Friday, October 9, 2020

चिल्लाती झकझोरती पत्रकारिता की आत्मा-----------युगल से गुगल तक


चिल्लाती -झकझोरती पत्रकरिता की आत्मा-----------युगल से गुगल तक
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       पत्रकारिता शब्द अंग्रेजी भाषा के शब्द जर्नलिज्म का हिंदी अनुवाद है ,और इसका मुल शब्द जर्नल है जिसका हिन्दी अर्थ दैनिक होता है। इस प्रकार से पत्रकारिता के तहत दैनिक हलचल से आम जनों को अवगत कराने के प्रयास और इसमें निहित विविध आयामों को हम देखते हैं।

              पुरातन संस्कृति से निरंतर आज तक उपलब्ध व्यवस्थाओं को व्यवहार में लाकर जन व्यापकता के हित कि बात सरेआम प्रसारित किया जाता रहा है। इस मामले में आदिवासी संथाल समुदाय द्वारा सखुआ पत्ता बांटकर और डुगडुगी बजा कर जन चेतना को जागृत करने की बात तथा अपने समाज के पुरातन परंपरा  को आज तक व्यवहारिक रुप से प्रयोग में लाने की बात को  गंभीरता से विचार किया जा सकता है। मुगलकालीन खबरनवीसो के भी समकालीन  संचार प्रसार में   अहम योगदान थे।

                आधुनिक काल यानी अंग्रेजों के आगमन और मुगल अवसादान काल से  पत्रकारिता के वर्तमान स्वरुप का हम शुरूआत देखते हैं।  'उदंड मार्तंड'  एक हिंदी समाचार पत्र जिसे पत्रकारिता के मामले में एक सुव्यवस्थित शुरूआत (30 मई1826) कहा जाता है और इसके संपादक थे युगल किशोर शुक्ल। ‌ इसी युगल से गुगल तक की पत्रकारिता ने अपने मौलिकता से समझौता सा कर लिया है--- कुछ तो इनकी जरुरत थी और कुछ बदलते दौर के बदलते तकनीक की आवश्यकता थी आज की पत्रकारिता।           कलांतर में भारतेंदु हरिश्चंद्र जिसे हिंदी साहित्य और नवजागरण  के अग्रदूत के रुप में ख्याति मिली उन्होंने हरिश्चंद्र मैग्जीन , हरिश्चंद्र चंद्रिका, कविवचन सुधा और समाधार सुधावर्षण जैसे समकालीन अनेकों माध्यम से पत्रकारों कि आवाज को जन जन तक पहुंचाने का कार्य किया।

              1780 में जेम्स अगस्टस हिक्की द्वारा   प्रकाशित बंगाल गजट तथा  राष्ट्रीय प्रेस के संस्थापक राजा राम मोहन राय द्वारा संवाद कौमुदी और मिराउतुल अखबार  सहित ये सभी भारतीय पुनर्जागरण और प्रगतिशील राष्ट्रीय जनतांत्रिक प्रवृत्ति को ही प्रसारित कर रहे थे। कलांतर में यही हिंदी पत्रकारिता राष्ट्रीय आंदोलन के अग्र पक्ति में संघर्षरत थे और ब्रिटिश शासकों के जनविरोधी नीतियों को जन जन‌ तक पहुंचाने के लिए प्रयासरत रहे।

           भारतीय लोकतंत्र के तीन मजबुत स्तंभ हैं ---- कार्यपालिका , न्यायपालिका और विधायिका । आजाद भारत में पत्रकारिता के महत्व को जन जन ने स्वत: स्वीकारा और इसे एक सजग प्रहरी , सच के सिपाही , लोकतंत्र के चौथे स्तंभ जैसे विशेषणों से इसे विभुषित किया गया है। लेकिन पत्रकारिता का वर्तमान स्वरूप क्या इन विशेषणों को और  इनसे संबंधित उत्तरदायित्वों को ठीक ठीक वहन कर पा रहा है---? इसी क्रम में सोशल मीडिया के मंच पर स्वपत्रकारिता का आना पत्रकारिता के मौलिक  स्वरूप को ही धाराशाही करता दिख रहा है। पत्रकारिता की आत्मा कभी भी सच से विचलीत होने की इजाजत नहीं देता है , भाषायी मर्यादा का पालन और व्यैक्तिक अनुशासन इनके हर शब्द में दिखनी चाहिए। लेकिन  पत्रकारिता के गिरते स्तर ने ही पप्पु ,बुआ ,बबुआ, भक्त,अंधभक्त,चम्मचे, फेकु जैसे शब्दों को प्रतिस्थापित कर दिया है जिसे बखुबी एक दुसरे की भावना से खेलने और उत्तेजित करने के काम लाया जा रहा है और सच से वर्तमान को भटकाने के लिए इन शब्दों का प्रभावी प्रहार किया जा रहा है।

          ' कोबरा पोस्ट वेबसाइट ' नामक एक संस्था ने सन् 2018 में एक स्टिंग आपरेशन चलाया । इस स्टिंग आपरेशन में भारतीय मीडिया के सभी आयामों ( प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सोशल मीडिया ) के  लगभग  एक सौ छत्तीस प्रभावशाली मंचों पर -- पुष्प शर्मा ने अपने मनोनुकूल बातों को प्रसारित करवाने का प्रयास किया ।  आपरेशन 136 नाम से प्रकाशित अपने सार्वजनिक रिपोर्ट में इनका दावा है कि भारतीय मीडिया को लालच देकर आसानी से मनोनुकूल खबरें प्रसारित किया जा सकता है। जातीय दंगे, सरकारी कार्यों के प्रभाव को बदनाम और जनता के अनुकूल और प्रतिकुल बताना सब कुछ कराया जा सकता है-- लाभ पहुंचाने की सहमति पर। इस मामले में 136 में से सिर्फ 'दैनिक संवाद' और 'वर्तमान पत्रिका'
 नामक दो जगहों पर इसे असफलता हाथ लगी थी। स्पष्ट है, पत्रकारिता के अंधे युग में भी  सच वाली रोशनी  की किरणें अभी भी कहीं न कहीं जुगनू कि तरह चमक रही है , जिसके वाहक कम हैं इसे बचाने की महती आवश्यकता है। विश्व प्रेस मीडिया इंडेक्स में भारतीय मीडिया के गिरते स्तर चौंकाने वाले हैं। 2018 में यह 136वे पायदान पर था और भविष्य में इसके और नीचे गिरने की संभावना बताया गया है।

    आदर्शों और वुसुलो की पत्रकारिता का पाठ पढ़ाई करने वाले , युगल किशोर शुक्ल के उतंड मार्तंण्ड को आदर्श मानने वाले  पत्रकारिता की शुरूआत करने वाले  अनजाने में ही बातों बातों में अपना दबदबा इस तरह बढ़ाते चले आये हैं,मानिए वह सच में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की भुमिका के साथ साथ नीति नियंता की भुमिका में हों---- गरजन और डांट डपट तो  आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का आवश्यक हिस्सा सा बन गया है। इन्हें मतलब है सिर्फ अपने टि आर पी से। पुंजीपति घरानों का राजनीतिक महकमों से अनुनय संबंध और इसी कड़ी में मीडिया का प्रवेश एक तिकड़ी समीकरण बनाता रहा है जो स्वहित के लिए सभी वसुलो और आदर्शों पर भारी साबित कर रहा है। जब सत्ता मीडिया को अपने चरणों में लेटने का इशारा कर रहा हो और  मीडिया के अधिकांश घराने खुशी खुशी ऐसा करने को उत्साहित हो रहे हों तो खबरें कितनी सच और कितनी झुठ आ रही है इसका आकलन कर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। जहां जनता भी झुठ की खबरों को बगैर तर्क के चुपचाप सच मान सुनते ही गदगद हो जा  रहा हो वहां सच के इक्के दुक्के सिपाही आखिर कब तक  अपने दम पर इस अंधेरे से लड़ेंगे ।

         पवन मिश्रा
      दुमका झारखंड
      पिन-- 814101
Email--
pawan19755@gmail.com

Sunday, September 27, 2020

अन्नदाता के थाली में छेद-----!


अन्नदाता के थाली में छेद-----!
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            किसानों के हौसला अफजाई के लिए कभी हमारे सादगी प्रधान यशस्वी प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने कहा था --- "जय जवान --जय किसान" । लेकिन वास्तव में किसानों की जय-जयकार क्या कभी हो भी पाई ---? यह एक गंभीर प्रश्नगत मामला है, जो पूछता है भारत और   यहां कि 52% आबादी जो सीधे सीधे आज भी कृषिगत कार्यों से अपना जीवीकोपार्जन करता है।
          आजादी के बाद किसानों के व्यापक हित के लिए मंडी /अढैती और अनाजों के लिए तय किये जाने वाले न्युनतम समर्थन मूल्य (मिनीमम सपोर्ट प्राइस--एम एस पी) निश्चित रूप से किसानों के हक में लिया गया अच्छा फैसला था । लेकिन बदलते दौर के साथ बदलते हालात ने किसान रुपी समुदाय के बहुसंख्यक आबादी को सिर्फ़ भोट बैंक के तहत हमेशा से अपने पक्ष में भुनाने का प्रयास किया है । कुछ खास राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्र में हमेशा से अनवरत किसानों के हक में कर्जमाफी का प्रस्ताव रहता आया था --और कई बार इनके बहुसंख्यक मतदान के उत्तर में इन्हें कर्जमाफी की सौगात भी भेंट होती रही है।
किसानों के कर्ज माफी ने इन्हें आदतन सरकारों से मदद लेने के मामले में आशावादी बनाते गया और ये निरंतर  लाचार होते गये और आज आत्मनिर्भर और आत्ममजबुती के मामले में ये पिछड़ सा गये हैं। शायद कभी भी गंभीरतापूर्वक इसे मजबुत और सम्मुनत बनाने के ईमानदार प्रयास नहीं किये गये।
           आज के दिनों में सांसदों में से 38% सांसद सक्रिय किसान हैं और विडम्बना देखिए 52%आबादी कि प्रत्यक्ष --अप्रत्यक्ष निर्भरता कृषि पर है---जबकि  सकेलु घरेलू उत्पाद (जी डी पी) में इनका योगदान 17% से 18% मात्र है। अब बात यह स्वभाविक रुप से उठता है कि इतने ज्यादा संख्या वाले कृषक सांसदों के रहते हुए किसानों की इतनी दुर्दशा क्यों--? क्या राजनीतिक दलों के सोची समझी साज़िश का परिणाम है वर्तमान कृषकों की दयनीय स्थिति--?
              कृषक हित के लिये कार्यरत एक गैर सरकारी संगठन के अध्ययन के मुताबिक मल्टीनेशनल कम्पनियों में उपलब्ध कृषिगत कच्चे /अनप्रोसेस्ड सामग्रियों के दामों में कृषकों को प्राप्ति स्तर मात्र  23% से 30% है। यानि हमलोग जिस चीज को ₹100 में खरिदते हैं , उसमें से किसानों को उसका किमत मात्र 23 से 30 रूपैया तक ही मिल पाता है। लगातार लागत मुल्यों में वृद्धि और बाजार मुल्यों के अन अपेक्षित स्तर‌ से तंग होकर सन् 2019 में दस हजार किसानों ने  मजबुरन आत्महत्या कर लिया । आज के दिनों में  हरेक किसानों की औसतन कमाई₹ 6400 प्रति महिना है ,जिसे वर्तमान सरकार सन् 2022 तक ₹13000 के औसत महिना की कमाई तक पर पहुंचाने की कार्ययोजना पर काम कर रही है । इसी तरह आज के दिनों में प्रति किसान लगभग औसतन ₹ 1.4 लाख कर्ज है, जिसे सरकार सन् 2022 तक आधा करने की ओर निरंतर प्रयासरत है।

      "अन्नदाता सुखी भव: " की कामना सासंद भवन के विजिटिंग रजिस्टर पर  अंकित करने वाले प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक पृष्ठभूमि का केन्द्र और आधार कभी भी किसान नहीं रहा। समग्र विकास में किसानों की अनदेखी न तो गुजरात में किया गया और न ही आज संपूर्ण भारत में किया जा रहा है। गुजरात और महाराष्ट्र के कपास कृषकों की व्यथा तथा इन्हें समय समय पर दिया गया प्रोत्साहन स्मरणीय हो। 

         किसानों के हक की आवाज बुलंद करने वाले राजनीतिक पार्टियों में से "अकाली दल" और एन सी पी-- "नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी" द्वारा हालिया कृषि सुधार बिल --2020 पर हो हंगामा मचाना --- रोड जाम आज सरे आम चर्चा में है। वर्तमान कृषि सुधार बिल के मुख्य तथ्यों को पंजाब विधान सभा चुनाव और लोक सभा चुनाव सन् 2019 में कांग्रेस सहित कई राजनीतिक पार्टियों ने अपने चुनावी घोषणापत्र में प्रमुखता से शामिल किया था। फिर यह हो हंगामा क्या खोते जा रहे राजनीतिक आधार को हो हल्ला के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का प्रयास कहा जा सकता है---? 
         देश के किसानों को यह याद हो उदारीकरण के शूरुआती  दौर में बहुराष्ट्रीय कंपनीयों के बीज जब बाजार में आये थे, तो हजारों आशंकाएं जनमानस में दौड़ रही थी। आज यह साबित हो चुका है, किसानों द्वारा उत्पादित अनाज का बीज के रूप में उपयोग से ज्यादा फायदेमंद इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा उपलब्ध कराये जा रहे बीज की उत्पादकता है , जो ढाई से तीन गुणा अधिक ही नहीं है, बल्कि दिर्घकालिक अभी तक कोई नुक़सान भी चिन्हीत नहीं हो पाये हैं  ।

     तमाम आशंकाओं के बीच देश के गृह मंत्री बिन्दुवार सभी तथ्यों को स्प्ष्ट  कर चुके हैं। किसानों को उनके उत्पाद पर ही अनुबंध करने की आजादी है --- जमीन पर कोई भी अनुबंध वर्तमान बिल का विषय वस्तु ही नहीं है।‌ अनुबंध से निकल जाने की आजादी कृषकों के पास हर समय उपलब्ध होगा। किसानों के लिए वर्तमान में उपलब्ध अढैती--(मंडी) तथा न्युनतम समर्थन मूल्य की वर्तमान व्यवस्था (एम एस पी) आज के तरह ही आगे भी  निरंतर चलते रहेंगे -- सरकारी महकमा इस बात का आश्वासन सार्वजनिक पटल पर दे चुकी है। वर्तमान कृषि सुधार बिल किसानों को  अपने उत्पाद बेचने के लिए एक अन्य बेहतर  और मजबुत  विकल्प देने जा रही है। यही वह बिल है जो देश के किसानों को बदलते दौर के साथ  समुन्नत कर देश के बहुसंखयक जनता के विकास में ए टू जेड विटामिन साबित होगा।
    
     तो फिर इस बिल को  कतिपय जनों द्वारा "अन्नदाता के थाली में छेद---!" के रूप में देखा जाना कई एक प्रश्न खड़ा करता है। किसानों और बाजारों के बीच वर्तमान मध्यस्थ की भुमिका और मलाई चट कर जाने वाले   लोगों के बीच अपने हित की बली चढ़ता देख उसी परिस्थिति  को बचाने की छटपटाहट का यह नतीजा है तथाकथित जनांदोलन। गंभीर मंथन और अध्ययन हमें अच्छे परिणाम की आशा के साथ वर्तमान कृषि सुधार बिल के प्रति आश्वस्त करता है, जो किसानों को आत्मनिर्भर   और  आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

पवन‌ मिश्रा
दुमका-- झारखंड
9931126996
email- pawan19755@gmail.com
    

         

Tuesday, September 22, 2020

राजनीति की भाषा - राजनेता ही जाने

राजनीतिक भाषा --- राजनेता ही जाने

नियोजन नीति--2016 के तहत चयनित शिक्षकों की सेवा खतरे में है । माननीय उच्च न्यायालय रांची के बृहत्तर खंडपीठ ने किसी भी नौकरी और भु क्षेत्र के लिए शत प्रतिशत आरक्षण को असंवैधानिक  बताते हुए , झारखंड सरकार --(जे एस एस सी) द्वारा चयनित और कार्यरत (सिड्युल्ड--13 जिले के इस वर्णित नियोजन नीति पर) शिक्षकों की नौकरी को गैर नियमानुकूल मानते हुए क्वैश कर दिया है।

      कई एक मित्रों का मानना है कि यह बिल्कुल सही है । माननीय न्यायालय के निर्णय पर टिका टिप्पणी का दायरा बहुत सीमित होता है---- और संक्षेप में कहना चाहूंगा यह सही भी है------!

         यह निर्णय सही है--- , नियोजन नीति भी तो कल परसों तक सही ही था -- क्योंकि इसे व्यापक प्रक्रिया अपनाकर कैबिनेट सहित विधानसभा में पास कराया गया होगा इसके बाद राज्यपाल महोदया द्वारा हस्ताक्षरित करते हुए, सभी आवश्यक वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करते हुए ही उस समय लागु किया गया होगा।
        लम्बी वैधानिक प्रक्रिया के बाद पदों का सृजन और इसके बाद विज्ञापन फिर बहाली। यानि की हरेक स्तर पर कानुनी प्रक्रिया का अनुपालन सुनिश्चित किया जाना जरुरी होता है। 

लोकतंत्र के शासन संचालन में सरकारी पक्ष और विपक्ष दोनों की कमोबेश समान भुमिका होती है और जनता के हक में संतुलित व्यवस्था संचालन इन दोनों की समान जिम्मेदारी। 

        आज हमारे माननीय मुख्यमंत्री जी जो बहुत ही संवेदनशीलता के साथ इस मुद्दे पर यह कह पाये--- कि पिछली सरकार द्वारा राज्य को 13 और -11  जिलों में शिड्युल और नन शिड्युल के तहत  दो भागों में बांटने की साज़िश थी उसे कोर्ट ने विफल कर दिया है।

         मुख्यमंत्री जी हम गैर राजनीतिक जनों को भाषायी संकेत में जाने की कोई आवश्यकता नहीं है --- न ही उतनी समझ है। लेकिन उनसे समान्य जनों की नाराज़गी और आपमें बेहतरी‌ को देख कर ही राज्य की जनता ने आपको अपना मुखिया चुन लिया है।

     अगर नियोजन नीति गलत है तो फिर इस गलती की जिम्मेदारी आप पर भी है।आप उस समय विपक्ष में रहते हुए इसे पास कैसे होने दिये---! आप अपने इस जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते हैं --- हेमंत भैया ---।

     आप तो नौकरी देने और स्थानीयता को वरीयता जैसे मुद्दों पर जनता से भोट मांगे थे--- झारखंड की जनता को यह बात प्रमुखता से याद  है , उम्मीद है आप भी इसे नहीं भुले होंगे।

          व्यवस्था के तहत शिड्युल्ड एरिया में सिर्फ उसी जिले के स्थायी  वासी आवेदक थे --- और नौकरी कर रहे हैं।
 ऐसे में आप द्वारा झारखंडी को दिये गये अश्वासन का ही पालन उपरोक्त व्यवस्था में हो रहा था।

       फिर पिछली सरकार के जिम्मे आरोप मढ़कर आप अपनी जिम्मेदारी से कैसे उन्मुक्त हो सकते हैं---!

        चलिए हम सभी मानते हैं यह नियोजन नीति गलत है-----

   तो फिर इस नियोजन नीति बनाने वालों को क्यो नहीं दण्डित किया जाय--?

जिम्मेदारी तो तय होने  ही चाहिए ।

       अब कोई ये भी समझा दे कि इस हेतु शिक्षक कहां और कैसे हैं जिम्मेदार---?

   आपने विज्ञापन निकाला --- सभी  अहर्ताओं को पुरा करते हुए इसने जगह सुरक्षित कराया । आज के दिन में कई शिक्षक अपने पुराने नौकरी को त्याग कर आये हैं --- ,इस नोकरी के आधार पर बैंक से लोन लिये हुए हैं-----

   इसमें चयनित  शिक्षकों की गलती कैसी---? इन्हें योग्यता पर आपने नौकरी दिया है --- ये योग्य हैं ---आपने इसे सफल अभ्यर्थी के रुप में सत्यापित किया है---- तो फिर -------

जो अयोग्य थे ,जिसने नियोजन नीति बनाई थी,  उस पर कार्रवाई न करके --- जिम्मेदारी तय न करके, नीति को बनाने में शुन्य भुमिका निर्वहन करने वाले इस नीरिह शिक्षकों पर शासन का और माननीय न्यायलय का डंडा कैसा --- बिल्कुल एक अनुत्तरित सवाल है।

   याद रखिएगा यह शिक्षक किसी मंत्री और सचिव के घर का बेटा बेटी नहीं  हैं -- ये सभी अधिकतर मध्यम और निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के सदस्य हैं --- हमारे आपके घर आंगन के ही बेटा और बेटीयां हैं --- जिसका वर्तमान अन्याय के मजबूत हथौड़ा से पीटा जा रहा है।

   मैं अपनी पुरी निष्ठा के साथ इन शिक्षक भाई --बहनो के लिए अपने मुख्यमंत्री जी से और माननीय उच्च न्यायालय रांची से गंभीरता पूर्वक न्याय और दया की गुहार लगाता हूं--- पुनर्विचार का अनुरोध करता हूं और हार्दिक सदभावन व्यक्त करता हूं----और आप-----?

     पवन मिश्रा
   दुमका

Thursday, September 3, 2020

पूछता है भारत --- कहां है रोजगार--?

पूछता है भारत --- कहां है रोजगार --?

                  कहते हैं असली दोस्ती की पहचान मुसीबत के समय  होती है। और सच्चे दोस्त मुसीबत में आपके सहयोगी होते हैं, आपको मुसीबत से निकालने में मददगार। सच्चे दोस्त आपको भटकते मार्ग पर चलने से रोकते हैं, और  नेक मार्ग पर चलने को विवश करते हैं ।

      मन की बात (30अगस्त सन् 2020) के लाईव प्रसारण में जब देश की जनता ने सोशल मीडिया पर पसंद के बनिस्पत नापसंद बटन को लगभग डेढ़ गुणा ज्यादा बार दबाया हो ,तो परिवेश में गंभीर सवालात खड़े होने लाज़िमी हैं। इतना ही नहीं देश के बेरोजगार जनों ने सोशल मीडिया पर 'बेरोजगार मांगे रोजगार"और अपने अपने नामों के आगे बेरोजगार शब्द को लिखकर हैशटैग के साथ ट्रैंड कराया।

        मई सन्2019 में जिस नरेंद्र मोदी को देश के कुल मतदाताओं  में से 38-5% मतदाता ने 336 सीटों के साथ ढ़ेर सारी अपेक्षाओं को पुरी करने की जिम्मेदारी सौंपी थी , देश का राजसिंहासन सौंपा था क्या उससे जनता का मोह भंग हो गया--? जिस सोशल मीडिया पर मोदी अपने चुनावी नारे और  देश के प्रति उनके भावी कार्यो का रोड मैप प्रभावी तरीके से रखने में कामयाब हो पाये थे , देश की बहुसंख्यक जनता का विश्वास अपने पक्ष में आकृष्ट कर पाने में सफल हो पाये थे, क्या वही जनता अब अपने को ठगा ठगा महसूस कर रहा है--? 

    क्या अब सोशल मीडिया पर पसंद और नापसंद देश के राजनीति की दशा और दिशा तय करेगा---? जिस सोशल मीडिया ने नरेंद्र मोदी को वैश्विक हीरो , जन जन का नेता और जादुई छवि वाले नेता के रूप में स्थापित किया था , वह सब क्या एक बालू के भीत की तरह धरधरा कर गिरने ही वाला है---? क्या देश एक नये विकल्प की ओर देख रहा है--? क्या हमारे पास विकल्प है भी--? सन् 2019 में जिस कांग्रेस को संपूर्ण लोक सभा के दस प्रतिशत सीट पर भी जनता ने न स्वीकारा हो, सत्तर साल तक भारतीय राजनीति की धुरी रहे,  सत्तासीन रहे पार्टी  जब पहली दफा तकनीक रूप से विपक्ष का तमगा तक हासिल करने में नाकामयाब रहा हो , लडखडाती ,डगमगाती कांग्रेस क्या बन पायेगी चरमराती अर्थव्यवस्था वाले वर्तमान संकट का खैवनहार---?

        आईए गौर करते हैं, वर्तमान समस्या को। हालिया आए रिपोर्ट में  दुसरी तिमाही का जी डी पी -23.9% पर पहुंच गया है। बिल्कुल स्पष्ट है-- यह दौर काफी संकट भरा है । जी डी पी यानी ग्रास डोमेस्टिक प्रोडेक्ट का यह डाटा अप्रैल --मई--जून  माह के तमाम गतिविधियों पर आधारित है जहां हम कुल उत्पादकता को पाते हैं। और हमें यह याद रखना चाहिए कि यह काल वही समयकाल है जब देश में पूर्ण लाकडाऊन था , फैक्ट्रीयां, कल कारखाने , रेल , सहित लगभग सभी गतिविधियां पूर्ण रुप से बन्द थे  और तमाम अर्थशास्त्री को इस बात का अंदेशा था। 

          आज के हालात में जब संपूर्ण विश्व सहित  भारत ,  कोरोना प्रभाव कारण गंभीर रूप से प्रभावित  है--- तो निश्चित रूप से ऐसी स्थिति में कोई भी व्यवस्था संचालक अपनी जिम्मेदारी के सूची में सर्वोच्च प्राथमिकता  मानव जीवन की सुरक्षा को देगा । एक घर का मुखिया जब अपने परिवार में लगातार बिमारी का संक्रमण देख रहा हो तो वैसी स्थिति में परिवार के सभी सदस्यों के भोजन और चिकित्सा के अलावे , उसे क्या कुछ और  दिख सकता है--?  यही तो हमारे देश के प्रधानमंत्री जी कर रहे हैं। 'राइट टू फ़ुड' और 'वन नेशन वन राशन कार्ड' इसी दिशा की ओर बढ़ते  कदम को तो इंगित करता है। एक बात बिल्कुल सच,  जिसे हम हर भारतीय को स्वीकारना चाहिए कि हमारे आज के इकानामी की तुलना अमेरिका और चाइना के अर्थव्यवस्था से नहीं की जा सकती है । निरंतर सीमा संघर्ष, पाकिस्तान ,चाइना,  नेपाल जैसे पड़ोसी देशों के जगजाहिर इरादा से निरंतर निपटना  और चुनौती को कुशलता से समाधान करने के पीछे अर्थव्यवस्था का बड़ा सा हिस्सा जो गैर नियोजित है -हर रोज खर्च किये जा रहे हैं,  और इसे किसी भी कीमत पर टाला नहीं जा सकता है। इस प्रकार से असंभावित , अनायास दो तरफा मुसिबत किसी भी देश के आंसुतलन के लिए प्रर्याप्त वजह हो सकते हैैं।
       जी डी पी के गिरावट की वैश्विक स्तर पर अगर भारत से तुलना की जाय तो -- अमेरीका सहित लगभग संपूर्ण विश्व नकारात्मक जी डी पी के डाटा को ही दिखा रहे हैैं। वैश्विक मंदी के इस दौर में अमेरिका, फ्रासं , इटली आदि देशों में अबतक के अपने पिछले तमाम बेरोज़गारी के रिकार्ड को तोड़ दिया है--- भारत भी कमोबेश इसी वैश्विक मंदी को दृश्य पटल पर दिखला रहा है।

           देश के इस चिन्ताजनक माहौल में भारत सरकार द्वारा 'CET'-- 'कौमन इलिजीबलिटी टेस्ट' की घोषणा   बेरोजगारों के लिए निराशा के बीच एक आशा की खबर अवश्य है । इसी प्रकार से कल कारखाने, रेल आदि के आंशिक संचालन की शुरुआत , शेयर सूचकांक का ग्राफ बढना ये सभी अर्थव्यवस्था  रुपी गाड़ी को वापस पटरी पर आने और सरपट दौड़ की तैयारी को दर्शाता नजर आ रहा है।

     लोकतंत्र में असंतोष और विरोध के जायज तरीके हर समय स्वीकार्य होता है । हमारे देश को बिहार के जयप्रकाश नारायण का जन आंदोलन नहीं  भूलना चाहिए--- एक ओर यह सत्ता पक्ष को तानाशाही करने से रोकता है तो दुसरी ओर  जन जन को उनके अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने की सीख देता है। सोशल मीडिया पर यह असंतोष और नापसंद की बटन तो ज्वालामुखी के क्रेटर और लार्वा कि तरह है -- जिसे ससमय उचित निष्पादन न होने के स्थिति में भयंकर भूकंप और विस्फोट की संभावना को ही जताता है। हमें धैर्य के साथ  विश्वास अपने द्वारा चुने हुए जनप्रतिनिधियों पर और प्रधानमंत्री पर होने चाहिए जो इस संकट से देश को बाहर निकालने कि दिशा में आगे बढ़ चले हैं।

------- पवन मिश्रा , दुमका ( झारखंड)
   मोबाईल नम्बर --9931126996
Gmail--- pawan19755@gmail.com

सादर धन्यवाद

  
   
        


          

Friday, August 28, 2020

स्वार्थ बनाम सेवाभाव

स्वार्थ बनाम सेवाभाव बनाम व्यवसाय
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            चलिए हम और आप चलते हैं, एक सफर पर ----
 आस -- पास के परिवेश को समझने ,
कोरोना त्रासदी से प्रभावित हुए कमोबेश हर घर की परेशानी को समझने ।

             झारखंड सहित संपूर्ण भारत के शैक्षणिक व्यवस्था में मिशनरीज स्कूलों का बड़ा ही व्यापक और महत्त्वपूर्ण योगदान है , हर गांव -- हर घर तक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा न्यूनतम दर पर  उपलब्ध कराना इनका उद्देश्य रहता आया है। ये मिशनरीज स्कूल मदर टेरेसा को अपना आदर्श मानते हैं । मदर टेरेसा के सेवा भाव की कहानी से मैं भी प्रभावित हूं और मैंने भी इन्हें आदर्श मान रखा है लेकिन इनकी सेवा भावना का प्रशंसक हूं , और इनके छुअन मात्र से कुष्ठ रोगी के चंगा हो जाने की कहानी का निन्दक  हूं, तर्क की कसौटी पर  इस बात के पीछे महिमा मंडन और धर्म प्रचार की प्रकृति को पाता हूं।

                मिशनरीज स्कुलो का संपूर्ण भारत वर्ष को एहसानमंद होना चाहिए -- क्योकि ये सभी विधालय जो  संपूर्ण भारत वर्ष के लगभग 65 % शैक्षणिक व्यवस्था को संभाले हुए हैं और मदर टेरेसा की सेवा भावना को आत्मसात करके निरंतर हमारी सेवा कर रहे हैैं।

        यहां तक की बातों से तो सभी मिशनरीज विधालय सहमत होंगे और गौरवान्वित भी महसूस करेंगे और करना भी चाहिए।

      लेकिन जब यही विधालय        व्यवस्थापक समूह  आपदा को पैसा कमाने वाले अवसर के रुप में देखने लगे तो आप क्या कहेंगे---? कहां गयी इनकी सेवा भावना----?  कहां है मदर टेरेसा के भावना की प्रकृति ---?

          आप में से किसी के पास ज़बाब हो तो तार्किक आधार पर अपने ज़बाब इसी पटल पर रखने का प्रयास करिएगा।


       दुमका सहित अन्य क्षेत्रों के लगभग सभी प्राइवेट विद्यालय अपने सभी कर्मचारियों  के वेतन को कम करते हुए 50  से 70 प्रतिशत ही भूगतान कर रहे हैैं।
 कई विधालय इनके वेतन बंद किये हुए हैं।

           अब इसी व्यवस्था के दुसरे पहलू को देखिए ---- मध्य मई के आस पास से सभी विद्यालयों ने आनलाइन कक्षा का संचालन आरंभ किया । करना चाहिए भी था ---पठन पाठन को जैसे भी हो फिर से संचालित करना बहूत बड़ी जिम्मेदारी थी।

           लगभग सभी कर्मी अपने घर से ही संरचनात्मक विकास (ऐंड्रॉयड मोबाईल , ट्रायपोड ,डाटा, ब्लैक -व्हाईट बोर्ड आदि,) कर पठन पाठन कर  अपने  दायित्वों का निर्वहन विभिन्न प्रकार के कठीन चुनौतियों का  सामना करते हुए कर  रहे  हैैं,और अपने आप को समयानुकूल अपग्रेड कर रहे हैैं।
।            
।        इस प्रकार से यह प्राइवेट शिक्षक समुदाय काफी परेशानी भरे स्थितियों के साथ संघर्ष कर रहे हैैं।

।       जबकि विधालय संस्थापक सह संचालक समूह इस आपदा कालीन परिस्थितियों में बच्चों के अभिभावकों से  सभी प्रकार के फीस  वसूल रहे हैैं  --किसी भी प्रकार की कोई रियायत , कोई सहानुभूति इनके मन में नहीं है -- इनके स्वभाव में नहीं है  ।

।     जबकि इस हेतु राज्य सरकार की मंशा है कि प्राइवेट विद्यालय इस कोरोना आपदा में सिर्फ ट्युशन फीस ही लें। सरकार की हर अपेक्षा कानुनी आदेश से ही लागु हो यह भी तो उचित नहीं।

।  हमें यह पता होना चाहिए कि इन सभी विद्यालयों का संचालन और निबंधन एक गैर लाभकारी संस्था के रूप में होता है और सरकार इन्हें विविध प्रकार की रियायतें भी  मूहैया कराती है।

।   इसी प्रकार से सरकार की यह अपेक्षा एक घोषित कानून के रूप में है, कि कोई भी प्राइवेट विधालय प्रत्येक साल नामांकन फीस नहीं ले सकता है --- इसके प्रत्युतर में कई विद्यालय ने नामांकन फीस का नाम बदलकर सलाना फी/ विविध फीस/ विकास कोष --आदि  कर लिया है और सरकारी आदेश को ठेंगा दिखा दिया।

  वर्तमान परिदृश्य में जब इनकी सेवा भावना जगजाहिर है, हरेक बच्चों से सभी फीस की वसुली कर रहे हैं तो फिर आप अपने शिक्षकों के वेतन को कम कर दें रहे हैैं ---यह कैसा न्याय-- ?

     ‌दुमका स्तर पर यह राहत है की अभिभावकों को फी के लिए नोटिस तो दिये जा रहे हैं -- लेकिन इनकी वसुली कड़ाई से नहीं हो रही है।

    अध्यापन के नाम पर बच्चों को आज जो मिल पा रहा है वह बहुत ही कम , अत्यल्प है तथा विधालय का अपना लागत और  संचालन खर्च भी आज के दिनों में बहुत ही कम है ।

    फिर ऐसे में अभिभावकों से सभी प्रकार के फीस वसूली ,  अध्यापन के नाम पर बच्चों को प्राप्ति स्तर का न्युन हो जाना, और  इन सब के बावजूद शिक्षकों का वेतन आधा कर देना , आप सभी के सेवा भाव और एक गैर लाभकारी संगठन का कैसे परिचायक हो पा रहा है -- समझ से परे है । जबकि आकलन के मुताबिक ट्युशन फीस मात्र ही शिक्षकों के वेतन भुगतान के लिए प्रर्याप्त राशि है।

  ---- पवन मिश्रा
  
            
         

Saturday, August 1, 2020

आत्म निर्भरता की बुनियाद- नई शिक्षा नीति-2020



आत्मनिर्भरता की बुनियाद--
             नई शिक्षा नीति -2020
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हरेक  मानव के  तीन मूलभूत आवश्यकताएं हैं-- भोजन वस्त्र और आवास। लेकिन किसी भी देश में अगर मानव संसाधन के विकास को समग्रता से देखा जाय तो इसके नींव में उस देश की शिक्षा व्यवस्था को ही पाया जायेगा जो हर पल उन्हें उन्नत सोच की ओर ले जाता है। हरेक देश के चतुर्दिक और सर्वागीण विकास में शिक्षा वहाँ के जनता के लिए भोजन ,वस्त्र ,आवास के बाद चौथी सबसे अहम कङी है,

    शिक्षा कि महता को देखते हुए भारत सरकार ने समय समय पर इनके स्वरूप में बदलाव लाया है। सन् 1947 से पूर्व भी शिक्षा को मानव संसाधन के विकास में आवश्यक माना गया और पराधीन भारत सरकार के संचालकों ने इसे अपने हित के अनुकूल आम जनों को मुहैया कराया और इसके परिणाम में उन्हें दुभाषिये ( अंग्रेज़ी - हिन्दी के जानकार) , क्लर्क और अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार करने वाली स्वभाविक मानसिकता युक्त तैयार  बहुजन मिलेे  ब्रटिश सरकार ने इसी के अनुकूल परिणाम पर लगभग डेढ़ शतक साल तक शासन किया। हम भारत वासियों का यह दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि अभी तक जो शिक्षा नीति हमारे यहाँ  संचालित है वह कमोबेश थोङे बहुत बदलाव के साथ पराधीन भारत में ब्रिटिश हित के लिए विकसित  शिक्षा नीति ही है , जो हमारे चतुर्दिक विकास में समयानुकूल नहीं है।  और यह आज अनुकूल हो भी कैसे सकता है ,सौ -ङेढ सौ साल पहले विकसित शैक्षणिक संरचना उस काल को ध्यान में ही रखकर तो बनाया गया था  ।आज के आधुनिक तकनीकी दौर की संकल्पना उस समय किसी के भी समझ से परे रहा होगा।
     बदलाव और समकालीन उपयुक्त  नीति विकसित करने की कङी में ही हम आजादी के बाद सन्1986 के राष्ट्रीय शिक्षा नीति को पाते हैं । यहाँ  कुछ सीमा तक ब्रिटिश कालीन शिक्षा नीति से बाहर निकलने की कशमकश छटपटाहट सी दिखती है और इसी के परिणाम स्वरूप  अंग्रेजी विषय की अनिवार्यता को ऐच्छिक बना दिया गया और यह उस नीति के तहत राज्यों के अपने विवेक पर यह निर्भर करने लगा कि उनके यहाँ अंग्रेज़ी वैकल्पिक हो या अनिवार्य ।
             सर्व शिक्षा अभियान (सन्-2001, 86वे संविधान शंसोधन)और राइट टू एजूकेशन एक्ट(04 अगस्त 2009 भारतीय संविधान की धारा 21ए ) के साथ ही भारत उन एक सौ पैतीस देशों की श्रेणी में आया गया जिसमेँ शिक्षा को मौलिक अधिकार स्वीकारा गया है। इनके  व्यवहार मे आने से शिक्षा की पहुँच आम जनों तक समान रूप से हो इस हेतु  यह एक बहुत ही गंभीर और प्रभावशाली प्रयास कहा जा सकता है। संविधान के भाग चार में वर्णित राज्य के नीति निदेशक तत्व में शिक्षा को सर्वशुलभ कराने की अपेक्षा राज्य सरकारों से अपेक्षित था लेकिन यह बाध्यकारी नहीं था। लेकिन राईट टू एजूकेशन एक्ट के आने के बाद  शिक्षा अब सभी बच्चों का (  छह से चौदह उम्र वालों  ) कानुनी अधिकार हो गया तथा अभिभावक और राज्य सरकार इस हेतु अब कानुन बाध्य हो गये। शिक्षा के प्रति  राज्यों के ढुलमूल रवैये को देखकर इसे अब समवर्ती सूची में लाया गया है और इसके लिए राज्य और केंद्र दोनों ही नियम कानून बना सकते हैं । सर्व शिक्षा अभियान द्वारा हरेक बच्चों तक गुणवत्तापूर्ण  शिक्षा मुहैया कराये जाने की प्रतिबद्धता का भी अभी तक के शैक्षणिक विकास में अहम योगदान कहा जा सकता है जिसके तहत कस्तूरबा विधालय , मध्याह्न भोजन ,सायकल, पोशाक ,जूता,कापी  पुस्तक आदि की उपलब्धता केन्द्र और राज्य के सम्मिलित  अंशदान से सर्व शुलभ विधालयो में कराया जा सका ।

        आज के हालात में उपयुक्त नवीन शिक्षा नीति 2020 बहुत ही असरकारी  और सभी प्रकारों के समस्याओं को समाधान करने के संदर्भ में गंभीर पहल कहा जा सकता है।  अन्तराष्ट्रीय व्यवस्था में फिनलैंड की शैक्षणिक व्यवस्था को बहुत ही प्रशंसनीय व्यवस्था कहा जाता है। और नवीन शिक्षा नीति-2020 भी उनसे बहुत ही ज्याद प्रभावित दिख रही है।
         

       अगर अच्छे गुणों की चर्चा की जाय तो स्थानीय भाषा में प्राथमिक शिक्षा, सरकारी स्कूली शिक्षा में प्ले स्कुल का संरचनात्मक विकास, फाउंडेशन कोर्स पर मजबूती से फोकस, विषय चयन की स्वतंत्रता , कोर्स से स्व  आंशिक  निष्कासन पर यथोचित चरणबद्ध  ङिग्री,  कोर्स की पूर्णतया विधार्थियों के सुविधानुसार,  विषय युग्म का चयन रूचिनुसार,  रटन्त व्यवस्था के जगह चनात्मकता का बढावा जैसे अनेकों नेक प्रयास यहाँ स्पष्ट दिख रहा है जिनकी अपेक्षा लम्बे समय से था। इस शिक्षा नीति की सबसे बड़ी विशेषता बच्चों में सर्टिफ़िकेट के साथ हुनर का समावेश होगा जो समय की मांग है और यही तथ्य संपूर्ण भारत को चाईना की तरह उत्पादन हब बनाने में सहयोगी होगा।  बच्चों द्वारा साल भर के अध्ययन को तीन घंटे में परीक्षा द्वारा मूल्यांकन करना किसी भी बोर्ङ और तकनीक द्वारा अन्यायोचित कहा जायेगा ,और इसी के समाधान में यहाँ हम सतत मूल्यांकन और सेमेस्टर सिस्टम को पाते हैं । अध्ययन- अध्यापन के उच्च संस्थानों पर भी अब ए आई सी टी ई , एन सी टी ई, एन सी ई आर टी और  यु जी सी जैसे विभिन्न नियामक इकाईयों की जगह एक मंचीय व्यवस्था का जिक्र काबिले तारीफ है। सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर शिक्षा को निजीकरण की  ओर बढावा निश्चित रूप से एक ऐसा चिन्तनीय पहलू है।                                                             जो भारत  के विविध
 स्तरीय समाज के शैक्षणिक विकास पर गंभीर प्रभाव और इसपर  चिंतन की ओर आकृष्ट करता है। 

       नवीन शिक्षा नीति 2020 भारत के कर्णधारो को इस अनुकूल  विकसित कर पाने में सक्षम हो जहाँ हर हाथ को हुनर के मुताबिक काम, उत्कृष्ट जीवन शैली ,नैतिक रूप से सबल और अन्तराष्ट्रीय स्तर के कौशल प्रबंधन और प्रदर्शन में उत्कृष्ट मानक स्थापित करने वाला साबित हो और हम सभी देश वासी इसी की अपेक्षा करते हैं ।

  पवन मिश्रा 
           

Saturday, July 18, 2020

औषधीय पादपों का हो व्यापक प्रसार

  आलेख

 औषधीय पादपों का होना चाहिए स्कूली शिक्षा में महत्वपूर्ण स्थान
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भारतवर्ष अपने गौरवशाली इतिहास के साथ विश्व स्तर पर  मानव सभ्यता के लिए हमेशा से अनुकरणीय रहा है । यहाँ कि विरासत और परंपरा ही संपूर्ण  मानवता को सुखद रास्ते दिखाते आया है । इस हेतु हमें याद करना चाहिए विश्व प्रसिद्ध अपने  'रामायण' को । यद्यपि यह वैश्विक लोकाचारी ही कहिये की रामायण को अपने ही घटित क्षेत्र में सत्य साबित होने के लिए विभिन्न राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय मंच से होकर सुप्रीम कोर्ट --भारत सरकार के मंच पर सत्यापन साबित होने के लिए लम्बे मुकदमे का सहारा लेना पङा(संदर्भ-राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद-अयोध्या मामला), और रामायण एक लोक कथा अधारित धार्मिक महाकाव्य ही नहीं बल्कि तत्कालीन राजघराने के घटनाक्रम का सटीक वर्णन है ,जिसे समकालीन  ऐतिहासिक जानकारी हेतु इतिहासकार और विद्वानों के द्वारा  बहुमूल्य स्रोतों के रूप में भी बतौर साक्ष्य व्यवह्रत किया जाता रहा है। यहाँ एक संदर्भ है ,कि माता सीता को जब रावण के चुंगल से लाने का प्रयास किया जा रहा था तो उसी समय  लक्षमण 'मूर्छा ' में चला जाता है-वस्तुतः यह मूर्छा अवस्था ,आधुनिक रूप में इसे आदमी के 'कोमा' की अवस्था को कहते हैं । राजवैध द्वारा इस मुर्छा रोग के उपचार हेतु संजीवनी बूटी को चिन्हित किया गया, जिसे हनुमान द्वारा लाया गया ,और लक्ष्मण मुर्छा  अवस्था  से स्वस्थ चंगा हो पाये थे। समकालीन चिकित्सा व्यवस्था को स्मरण करते हुए हमें गर्व होना चाहिए अपने गौरवशाली अतीत पर-- कि उस ऐतिहासिक काल में भी हमारे पास मुर्छा यानि की कोमा की अवस्था से चंगा होने हेतु पर्याप्त औषधीय जानकारी  थी, जो  पर्यावरण में  ही उपलब्ध थे --जबकि आज तक अन्य किसी चिकित्सा पद्धति में 'कोमा' से बाहर आने हेतु कोई भी दवा उपलब्ध नहीं है और इसके निदान हेतु आज चिकित्सा जगत सिर्फ यही बोल पाता है--'वेट एन्ङ वाच'--उपर वाले का स्मरण करें ।

    आज वैश्विक महामारी कोरोना ने मानव सभ्यता के विकास पर एक जोरदार प्रश्न चिन्ह खङा कर दिया है । अमेरिका, इटली ,फ्रांस जैसे वैश्विक महाशक्ति और सुसंपन्न देशो ने आज कोरोना के आगे मानिए घुटने टेक दिए हो । तमाम घोर निराशाओं के बावजूद भारत के पास संतोष करने के लिये यह बात हैं कि बचाव  हेतु अपनाये गये उपायों का अन्तराष्ट्रीय स्तर पर काफी सराहना ही नहीं किया जा रहा है,अपितु मोदी जी से सलाह भी लिया जा रहा और विश्व समुदाय हमारी ओर आशा भरी निगाह से देख रहा है, इसी कङी में भारत से अमेरिका जैसी महाशक्ति क्लोरोफ्क्वीन नामक दवाई हेतु अनुरोध सह दबाब बना रहा है , यह हर हिन्दुस्तानीयों के लिए गर्व की बात है, भारत की सक्षमता हर्षित करने लायक है।

             भारत के गौरवशाली अतीत को बर्बाद करने का काम मुस्लिम आक्रांताओं ने  किया । बारहवीं शताब्दी  तक भारत विश्व स्तर पर अपने ज्ञान पूजं से समकालीन  संपूर्ण विश्व को आकृष्ट कर रहा था । समकालीन विश्वविख्यात विश्वविद्यालय--'नालंदा विश्वविद्यालय ' 'विक्रमशिला विश्वविद्यालय ' 'ओदन्तपुरी विश्वविद्यालय' और 'तक्षशिला विश्वविद्यालय ' वाराणसी  के सुंदर और व्यापक चर्चे चीन और मध्य ऐशिया में दिखते हैं जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं । यही वह समय था जब बख्तियार खिलजी नामक एक युद्धक सेनापति के हाथों इन विश्व धरोहर रूपी विश्वविद्यालय में आगजनी और लुटकान्ङ किया गया था ।  और पारंपरिक धरोहर को नष्ट कर दिया गया था।

    अथर्ववेद,  चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, महर्षि वागभट्ट कृति अष्टांग ह्रदयम्,, अष्टांग संग्रहम्, धन्वन्तरी जैसे अनेकों नेक और उत्कृष्ट   चिकित्सक अपने चिकित्सा पद्धति के लिए विश्व विख्यात थे।इन महर्षियों के चिकित्सा पद्धति के वाहक उपर वर्णित विश्वविद्यालय खंङहर में तब्दील हो गये। फिर भी जङी-बुटी, पेङ-पौधों, फल-फूल द्वारा बताये गये चिकित्सा पद्धति के लिए चरक संहिता,सर्जरी/शल्य चिकित्सा हेतु सुश्रुत संहिता,आज भी स्मरणीय है। खान पान पच अपच, संयम-नियम,योग ,आसन आदि के विषय में महर्षि  पतंजलि द्वारा विस्तार से विश्लेषित किया गया है जिसे अपनाकर आम आदमी अपने जीवन शैली को स्वस्थ और हंसमुख बना सकता है।
  सुश्रुत संहिता में कुल 121शल्य उपकरण का वर्णन है तथा 760 औषधिय पौधों  का मानवपयोगी विशलेषण है। पुरातन भारत में राजवैध और चिकित्सकों को मोतियाबिंद,  प्लास्टिक सर्जरी , टूटे   हङ्ङीयो को जोङने की सफलतम तकनीक की विशेषज्ञता प्राप्त थी। सुश्रुत संहिता में गुर्दे के बिमारी को नमक विहीन भोजन देने की सलाह को प्रमुखता से चर्चा में लाया गया है। इसी प्रकार वात, पित्त और कफ के असंतुलित अवस्था ही रोग के कारक होते है और इन तीनों के मजबुत संतुलन  को निरोगी काया हेतु आवश्यक बताया गया है वागभट्ट द्वारा । वागभट्ट ने 'भोजनंते विषम नीरे' का उल्लेख किया है--जिसका अर्थ होता है भोजन के तुरंत बाद पानी पीना हानिकारक है। यह बात आज भी ऐलोपेथ चिकित्सा पद्धति में बतलाया जाता है ,
         
जिसकी जानकारी हमारे पूर्वजों को हजारों हजार वर्ष पूर्व भी भली भाँति थी।

तकरीबन अट्ठारहवीं शताब्दी के अन्तिम दशक की बात होगी , कर्नाटक के बेलगाँव आस पास हैदर अली और टीपू सुल्तान नामक  दो बङा ही पराक्रमी भाई हुआ करते थे। एक बार कर्नल कुट  और हैदर अली में व्यापक संग्राम हुआ। हैदर अली ने अपने तलवार से कर्नल कुट अँग्रेजी योद्धा के  नाक काट दिये । क्योकिं हम भारतीय किसी के गर्दन काटने से ज्याद नाक काटने में प्रतिद्वन्द्वी के अपमानित होने को महसूस करते थे। कर्नल कूट हाथ में अपने नाक लिए घोंङे पर सवार हो भाग रहे थे --तभी किसी स्थानीय द्वारा उनसे तहकीकात किया गया --कर्नल कूट कहते हैं कि घोंङे से गिर जाने के कारण ऐसा हुआ है,लेकिन भारतीय सज्जन उसे कहता है ,नहीं यह तो तलवार के धार से कटा हुआ है--आप चाहें तो मैं इस कटे नाक को जोङ सकता हूँ । कूट को यह आश्चर्य हुआ चूँकि समकालीन   ब्रिटेन में ऐसी कोई चिकित्सा व्यवस्था नहीं थी जो मानव शरीर के कटे अंग को फिर से जोङ पाये।पन्द्रह दिन के अन्दर उनका नाक जोङकर उन्हें फिर छोङ दिया गया। यह थी भारतीय उत्कृष्ट चिकित्सा पद्धति  । जब समूचा विश्व प्लास्टिक सर्जरी से अनभिज्ञ था उस समय हमारे भारत में यह एक साधारण बात थी।

         आज भी भील, गोन्ङ, संथाल  ,सबर,  हो, असुर जैसे आदिम जनजातियों  के कुछ जनसमूहो द्वारा अपने चिकित्सकीय जरूरत को जंगल और पहाङो में उपलब्ध स्थानीय जङी बूटी अधारित चिकित्सकीय पादपों से पूर्ति करते हैं । इनके पास विकास और सभ्यता की पहुँच अब भी दूर है। कुछ समय पहले तक महिलायें अपने बच्चे का जन्म स्थानीय विशेषज्ञ के देख रेख में ही करते थे और जङी बुटी अधारित औषध से जल्द ही कुशल और स्वस्थ हो जाती थीं ।
 आज एक प्रकार के आर्थिक औपनिवेशीकरण ने हमारे गौरवशाली पारंपरिक विशिष्टताओं को बर्बाद कर दिया है। पाश्चात्य जगत के गैरतार्किक अंधाअनुकरण ने हमें मानसिक गुलाम सा बना दिया और पिज्जा बर्गर की  संस्कृति हावी होती जा रही है जिनके परिणाम तो अवसादयुक्त होने तय हैं ।

हमें जरूरत है हर घर में एक किचेन गार्डन और एक आरोग्य उपवन विकसित करने की । जहाँ सरकारी स्तर पर औषधिय पौधों की जानकारी का प्रसार हो , उपयोग के तरीकों का प्रसार हो , तथा पौधों का निःशुल्क वितरण हो तो भारत का बहुत सा पैसा बच सकता है -आदमी स्वस्थ रह सकता है ,प्रदूषण मुक्त रह सकता है। लेकिन हमारे यहाँ प्लास्टिक के आर्टिफिसयल पौधे और पुष्प घर में रखना तो आदमी शान समझते हैं लेकिन सदाबहार, तुलसी ,घृतकुमारी, गिलोय आंवला, नीम,पत्थरचट्टी, जामुन  जैसे बहुपयोगी  और बहुऔषधिय गुणों से सुसंपन्न पादपो से अपनी दुरी बनाते हुए अपने को सुसभ्य दिखाने की होङ में स्वनुकसान करते जा रहे हैं । इस संदर्भ में हिमाचल प्रदेश,  मध्य प्रदेश और झारखंड और उत्तरप्रदेश  ने कुछ प्राथमिक स्तर पर अवश्य कदम उठाये हैं लेकिन यह नाकाफी है। सरकार को औषधीय पादप की पहचान और सर्वव्यापी उपयोग हेतु स्कूली शिक्षा के आवश्यक अध्ययन विषयों  में इसे शामिल करना बहुत ही ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है , और लुप्तप्राय हो रहे समृद्ध पारंपरिक ज्ञान को हर घर तक पुनः पहुंचाने का एक सरल, प्रभावी और व्यवहारिक माध्यम हो सकता है।

©®  पवन मिश्रा-दुमका झारखंड

अंक शास्त्र में उलझता जीवन शास्त्र

        अंक शास्त्र में उलझता जीवन शास्त्र
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         सी बी एस ई बोर्ड, आई सी एस ई बोर्ड , दिल्ली बोर्ड, झारखंड जैक बोर्ड बिहार बोर्ड सहित  लगभग सभी राज्यों के दसवीं और बारहवीं के परीक्षा परिणाम घोषित होने आरंभ हो चुके हैं । सन् 2010 से पूर्व आप ऐसे परिणाम की कल्पना नहीं कर सकते थे और सन्2000 से पूर्व जिन्होनें भी मैट्रिक और इंटर की परीक्षा पास की हो उनके लिए तो समाजशास्त्र और भाषा साहित्य जैसे विषयों में ङिसटिन्कसन(75%)  मार्क्स लाना ही बहुत बड़ी उपलब्धि के तौर पर माना जाता था । आज परिस्थिति अलग है । नब्बे प्रतिशत नम्बर लाने वाली अनुष्का , जहान्वी, अक्षय जैसे हजारों  बच्चे-बच्ची इस लिए परेशान हो रहे हैं--रो रहे हैं कि उसे बढिया कालेज में दाखिला शायद नहीं मिल पायेगा, उसे और उनके अभिभावको को पन्चानबे (95%) प्रतिशत नम्बर की अपेक्षा थी।

               अपेक्षा और उनके अनुकूल मेहनत निश्चित रूप से बहुत ही ज्यादा अच्छा है--लेकिन महत्वकांक्षा का स्तर इतना ऊँचा कभी न होने चाहिए कि अगर यह पुरा ना हो पाये तो हमारे बच्चे डिप्रेशन का शिकार हो जाये और उनमें  निराशावादी मानसिकता घर कर जाये, कुछ गलत कर जाये।
 
       अंक शास्त्र के मायाजाल में समूचा जीवन शास्त्र ही आज उलझता जा रहा है। दिल्ली , प्रयागराज , रांची, पटना सहित कुछेक क्षेत्रों से बच्चों के आत्महत्या करने जैसी बुरी खबर हरेक परीक्षा फल प्रकाशन के बाद आना एक दुखद परिस्थिति को दिखाता है। इसके लिए बच्चों से ज्यादा हम अभिभावक , शिक्षक और इनके परिवेश इस हेतु जिम्मेदार हैं ।

        एक आकलन के मुताबिक सन् 2010 के बाद से मैट्रिक और इंटर  पास करीब करीब 60% ऐसे बच्चों की संख्या हमारे आस पास है जिनके प्राप्तांक 75% से उपर हैं । सन् 2020 में तो यह ङाटा और चौंकाने वाला है --90% से उपर अंक प्राप्त करने वालों की  छात्र संख्या इस वर्ष पास किये हुए  कुल छात्रों का 15% है।

     अब तर्क की कसौटी पर इन्हें समझने का प्रयास किया जाय । अखिल भारतीय स्तर पर मेङिकल और इन्जीनियरिन्ग के सर्वोच्च कालेजों  में नमाकंन के लिए आयोजित होने वाले प्रतियोगी परीक्षा सहित सिविल सेवा परीक्षा में 70% से 75% प्राप्तांक लाने वालों के लिए , अब तक यहाँ नमाकंन हेतु जगह सुरक्षित होता रहा है। मतलब आई आई टी और एम्स में  पढाई हेतु आयोजित किये जाने वाले परीक्षाओ में   बच्चों का उपलब्धि  स्तर 70-75% के बीच  ही रहता है।

        अब इसी तथ्य का दुसरा पहलू देखिए --- हमारे यहाँ उसी स्लेबस /पाठ्यक्रम पर  पास किये 60% बच्चे ऐसे हैं जिन्हें इन बोर्डों ने 75% से उपर का प्राप्तांक वाला अंक पत्र दे रखा है। इनमें अधिकांश बच्चे दर दर की ठोकर खा रहे हैं--कोचिंग संस्थानों में और कैरियर के लिए संघर्ष रत हैं । तार्किक आधार पर 85% और इससे उपर प्राप्तांक वाले बच्चों को किसी भी कोचिंग संस्थान की आवश्यकता ही नहीं महसूस होनी चाहिए--क्योंकि उसे उच्च संस्थानों में नमाकन हेतु लाने हैं मात्र60--65%  और उसी स्लेबस /पाठ्यक्रम पर कुछ ही दिन पूर्व उन्होंने हासिल किया है85% या इससे भी ऊपर।

      यही है अंकशास्त्र का माया जाल। रटन्त विधा और सलेक्टीव स्टङी परीक्षा में अंक का इजाफा अवश्य करा सकता है, प्राइवेट स्कूलों में लिये जा रहे अत्यधिक फीस के वनिस्पत हम अभिभावकों को संतुष्टि का ऐहसास भी कराते हैं  यह अंक शास्त्र का माया जाल --लेकिन संघर्ष पथ  पर व्यवहारिक तरीकों से हमारे बच्चे दौङ लगाने  में कितने सक्षम बन पा रहे हैं यह अभिभावक, शिक्षक  और हमारे बीच उपलब्ध सभी शैक्षणिक निकायों को गंभीरता से सोचना चाहिए।

   अंकों का यह मायाजाल मृगतृष्णा जैसा ही तो है। जरूरत है हम क्षमतावान बनें । पढाई में रचनात्मकता का समावेश हो । अंकों के मायाजाल रूपी इस प्रतिस्पर्धी परिवेश से हमें निकलने की आवश्यकता है । शैक्षणिक तौर तरीकों को इक्कीसवीं सदी के अनुकूल और अन्तराष्ट्रीय गुणवत्ता आधारित पैमाने पर विकसित करने की आवश्यकता है । तभी हम आने वाले उज्जवल भविष्य के साथ सम्मुन्नत भारत की कल्पना कर सकते हैं ।

           पवन मिश्रा
     

Thursday, May 7, 2020

कोरोना के वैश्विक कङुवाहट में भारतीय वित्त

कोरोना के वैश्विक कङुवाहट में भारतीय वित्त
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                         ( 01)
       कोरोना से उत्पन्न वैश्विक हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं । 13.6 ट्रिलियन डालर इकानामी की  विशाल अर्थव्यवस्था  के साथ दुनिया की दुसरी सबसे बङी इकानामी वाले चीन के विकास का आकलन जब विश्व बैंक ने 6,3 जी ङी पी के साथ ग्रोथ कर रहे देश को 0,1 से भी नीचे नकारात्मक विकास दर पर जाने का संकेत दिया हो तो निश्चित रूप से विश्व स्तर पर चिन्ता के बादल साफ साफ मंङराते हुए देखे जा सकते हैं । आज के दिन में चीन और अमेरिका विश्व व्यापार की दिशा और दशा तय करते हैं ।भारत अपने वैश्विक व्यापार का 43% चाईना से ही आयात करता है--65% दवाई और इससे समबद्ध रसायन , 90% मोबाईल और इसके एक्सेसरीज, 45% अन्य इलेक्ट्रॉनिक समान, तथा भवन निर्माण एवं फिनिसिन्ग  के 60% समान भारत चाइना से ही आयात करता आया है। विश्व के सबसे बड़े मेन्युफेक्चरर और निर्यातक चीन से अंतरराष्ट्रीय व्यापार अब भय और संशय के माहौल में है।  पूर्वी ऐशिया में एक करोङ दस लाख आदमी गरीबी रेखा से नीचे पुनः आ जायेंगे ऐसा विश्व बैंक का मानना है । मौत के हर रोज बढते आकङे ने विश्व महाशक्ति अमेरिका को लाचार सा कर दिया इस कोरोना तान्ङव ने।

          कच्चे तेल के दाम हर रोज गिर रहे हैं, खपत कमते जा रहा है । कार निर्माता के प्लान्ट बन्द पङे  हैं । बजार में  इनके खरीददार  अचानक चुप सा हो गये हैं ।  वैश्विक व्यापार कमोबेश बंद है । आई एम एफ के प्रमुख अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने वैश्विक विकास का आकलन इस वित्तीय वर्ष के लिए -3% तय किये हैं । विश्व स्तर पर 75लाख करोङ के नुकसान का तार्किक अनुमान लगाया है। 2020 में  विकसित देशो की अर्थव्यवस्था 6% तक गिरने का अनुमान लगाया है  ।  वैश्विक चिन्तनीय स्थिति से निकल चलिये भारत की स्थिति पर विचार किया जाय ।

                  भारत की लाइफ लाइन भारतीय रेल जहाँ 2करोङ 30लाख यात्री हर रोज यात्रा करते हैं--आज ठप है, यह यात्रा व्यवस्था । सम्पूर्ण भारतवर्ष में  मिङ ङे मिल(मध्याह्न भोजन) योजना परिस्थिति जन्य बाध्यता और संरचनात्मक अभाव के कारण बन्द पङे हैं ,और इससे लाभान्वित होने वाले बच्चे 12करोङ 69लाख 15हजार 460 बच्चों को हम महज 4 रूपये से लेकर सात रूपये के बीच का एक थाली  भोजन तक देने की सुविधाजनक स्थिति में नहीं हैं ।    कारखानों के चिमनी शान्त हुए 50दिन से उपर बीत गये। गोदामो में बने पङे हुए नये समानो की मांग रूक गयी है। निर्यात हो नहीं रहे और आयात करने की सुविधाजनक स्थिति में हम हैं नहीं । रईश जनों का शेयर बाजार औंधे मुंह भरभरा कर रोज गोते लगा रहे हैं और लगभग ₹45लाख करोङ कोरोना के जहर रूपी सागर में ङुब गये हैं । विदेशी निवेशकों ने एक लाख करोङ से ज्यादा की निकासी इन दिनों कर लिया है। भारतीय रूपये  अपने मूल्य ह्रास रोक नहीं पा रहे हैं और यह 01 ङालर 76रूपये की स्थिति में पहुँच चूका है । पर्यटन,  होटल, कालीन, वस्त्र--हैण्ङलुम से संबंधित सभी उधोग धंधे बन्द पङे हैं ।

                सम्पूर्ण देश में श्रमशील आबादी 60%  है, जिसमें से मात्र 09% ही नौकरी पेशा और अन्य संगठनात्मक कार्यों से जुटे हुए हैं,  गैर पंजीकृत और असंगठनात्मक कार्यों से जुटे हुए श्रमिक जो 59%है की वास्तविक संख्या 40से 45 करोङ है , जो घरों में बंद हैं । इनके पास खाना खाने को नहीं हैं और मददगारो के रहमोकरम पर आज इनका पेट पल रहा है। 3'50 करोङ से ज्यादा  श्रमीक कंस्ट्रक्शन कम्पनी में कार्य रत हैं, जो बंद पङे हैं। 20बङे शहरों से लगभग 2'50 करोङ श्रमीक अपने घर को वापस जाना चाह रहे हैं। हम व्यवस्था कर पा रहे हैं सैकङो हजारों के घर पहुँचाने की और तादाद में ये हैं करोङो में।  विदेशों में नीति परिवर्तन और उत्त्पन्न हलात के  मद्देनजर बेरोजगार हो चुके करोङो भारतीय अपने वतन वापसी की अनुकूल परिस्थिति के इंतजार में हैं ।    गौरवशाली विकासशील भारत की एक और सच को हमें निश्चित रूप से गौर करना चाहिए ।  भारत की तुलना अमेरिका और चाईना से करना बिल्कुल गैरतार्किक है। हम भूखे देशों की वैश्विक  सूची क्रमाक (Global hunger index), 117 देशों की सूची क्रमाक में से 102नम्बर पर हैं और पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका से भी हमारी स्थिति बदतर है, इस मामले में ।

हरेक घोर निराशाजन्य परिस्थितियों में कहीं ना कहीं आशा के किरण छिपे होते हैं । हम भारतीय  उसी आशा रूपी किरण से अपने अंधेरे को उजाले में बदलने की कोशिश करें ।

    आई एम एफ ने अभी कुछ समय पहले ही भारत के 2'94 ट्रिलियन ईकोनोमी वाली अर्थव्यवस्था  को समान्य जी ङी पी के आधार पर दुनिया की पाँचवी सबसे बङी अर्थव्यवस्था घोषित किया है, जबकि परचेजिन्ग  क्वालिटी के आधार पर भारत को नम्बर 03 की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था माना है। 
          अभी  विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भारत के विकास दर को 1'9 % विकास दर हासिल करने की संभावना जताया है।  IMF और RBI OF INDIA  ने कोरोना से उत्पन्न हालात पर विचार करते हुए इसे सन् 1929 के बाद सबसे बङी मंदी करार दिया है। आर बी आई ने ज्यादा वित्त उपलब्धता के लिए कई ठोस कदम उठाये हैं, मसलन ₹50 हजार करोङ नबार्ङ, सिङबी और एन एच बी को उपलब्ध कराया ,रिवर्स रेपो रेट को 4% से घटाकर 3'75% किया गया इससे भारतीय बाजार में धन की सुलभता बनी रहेगी ।
आर बी आई गवर्नर श्री शशिकान्त दास ने ₹476'5 बिलियन ङालर विदेशी मुद्रा की उपलब्धता से देश को अवगत कराया जिससे अगले एक साल तक जरूरी सामनो के निर्बाध आयात हो सकेंगे । खरीफ फसलों के  पैदावार में  37% वृद्धि  और अगामी मानसून की संतोषजनक भविष्यवाणी भारत के सुखद स्थिति को इंगित करता है। वर्तमान विषम हालात पर भी 91% ए टी एम मशीन कार्यरत हैं और देश में पैसे की कोई कमी नहीं है। लेकिन बिजली की मांग में 30% की कमी और निर्यात में 34%की गिरावट देश के कठिन और चिन्तनीय वित्तीय स्थिति को जरूर स्पष्ट करता है। होटल व्यवसाय को हर दिन पाँच करोङ से ज्यादा का नुकसान हो  रहा है जो अर्थव्यवस्था को कमजोर कर रहा है। इसके बावजूद भारत के पास खाद्यान्न के पर्याप्त बफर स्टॉक हैं जो देश के खाद्यान्न खपत के मामले में अगले तीन साल के लिए चावल , दो साल से ज्याद के लिए चीनी का प्रयाप्त भंडार है , जो देश के सुखद स्थिति को इंगित करता है।

      सङक परिवहन और राष्ट्र राजमार्ग मंत्रालय ने इन चिन्ताओ पर गौर करते हुए 22 मे से 7ग्रीन एक्सप्रेस हाईवे पर कुछ शर्तों के साथ काम शुरू कर दिये हैं, जिससे श्रमिकों के बेरोजगारी और भुखमरी पर नियंत्रण लाया जा सके। विभिन्न राज्य सरकारों और केन्द्र सरकारों ने भी गरीबी रेखा से नीचे जी रहे लोगों और जन धन खाता धारी को शुरूआती तौर पर कूछ कुछ रूपये उपलब्ध कराना शुरू कर दिये गये हैं ।

        सन्1918में स्पेनिश फ्लू भारत में भी फैले थे और हालात कमोबेस आज से ज्याद भयावह थे । इस महामारी में एक करोङ अस्सी लाख के मारे जाने की सरकारी सुचना थी। हमें उन स्थिति को याद करते हुए सबक लेने की और मजबुत टास्क फोर्स गठन करने की जरूरत थी । 30 जनवरी को भारत सहित विश्व बिरादरी ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के हाई एलर्ट को हल्के में लिया था । 27फरवरी और 11मार्च को जब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 'पेन्ङेमीक ' रिपोर्ट एलर्ट भारत के लिए जारी किया तब जाकर भावी खतरे की गंभीरता पर गौर किया गया । यद्यपि हम ब्रिटेन ,अमेरिका ,इटली, जैसे अन्य देशों से अच्छे स्थिति में हैं ,तो यह भारत की कुशल राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था को दर्शाता है ।

     हमें याद करना चाहिए अपने भूतकाल को --1947 में जब हम आजाद हो रहे थे तो भारतीय मुद्रा एक ङालर बराबर थे तीन रूपये के, यह वह परिस्थिति थी जब अंग्रेज  मनोनुकूल आर्थिक दोहन हमारे संसाधनों का कर चुके थे। हमारी समकालीनअर्थव्यवस्था पूर्णतया ग्रामीण और कृषि अधारित थी। आज भी कृषि और वनस्पति अधारित प्रोत्साहित उधोग धंधे संपूर्ण देश की बेरोजगारी को खत्म करने की क्षमता रखता है, जरूरत है ईमानदारी से इस ओर हम आगे बढें । निकट भविष्य की चुनौतियों पर भी हमें गंभीरता से तैयार होने चाहिए ।  विचारणीय- जो  रास्ते गांवो से महानगरों की ओर जाते हैं-वही रास्ते महानगरों से गाँवों की ओर भी आते हैं ।
*****************************शुभकामनाओं सहित सादर धन्यवाद्
@पवन मिश्रा