हिंदी साहित्य जगत के शिरोमणि सम्राट श्रद्धेय श्री हरिवंश राय बच्चन की अजर अमर कृति 'मधुशाला ' को सभी हिंदी साहित्यकारों ने न सिर्फ पढा बल्कि अपने अपने अंदाज मे कुछ न कुछ पंक्तियां इसमें जोडने की या इसे आगे बढ़ाने को प्रयास किया.बात बहुत पुराने उन दिनों की है जब टुटी -फुटी लडखडाती सी मेरी कलम भी कुछ उकेरने का प्रयास करती थी -- उसी संदर्भ में
" मधुशाला --------"
मधुशाला भी है असली पाठशाला
रूक रूक कर लोग यहां आता जाता
खुब पीता, मस्त मस्त हाला
ग़म भुलाते गले मिलाते
समय समय पर सुकून दिलाते
नई दुनिया से है परिचय कराता
है ,जगह यह बड़का अमृतशाला
खुद से मुख मोड़ जल्दी जल्दी
भाग जो आता मधुशाला
उनके जन्नत का है यही रखवाला
स्वर्ग -- नरक को है किस किस ने देखा-!
पिया जिस जिस ने हाला
बन जाता वो बड़ा दिलवाला
स्वर्ग नरक को जमीं पे लाता मतवाला
बनाता मतवाला राह दिखाता मधुशाला ----
मधुशाला ही है असली पाठशाला
----+-क्रमशः
-- पवन मिश्रा ( दुमका)