कहानी
संध्या
नन्हीं सी मासुम बच्ची संध्या अपने परिवार की अकेली चिराग बच गयी थी , भागलपुर दंगा 1989 में। समकालीन लोग आज भी उस आतंक भरी डरावनी परीदृश्य को याद कर सिहर जाते हैं। संध्या अपने मामा घर अमरपुर मे मामा मामी के संग रहने लगी। गुजरते समय के साथ संध्या की शादी एक खुबसूरत लड़के से करा दी गयी। संध्या के जीवन में अब खुशियाली छा गयी थी। बचपन से ही माँ बाप के प्यार से वंचित रह गयी संध्या अब सास और ससुर के स्नेहील छांव तले सुखद अनुभूति प्राप्त कर रही थी। और उनका पति हरेंद्र भी उनके सुख दुख का हर पल ख्याल रखता था। एक औरत को ससुराल का हर सुख मिलना, और साथ मे पति का प्यार शायद , पृथ्वी पर यही स्वर्ग होता है जो संध्या जी रही थी।
पर कहते हैं न सुख के दिन बहुत छोटे होते हैं। एक नवजात संतान गोद मे आये अभी तीन महीने भी नहीं बिते थे कि हरेंद्र एक सड़क दुर्घटना मे दुनिया को अलविदा बोल परलोक को गमन कर गये। पर हरेंद्र के माता पिता एक उच्च स्तर के मानवता को आत्मसात किये थे। हरेंद्र के जाने के बाद उन्होंने कभी भी संध्या को यह आभास नहीं होने दिया कि यह घर उनका नहीं है। एक बेटी समान प्यार उसे मिलता रहा।
समय अपने गति के साथ गुजरते गया। अब संध्या का बेटा अनुराग दो साल का हो चुका था। अपने सास ससुर और बेटा के साथ संध्या अपनी जीवन आम आदमी की तरह जी रही थी।
तभी एक शाम एक परिवार संध्या के घर चाय पर आता है। चाय -- नाश्ता और बातचीत के उपरांत आगन्तुक विदा हो लेते हैं, कुछ गुफ्तगु करते हुए संध्या के सास ससुर के साथ । संध्या अपने सास ससुर के साथ पुरी आत्मिक स्नेह बंधन मे बंध गयी थी और अपनी दुनिया अनुराग और अनुराग के दादा दादी तक सीमित कर ली थी।
धीरे धीरे अनुराग अब तीन साल के उम्र पर पहुँच चुका था। उनका पड़ोस के ही स्कूल मे नामंकन नर्सरी कक्षा हेतु कर दिया गया। और अनुराग को विद्यालय पहुंचाने के क्रम मे लोगों से संपर्क बढने लगा। संध्या ने अपने ससुर के सलाह से महिला मंडली एक गैर सरकारी संस्था से जुड़कर फुरसत के समय मे कुछ काम करना शुरू कर दी और दो पैसे अतिरिक्त आय के स्रोत विकसित हो गये।
लेकिन कहते हैं एक असली माँ बाप ही बेटी के दुख तकलीफ को समझने की क्षमता रखता है। संध्या अगर जवानी मे विधवा हो गयी और उसके रहने खाने वस्त्रादि की व्यवस्था हो गयी तो मतलब समस्या खतम हो गयी -- यह आंशिक सत्य है। एक महिला को आजीवन पुरुष साथी ही खुशहाल जीवन दे सकता है और इस बात को संध्या के सास ससुर ने बखुबी न सिर्फ समझा बल्कि बड़ी होशियारी से अमल मे भी लाया।
संध्या की सास ने अनोखे अंदाज मे प्यार जताते हुए बोली -- संध्या क्या होगा तेरा तब जब मैं और तेरे ससुर इस दुनिया को छोड़ जाऊंगी------
पुत्र वियोग में रह रहे एक वृद्ध दंपति अपने को अकेला बेसहारा करके अपने विधवा पोतहु को कहीं और कोई नया घर बसा देना चाहता हो -- कितना कठिन होगा वह निर्णय लेने की घड़ी ----
तब जबकि बुढ़ापे मे हर कोई एक सहारा चाहता हो।
संध्या बोल पड़ी होगा क्या अम्मा -- वही जो मंजुरे खुदा होता है ----!
ओह हो तुम मेरी बहु और बेटी दोनों हो -- और एक माँ को बेटी का जो प्यार मिलना चाहिए उससे ज्यादा प्यार तुमने हम दोनों को दिया है--
क्या तुम अपनी माँ को रोक दोगी -- अपने बेटी को प्यार करने से --?
क्या यही तेरा इंंसाफ है --?
आदेश हो अम्मा -- ईश्वर का प्रत्यक्ष रूप मैने आप दोनों मे अनुभव किया है और आप दोनों के सिवा मेरा इस दुनिया में है भी कौन --? आपके हर आदेश को ईश्वर का आदेश मानुंगी --?
तभी संध्या के ससुर बोल पड़े--
बेटा तुझे घर से विदा करने की हिम्मत ही नहीं है हममें -- बस तुझे एक और नया घर दे रहा हूँ, तेरा हमसफर तुझे देने जा रहा हूँ --
वो जो कुछ माह पहले एक परिवार चाय पर अपने घर आया था वह तुझे देखने ही आया था और तुम उनलोगों को पसंद हो और आज ही लड़का से तुझे मिलाऊंगा --
-- भगवान के नाम पर तुम ना नहीं कहना
हमारा स्नेह और प्यार यूं ही तेरे लिए बनी रहेगी --
कितना दुर्लभ और कठिन क्षण होगा किसी औरत के लिए ऐसी परिस्थिति पर फैसला लेना--
जिंदगी हर मोड़ पर परीक्षा लेती है और अगर कुछ समझ न आये बीच मझधार में अकेला महसूस कर रहे हों तो बस अपने आप को ईश्वर को समर्पित कर दें -- निर्झरनी के बहते तेज प्रवाह जल मे अपने को चीत छोड़ दें -- ईश्वर आपको उचित किनारा पर पहुँचा देंगे। यह संशय से परे तथ्य है।
लड़का लडकी एक दुसरे से मिला दिये गये और शादी के दिन तय कर दिये गये--
ईश्वर जब धैर्य की परीक्षा लेता है तो उस परीक्षा को पास करने से ज्यादा आसान कभी कभी आत्म हत्या कर मृत्यु को गले लगाना होता है -- पर ईश्वर की मर्जी के आगे किनकी क्या चली है ----
संध्या के सामने एक और कठिन परीक्षा आ गयी --
नव दुल्हा लड़का श्री सुरेंद्र प्रसाद का एक शर्त था जिसे हरेंद्र के मां पिता ने स्वीकार कर लिया था अब बारी थी संध्या की--
संध्या -- सुरेंद्र का एक विचार था कि अनुराग अपने बाबा दादी घर ही रहेगा और वह अपनी मम्मी के साथ नहीं आयेगा -- ससुर साहब का विचार कोमल शब्दों मे आया।
किसी भी औरत के लिए उनके बेटा से जुदा होना , उस बेटा से जिसे अपने छाती पर लगा कर संध्या हर रोज सुलाती थी-- अनुराग को मम्मी और पापा दोनों का ही प्यार तो संध्या ही देने को मन से संकल्पित थी और वह बच्चा जो माँ के सीने से चिपक कर सोता था, वह पितृ सुख से तो वंचित था ही अब मातृ सुख से भी वंचित रखने की व्यवस्था इस दुनियादारी ने कर दिया वो भी क्यों कि संध्या का भविष्य उज्जवल रहे -- वाह रे दुनिया दारी और वाह संसार के मालिक मेरे भगवान आपकी ये क्या मालकियत है जो आपने एक लाठी से कई के हौसले पस्त कर दिये --
*हरेंद्र के मम्मी पापा निसहाय हो चले थे जो अंदर से टुट रहे थे
* अनुराग मातृत्व वात्सल्य से अलग होने जा रहा था
*संध्या एक घर -- एक वृद्ध दंपति -- और अनुराग को बेसहारा करके दुसरे अनजान घर मे अपना भविष्य तलाशने के लिए बाध्य थी,
एक सादा सरल वैवाहिक समारोह का आयोजन शहर के एक मंदिर मे संपन्न हुआ और अब संध्या हुई सुरेंद्र की --- दुल्हन --
अनुराग को चुम्बन देते जबरदस्ती हाथ छूडाते, आंसु के घुंट पीते, अपने सास ससुर के सानिध्य छांव से प्रत्यक्ष रूप मे अपने को दुर करते संध्या चल पड़ी सुरेंद्र के साथ एक नयी जिंदगी जिने। --
संध्या का अब नया आशियाना था । सुरेंद्र पुरूषोचित मानसिकता के साथ भरपूर मानवीय संवेदना को आत्मसात किये हुए था। लेकिन एक पुरूषोचित मानसिकता -- मानवीय संवेदना पर हावी हो जाता है जिसका परिणाम था अनुराग और संध्या का विच्छेद।
संध्या विधना ( विधान रचने वाला) के अनुकूल सुरेंद्र के हर सुख दुख का ख्याल रखती थी। सुरेंद्र भी एक अच्छे पति और मानव रूप मे संध्या को हरेक प्रकार की सुख सुविधा मिले इसका ख्याल रखती थी।
समय बितते गया। संध्या ने एक खुबसुंदर बच्ची को जन्म दिया। मानिए एक ठुंठ उजड़े हुए वृक्ष पर कोपल आये हों -- प्रकृति का अनमोल उपहार इस चमन मे आया -- और पुरा परिवेश -- बाग - बाग हो गया--!
एक बच्चे को जन्म देना किसी भी औरत को कष्ट के उस स्थिति को झेलने के समान होता है मानिये कि वह उसका पुनर्जन्म हुआ हो -- और माना जाता है जिस औरत ने बच्चे को अपने गर्भ से जन्म नहीं दिया वह संपुर्ण औरत के प्रकृति को जी नहीं पायी वह शरीर से औरत होकर भी एक अधुरी औरत है-- और जिस पुरूष ने औरत के इस कष्ट को न समझा हो वह असल में एक पति के रूप मे
अधुरा प्यार ही पत्नी को दे पाया है -- आप अपने परिवेश मे इस बात को देखने का प्रयास करें आप पायेंगे कि ये आधी अधुरी औरत और अधुरा प्यार देने वाला अनेकों पति आपको मिल जायेगा ---
खैर चलिए संध्या और सुरेंद्र के पास और बहुत पास उनके नवजात बच्ची को देखने।
छट्टी और नामकरण संस्कार एक साथ संपन्न हुए जिसमे अनुराग और अनुराग के दादा दादी भी शामिल थे---
नवजात बच्ची का नाम 'अर्पण' रखा गया। जब अर्पण मुस्कुराती थी , मंद मंद ओठो की मुस्कुराहट -- मानिए सक्षात देवी भगवती मुस्कुराकर इस घर आंगन को आशीर्वाद दे रही हो -- यह अनुभूति --- प्रकृति का यह उदगार -- किसी भी वैज्ञानिक और ए आई के क्षमता से बाहर की चीज है। और इस अनुभूति को पाकर, अर्पण के रूप मे सुरेंद्र को अपने जीवन की सबसे बड़ी खुशी मिल गयी थी जो अनमोल थी।
सुरेंद्र अपने काम धंधा पर जब घर से बाहर रहता तो संध्या और अर्पण का ख्याल फोन पर लेते रहता था। लेकिन नवजात शिशु को संभालना अकेले औरत के बुते बड़ा कठिन कार्य होता है। सो अनेकों परेशानीयां के साथ कुछ दिन तो ठीक ठाक बीत गये लेकिन अब संध्या शारीरिक रूप से असहज होते जा रही थी इन परेशानीयों को झेलने में।
संध्या ने सुरेंद्र से अनुरोध किया कि अगर कुछ दिन मैं अनुराग के दादा दादी पास चले जाऊं तो शायद मुझे आराम हो सकती है, लेकिन आपको थोड़ा कष्ट होगा-?
सुरेंद्र ने परिस्थिति पर विचार करते हुए, संध्या के कष्ट को देखते हुए उनका यह प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार किया और मानवीय संवेदना का परिचय दिया। संध्या और अर्पण कुछ दिनों के लिए अनुराग के दादा दादी के पास पहुंच चुके थे।
संध्या के इस घर पहुंचते ही संध्या के सास और ससुर सहर्ष गदगद हुए और नवजात बच्ची को गीत, दीपक , पुष्प, टीका सहित कई रस्मो रिवाज संपन्न कराते घर के अंदर सवागत के साथ लाया गया । खुशी तो उस समय प्रकट हुई जब अनुराग अपने मम्मी से चिपक गया और दोनों हाथों से मम्मी को कसकर पकड लीया ( जांघ के पास) और बोलने लगा मम्मा तुम पहले बोलो कि तुम मुझे छोड़कर अब कभी नहीं जायेगी --!
ओहहहह् -- भगवान आपकी लीला अजीब है -- क्या क्या नाटक रचते हैं आप --!
अनुराग मैं तेरे पास ही आया हूँ और अब तेरे पास ही रहूंगी---?
एक बड़ी सी झुठ सत्यता को कैसे समेकित करते हुए अपने आवरण मे ढ़क लेती है -- यहाँ माँ की ममत्व के सामने सब कुछ सही दिखता है।
उधर सुरेंद्र आफिस से घर आता तो था लेकिन अब उसे यह घर प्रवेश होते ही सुनसान सा लगने लगा था मानिए जिस बाग मे हरपल गुलाब और गेंदा चहक रहा हो और वह बाग अगर अचानक से बंजर जैसा हो गया हो ,किसी ने उसे उजाड सा दिया हो -- तो वह बाग - अब बाग कहाँ रहा -? आफिस से आते ही अर्पण और संध्या -- सुरेंद्र की जरूरत बन गयी थी।
मछली की छटपटाहट जल के बगैर जो होती है उसी सदृश्य सुरेंद्र की मानसिक छटपटाहट थी संध्या और अर्पण के बगैर --
यही तो असली मानवीय संवेदना है --
अभी तीन दिन भी न हो पाये थे कि सुरेंद्र ने आफिस में मन ही मन निर्णय लिया कि नहीं कुछ करने चाहिए नहीं तो मैं जल्द ही पागल हो जाऊंगा -; मानसिक अवसाद मे चला जाऊं इससे पहले ही कुछ उपाय करने चाहिए --
पांच बजे आफिस बंद होने थे। आफिस बंद होने से पहले ही सुरेंद्र ने तीन बजे एक कार भाड़े पर लिया और चल दिया अर्पण और संध्या के पास --
सुरेंद्र जैसे ही दरवाजा खोलता है देखता है बीच आंगन संध्या अर्पण को गोद मे रखी है और कुछ कुछ चम्मच से खिला रही है-- साथ ही अनुराग अपनी मम्मी का पल्लू पकड़कर खडा है और वह भी मम्मी के हाथों कुछ और चीज खा रहा है --
संध्या के चेहरे पर वो आत्मिक और मानसिक संतुष्टि के साथ खुशी झलक रही थी जिसे इससे पहले सुरेंद्र ने कभी नहीं देखा।
सुरेंद्र इस परिदृश्य को देखते हुए इस आत्मग्लानि के स्थिति मे आ गया कि मुझे अपने संतान को अपने से तीन दिन दुर रखना असहनीय हो गया और मैं ने एक माता( संध्या) को उसके संतान से वर्षों दुर रखा -- कितना पिड़ादायी है यह मेरा निर्णय --!
और आहिस्ता सुरेंद्र घर के अंदर प्रवेश करता है और अनुराग के दादा दादी का पैर छुता है -- दादा दादी द्वारा उचित सम्मान के साथ सुरेंद्र का स्वागत किया गया।
अनुराग कि समझदारी अब कुछ बढ़ चुकी थी -- वो बोल पड़ा-- मम्मी तुम चली जाओगी -- ! मम्मी -- मम्मी तुम मुझे छोड़ कर चली जाओगी। फिर मम्मी से कुछ भी उत्तर न पाकर अनुराग सुरेंद्र के पास जाता है और बोलता है अंकल आप मम्मी को ले जायेंगे ना-;! अंकल --- अंकल -- आप मम्मी को ले जाने आये हैं ना--?
अंकल-- मैं जाने ही नहीं दुंगा मम्मी को--!
समस्या का उत्पन्न होना मानव के नियंत्रण से बाहर की चीज होती है तो समस्या समाधान भी मानव नियंत्रण से परे किसी अदृश्य सत्ता के हाथ होती है --- यह अटल सत्य है। हम सब सिर्फ शतरंज के मोहरे जैसे हैं। इसलिए भगवान को विध्नकर्ता और विध्नहर्ता दोनो ही नामों से जाना जाता है --
सुरेंद्र ने अनुराग के पीठ पर हाथ सहलाया और थपथपाते हुए बोला --
अनुराग मैं तेरा अंकल नहीं हूँ ----!
मै तेरा पापा हूँ बेटा।
आज से तुम मुझे पापा बोलना और तुम भी मेरे साथ ही रहोगे जैसे संध्या और अर्पण रहता है
अब चल़ो संध्या, अर्पण और अनुराग दोनो साथ साथ रहेगा -- अपने मम्मी पापा के साथ
धन्यवाद
©®पवन मिश्रा
16-02-2025
दुमका झारखंड
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