Thursday, February 22, 2024

(5)कहानी --अधकचरा मोहब्बत

कहानी 
                   #*अधकचरा मोहब्बत*
                
           तैंतीस सालों बाद न जाने कहां से वो अचानक मेरे सामने आ गयी, वही मुस्करातें होंठ , मोती सी चमकदार दांतें पर माधुरी दीक्षित जैसी थोडी बडी बडी अग्रदंत पर अब मेरे मेंं से वो शरारत , जो शायद उस समय ही गायब हो गई  जब से वो ओझल हो गई  थीं. मैं अकबका गया हडबडा गया मानिए बेचैन हो गया उसे करीब देखकर ----------–-------------
     मैं बोल पडा --
       अरे ओ विश्वसुंदरी  --- मेरी लिली ----!
कैसी है तु यार ------!
कितना तडपा हूं यार तेरी यादों में तुझे कुछ पता भी है --?
 बस वो तैंतीस साल पुरानी शरारत भरी हरकतें बक बक करने की मेरी आदतें, शेरो शायरी कविता सब निकलने लगे मेरे आवाजों में ,सोचना समझना कुछ नहीं -- --!
                 लिली खो गई अपने  हि यादों  मानिए वह मन ही मन कह रही हो ----- जितना मजा तडपाने में उतना जताने मे नहीं होता रे पगले. हां ,प्रेम तु क्या बोले जा रहे हो -- मतलब कुछ भी ---------
                इन तैंतीस सालों में  बहुत कुछ बदल चुकी थी मै़ (लिली)लाईफ को लेकर , रिलेशनसिप को लेकर.
  चल काफी की चुस्की लेता हूँ ---,-प्रेम, के कहने पर हम दोनो पास के  कैफेटेरिया में प्रवेश किये --
           आमने सामने गोल टेबल के साथ लगे कुर्सी पर बैठ दोनों एक दुसरे को निहारते रहे, वो बोलता रहा मैं सुनती रही ,
                     तुम बदल गयी हो यार -----!, बहुत बदल गयी तु  लिली -- -! ऐसा लगा मानिए प्रेम ने मेरे अंदर के बदलाव को समझ लिया हो.  काफी कब के खतम हो गयी , दुबारा आडर दिया वो भी खतम ------! लेकिन बातों का अनवरत सिलसिला प्रेम के मुंह से निकलता रहा -- मानिए ग्यारह माह से सुखे पडे किसी नदी में बरसाती बाढ आ गई हो और --- तेज गती से हडबड हडबड बक बक सब कुछ कहना चाह रहा हो अब जो तैंतीस सालों के लंबी कालखंड में प्रेम के दिमाग ने लिली के लिए संचित कर रखा था..
                       बडी मशक्कत से अगले रविवार गौतम झील के किनारे समुचे दिन साथ साथ बिताने को प्रोमिश किया मैने तब जाकर प्रेम ने कहीं आधे अधुरे मन से शुभकामनाएँ व्यक्त करते हुए मुझे जाने को इजाजत दिया.
       तैंतीस साल एक लंबा सा कालखंड -------- लेकिन ऐसा तो पहले कुछ नही था . ऐसा था,  कुछ नहीं था उस समय --! या मेरा मन उस कुछ को समझ नहीं पा रहा था -------!
 नहीं नही नही नहीं ----- ये मुझे (लिली) क्या हो गया --!
  अच्छे दोस्त थे हम दोनों--- ! समय बितने  के साथ दोस्ती पर जो धुंध पर्दा स्वरूप चिपक सी गयी थी वही धुंध तो छट रही है --- और मैं क्या जो सोचे जा रही हूं.. प्रेम हैंडसम था ,आज भी है---- बोली विचार से  नैन नक्शों से बहुत ही सुंदर है लंबा छरहरा बदन . कहां  मैं पतलसुट्टी , लंबी लंबी दांतें , बडी बडी टांगे -- भला क्यों मुझे वो  -----------! वो बातुनी था--- आज ये बकबक करने की आदत बढ़ गई है और क्या ----! हंसते मुस्कुराते बात करने का ये प्रेम का अपना अंदाज है इसमें मेरे लिए विशेष क्या हो सकता है. मैं भी न पगली हूं इस उम्र में क्या क्या जो ख्यालात आ जा रहें. धत् तेरे कि समान्य सी तो बात है ये --- मिलना. हम दोनों मे आखिर साम्यता ही क्या है ---!  प्रेम बातुनी है और लिली श्रोता -- बस और क्या ------!
  ना  ना ना ना और क्या -------!
 लेकिन है तो प्रेम एक रोमांटिक लडका -----!
 उसने मुझसे बातों ही बातों मे एक बार कहा था
    यार लिली तु किसी से प्यार क्यों नहीं कर लेती ----?
तुम तो जानते हो प्रेम प्यार  व्यार मेरे बस की बात नहीं  है --! इस बदसुरती पतलसुट्टी से करेगा कौन प्यार --! रहने भी दो छोडो ---- चलो चेंज द टापिक ---!
    व्हाय चेंज द टापिक यार ---! 
  मैं हूं ना ----! होगी तुम औरों के लिए पतलसुट्टी , बदसुरती --! पर तु तो मेरे लिए है विश्व सुंदरी --!
     बिल्कुल सिनेमाई अंदाज मे उनका यह कहना ------- दिल की गहराईयों में सुकून सा देता महसुस करा गया . मैं कुछ बोल न पायी .
      हम रोज ही मिलने लगे.  दुनियां जहान की बातें करने लगे हम दोनों. पढाई, लिखाई ,कहानी, कविता , शायरी सुनना सुनाना देश दुनिया कि राजनीति, विश्व इकोनोमी , शेयर बाजार हर चीजो पर बातें होने लगी -- बातें बहाना मात्र था ,मिलना जुलना अब एक दुसरे को अच्छा लगने लगा था. एक दिन अगर किसी कारण मिलना न होता , दिन  भर बातें न होती तो रात में प्रेम मैसेज करता आई एम मिसींग यु यार ---! लगता है मिलना जरुरी है.--!
     मैं लिखकर मैसेज भेजी----मुझे नहीं लगता मिलना जरुरी है।  अरे प्रेमी थोडे ही हो तुम प्रेम --- दोस्त हो दोस्त की तरह रहो ------ और----क्या---!
अरे ऐ विश्वसुंदरी----! मैं ही कहां सिरियस हूँ --- मजाक कर रहा था तुमसे ----! कौन करेगा तुझसे प्यार --!प्रेम का मैसेज आया.
 बस यही सारा बकवास बकर बकर करते न जाने दो तीन घंटे कितनी जल्दी से बित गये पता ही नहीं  चला .
         एक बार बस वहीं (जहां मुझे रविवार को उनसे मिलना है) गौतम झील किनारे बैठ प्रेम मुझसे बोल पड़ा -- कुछ बोलूं --- सुनेगी ---?
मै़ (लिली) बोल पडी  न भी बोलुं तो तु कहां मानने वाला है -- बोल --?
   मैं और मेरी तन्हाई अक्सर ये बातें करती रहती हैं ------  ( मेरी ओर एकटक निहारते )तुम होती तो कैसा होता ------, तुम ये कहती -----, तुम वो कहती ----, तुम इस पर हैरान होती ----, तुम ---!
 बस बस बस बस भी करो प्रेम ----!  तुम्हें सिनेमा में होना चाहिए,  प्रेम कर लेना चाहिए और शादी भी कर लेने चाहिए ---!
प्रेम बोल पडा ---तो ठीक है बस आगे का सुनाऊं -----!
   अरे यार प्रेम फिर कभी सुनाना -- बोर मत करो यार कान पका दिया तुने --!
     अरे विश्वसुंदरी तेरी एक भी बातें आज तक न टाली मैंने , ये भी स्वीकारता हूं , लेकिन आज हो या कल या हो दस बीस साल बाद तुझे -- तुझे मेरी पुरी कहानी तो सुननी होगी. 
      ऐसे ही न जाने कितने ही अनगिनत यादें प्रेम से जुड़ी हुई थी जो मेरे दिल दिमाग को बारंबार मीठी चुभन सा देते जा रही थी आज के दिनों में.
    आफिस मे ,और सोसायटीज के सहेलियों में अब चर्चे होने लगी थी. मेरी सबसे नजदीकी सहेली  सुगंधा एक दिन पुछ बैठी तेरा कुछ चक्कर ऊक्कर है क्या रे लिली ---,  मैं अक्कड़ अंदाज मे डपटते हुए उसे चुप कर दिया.
स्त्री और पुरुष अच्छे फ्रेंड नहीं हो सकते. कितनी घटिया सोच है तुम लोगों की.”
उसी दिन मेरी और एक सहयोगी मुन्नी जो मेरी बहुत अच्छी फ्रेंड भी थी, बोली, “सच कहूं तो स्त्री-पुरुष दोस्ती के बीच बहुत बारीक रेखा होती है. गहरी दोस्ती कब प्यार में बदल जाती है, पता भी नहीं चल पाता.”
“अब तू भी शुरू हो गई मुन्नी   . तुम लोगों की सोच कितनी छोटी है यार. वो प्रेम मेरा एक अच्छा दोस्त है, बस और कुछ नहीं---!.”

       आज पता नहीं क्यों उससे जुड़ी यादें पीछा ही नहीं छोड़ रही थीं. सच कहूं तो मैं उसकी यादों से पीछा छुड़ाना भी नहीं चाहती थी. इन्हीं यादों के साथ तो जी पाई हूं इतने दिनों से-------! 

फिर उन दिनों की ही बात है, अचानक से वो आया और बोला, “यार घर पर अब शादी के लिए बहुत प्रेशर डाल रहे हैं. कल ही एक लड़की को फाइनल कर लिया उन्होंने. क्या करूं, कुछ बताओ यार.”
“शादी कर लो और क्या करोगे. इतना क्या सोचना.”
“ये फाइनल ़फैसला है मेरे लिए तुम्हारा. सच कर लूं शादी.”
“बिल्कुल.”
“और तुम?”
“मैं इस शादी, प्यार-मोहब्बत पर यक़ीन नहीं करती, जानते हो न तुम.”
“ठीक है. आज तक तुम्हारी  कोई बात नहीं टाली मैंने. अब भी नहीं टालूंगा…” और उसने उसी क्षण अपनी मां को फोन लगाया और शादी के लिए हां कर दी. पर वो ख़ुश नहीं लगा मुझे, पता नहीं क्यों.----!
एक महीने बाद ही उसकी शादी थी. चूंकि शादी गांव में थी, इसलिए जाने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था. पता चला शादी के लिए छुट्टी भी नहीं ली उसने , त्यागपत्र दे दिया. पूछने पर इतना ही बोला, “नई ज़िंदगी बिल्कुल नए तरह से शुरू करना चाहता हूं. पुरानी बातों को भुलाकर. तभी उसे ख़ुश रख पाऊंगा.”
पता नहीं उस दिन उसकी आंखों में क्या नज़र आया मुझे, जिसने बेचैन कर दिया. अजीब-सी बेचैनी महसूस होने लगी. कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. लगा ऐसा जैसे मानिए सालों साल से दिल में बसे किसी परींदे को अपने हाथों पिंजरा खोलकर बोल रहा हूँ --जा तु आजाद है ---! 
उसने पूछा भी, “आर यू ऑलराइट?” क्या तुम ठीक हो-- ---! मैंने हां तो कर दी, लेकिन मैं ऑलराइट नहीं थी. दिल के अंदर छटपटाहट और अजीब सी बेचैनी हो रही. घर लौटी, तो ख़ूब रोई, ऐसा लगा कि कोई बहुत प्रिय वस्तु हाथ से छिन गई… हमेशा के लिए… जैसे कोई बहुत बड़ी ग़लती कर दी हो मैंने.

    वो रांची शिफ्ट हो गया फाइनली. उसके जाने के बाद एक अजीब-सा खालीपन आ गया ज़िंदगी में. हर पल बस वो ही यादों में बसा रहता. उसकी ही बातें याद आती रहतीं. सच कहूं तो उसे खोने के बाद महसूस हुआ कि उसे प्यार करने लगी थी मैं. बहुत ज़्यादा प्यार ---! 
            मुन्नी से मेरी हालत छिपी नहीं रही. उसने एक दिन पूछ ही लिया, “तुम प्रेम को मिस कर रही हो ना? जानती हूं. लेकिन तुम्हारी वो प्यार पर यक़ीन नहीं करती, शादी नहीं करूंगी, वाली झूठी बातें हैं  न… तुमने ख़ुद ही अपने साथ अन्याय किया.”
बस मैं उससे लिपटकर रो पड़ी, “इस बात का एहसास तो बहुत पहले ही हो गया था मुझे कि मैं प्रेम को प्यार करने लगी हूं. पर हमेशा डरती रही कि कहीं वो मुझे रिजेक्ट न कर दे. कहां वो हैंडसम बंदा और कहां मैं. बस कभी कुछ कह नहीं पाई. लेकिन अब बहुत तड़प रही हूं यार उसके लिए.”
“तू जानती भी है लिली, प्रेम कितना प्यार करता था तुझे. कई बार कहना भी चाहा तुझे उसने. पर तूने कभी उसे मौक़ा ही नहीं दिया. बड़ी देर कर दी यार तूने.”
         जानती थी कि अब प्रेम को कभी हासिल नहीं कर पाऊंगी मैं. तो बस उसकी यादों के सहारे ही ज़िंदगी बिताने का फैसला कर लिया. ख़ुद को बस काम में झोंक दिया. हां, इस बीच में पूरी तरह बदल ज़रूर गई थी. प्यार के मायने समझने लगी थी. लोगों को समझाने लगी थी.
            प्रेम मेरे जीवन का हिस्सा नहीं बन पाया था, पर मेरे हर अकेले से लम्हों में स़िर्फ वो ही होता. कई बार तो ऐसा लगता कि उसने विश्‍वसुंदरी कहकर पुकारा…हो ---लेकिन वो स़िर्फ एक ख़्याल ही रहा.
इसलिए उस दिन जब वो मिला और उसने मुझे पुकारा तो मैंने समझा फिर वही ख़्याल… लेकिन वो तो साक्षात सामने खड़ा था और मुझे यक़ीन ही नहीं हुआ.
अब तो बस रविवार का इंतज़ार था. मन में पता नहीं कैसे-कैसे ख़्याल आ रहे थे. प्रेम शादीशुदा है. अब उससे मिलना ठीक रहेगा क्या? लेकिन फिर सोचा उसे कौन-सा अपने एहसास बतानेवाली हूं. दोस्त की हैसियत से तो मिल ही सकती हूं. इसी बहाने प्यार के एहसास के साथ थोड़ा समय तो उसके साथ बिताऊंगी.
आख़िर रविवार आ ही गया. सुबह से मन में कुछ अजीब-सा हो रहा था. शायद प्रेम से मिलने की व्यग्रता थी, उतावलापन था. हमें शाम को एक कॉफी शॉप में मिलना था.
वो उसी अंदाज़ में मिला.

“हे विश्‍वसुंदरी, बड़ी बेसब्री से इंतज़ार किया इस संडे का. चलो कॉफी पीते हैं.”
सामने बैठा वो मुझे देखे ही जा रहा था, लेकिन मेरी आंखों में इतना साहस नहीं था कि उसकी आंखों का सामना कर पाऊं.
“और बताओ, कैसी चल रही है लाइफ.” मन में तो आया कह दूं तुम्हारे बिना लाइफ चलती तो है, पर अब तक मंज़िल पर नहीं पहुंच पाई, लेकिन फिर सोचा अब क्या फ़ायदा ये सब कहने का. बेवजह किसी की शादीशुदा ज़िंदगी में हलचल क्यों मचाना.
“ठीक हूं.”
“फैमिली में कौन है तुम्हारे? पति क्या करते हैं तुम्हारे..? बच्चे?”
“अरे, इतने सारे सवाल… इतना उतावलापन. अब तक नहीं बदले तुम. कहा तो था तुमसे शादी पर यक़ीन नहीं करती, तो शादी करने का सवाल ही कहां आता है.” मैं भरसक कोशिश कर रही थी कि कहीं वो मेरी आंखों में ख़ुद के लिए प्यार के लफ्ज़ न पढ़ ले.
“तुम सुनाओ, तुम्हारी ज़िंदगी कैसे चल रही है. तुम्हारी पत्नी, बच्चे…?”
“सब ठीक हैं. मैं भी, ज़िंदगी भी. बस…”
“बस क्या प्रेम -----?”
“बस तुम नहीं हो और तुम्हारे बिना ज़िंदगी की कहानी अधूरी है. कल भी थी. आज भी है.”
“पागल हो तुम. मुझे बहकाना कब छोड़ोगे. अब तो शादीशुदा हो. ये शरारतें छोड़ दो.”
“आज एक अधूरी कहानी पूरी करना चाहता हूं. कुछ बात अधूरी ही छोड़ गया था उसे पूरा करने दो.” और वो फिर शुरू हो गया अपने फिल्मी अंदाज़ में.
“मैं और मेरी तन्हाई अक्सर ये बातें करती रहती हैं… तुम होती तो कैसा होता… तुम ये कहती तुम वो कहती, तुम इस बात पर
हैरान होती.
तुम इस बात पर कितना हंसती… तुम होती तो ऐसा होता… हां तुमसे मोहब्बत है --मोहब्बत है…मोहब्बत है-----“
“ये क्या मज़ाक है प्रेम ---?”
“मज़ाक नहीं, सच है. जो उस दिन नहीं कह पाया. अधूरी ही रह गई मेरे प्यार की कहानी उस दिन, जिसे आज पूरी करना चाहता हूं.”
मेरी आंखों से आंसू बहने लगे. ये कुछ खोने का दर्द था.
अब क्या फ़ायदा इन बातों का. प्रेम अब कहां हासिल होता मुझे. वो तो  पहले ही किसी और का हो गया था.
“प्रेम प्लीज़, सुधर जाओ. तुम शादीशुदा हो. इस तरह का मज़ाक मत करो मेरे साथ.”
“मज़ाक नहीं कर रहा. सच कह रहा हूं. तब नहीं कह पाया, क्योंकि नहीं जानता था कि तुम क्या सोचती हो मेरे बारे में. पर अब मुन्नी ने सब बता दिया है.”
मुन्नी---? वो कब मिली तुम्हें.”
वो मुझसे फेश बुक पर मिली और सब बातें बता दिया है मुझे --!
“और तुम्हारी शादी?”
“वो तो तुमसे दूर हो जाने का एक बहाना था. यार तुम मान नहीं रही थी और मैं हिम्मत नहीं कर पा रहा था तुम्हें डायरेक्ट पूछने की. क्या करता, ख़ुद को दूर कर लिया तुमसे. ये सच है कि मां ने लड़की पसंद कर रखी थी, पर मेरी पसंद तो स़िर्फ तुम थी न लिली -मेरी विश्व सुंदरी --!.”
मेरी आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे.
आख़िरकार उसने पूछ ही लिया, “मेरी अधूरी कहानी पूरी
करोगी न?”
मैं उससे लिपट गई. कहानी पूरी हो गई थी अब.

        तभी जोर का झटका लगा मेरी पत्नी देवी  ने झकझोरते हुए ,झल्लाते हुए मुझे  निंद से जगाया बोली जल्दी उठ ,गदहा की तरह आठ बजे तक सोया है -- बच्चों को स्कुल छोडने हैं और मेरा सपना टुट चुका था---! सच कहते हैं सपना सपना होता है -- और कभी न पुरा हो पाया मेरा अधकचरा प्यार ----!
पवन मिश्रा-(दुमका झारखंड) 

  धन्यवाद

Saturday, February 10, 2024

नागरिकता संशोधन कानून-2019

#बेबाक सच
नागरिकता संशोधन कानून--2019

    और नागरिकता संशोधन कानून रूपी बादल जब संपूर्ण भारतवर्ष पर छा गया है, तो निश्चित रूप से राजनीतिक घराने अपने फसल  काटने के हिसाब से ही इनके फायदे और नुकसान के मदेनजर गणना करेगे ,-- और फिर अपनी प्रतिक्रिया देना आज के दिन में भारतीय राजनीति का अहम हिस्सा सा हो गया है, स्वभाविक रूप से सत्तारूढ सरकार और राजनीतिक पार्टी को इसके विरोध का पुरा आभास रहा ही होगा तभी तो गृह मंत्री पुरे मजबूती के साथ इस संशोधन बिल के पक्ष में हैं ।
       संपूर्ण भारत वर्ष में मुस्लिम समुदाय के द्वारा इस बिल का विरोध निरंतर जारी है   और जुलूस के साथ सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान भी पहुंचाया जा रहा है । विरोध के स्वर लोकतंत्र को मजबूती देता है और इसे निखरने का मौका भी । सरकार के किसी भी कदम का जनता विरोध कर सकती है या फिर समर्थन यह उनके कृत्य पर निर्भर करता है । यह बिल संसदीय व्यवस्थाओ के सारे पहलुओं को आत्मसात  करने के उपरांत अस्तित्व में आया है ।  इसके बाद भी विरोध के  कई मायने है,
      लेकिन जनता के हर प्रकार के अधिकारों की समीक्षा की जाय तो किसी को भी सार्वजनिक सम्पत्ति के नुकसान का अधिकार नहीं है  । सरकार के पास पर्याप्त कानूनी आधार है नुकसान की भरपाई नुकसान कर्ता द्वारा ही किया जायेगा ,जिस पर अमल होना शुरू हो चुका है।
       --फिर इतने संवेदनशील मुद्दे पर जनता का सङक पर उतरना निश्चित रूप  से उनके बौद्धिक  सक्रियता को दिखाता है । कुछ राजनीतिक घराने जिनकी वर्तमान समय में प्रासंगिकता ही खत्म सा होता दिख रहा है उन्हें सरकार का हर स्तर पर विरोध करते हुए मीडिया में बने रहने के अपने एक अलग मायने हैं ।
         ज्यादातर पब्लिक जो आज सङक पर उतर कर विरोध जता रहे हैं उन्हें अपने रोजी रोटी कमाने के अलावे कुछ नहीं दिखता है , वह सिर्फ गुमराह किये जा रहे हैं, जरूरत है मुस्लिम कौम को विवेकशीलता के साथ बाहर आने का,उन जनों को सार्वजनिक रूप से
बेनकाब किया जाय जो मुस्लिम समुदाय को बदनाम करते हैं ।
     छिन कर लेगें आजादी, हमें चाहिए आजादी, अफजल तेरे कातिल जिन्दा हैं-हम बहुत शर्मिन्दा हैं,  इस प्रकार के बोल आम भारतीय मुस्लिमों के हो ही नहीं सकते यह तो किसी षङयंत्रकारियो के इशारे पर संचालित होता दिख रहा है जिसे बेनकाब करने की जरूरत है।
    दिसम्बर 2014से पूर्व आये हुए छह अल्पसंख्यक समुदाय जो (हिन्दु, सिक्ख ,इसाई, फारसी , बौद्ध ,जैन, ) पाकिस्तान ,बंगलादेश और अफगानिस्तान  से हैं ,तथा नेहरू लियाकत समझौता में इनके हित की बात का जिक्र था जिसे अनदेखा किया गया है वहाँ के सरकारों द्वारा,    उन्हें नागरिकता देने की बात उक्त संशोधन कानून में  है । चुकी यही समुदाय वाले लोग उस देश में अल्पसंख्यक थे तथा ये वर्तमान में भारत में अवैध रूप से रह रहे हैं ,इसलिए इन्हें नागरिकता देने की जरूरत भारत सरकार को दिखाइ पङी ।
          वर्तमान में भारत में जो नागरिकता कानून है वह 1955 के बने कानून से ही संचालित हो रहा है और इसके तहत विश्व का कोई भी नागरिक निर्धारित अहर्ता को पुरा करते हुए नागरिकता के लिए आवेदन कर सकता है,यह बात स्पष्ट है ।
            एक घर के मुखिया को अगर अपने क्षमतानुसार दस जनों का भरण पोषण करना हो तो वह अपने योजना नुसार अतिरिक्त संसाधन को सुख सम्पदा वैभव और अन्य आधुनिक व्यवस्थाओ  पर खर्च करता है , लेकिन उस दस जनों के अतिरिक्त अगर अवांछित व्यक्ति बराबर घुसपैठिया के रूप में आते रहे तो निश्चय ही एक अव्यवस्था की स्थिति हो रहा होता है और इसी अव्यवस्था से बचने का आयाम है नागरिकता संशोधन कानून-2019।
 
       दरअसल   ट्रिपल तलाक निषेध, नागरिकता संशोधन कानून, एन सी आर ,धारा 370, ये सभी तथ्य सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र में थे तथा देश की बहुसंख्यक जनता ने इन्हीं अपेक्षाओ के साथ चुना है कि वो अपने घोषणा पत्र को लागू करे और यही किया जा रहा है।
     लेकिन चुनाव पश्चात सत्ताधारी व्यक्ति किसी पार्टी या किसी संप्रदाय विशेष का प्रतिनिधित्व नहीं करता है ,अपितु वह भारत देश का सरकार होता है उन्हें संपूर्ण देश की जनता को विश्वास में  लेना ही चाहिए कि किसी के भी साथ अन्याय नहीं होगा ।
        आमतौर पर भारत की सरकार सर्वजन हिताय की बात करता है और वसुधैव कुटुंबकम को ही आत्मसात करता आया है, किसी को भी इसपर निरर्थक  चिंता  नहीं करनी चाहिए ।

Saturday, February 3, 2024

     श्रीराम आयेंगे
श्रृंखला-6
                       लंकाकांड
संत तुलसीकृत रामचरितमानस में षष्टम् सोपान लंकाकांड है. लंकाकांड को युद्ध कांड भी कहा जाता है क्योंकि लंका मे राम रावण युद्व सहित रावण वध इसी कांड का हिस्सा है. इस भाग में जामवन्त के निर्देश पर नल नील वानर के अगुवानी में समुद्र पर पुल बनाना  , श्री राम जी द्वारा रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना और पुजन , लंका में राम जी का प्रवेश ,राम - रावण युद्ध , लक्ष्मण का मुर्छित होना , हनुमान जी के द्वारा औषध लाना , पुष्पक विमान पर श्री राम सीता और लक्ष्मण का वापस आने की कथा विस्तार से बतायी गई है.
         समुद्रदेव के वचन सुनकर श्री राम ने वानर सेना को शीघ्रातिशीघ्र पुल निर्माण  का आदेश दिया. जाम्बवन ने नल नील को पौराणिक कथा सुनाते हुए उन्हें उनके दिव्य शक्ति का याद दिलाया. वानरी सेना को बडे बडे चट्टान लाने को कहा गया और नल नील ने श्री राम का स्मरण ध्यान करते हुए सुंदर सेतु का निर्माण कर लिया.
       यहीं पर प्रभु श्रीराम ने शिवलिंग स्थापना की इच्छा जताई . सुग्रीव ने इस कार्यार्थ श्रेष्ठ मुनीयों को बुलवा शिवलिंग की स्थापना कराया और श्री राम ने प्रसन्न होकर शिवलिंग का पुजन किया. यहीं श्री राम जी कहते हैं जो मनुष्य शिवजी की अनादर कर मेरी पुजन करेंगे वह व्यर्थ होगा ,बगैर शिवभक्ति के श्री राम के कृपा की चेष्टा व्यर्थ और मुर्खता पूर्ण याचना है.
        श्री राम की आज्ञा पाकर संपूर्ण वानर सेना पुल के उस पार के लिए चल पडे.       चलचर ,नभचर सभी प्राणियो़ नें श्री राम जी उत्सुकता से स्वागत किया. श्री राम पुल पार अपने वानरी सेना सहित सुबेल पर्वत  पर आश्रय लेते है़.
      इधर राक्षसी सेनाओं द्वारा रावण को यह समाचार सुनाया गया कि वानरी सेना ने समुंदर पर पुल बना लिया है और राम अपने सेनाओं सहित  सुबेल पर्वत पर पहुंच गये हैं. इस पर रावण ने अट्टहास उठाया . रावण की पत्नी मंदोदरी बारंबार रावण को समझाती है कि आप कुनीति को त्याग नीति के शरण में आ जाईए. राम को सीता वापस कर क्षमा याचना कर लिजिए.पर रावण का अहंकार तो कुछ भी सुनने को तैयार न था. उल्टे मंदोदरी को डांट डपट का सामना करना पडा.रावण मंदोदरी से अपनी प्रभुता कहने लगा कि मैंने अपनी भुजाओं के बल पर देवता , दानव, वरुण, कुबेर , यमराज  आदि दिक्पालों को तथा काल को भी जीत रखा है. तुम्हे भय किस कारण उत्पन्न हुआ है. मंदोदरी जान गई कालवश होने के कारण ही उसके पति को अभिमान हुआ है.
              रावण का पुत्र प्रहस्त हाथ जोड़कर कहने लगा कि , "हे प्रभु! नीति के विरुद्ध कुछ नहीं करना चाहिए . एक बंदर समुद्र लांघ कर आया. उसका चरित्र उत्कृष्ट है .उस समय किसी को भूख ना लगी ( बंदर तो तुम्हारा भोजन है). नगर जलाते किसी ने नहीं पकड़ा. 

वह खेल में समुंद्र बांध और सुबेल पर्वत पर सेना सहित उतरे हैं .मुझे कायर ना समझे . नीति अनुसार दूत भेजकर सीता को श्री राम को दे दीजिए . अगर सीता पाकर वह लौट जाएं तो झगडा यहीं समाप्त कर लेवें.
रावण ने गुस्से में पुत्र से कहा कि तुझे ऐसी बुद्धि किसने सिखायी  ? पिता के कठोर वचन सुनकर प्रहस्त यह कहता हुआ सभा से चला गया की मृत्यु के वश व्यक्ति को दवा नहीं सुहाती.
             रात में श्री राम ने दक्षिण की ओर देखकर विभीषण से कहा कि दक्षिण दिशा में मानो बादल घूमड़ रहा है . बिजली चमक रही है . मीठे - मीठे स्वर में बादल गरज रहे हैं .  विभिषण बोले कि कृपालु ना तो यह बिजली है और ना बादल की घटा .लंका की चोटी पर एक महल है .वहां रावण ने सिर पर मेघ तडित जैसा छात्र धारण किया है . वही मानो बादलों की घटा है और मंदोदरी के कानों में कर्ण फूल हिल रहे हैं  वही मानो बिजली चमक रही है.रावण का अभिमान समझ के श्री राम ने धनुष पर बाण का संधान किया . एक ही बाण में छत्र ,मुकुटऔर कर्ण फूल कटकर जमीन पर गिर गए. किसी को भी इसका भेद ना लगा और रावण की सारी सभा भयभीत हो गई . 
             शत्रु की सूचना प्राप्त कर श्रीराम ने मंत्रियों को बुलाया और कहा कि लंका के चार द्वार हैं . उन पर किस प्रकार आक्रमण किया जाए .  तब विचार कर वानरों की सेना के चार दल बनाकर सबसे उचित सेनापति नियुक्त किए .वानर सेना श्री राम की जय ,लक्ष्मण जी की जय,  वनराज सुग्रीव की जय कहकर गर्जना करने लगी.
जब रावण को पता चला तो वह हंसकर कहने लगा बंदर काल की प्रेरणा से चले आए हैं . सब लोग चारों दिशाओं में जाओ और वानरों को खा जाओ ,मार भगाओ . रावण की आज्ञा पाकर राक्षस अपने अपने शस्त्र ले कर चले.                    
          उधर रावण की और इधर श्री राम की दोहाई बोली जा रही हैं . श्री राम के प्रताप से वानरों के समूह राक्षसों को मसल रहे हैं. वानरों  के समूह किले पर चढ़कर श्री राम की जय बोलने लगे. राक्षस युद्ध के मैदान से भागे और लंका में हाहाकार मच गई. 
जब रावण ने यह समाचार सुना तो उसने कहा कि युद्ध में जो भी पीठ दिखा कर भागेगा मैं उसे स्वयं तलवार से मारूंगा . यह वचन सुनकर सब युद्ध के मैदान में लौट गए .अब उन्होंने  प्राणों का मोह छोड़ दिया . वे ललकार कर  वानरों से भिड़ने लगे . जिससे वानर भयभीत सा हो गये.
        हनुमान जी ने जब अपने दल को विकल देखा तो वह पश्चिम द्वार गए.  जहां मेघनाद युद्ध कर रहा था. वह द्वार टूटता ना था . हनुमान जी ने युद्ध में मेघनाथ का रथ तोड़ दिया  . सारथी को मार गिराया. मेघनाथ की छाती में लात मारी तो दूसरा सारथी रथ मेंं मेघनाथ को डाल  घर ले गया . 
        तब अंगद ने सुना कि हनुमानजी किले पर अकेले हैं तो वह भी वहां किले पर चढ़ गए .  दोनों वानरों ने उत्पात मचाना आरंभ कर दिया.  राक्षसों को मसल रहे हैं .
          श्रीराम सब को अपने परम धाम भेज रहे हैं. शत्रु की सेना को कुचल कर फिर दिन का अंत होता देख सभी बंदर वहाँ आ गए जहाँ श्रीराम थे. रात में चारों सेनाएँ वहाँ आ गई जहाँ श्री राम थे.जब श्री राम ने सब को कृपा दृष्टि से देखा त्यों ही सब वानर थकान रहित हो गए. 
           लंका में रावण ने मन्त्रियों को बुला कर कहा कि वानरों ने आधी सेना का संहार कर दिया है. अब क्या विचार करना चाहिए?
        माल्यवान ने जो रावण का नाना था ने कहा कि तुम जब से सीता को हर लाए हो तब से अपशकुन हो रहे हैं. शिव जी और ब्रह्म जी जिनकी सेवा करते हैं, तुम ने उन से वैर किया  ? 
       वैर छोड़ कर जानकी श्री राम को दे दो और श्री राम का नाम भजो. रावण  को उनके वचन बाणों की तरह लगे. रावण ने कहा कि तू बूढ़ा हो गया है. नहीं तो मार देता. तब माल्यवान ने अनुमान लगाया कि इसे श्रीराम अब मारना ही चाहते हैं  . 
मेघनाद ने कहा कि सुबह युद्ध भुमि में  मेरी करामात देखना. सुबह मेघनाथ की सेना और लक्ष्मण की सेना में जोरदार भिडंत हुई. मेघनाथ की सेना चारों तरफ से परास्त होने को थी. तभी  कुनीति से मेघनाथ ने बाण चला लक्ष्मण को मुर्छित कर दिया. लक्ष्मण अरद्धमृत्त सा हो गया.
   श्री राम ने जब लक्ष्मण की स्थिति जाना तो काफी परेशान सा हो गये. श्री राम ने हनुमान को लंका से सुषेन वैध को ले आने का निर्देश दिया. सुषेण वैध ने पर्वत औषधि लाने का निर्देश हनुमानजी को दिया. हनुमान जी ने औषध न पहचान पाने की स्थिति में पर्वत ही उठा लाया.
उधर श्री राम कह रहे हैं कि आधी रात हो गई है हनुमान जी अभी नहीं आए.  उन्होंने ने लक्ष्मण जी को गले से लगा लिया. श्री राम कहने लगे कि, "धन, स्त्री, पुत्र, घर और परिवार बार - बार होते हैं लेकिन सहोदर भ्राता बार - बार नहीं मिलता  . तुम्हारी माता को मैं क्या उत्तर दूंगा. प्रभु के विलाप को सुन कर वानर विकल हो गए. उसी समय हनुमान जी आ गए  . मानो करूणा रस में वीर रस आ गया हो. वैद्य सुषेण ने तुरंत उपाय किया जिससे लक्ष्मण जी उठ कर बैठ गए. श्रीराम ने लक्ष्मण जी को हृदय से लगा लिया. हनुमान जी ने वैद्य को वहाँ पहुँचा दिया जहाँ से लाए थे  . 
           रावण ने अब अपने को कमजोर होता देख कुम्भकरण को जगाया .कुम्भकर्ण विलख कर कहने लगा कि तू जग जननी जगदंबा को हर लाया. अब तू अपना कल्याण चाहता है! तू उस देवता का विरोध कर रहा है जिसके शिव, ब्रह्म सेवक है  . हे भाई तू जी भर कर मुझ से मिल ले और मैं जाकर श्रीराम के दर्शन करू.
युद्ध के मैदान में उसे विभिषण  मिला तो कुम्भकर्ण कहने लगा कि तुम धन्य हो रावण तो काल के वश हो गया है. मैं भी मृत्यु के वश हूँ मुझे अपना पराया नहीं सूझता. इसलिए तुम जाओ  .प्रभु श्री राम ने कुम्भकरण के विशालकाय शरीर देख कर स्वयं ही उनसे लडना उचित समझा. विविध गतिविधियां के पश्चात कुम्भकरण को युद्ध के मैदान से सक्षात श्री राम ने परमधाम को भेज दिया.
          राक्षसों की सेना का विनाश देख रावण विचार करने लगा. मैं अकेला रह गया हूँ . इसलिए उसने अपार माया रची. इंद्र देव ने श्री राम को बिना रथ के युद्ध करते देख अपना रथ भेजा. श्री राम उस रथ पर चढ़ गए. 
रावण ने माया फैलायी और वानरों और लक्ष्मण जी ने बहुत से रामों को देखा. श्री राम ने जब सेना को आश्चर्य चकित देखा तो उन्होंने  सारी माया हर ली.
श्रीराम ने रावण के सारथी और घोडों को मार दिया और रथ को चूर - चूर कर दिया. रावण ने दूसरे रथ पर चढ़ कर श्रीराम पर नाना प्रकार के अस्त्र शस्त्र चलाएं.
श्री राम ने उसकी बीस भुजाओं और दसों सिरों पर एक साथ बाण चलाएं. बीसों भुजाएँ और दसों सिर कट कर पृथ्वी पर गिर पड़े.  लेकिन सिर और हाथ कटते ही नये हो जाते. प्रभु श्रीराम बार - बार उसके सिर और भुजाओं को काटते. आकाश में उसके सिर और भुजाएँ फैल गई. 
रावण ने विभिषण पर परम शक्ति छोड़ी तो श्रीराम ने विभिषण को पीछे कर शक्ति स्वयं पर सह ली  . विभिषण ने गदा से रावण पर प्रहार किया और फिर दोनों में मल युद्ध होने लगा. हनुमान जी ने विभिषण जी को थका हुआ जान कर रावण से भिड़ गए. 
रावण माया दिखाने लग गया और उसने अनेकों रूप प्रकट किए. जिस से भालू, वानर विचलित होने लगे तो श्रीराम ने बाण चला कर माया के रावणों को मार डाला.
.. जानकी का संदेश सुन कर प्रभु श्री राम ने विभिषण से कहा हनुमान के साथ जाओ और सीता को लेते आवें.
विभिषण जी सुंदर पालकी सजा कर सीता जी को ले आए. वानर, भालू सीता जी के दर्शन करने दौडे़. आकाश से देवताओं ने फूल बरसाए.
सीता जी के असली रूप को अग्नि में रखा था  . अब श्री राम उनको प्रकट करना चाहते हैं. प्रभु के चरणों में सिर निवास कर सीता जी ने लक्ष्मण जी से कहा कि तुम आग तैयार करो.
सीता जी की विवेक, धर्म और नीति से सनी वाणी सुन कर लक्ष्मण जी के नेत्रों में जल भर आया. परन्तु श्रीराम से कुछ कह ना सके.
लक्ष्मण जी आग तैयार करके लकड़ी ले आए. आग की लौ देख जानकी जी ने कहा कि, " मन  , वचन और कर्म से मेरे हृदय में रघुवीर को छोड़ कर कोई नहीं है तो यह अग्नि मेरे लिए चंदन के समान शीतल हो जाए  . कोशलपति की जय बोल कर सीता जी ने अग्नि में प्रवेश किया. सीता जी की छाया मूर्ति और लौकिक कलंक अग्नि में जल गए. प्रभु के इस  चरित्र को किसी ने नहीं जाना.
अग्नि ने शरीर धारण कर सीता जी को श्री राम को वैसे ही समर्पित किया जैसे क्षीर सागर ने विष्णु भगवान को लक्ष्मी जी को समर्पित किया था. वह श्री राम के वाम अंग में विराजित हुई. सभी देवताओं ने आकर नाना प्रकार से श्रीराम की स्तुति की.
      फिर देव राज इंद्र ने प्रभु की स्तुती की और कहा कि आज्ञा दीजिये कि मैं क्या  करूँ  ? प्रभु श्री राम ने कहा कि जिन वानर, भालुओं ने प्राण त्याग किये है आप सबको जिंदा दो. प्रभु श्री राम तो त्रिलोकी को जिला सकते हैं उन्होंने ने इंद्र देव को बड़ाई देने के लिए ऐसा कहा. इंद्र देव ने अमृत छिड़क कर सबको जिला दिया.
           सभी देवता विमान में चढ़ कर अपने - अपने लोक चले गए. फिर भगवान शिव हाथ जोड़ कर प्रभु श्री राम से विनती करने लगे. प्रभु आप मेरे हृदय में निवास करे और जब आपका राजतिलक होगा तो मैं आप की लीला देखने आऊंगा.
        विभिषण जी पुष्पक विमान ले आए. श्री राम, लक्ष्मण जी और सीता जी के साथ- साथ सुग्रीव, नल, जाम्बवन्त्, अंगद, हनुमान और विभिषण जी सहित सभी विमान में चढ़े . विप्र चरणों में प्रणाम कर उत्तर दिशा की ओर विमान चलाया. विमान चलते ही सब श्रीराम की जय कहने लगे.
श्री राम सीता जी को रणभूमि दिखा रहे हैं यहाँ भारी निशाचर  मेघनाद, कुम्भकर्ण और रावण मारे गये. श्री राम ने बताया जहां पुल बंधवाया और श्री शिव जी की स्थापना की. फिर श्री राम ने सीता जी सहित रामेश्वर महादेव को प्रणाम किया.
वन में जहाँ - जहाँ श्री राम ने निवास किया वह स्थान सीता जी को दिखलाये. विमान दण्डकवन पहुँचा तो प्रभु अगस्त्य आदि ऋषियों के स्थान पर गये. ऋषियों से आशीर्वाद प्राप्त कर चित्रकूट आये. ऋषियों को संतुष्ट कर विमान आगे चला. श्री राम ने जानकी जी को यमुना जी के दर्शन कराये . फिर गंगा जी के कर तीर्थ राज प्रयाग के दर्शन किए. त्रिवेणी में पहुँच कर प्रभु ने स्नान किया और हनुमान जी से कहा कि तुम ब्रह्मचारी का रूप धरकर अवधपुरी चले जाओ.  भरत को हमारी कुशल कह कर और उनका समाचार लेकर आना. हनुमान जी तुरंत चल दिये.
श्रीराम भरद्वाज ऋषि के आश्रम गए. उन्होंने ने प्रभु की अनेकों प्रकार स्तुति की. ऋषियों को प्रणाम कर गंगा जी की ओर चले. वहाँ सीता जी ने गंगा जी की पूजा की. गंगा जी ने आर्शिवाद दिया तुम्हारा सुहाग अखंड रहे. निषादराज जी को प्रभु के आने का समाचार मिला तो वह प्रभु के चरणों में गिर पड़े. प्रभु ने निषादराज को अपने हृदय से लगा लिया.
जय श्रीराम
बहुत जल्द श्रंखला 7 उत्तर कांड