Wednesday, May 28, 2025

कविता

कविता


*प्यार रहे बरकरार -- अगले जनम से सात जनम तक*

  शादी के उन्नीसवीं साल गिरह पर
मंदिर में हम दोनों ने माथा टेका
मंदिर बाहर बैठे दरिद्र नारायण  के हाथों 
दिये कुछ लड्डू और खुदरा  पैसे 
घर पहुँच सजीव और प्रत्यक्ष ईश्वर  के रुप
अपने  मम्मी -पापा के पैर छुए
आशीर्वाद मिला--
युग युग जोड़ी सलामत रहे
सातों जनम यही जोड़ी बनी रहे 
श्रीमती हुईं भरदम गदगद 
और मुझसे पुछीं -? 
आपने मंदिर में क्या मांँगा -? 
मैं रहा चुप -
वो फिर बोली मैंने तो अगले जनम से सातो जनम तक आपका ही साथ माँगा। 
वो फिर बोली 
आपने कुछ भी नहीं माँगा-? 
मैंने कहा वही जो ईश्वर से कामना किया
अब इस पवित्र सुअवसर पर कैसा झुठ बोलना -? 
प्रिये मैं तेरा साथ चाहता तो हूँ
बस इसी जनम भर 
अगले जनम सात जनम 
किसने है देखा  --? 
मैंने ईश्वर से मांँगा है 
जब तक ये आंखे खुली रहे 
साथ तेरा मुझे, हर पल मिले
चिलचिलाती धुप में घर प्रवेश करूँ
तो वाशरूम में बर्फ़ वाली ठंडी पानी का इंतजाम हो--
कमरा पहले से एसी चला कर ठंडा रखो 
कमरा में प्रवेश के साथ ही 
तुम मुझे पुछो
ऊफ ये गर्मी
तुरंत लाता हूँ आपके लिए ठंडय 
कपकपाती ठंड में 
काम निपटा कर जब मैं घर प्रवेश करूँ
तो वाशरूम में गरम पानी का इंतजाम हो
कमरा  हीटर से गरम कर दिया गया हो
और तुम सुसम पानी का ग्लास मुझे देते हुए
 बोलो ऊफ ये ठंडक
लाती हूँ झट से आपके लिए 
एक प्याली प्यारी सी काफी
मेरे घर आने की खबर 
और पक्के समय का अंदाज
मुझसे ज्यादा तुझे हो 
मेरे ऊपर आने वाली हर मुसिबतों
पर ढ़ाल बनकर तुम दृढ़ता से मुकाबला करो
मैंने ईश्वर से ये सब मांगा है --
इसी जनम तक 
अंतिम सांँस तक 
एक दुसरे को 
जीवन के संघर्ष पथ पर
हर पल साथी बन
हर संभव मदद कर सकूँ
मैंने प्रार्थना किया है 
तेरी हर अपेक्षाओं की पूर्ति 
कर सकूँ इतनी सामर्थ देना प्रभु
मैंने तुझे चांद - सितारे लाकर
देने की महती कामना नहीं कि
होंगे वो बड़े बड़े लोग 
जो पत्नी को चांद - तारे 
लाकर देने का भरोसा देते हैं
मैंने ईश्वर से मांगा है कि
इस भरोसा पर मै कायम रह सकूं
पत्नी के साथ 
सच्चा हमसफर भगवान मुझे बनाये रखना
इसी जीवन के अंतिम पल तक। 
अगले जनम को किसने देखा
सातों जनम की बातें हैं
कोरी कल्पना
बस तेरा साथ रहे इस जीवन भर
तो हर गम पी जाऊँ हँस हँस कर
धन्यवाद
  ©®पवन मिश्रा (दुमका- झारखंड़)

Saturday, May 24, 2025

प्रेम पथ

    नदीया के पार 

ऐ सुनो ना 
लिली मेरी बात सुनो
चलते हैं नदी के उस पार 
रेत पर कुछ सैर करने 
चलते चलते --
जब मैं और तुम 
थक जाऊँ 
तो रेत पर ही बैठ्ठका लगाऐंगे
दुनियादारी से दुर 
बहुत दुर -- बस अकेले 
मैं और तुम 
भींगे -- भी़ंगे रेतों से
बिल्कुल मेरे जैसा 
 बनाना एक गुड्डा 
मैं बना लुंगा तेरी ही जैसी एक गुड़िया
खुबसूरत-- बहुत खुबसूरत गुड़िया 
मानो तो वो गुड़िया भी होगी 
तेरी जैसी विश्वसुन्दरी 
फिर--
फिर अचानक से रेत से बने इस
गुड्डा और गुड़िया को 
ढ़हा  देना तुम -- 
और फिर से बनाना
मेरे जैसा बकलोल -- एक गुड्डा 
और बना लेना इस बार फिर
ठीक अपने जैसा एक कुशाग्र बुद्धि
वाली मेरी चहेती विश्वसुन्दरी -- लिली 
ताकि तुझमें कुछ -- कुछ -- बहुत कुछ मैं रह जाऊँ
मुझमें -- कुछ - कुछ -- बहुत कुछ तुम रहो जाओ --
और लाख हो तकरार हममें 
फिर भी 
तुझमें मैं और
मुझमें तुम 
कुछ -- कुछ ,बहुत कुछ 
एक दुसरे मे दिखता रहें 
जय हो 🚩
©®पवन मिश्रा