर रही है।
अमेरिका, ब्रिटेन, चीन , पाकिस्तान आदि देशों में समान नागरिक संहिता लागू है। हमारे देश में गोवा एक मात्र ऐसा राज्य है जहाँ समान नागरिक संहिता लागू है ।
भारतीय विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता को देश में आवश्यक रूप से लागू करने की बात स्वीकारा है और कहा है यह लागू होने के बाद ही इक्विटी आफ ला यानि कानून के समक्ष समानता का अधिकार की बात हम कर सकते हैं, सही मायने में लागू कर सकते हैं । अभी वर्तमान में उच्चतम न्यायालय में समान नागरिक संहिता से संदर्भित कूछ तथ्यों पर मामलात देखे जा रहे हैं । हम देशवासियोंको अपेक्षा है कि जल्द ही सुखद परिणाम सामने होंगे और हम सब माननीय न्यायालय के निर्णय के साथ होंगे
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पवन मिश्रा
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ReplyDeleteआपका सादर आभार बङे भाई , मंगलमय शुभकामनाओ सहित बहुत-बहुत धन्यवाद्
ReplyDeleteसुन्दर आलेख , जरूरी कानून , देश के लिए, हर मानव के लिये
ReplyDeleteएक देश एक कानून
ReplyDeleteआभार आपका सादर
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