Sunday, September 27, 2020

अन्नदाता के थाली में छेद-----!


अन्नदाता के थाली में छेद-----!
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            किसानों के हौसला अफजाई के लिए कभी हमारे सादगी प्रधान यशस्वी प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने कहा था --- "जय जवान --जय किसान" । लेकिन वास्तव में किसानों की जय-जयकार क्या कभी हो भी पाई ---? यह एक गंभीर प्रश्नगत मामला है, जो पूछता है भारत और   यहां कि 52% आबादी जो सीधे सीधे आज भी कृषिगत कार्यों से अपना जीवीकोपार्जन करता है।
          आजादी के बाद किसानों के व्यापक हित के लिए मंडी /अढैती और अनाजों के लिए तय किये जाने वाले न्युनतम समर्थन मूल्य (मिनीमम सपोर्ट प्राइस--एम एस पी) निश्चित रूप से किसानों के हक में लिया गया अच्छा फैसला था । लेकिन बदलते दौर के साथ बदलते हालात ने किसान रुपी समुदाय के बहुसंख्यक आबादी को सिर्फ़ भोट बैंक के तहत हमेशा से अपने पक्ष में भुनाने का प्रयास किया है । कुछ खास राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्र में हमेशा से अनवरत किसानों के हक में कर्जमाफी का प्रस्ताव रहता आया था --और कई बार इनके बहुसंख्यक मतदान के उत्तर में इन्हें कर्जमाफी की सौगात भी भेंट होती रही है।
किसानों के कर्ज माफी ने इन्हें आदतन सरकारों से मदद लेने के मामले में आशावादी बनाते गया और ये निरंतर  लाचार होते गये और आज आत्मनिर्भर और आत्ममजबुती के मामले में ये पिछड़ सा गये हैं। शायद कभी भी गंभीरतापूर्वक इसे मजबुत और सम्मुनत बनाने के ईमानदार प्रयास नहीं किये गये।
           आज के दिनों में सांसदों में से 38% सांसद सक्रिय किसान हैं और विडम्बना देखिए 52%आबादी कि प्रत्यक्ष --अप्रत्यक्ष निर्भरता कृषि पर है---जबकि  सकेलु घरेलू उत्पाद (जी डी पी) में इनका योगदान 17% से 18% मात्र है। अब बात यह स्वभाविक रुप से उठता है कि इतने ज्यादा संख्या वाले कृषक सांसदों के रहते हुए किसानों की इतनी दुर्दशा क्यों--? क्या राजनीतिक दलों के सोची समझी साज़िश का परिणाम है वर्तमान कृषकों की दयनीय स्थिति--?
              कृषक हित के लिये कार्यरत एक गैर सरकारी संगठन के अध्ययन के मुताबिक मल्टीनेशनल कम्पनियों में उपलब्ध कृषिगत कच्चे /अनप्रोसेस्ड सामग्रियों के दामों में कृषकों को प्राप्ति स्तर मात्र  23% से 30% है। यानि हमलोग जिस चीज को ₹100 में खरिदते हैं , उसमें से किसानों को उसका किमत मात्र 23 से 30 रूपैया तक ही मिल पाता है। लगातार लागत मुल्यों में वृद्धि और बाजार मुल्यों के अन अपेक्षित स्तर‌ से तंग होकर सन् 2019 में दस हजार किसानों ने  मजबुरन आत्महत्या कर लिया । आज के दिनों में  हरेक किसानों की औसतन कमाई₹ 6400 प्रति महिना है ,जिसे वर्तमान सरकार सन् 2022 तक ₹13000 के औसत महिना की कमाई तक पर पहुंचाने की कार्ययोजना पर काम कर रही है । इसी तरह आज के दिनों में प्रति किसान लगभग औसतन ₹ 1.4 लाख कर्ज है, जिसे सरकार सन् 2022 तक आधा करने की ओर निरंतर प्रयासरत है।

      "अन्नदाता सुखी भव: " की कामना सासंद भवन के विजिटिंग रजिस्टर पर  अंकित करने वाले प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक पृष्ठभूमि का केन्द्र और आधार कभी भी किसान नहीं रहा। समग्र विकास में किसानों की अनदेखी न तो गुजरात में किया गया और न ही आज संपूर्ण भारत में किया जा रहा है। गुजरात और महाराष्ट्र के कपास कृषकों की व्यथा तथा इन्हें समय समय पर दिया गया प्रोत्साहन स्मरणीय हो। 

         किसानों के हक की आवाज बुलंद करने वाले राजनीतिक पार्टियों में से "अकाली दल" और एन सी पी-- "नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी" द्वारा हालिया कृषि सुधार बिल --2020 पर हो हंगामा मचाना --- रोड जाम आज सरे आम चर्चा में है। वर्तमान कृषि सुधार बिल के मुख्य तथ्यों को पंजाब विधान सभा चुनाव और लोक सभा चुनाव सन् 2019 में कांग्रेस सहित कई राजनीतिक पार्टियों ने अपने चुनावी घोषणापत्र में प्रमुखता से शामिल किया था। फिर यह हो हंगामा क्या खोते जा रहे राजनीतिक आधार को हो हल्ला के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का प्रयास कहा जा सकता है---? 
         देश के किसानों को यह याद हो उदारीकरण के शूरुआती  दौर में बहुराष्ट्रीय कंपनीयों के बीज जब बाजार में आये थे, तो हजारों आशंकाएं जनमानस में दौड़ रही थी। आज यह साबित हो चुका है, किसानों द्वारा उत्पादित अनाज का बीज के रूप में उपयोग से ज्यादा फायदेमंद इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा उपलब्ध कराये जा रहे बीज की उत्पादकता है , जो ढाई से तीन गुणा अधिक ही नहीं है, बल्कि दिर्घकालिक अभी तक कोई नुक़सान भी चिन्हीत नहीं हो पाये हैं  ।

     तमाम आशंकाओं के बीच देश के गृह मंत्री बिन्दुवार सभी तथ्यों को स्प्ष्ट  कर चुके हैं। किसानों को उनके उत्पाद पर ही अनुबंध करने की आजादी है --- जमीन पर कोई भी अनुबंध वर्तमान बिल का विषय वस्तु ही नहीं है।‌ अनुबंध से निकल जाने की आजादी कृषकों के पास हर समय उपलब्ध होगा। किसानों के लिए वर्तमान में उपलब्ध अढैती--(मंडी) तथा न्युनतम समर्थन मूल्य की वर्तमान व्यवस्था (एम एस पी) आज के तरह ही आगे भी  निरंतर चलते रहेंगे -- सरकारी महकमा इस बात का आश्वासन सार्वजनिक पटल पर दे चुकी है। वर्तमान कृषि सुधार बिल किसानों को  अपने उत्पाद बेचने के लिए एक अन्य बेहतर  और मजबुत  विकल्प देने जा रही है। यही वह बिल है जो देश के किसानों को बदलते दौर के साथ  समुन्नत कर देश के बहुसंखयक जनता के विकास में ए टू जेड विटामिन साबित होगा।
    
     तो फिर इस बिल को  कतिपय जनों द्वारा "अन्नदाता के थाली में छेद---!" के रूप में देखा जाना कई एक प्रश्न खड़ा करता है। किसानों और बाजारों के बीच वर्तमान मध्यस्थ की भुमिका और मलाई चट कर जाने वाले   लोगों के बीच अपने हित की बली चढ़ता देख उसी परिस्थिति  को बचाने की छटपटाहट का यह नतीजा है तथाकथित जनांदोलन। गंभीर मंथन और अध्ययन हमें अच्छे परिणाम की आशा के साथ वर्तमान कृषि सुधार बिल के प्रति आश्वस्त करता है, जो किसानों को आत्मनिर्भर   और  आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

पवन‌ मिश्रा
दुमका-- झारखंड
9931126996
email- pawan19755@gmail.com
    

         

Tuesday, September 22, 2020

राजनीति की भाषा - राजनेता ही जाने

राजनीतिक भाषा --- राजनेता ही जाने

नियोजन नीति--2016 के तहत चयनित शिक्षकों की सेवा खतरे में है । माननीय उच्च न्यायालय रांची के बृहत्तर खंडपीठ ने किसी भी नौकरी और भु क्षेत्र के लिए शत प्रतिशत आरक्षण को असंवैधानिक  बताते हुए , झारखंड सरकार --(जे एस एस सी) द्वारा चयनित और कार्यरत (सिड्युल्ड--13 जिले के इस वर्णित नियोजन नीति पर) शिक्षकों की नौकरी को गैर नियमानुकूल मानते हुए क्वैश कर दिया है।

      कई एक मित्रों का मानना है कि यह बिल्कुल सही है । माननीय न्यायालय के निर्णय पर टिका टिप्पणी का दायरा बहुत सीमित होता है---- और संक्षेप में कहना चाहूंगा यह सही भी है------!

         यह निर्णय सही है--- , नियोजन नीति भी तो कल परसों तक सही ही था -- क्योंकि इसे व्यापक प्रक्रिया अपनाकर कैबिनेट सहित विधानसभा में पास कराया गया होगा इसके बाद राज्यपाल महोदया द्वारा हस्ताक्षरित करते हुए, सभी आवश्यक वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करते हुए ही उस समय लागु किया गया होगा।
        लम्बी वैधानिक प्रक्रिया के बाद पदों का सृजन और इसके बाद विज्ञापन फिर बहाली। यानि की हरेक स्तर पर कानुनी प्रक्रिया का अनुपालन सुनिश्चित किया जाना जरुरी होता है। 

लोकतंत्र के शासन संचालन में सरकारी पक्ष और विपक्ष दोनों की कमोबेश समान भुमिका होती है और जनता के हक में संतुलित व्यवस्था संचालन इन दोनों की समान जिम्मेदारी। 

        आज हमारे माननीय मुख्यमंत्री जी जो बहुत ही संवेदनशीलता के साथ इस मुद्दे पर यह कह पाये--- कि पिछली सरकार द्वारा राज्य को 13 और -11  जिलों में शिड्युल और नन शिड्युल के तहत  दो भागों में बांटने की साज़िश थी उसे कोर्ट ने विफल कर दिया है।

         मुख्यमंत्री जी हम गैर राजनीतिक जनों को भाषायी संकेत में जाने की कोई आवश्यकता नहीं है --- न ही उतनी समझ है। लेकिन उनसे समान्य जनों की नाराज़गी और आपमें बेहतरी‌ को देख कर ही राज्य की जनता ने आपको अपना मुखिया चुन लिया है।

     अगर नियोजन नीति गलत है तो फिर इस गलती की जिम्मेदारी आप पर भी है।आप उस समय विपक्ष में रहते हुए इसे पास कैसे होने दिये---! आप अपने इस जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते हैं --- हेमंत भैया ---।

     आप तो नौकरी देने और स्थानीयता को वरीयता जैसे मुद्दों पर जनता से भोट मांगे थे--- झारखंड की जनता को यह बात प्रमुखता से याद  है , उम्मीद है आप भी इसे नहीं भुले होंगे।

          व्यवस्था के तहत शिड्युल्ड एरिया में सिर्फ उसी जिले के स्थायी  वासी आवेदक थे --- और नौकरी कर रहे हैं।
 ऐसे में आप द्वारा झारखंडी को दिये गये अश्वासन का ही पालन उपरोक्त व्यवस्था में हो रहा था।

       फिर पिछली सरकार के जिम्मे आरोप मढ़कर आप अपनी जिम्मेदारी से कैसे उन्मुक्त हो सकते हैं---!

        चलिए हम सभी मानते हैं यह नियोजन नीति गलत है-----

   तो फिर इस नियोजन नीति बनाने वालों को क्यो नहीं दण्डित किया जाय--?

जिम्मेदारी तो तय होने  ही चाहिए ।

       अब कोई ये भी समझा दे कि इस हेतु शिक्षक कहां और कैसे हैं जिम्मेदार---?

   आपने विज्ञापन निकाला --- सभी  अहर्ताओं को पुरा करते हुए इसने जगह सुरक्षित कराया । आज के दिन में कई शिक्षक अपने पुराने नौकरी को त्याग कर आये हैं --- ,इस नोकरी के आधार पर बैंक से लोन लिये हुए हैं-----

   इसमें चयनित  शिक्षकों की गलती कैसी---? इन्हें योग्यता पर आपने नौकरी दिया है --- ये योग्य हैं ---आपने इसे सफल अभ्यर्थी के रुप में सत्यापित किया है---- तो फिर -------

जो अयोग्य थे ,जिसने नियोजन नीति बनाई थी,  उस पर कार्रवाई न करके --- जिम्मेदारी तय न करके, नीति को बनाने में शुन्य भुमिका निर्वहन करने वाले इस नीरिह शिक्षकों पर शासन का और माननीय न्यायलय का डंडा कैसा --- बिल्कुल एक अनुत्तरित सवाल है।

   याद रखिएगा यह शिक्षक किसी मंत्री और सचिव के घर का बेटा बेटी नहीं  हैं -- ये सभी अधिकतर मध्यम और निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के सदस्य हैं --- हमारे आपके घर आंगन के ही बेटा और बेटीयां हैं --- जिसका वर्तमान अन्याय के मजबूत हथौड़ा से पीटा जा रहा है।

   मैं अपनी पुरी निष्ठा के साथ इन शिक्षक भाई --बहनो के लिए अपने मुख्यमंत्री जी से और माननीय उच्च न्यायालय रांची से गंभीरता पूर्वक न्याय और दया की गुहार लगाता हूं--- पुनर्विचार का अनुरोध करता हूं और हार्दिक सदभावन व्यक्त करता हूं----और आप-----?

     पवन मिश्रा
   दुमका

Thursday, September 3, 2020

पूछता है भारत --- कहां है रोजगार--?

पूछता है भारत --- कहां है रोजगार --?

                  कहते हैं असली दोस्ती की पहचान मुसीबत के समय  होती है। और सच्चे दोस्त मुसीबत में आपके सहयोगी होते हैं, आपको मुसीबत से निकालने में मददगार। सच्चे दोस्त आपको भटकते मार्ग पर चलने से रोकते हैं, और  नेक मार्ग पर चलने को विवश करते हैं ।

      मन की बात (30अगस्त सन् 2020) के लाईव प्रसारण में जब देश की जनता ने सोशल मीडिया पर पसंद के बनिस्पत नापसंद बटन को लगभग डेढ़ गुणा ज्यादा बार दबाया हो ,तो परिवेश में गंभीर सवालात खड़े होने लाज़िमी हैं। इतना ही नहीं देश के बेरोजगार जनों ने सोशल मीडिया पर 'बेरोजगार मांगे रोजगार"और अपने अपने नामों के आगे बेरोजगार शब्द को लिखकर हैशटैग के साथ ट्रैंड कराया।

        मई सन्2019 में जिस नरेंद्र मोदी को देश के कुल मतदाताओं  में से 38-5% मतदाता ने 336 सीटों के साथ ढ़ेर सारी अपेक्षाओं को पुरी करने की जिम्मेदारी सौंपी थी , देश का राजसिंहासन सौंपा था क्या उससे जनता का मोह भंग हो गया--? जिस सोशल मीडिया पर मोदी अपने चुनावी नारे और  देश के प्रति उनके भावी कार्यो का रोड मैप प्रभावी तरीके से रखने में कामयाब हो पाये थे , देश की बहुसंख्यक जनता का विश्वास अपने पक्ष में आकृष्ट कर पाने में सफल हो पाये थे, क्या वही जनता अब अपने को ठगा ठगा महसूस कर रहा है--? 

    क्या अब सोशल मीडिया पर पसंद और नापसंद देश के राजनीति की दशा और दिशा तय करेगा---? जिस सोशल मीडिया ने नरेंद्र मोदी को वैश्विक हीरो , जन जन का नेता और जादुई छवि वाले नेता के रूप में स्थापित किया था , वह सब क्या एक बालू के भीत की तरह धरधरा कर गिरने ही वाला है---? क्या देश एक नये विकल्प की ओर देख रहा है--? क्या हमारे पास विकल्प है भी--? सन् 2019 में जिस कांग्रेस को संपूर्ण लोक सभा के दस प्रतिशत सीट पर भी जनता ने न स्वीकारा हो, सत्तर साल तक भारतीय राजनीति की धुरी रहे,  सत्तासीन रहे पार्टी  जब पहली दफा तकनीक रूप से विपक्ष का तमगा तक हासिल करने में नाकामयाब रहा हो , लडखडाती ,डगमगाती कांग्रेस क्या बन पायेगी चरमराती अर्थव्यवस्था वाले वर्तमान संकट का खैवनहार---?

        आईए गौर करते हैं, वर्तमान समस्या को। हालिया आए रिपोर्ट में  दुसरी तिमाही का जी डी पी -23.9% पर पहुंच गया है। बिल्कुल स्पष्ट है-- यह दौर काफी संकट भरा है । जी डी पी यानी ग्रास डोमेस्टिक प्रोडेक्ट का यह डाटा अप्रैल --मई--जून  माह के तमाम गतिविधियों पर आधारित है जहां हम कुल उत्पादकता को पाते हैं। और हमें यह याद रखना चाहिए कि यह काल वही समयकाल है जब देश में पूर्ण लाकडाऊन था , फैक्ट्रीयां, कल कारखाने , रेल , सहित लगभग सभी गतिविधियां पूर्ण रुप से बन्द थे  और तमाम अर्थशास्त्री को इस बात का अंदेशा था। 

          आज के हालात में जब संपूर्ण विश्व सहित  भारत ,  कोरोना प्रभाव कारण गंभीर रूप से प्रभावित  है--- तो निश्चित रूप से ऐसी स्थिति में कोई भी व्यवस्था संचालक अपनी जिम्मेदारी के सूची में सर्वोच्च प्राथमिकता  मानव जीवन की सुरक्षा को देगा । एक घर का मुखिया जब अपने परिवार में लगातार बिमारी का संक्रमण देख रहा हो तो वैसी स्थिति में परिवार के सभी सदस्यों के भोजन और चिकित्सा के अलावे , उसे क्या कुछ और  दिख सकता है--?  यही तो हमारे देश के प्रधानमंत्री जी कर रहे हैं। 'राइट टू फ़ुड' और 'वन नेशन वन राशन कार्ड' इसी दिशा की ओर बढ़ते  कदम को तो इंगित करता है। एक बात बिल्कुल सच,  जिसे हम हर भारतीय को स्वीकारना चाहिए कि हमारे आज के इकानामी की तुलना अमेरिका और चाइना के अर्थव्यवस्था से नहीं की जा सकती है । निरंतर सीमा संघर्ष, पाकिस्तान ,चाइना,  नेपाल जैसे पड़ोसी देशों के जगजाहिर इरादा से निरंतर निपटना  और चुनौती को कुशलता से समाधान करने के पीछे अर्थव्यवस्था का बड़ा सा हिस्सा जो गैर नियोजित है -हर रोज खर्च किये जा रहे हैं,  और इसे किसी भी कीमत पर टाला नहीं जा सकता है। इस प्रकार से असंभावित , अनायास दो तरफा मुसिबत किसी भी देश के आंसुतलन के लिए प्रर्याप्त वजह हो सकते हैैं।
       जी डी पी के गिरावट की वैश्विक स्तर पर अगर भारत से तुलना की जाय तो -- अमेरीका सहित लगभग संपूर्ण विश्व नकारात्मक जी डी पी के डाटा को ही दिखा रहे हैैं। वैश्विक मंदी के इस दौर में अमेरिका, फ्रासं , इटली आदि देशों में अबतक के अपने पिछले तमाम बेरोज़गारी के रिकार्ड को तोड़ दिया है--- भारत भी कमोबेश इसी वैश्विक मंदी को दृश्य पटल पर दिखला रहा है।

           देश के इस चिन्ताजनक माहौल में भारत सरकार द्वारा 'CET'-- 'कौमन इलिजीबलिटी टेस्ट' की घोषणा   बेरोजगारों के लिए निराशा के बीच एक आशा की खबर अवश्य है । इसी प्रकार से कल कारखाने, रेल आदि के आंशिक संचालन की शुरुआत , शेयर सूचकांक का ग्राफ बढना ये सभी अर्थव्यवस्था  रुपी गाड़ी को वापस पटरी पर आने और सरपट दौड़ की तैयारी को दर्शाता नजर आ रहा है।

     लोकतंत्र में असंतोष और विरोध के जायज तरीके हर समय स्वीकार्य होता है । हमारे देश को बिहार के जयप्रकाश नारायण का जन आंदोलन नहीं  भूलना चाहिए--- एक ओर यह सत्ता पक्ष को तानाशाही करने से रोकता है तो दुसरी ओर  जन जन को उनके अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने की सीख देता है। सोशल मीडिया पर यह असंतोष और नापसंद की बटन तो ज्वालामुखी के क्रेटर और लार्वा कि तरह है -- जिसे ससमय उचित निष्पादन न होने के स्थिति में भयंकर भूकंप और विस्फोट की संभावना को ही जताता है। हमें धैर्य के साथ  विश्वास अपने द्वारा चुने हुए जनप्रतिनिधियों पर और प्रधानमंत्री पर होने चाहिए जो इस संकट से देश को बाहर निकालने कि दिशा में आगे बढ़ चले हैं।

------- पवन मिश्रा , दुमका ( झारखंड)
   मोबाईल नम्बर --9931126996
Gmail--- pawan19755@gmail.com

सादर धन्यवाद