Friday, September 10, 2021

तालिबान -अफगानिस्तान के प्रसंग में सशंकित हिन्दुस्तान

तालिबान - अफगानिस्तान प्रसंग          और हिंदुस्तान 
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            अफगानिस्तान में वर्तमान राजनीतिक संकंट और तालिबान के कब्जा को सरलतम रुप से देखने के लिए हमें इस क्षेत्र के ऐतिहासिक स्वरुप और समकालीन राजनीतिक रणनीति को देखें जाने की आवश्यकता है।

             वर्तमान अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच , और समकालीन राजनीतिक व्यवस्था के तहत अफगानिस्तान और भारत के बीच ब्रीटिशर्स द्वारा खिंचे गये डूरंड रेखा ने भी तालिबानियों को खाद और उर्वरक मुहैया कराकर वर्तमान भयानक अक्रांता वाला चेहरा विकसित करने में मदद किया है।
              डूरंड रेखा और इसके परिप्रेक्ष्य में विस्तार से रखे गये सभी बातों को राजीव डोगरा के पुस्तक -- 'एक्रास द पठान हार्ट'  के अनुसार और अफगान कमिश्नर और  ब्रिटिश के द्वारा यह रेखा आमीर से  समझौतों के तहत मौके पर ही नक्शे पर यह लाईन खींच दी गई थी -- जो किसी भी दृष्टिकोण से व्यवहारिक नहीं था ।
           वस्तुत: यह रेखा पश्तुन सम्प्रदाय के घर आंगन खेत खलिहान और विविध परिवारों के बीच एक विभाजक रेखा जैसा साबित हो रहा था। फलत: इससे संबंधित जनाक्रोश वर्तमान पाक भूखंडों और अफगान भुखंडो पर निवास करने वाले जनों के बीच निरंतर गहराता गया और  स्थानीय असंतोष जो सुन्नी समुदाय के पोषक थे उसने सरिया कानुनों के तहत इस क्षेत्र पर सभी बंदिशों को खत्म कर अपना हुकूमत चलाने की योजना बनाई। पाकिस्तान ने अन अपेक्षित आतंक समुह के प्रवेश निषेध को लेकर  इस क्षेत्र का फेसिंग भी कराया लेकिन यह कारगार न हो पाया।फलत: दोनों ही देशों ने उक्त डूरंड रेखा के प्रति असंतोष जाहिर करते हुए इसे अव्यवहारिक तो मान लिया लेकिन आपसी सहमति आधारित सीमा रेखा / बाडर लाईन आज तक नहीं विकसित कर पाया।

     पश्तून आंदोलन का एक अलग भी समीकरण है , जिससे पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों ही सशंकित रहते हैं। पश्तुनो का राष्ट्रवादी हिरो फ्रंटियर गांधी का भारत से नजदीकी संबंध भी पाकिस्तान को शुरूआत से ही असहज करता आया है। विदेशी मामलों के विशेषज्ञ का मानना है कि तालिबानियों को पाकिस्तान द्वारा समर्थन के पिछे का मंसूबा पश्तुनो ‌को कुचलना भी था। जबकि पश्तूनों के आजादी को भारत द्वारा  तथाकथित समर्थन या संकेत मात्र से पाकिस्तान  बेचैन हो जाता है।


         पश्तो जुबान में छात्रों को तालिबान कहा जाता है।नब्बे के शुरुआती दशक में जब रुसी सैनिकों द्वारा अफगानिस्तान को छोड़कर वापस जाने की प्रक्रिया चल रही थी उस समय ये तालिबान अपने को सांगठनिक रूप से मजबूत कर रहे थे। विशेषज्ञों के अनुसार पश्तो आंदोलन पहले धार्मिक मदरसों में उभरा जिसका वित्तपोषण सउदी अरब ने किया ।

            यह तालिबानियों के शुरुआती दिनों की बात थी । कलांतर में यह पश्तून और तालिबान कमोबेश एक दुसरे के पर्याय सा बन गये और अपने समान हित को लेकर एक दुसरे का समर्थन भी करते हैं और विपरीत हित पर टकराते भी हैं। 

            जब सोवियत संघ के सैनिक वापस जा रहे थे तो उस समय तालिबानियों के उभरने की सुगबूगाहट   और सांगठनिक रूप से मजबूत होना  स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा था और ठीक आज जब अमेरिकन सैनिक वापस जा रहें हैं तो तालिबानियों द्वारा सत्ता अवरोहन  के बीच का कालखंड भी वर्तमान राजनीतिक विश्लेषकों के अध्ययन का कालक्षेत्र अवश्य होना चाहिए।
          अब दशकों तक लंबे समयकाल जैसा सैन्य सहित अन्य विविध सहायता प्रदान कराने वाला अमेरिका और रुस  को आज जरुर आत्मचिंतन करना चाहिए ,कि किन कारणों से उनकी नीति अफगानिस्तान में लोकतंत्र की स्थापना में असफल रहा । दरअसल सैन्य प्रहरी के साथ साथ  इनके औपनिवेशिक व्यपारिक हित भी इन कालखंडो में यहां परोक्ष रूप से गतिशील रहा।कतर की राजधानी दोहा में फरवरी 2020 में तालिबानी प्रतिनिधि और अमेरिकी प्रतिनिधि के बीच एक समझोता हुआ जिसमें अमेरिका द्वारा अपने सैनिकों के वापसी और तालिबानियों द्वारा किसी भी अमेरिकी ( सैनिकों सहित ) को कोई नुकसान न पहुंचाने पर सहमति बनी। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति का यह बयान‌ स्वभाविक ही है,  कि अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लोकतंत्र की रक्षा के लिए अफगान जनता को संघर्ष करना होगा , अमेरिकी सैनिकों को इस हेतु व्यर्थ ही जान गंवाने क्यों भेजा जाय। दरअसल अमेरिका अफगानिस्तान में भारी भरकम सैन्य खर्च के लंबे समय से वहन करते करते‌ परेशान सा हो गया था और यह कदम अमेरिकी विदेश नीति का हि एक आयाम था जो पूर्व निर्धारित था और जिनकी झलक अमेरिकी चुनाव में देखा जा सकता है।

             लोकतंत्र के मजबूत बुनियाद के लिए जागरूक जनता और शैक्षणिक परिस्थिति मुख्य भूमिका में होता है। अल-कायदा और तालिबान को नस्तनाबूद करने की तथाकथित सोच रखने वाले अमेरिकी रणनीतिकारों ने यह बहुत बड़ी भूल‌ कर दी थी -- कि तालीबान , अल-कायदा , जैसे आतंक के पर्याय , वहां की जनता द्वारा ही पोषित होता था , जिसे किसी ने गंभीरता से नहीं पहचाना और न समाधान के मौलिक उपाय खोजे। किसी भी वैश्विक संगठन ने अफगानिस्तान के हालात को लोकतंत्र के अनुरूप स्वत: पुष्पित पल्लवित होने के लिए आवश्यक मौलिक बातों पर ध्यान नहीं दिया , वहां के शैक्षणिक परिवेश और रोजगारोन्मुख पाठ्यक्रम को टटोलने और उसे आधुनिक स्वरूप में ढालने के लिए कोई यत्न नहीं किया । 


       फलस्वरूप सोवियत रूस और अमेरिकी सैनिक जो वहां के प्रहरी बन बैठे थे के घर-वापसी पश्चात पुरानी व्यवस्था का कायम हो जाना कोई अचरज वाली बात नहीं ।

    तालिबानियों द्वारा गठित सरकार का उद्देश्य है सरिया कानून लागू करना , बुर्का व‌ पर्दा प्रथा का सख्ती से लागू करना , औरतों को बगैर पुरुष सहयोगी के घर से निकलने पर मनाही आदि।

       अफगानिस्तान में वर्तमान गठित तालिबानी सरकार इक्कीसवीं सदी का  शायद सबसे बड़ा  भद्दा मजाक होगा जिसे विश्व एक अनोखे प्रकार का ग्रेट ट्रेजडी या ग्रेट कमेड़ी की संज्ञा देंगे यह तो भविष्य के राजनीतिक विज्ञान वाले  पुस्तक में एक काला अध्याय के रूप में होगा। 
                आम तौर पर एक सरकार गठन के समय स्वस्थ परंपरा चली आ रही है कि अनुभवी और ज्ञानी जनों को उनके काबिलियत के अनुकूल ही विभागों का बंटवारा होता है  , उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलती है समाज में अहम विषयों पर अच्छे सोच को लाने का ,और लागु करने का। लेकिन आज का अफगानिस्तान इससे बिल्कुल परे है। नाग सर्प को अगर आप नित्य  अमृतपान कराते हैं तो इस बात की कोई गारंटी नहीं कि वह आपको या आपके हितैषी को नहीं डसेगा -- आपके परिवेश में जो आयेगा  उसे वह डसेगा जरुर बशर्ते  आप लापरवाह वश कभी भी असावधानी बरते। आज यही तालिबान कर रहा है। कभी तालिबान का पोषक वैश्विक समुदाय के विभिन्न देशों को माना जाता था। आज सभी संशकित हैं। खुनखराबा , गोला बारुद ,अपहरण,  मानव बम इस्तेमाल , हत्या जैसे जघन्य कुकृत्य जिनके माथे जितनी बड़ी नरसंहार किया गया हो वह व्यक्ति आज अफगानिस्तान के तालिबानी सरकार में उतने ही बड़े ओहदे पर विराजमान हैं।
        अभी तक के घटनाक्रम यह संकेत देने के लिए काफी है कि वह दिन दुर नहीं जब वैश्वीक समुदाय का स्वत: मंचित व घोषित निर्विवाद मुखिया अमेरिका,  लंबे समय से अपने द्वारा घोषित मोस्ट वांटेड टेररिस्ट के साथ अमेरिकी विदेश मंत्री या राष्ट्र पति समकक्ष के हैसियत से साथ साथ चाय की चुस्की ले रहे हों -- वार्ता कर रहे हों।
       इस समस्त घटनाक्रम में भारत के लिए चिंता बढ़ती जा रही है। वर्तमान तालिबान सरकार कहीं न कहीं से चीन और पाकिस्तान का अपरोक्ष गठबंधन‌  सरकार जैसा है , जिसे भारत को संभवतः अकेले अपने बल बूते पर लड़ना और राजनीतिक कौशलता से अपनी मजबूत स्थिति जगजाहिर करना होगा। और वैसी स्थिति में जब अमेरिका जैसा वैश्विक महाशक्ति और संयुक्त राष्ट्र संघ इस घटनाक्रम पर चुप्पी बनाये‌ हुए हों तो एक प्रकार से इस सरकार को अपनी मौन सहमति और स्वीकृति देने जैसा ही है -- ऐसे स्थितियों में भारत के लिए हर एक कदम , इस संदर्भ में बोला गया हरेक वाक्य दुरगामी परिणाम वाला साबित हो सकता है ।  कहते हैं दुध का जला मठ्ठा भी फुक फुक कर पिता है -- और भारत भी आज इसी रणनीति पर गंभीर है , अंतराष्ट्रीय बिरादरी के साथ भारत  है ही लेकिन कोई भी ऐसा कदम भारत नहीं उठाना चाहता जिसके दुष्परिणाम हमें झेलने पड़े। 

    विश्व   मानवाधिकार  वालों ने‌  पैंतीस युरोपीयन देशों के प्रतिनिधियों के साथ जम्मू कश्मीर का उस समय दौरा किया था जब वहां से धारा 370 को समाप्त कर दिया गया था , अब शायद आज के समय में विश्व मानवाधिकार संगठन सहित अन्य वैश्विक संस्था गहरी निद्रा में हो और उसे अफगानिस्तान के हालात कि जरा भी भनक न हो लेकिन उसे विश्व बिरादरी के प्रमुख देशों द्वारा जगाना ही चाहिए  , और इस प्रकार के वैश्विक संगठनों को अपने अस्तित्व में होने का अर्थ जगजाहिर करना चाहिए वरना जिसकी लाठी उसकी भैंस क्रुरता से अपना अर्थ जगजाहिर करता रहेगा ।
    धन्यवाद।
©पवन मिश्रा
दुमका - झारखंड
814101



         


Sunday, June 13, 2021

पंजे का भगवाकरण---?

         पंजे का भगवाकरण
बदलते समय के साथ हर वो चीज बदलते जाता है जो समय और सभ्यता के साथ अपनी तारतम्यता बनाये रखना चाहते हैं। आपको अगर परिवेश में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करानी है तो परिवेश के अनुसार अपने  आपको ढालना होगा अपने आपको उसके अनुकूल बदलना होगा अन्यथा परिदृश्य से आप स्वत: गायब
होते चले जायेंगे और जल्द ही विलुप्तप्राय  तथ्यों की श्रेणी में गिने जायेंगे।
           पिछले कई घटनाक्रमों ने यह बात व्यापक चर्चा का विषय बना दिया है ,कि क्या सन् 1885 में स्थापित कांग्रेस अपने मौलिक तथ्यो से भटक गयी है---? एक एक करके मजबूत और व्यापक जनाधार वाले नेता अगर अपने घर को छोड़ , अपने पार्टी को छोड़ किसी और राजनीतिक छत्रछाया में चले जा रहे हों या धुर विपक्षी खेमा के नेताओ का महिमा मंडन करने लगे,  सत्ता पक्ष की  नीतियां जो कुछ समय पहले तक जन विरोधी  रूप में प्रसारित किया जा रहा था और अचानक से उन्हीं नीतियों का महिमा मंडन किया जाने लगे तो संशय और आका के नेतृत्व संचालन पर प्रश्न‌चिन्ह उठना लाजमी होता है।
         इसी क्रम में जी -23 जो तथाकथित गांधीजी के अनुयायीयों या  कांग्रेस आलाकमान के विरोध में नेतृत्व‌ क्षमता पर प्रश्न चिह्न खड़ा करने वाले वरिष्ठ कांग्रेसी जनों के 23 सदस्यों का समूह जो आलाकमान को पत्र के मार्फत कोर नेतृत्व सहित अनेक मुद्दों पर‌ व्यापक बदलाव की महती आवश्यकता को रेखांकित कराया था, पर एक ध्यान देने की आवश्यकता है।
             आजादी के बाद से सन् 2014 तक अधिकांश‌ समय तक  कमोबेश कांग्रेस ही जनता के लिए सत्ता संचालन हेतु एक मात्र विकल्प था । फिर इतने लंबे समय तक सत्ता‌ संचालन करने वाला राजनीतिक दल अचानक से आज इस स्थिति में कैसे पहुंच गया कि अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष का न तो जनतांत्रिक व्यवस्था से चुनाव करा पा रहा है , और न ही विपक्षी दल के नेता के रूप में देश के सामने कोई अपेक्षित अहर्ताधारी नेता  दे पा रहा है --? इस सवाल के ज़बाब पाने की तिलमिलाहट जिन जिन कांग्रेसियों ने व्यक्त कर पाया उनके आवाज को नजरंदाज करने का प्रयास किया गया और उसे राजनीतिक षडयंत्र के तहत उनका राजनीतिक ओहदा बौना कर दिया गया  , उनके राजनीतिक मंसूबों के पर कतर दिये गये।

        काश कि कांग्रेसी आलाकमान यह समझ पाते की जिस कर्मठ नेताओं ने अपने छात्र जीवन से संघर्ष की मजबूत गाथा के साथ अपने जीवन के संपूर्ण समय को कांग्रेसी महल के चौखट को चमकाने में बिताया है आज उसे आलाकमान के नजर अंदाज करने और मांग पर मौन प्रतिक्रिया से तंग आकर अपने आपको वो कांग्रेस से स्वत: छुट्टी कर लें रहे हैं ,रोशनदान से आ रहे रौशन के किरण को आलिंगन कर रहे हैं उस और दौड़ रहें हैं, इसके पिछे कुछ तो मौलिक कारण रहे होंगे ।

        इसी जी --23 में एक सदस्य , जो राहुल गांधी के काफी करीबी थे और कोर कमेटी के पुनर्गठन हेतु लंबे समय से अनुरोध कर रहे थे ,ने बार बार अपने मांग को ठुकराने पर तथा निरंतर लल्लो चप्पो की राजनीति को तरजीह मिलता देख , जतिन प्रसाद‌ ने तंग‌ होकर कांग्रेस छोड़ दिया और बीजेपी ज्वाइन कर लिया। जतिन प्रसाद ने बी जे पी को एक अनुशासित और योग्य शिर्ष नेतृत्व के संचालन में योग्यता , क्षमता और उत्पादक्ता देने वाले कार्यकर्ता को उपयुक्त  ओहदा देने वाले पार्टी के रुप में पहचाना।

          जतिन प्रसाद जी जैसे कर्मठ और महत्त्वकांक्षी जन इस प्रकार के घटनाक्रम के अकेला उदाहरण नहीं हैं,  एक लंबी मानव श्रृंखला सी है जो कांग्रेस या अन्य पार्टियों को छोड़कर बी जे पी ज्वाईन कर ली है , इन्हें अपना भविष्य और कुछ स्वतंत्र होकर काम करने की आजादी यहां दिखती है। जैसे -- एस एम कृष्णा ( पूर्व विदेश मंत्री सह वरिष्ठ कांग्रेसी), ज्योतिरादित्य सिंधिया, चौधरी बिरेंद्र सिंह, संजय सिंह , राधाकृष्ण बिखे पाटिल , नारायण राणे, टाम वडक्कन, हेमंत विश्वा शर्मा,, विजय बहुगुणा ,शंकर सिंह वाघेला, रीता बहुगुणा जोशी, नारायण राणे , राव इंद्रजीत सिंह जैसे अनेकों प्रशंसनीय राजनेता हैं जो किसी न किसी कारण अपने पार्टी को छोड़कर अपने आपको भगवा रंग में रंग लिया ।
    शिर्ष नेतृत्व द्वारा हर अच्छे और जनोपयोगी नीतियों का विरोध करना कभी भी विवेकशील राजनेताओं को तार्किक रूप से रुचीकर नहीं हो सकता है । अब कांग्रेस के वरिष्ठ और पुराने राजनेता जो सोनिया गांधी के बहुत करीबी माने जाते हैं -- दिग्विजय सिंह का बयान आना कि कांग्रेस अगर सत्ता‌ में आती है तो जम्मू कश्मीर को अपने पुराने स्वरूप में वापस लाया जायेगा और धारा 370 को पुनः बहाल करने की दिशा में कार्य किया जायेगा। यह बयान तार्किक रुप से किसी भी राष्ट्र भक्त को  तो नापसंद होगा ही साथ ही साथ संबंधित पक्ष के सभी राजनेता भी असहज महसूस करेंगे और ये बात गैर है कि लल्लो चप्पो की परिधि में घुमने वाले रागदरबारी बुद्धीजीवी अब इसी को महिमा मंडित करते नहीं थकेंगे।
      विचारणीय हो कि कांग्रेस छोड़कर जाने वाले राजनेताओं से कांग्रेस तो कमजोर हो ही रही है , बी जे पी ज्वाईन करने वालों से बी जे पी का भला हो सकता है , उस राजनेता का भला हो सकता है लेकिन देश का भला तो मजबूत विपक्ष से ही संभव है जो वर्तमान में ऐसा विपक्षी धडा दिख नहीं रहा है। धन्यवाद्
           नीतू कुमारी
     संगीतज्ञ सह समाजसेवी
          दुमका - झारखंड
             814101
     
           

            

Wednesday, May 5, 2021

---यादें-----

--------यादें----------
परिदृश्य देखो 
ये मैं नहीं परिवेश बोल रहा है
मैं आप और सारा हालात यही कह रहा है
कोरोना भय और संशय के बीच
मानव को तड़पा तड़पा कर
बेचैन‌ कर रहा है
कभी अनजाने नम्बर
तो कभी अपनों का फ़ोन
मन को कर देता है,
अशुभ,सशंकित और अप्रिय समाचारों
के संभावित खबरों से बेचैन
जानता हूं, इसपर नहीं है किसी का नियंत्रण--
और  फिर अगले ही पल 
सर्व स्नेहिल जनों के रक्षार्थ करता हूं सर्वशक्तिमान का स्मरण

फिर स्मरण करता हूं
 धुंआ ---
सुखे पत्ते राख और 
मोटे मोटे डालियों के साथ कैसे
अपनों से अपनों को तन्हा 
कर उड़ता जा रहा है

ये यादें मेरे नये पुराने जख्मों
को कुरेद कर ताजा कर जा रहा है
हर दिन यादों के कुछ गुलदस्तों से
 सुंदर सुंदर फुल मुरझा रहे हैं
पर यादें तो अब भी हैं ताजा
और ये यादें ही हैं
जिसे सिरहाने रख
सुनता हूं और सुनाता हूं
अपने को रोज एक कहानी

©पवन‌ मिश्रा
  दुमका- झारखंड
   814101

Saturday, April 24, 2021

विश्वास

विश्वास

          ____________

तेरे संग चलते चलते
मुझे आभास ऐसा होने लगा है
कि दुरियां सिमटती जा रही है
कठीन रास्ते सुगम दिखने लगे हैं
जीवन के संघर्ष पथ पर
जाने अंजाने
सही ग़लत 
बहुत कुछ हो जाने के बाद 
डरता हूं मैं
अपने किये‌ गलत कर्मों के 
बुरे फल से 
तभी धीरे से
कोई कह रहा है
मैं सुन पा रहा हूं
कोई बिन कहे
 मुझे समझा पा रहा है
धैर्य रख ----- सब्र बांध
आगे भी भला होगा
सब कुछ अच्छा होगा 
उस अदृश्य शक्ति का साथ
मुझे दे रहा है
हर पल यही पावन विश्वास
©-- पवन मिश्रा
     दुमका - झारखंड़
         814101

Tuesday, April 20, 2021

कोरोना संवाद

कोरोना संवाद

     मौत का मंजर हर किसी को भयभीत करते जा रहा है --- हर रोज विविध शहरों के कोरोना न्युज बुलेटिन में अपनों के अलविदा हो जाने की खबर अंदर से सबको झकझोर सा रहा है, शहरों की अपेक्षा गांवों में कुछ हद तक अभी भी अच्छे और शुकून भरा माहौल देखा जा सकता है।

      कल तक कोरोना को जिसने भी हवा हवाई साबित करने का प्रयास किया वो सब आज इसे ग़भीरता से ले रहे हैं और लेना भी चाहिए--- शायद आज और अब की गंभीरता अगर हम बिते दिनों में अपनाये होते , और कोरोना को मजाक में नहीं लिये होते तो शायद यह परिस्थिति हमें देखने को नहीं मिलता।

   प्रशासन और सक्षम  प्रबुद्ध वर्गो से मेरा निवेदन है कि --

     24घंटे×7 दिनों एक टेलीमेडिसिन सेंटर का यथाशिघ्र व्यवस्था हो--- हर कोई डाक्टरस के दिये गये  नम्बर पर चिकित्सा सुविधा प्राप्त कर सके , इस हेतु व्हाटस एप्प की सुविधा भी कारगार हो सकती है -- डाक्टरस मंडली को इस हेतु त्वरित संज्ञान लेकर प्रशासन से सम्न्वय कर फोन नम्बर /व्हाटस एप्प नम्बर सार्वजनिक करने चाहिए।

       लोकल एम एल ए और एम पी (#BasantSorenDumka. #ShibuSorenDumka #ShunilSoren #LouisMarandi #DCDumka) जैसे सक्षम सामर्थ्यवान , शहर के सभी स्कुलो , कालेजों , होटलों और अन्य सरकारी बड़े भवनों को अस्थाई हास्पीटल के रुप में विकसित करने पर विचार करे--- इस हेतु विधायक --सांसद फंड सहित शहर के अन्य‌ कुबेर कृपा पात्रों  से मदद के लिए अनुरोध किया जाना चाहिए। अगर पर्याप्त सरंचना यथा भेंटिलटर , आक्सीजन ,  पीपी किट, सब  की खरिद खुले बाजार से कर लिया जाय और डाक्टरस तथा पारा मेडिकल खुल कर सहयोग करें तो पांच हजार से ऊपर मेडिकल हेतु बेड इन वर्णित जगहों पर लगाये जा सकते हैं।

   सेल्फ आइसोलेशन कन्फर्म कोरोना पेसेंट को कोरोना किट उपलब्ध‌कराने का माननीय हेमंत सोरेन‌ का निर्णय बहुत ही कारगार साबित होना चाहिए -- लेकिन इनपर अमल भी अविलंब शुरू हो जाय -- इनके लिए व्यपक प्रयास शुरू हो।
   यथाशिघ्र स्थानीय श्मसान घाट पर विद्युतीकृत शवदाहगृह बने -- इस हेतु भी गंभीर सोच विचार की जरूरत है।

     पिछली सरकार और आज के सरकार पर दोषारोपण करने का यह समय नहीं है। यह बात बिल्कुल सत्य है कि आजादी के पिछले सतर सालों में जो स्वास्थय सेवा हेतु संरचनात्मक विकास होने चाहिए था वह हमने नहीं कर पाया है -- लेकिन बढ़िया सरंचना वाले देश इटली , अमेरिका ,जर्मनी भी तो कोरोना से कराह रहा है --- इसलिए हमे कड़ाई से दिशा निर्देशों का पालन करना ही चाहिए--- सामुदायिक सहभागिता-- सेल्फ आइसोलेशन , कोरोना से ग्रसित जनों के प्रति सद्भावना और प्रोत्साहन उसे इस जंग पर विजय दिलाने में एक मजबूत हौसला दिलायेगा इसकी आज बहुत जरुरत है। हमें याद करना चाहिए कोरोना से आदमी ठीक हो रहे हैं और यही खबर संक्रमित  जनों को उनके ठीक होने के लिए प्रेरक संवाद हमें बनाने चाहिए ।--- सादर धन्यवाद।

Friday, April 9, 2021

TEACHING

A young man saw his primary school teacher on a wedding.
He went to greet him with all the respect and admiration.
He said to him:
"Do you remember me, Teacher?"
The teacher said: "No, please introduce yourself."
The student said: "I was your student in the 3rd Grade, I am the one who stole the watch of a child in the classroom. I will remind you but I am sure you remember the story."

One of the boys in my class had a beautiful watch, so I decided to steal it.               
He came to you crying that someone had stolen his watch. 
You asked us to stand so as to search our pockets.      
I realized that my action would be exposed in front of the Students and Teachers.
I will be called a thief, a liar and my character will be shattered forever.

You asked us to stand and face the wall and close our eyes completely.
You went searching from pocket to pocket, and when you reached my pocket you pulled the watch out of my pocket, and you continued until you searched the last student.

After you finished you asked us to open our eyes and to sit on our chairs.     
I was afraid you will expose me in front of the students.

You showed the watch to the class, and gave it back to the boy, and you never mentioned the name of the one who stole the watch.
You never said a word to me, and you never mentioned the story to anyone. 

Throughout my school life, none of the teachers nor the students talked about me stealing the watch.       
I thought to myself you saved my dignity that day.

The teacher said: "I can't remember who stole the watch that day, because I searched the pockets of all of you while my eyes were also closed."

Education needs wisdom. As Teachers, Parents, Leaders, we should be able to understand the consequences of our actions. Protecting and reforming is tougher than exposing and expelling👍👍

Wednesday, March 10, 2021

शिवोम

एक दु:साहस भरा प्रयास--शिव जी को समर्पित 🌹⚘🌷🌷🙏🏾🙏🏾

हाँ मैं ही शिव हूँ 

कुछ भ्रम 
कुछ हकीकत
आस्था के हर दस्तक पर
सत्य और असत्य 
देव और दानव 
सबका संतुलन कर्ता हूँ मैं 

हाँ मैं ही शिव हूँ 
    मैं ही शिव हूँ 

सृजन और विनाश 
का कारक हूँ मैं 
हर पल हर क्षण 
सर्वत्र हूँ मैं ,
क्या जङ-!
क्या चेतन--!
सबका प्राण हूँ मैं 
हर करम का 
कारक मैं ही हूँ 

हाँ मैं ही शिव हूँ 
    मैं ही शिव हूँ 

देव में 
दानव में  
नर में 
नारी में 
रीति में 
रिवाज में 
इबादत में 
अरदास में 
भजन में 
संकीर्तन में 
हरेक प्रार्थना में 
दुखहर्ता हूँ 
कल्याण कर्ता हूँ 
मानवता की परिभाषा हूँ 
सद्व्यवहार हूँ 
अशेष ऊर्जा का स्रोत हूँ 
मैं संस्कृति हूँ 
कल्याणकारी व्यवहार हूँ 
संस्कार हूँ मैं 
ओंकार हूँ मै

 मैं  शिव हूँ 
 हाँ मैं ही शिव हूँ ।
  हाँ मैं ही शिव हूँ ।।

🌹⚘⚘⚘🌷🌷🌷🌹🙏🏾

भूल-चूक क्षमाप्रार्थी--सर्वशक्तिमान सर्वव्यापी देवों के देव महादेव के चरणों पर यह सृजन समर्पित 🌷🙏🏾

---पवन मिश्रा 
मौलिक, स्वरचित और सर्वाधिकार सुरक्षित ।

Sunday, February 28, 2021

जेबकतरी डायन

किस कदर जी रही हूं 
किस किस को बताऊं
भुखे गरीबों की जिंदगी
तंगहाल बनाती 
नेताओं पर हूं बेअसर
गरीब मुझे महसूस करते अकथ
रोजी रोटी में ही थक सो जाते
हां पहले मैं डायन थी
अब बनी प्रेमिका
 रंग बदलू व्यवहार पा
मैं मदमस्त हो छा गई
चुम गई
बाजारु हर चीज को
हां मैं आज की मंहगाई हूं
हां मैं आज की मंहगाई हूं
--- पवन मिश्रा

Tuesday, January 26, 2021

हकीकत और संशय के बीच उलझता कृषि कानून---2020


हकीकत और संशय के बीच उलझता 
कृषि कानून--2020
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       वैश्विक स्तर पर   अर्थव्यवस्था के जानकारों का मानना है कि भारत सन् 2030 तक विश्व की तिसरी सबसे बड़ी  आर्थिक महाशक्ति बन कर उभरने जा रही है। विगत कुछ दशकों से भारत के हरेक क्षेत्रों में आमुलचूल‌ बदलाव आया है। विश्व की महाशक्ति और विकसित देशों से कदमताल मिला कर चलने की सामर्थ्यता हासिल करने में भारत कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता है। और इसी कड़ी में व्यापक मंथन करने पर स्पष्ट रूप से जो दृष्टिगोचर है , वह सन् 1990 से शुरूआत हूए भारत के आर्थिक उदारीकरण का कदम जो वस्तुत: विश्व स्तर पर अर्थ व्यवस्था के भूमंडलीकरण या वैश्वीकरण का ही एक हिस्सा मात्र है। इसी नीति ने संपूर्ण भारत में बदलाव की आंधी सी ला दी है। 
          वर्तमान कृषि कानून -2020 भी कमोबेश‌ उसी आर्थिक उदारीकरण सहित बदलते भारत में बदलाव की  ओर  बढ़ते  कदम हैं।
              हमेशा से वोट बैंक की धुरी  रहे कृषक समुदाय ने सदैव से भारतीय समाज के गरीब तबकों को ही प्रतिबिंबित किया है। विडंबना देखिए सबके पेट को अन्न देने वाला यह समुदाय सदियों से भूखे पेट सोने को मजबुर थे , तो आज खाद्ध‌ सुरक्षा  अधिनियम 2013 द्वारा मुहैया कराये जा रहे सांकेतिक मुल्य मात्र पर उपलब्ध कराये जा रहे अनाज पर जीवन‌यापन को मोहताज हैं।  
  वर्तमान कृषि कानून शायद किसानों के इन्हीं परेशानीयो को दुर करने का एक प्रयास है। 
      लेकिन इन गरीब किसानों की संघर्ष गाथा देखिए --यथा लाखों की कीमत वाले ट्रैक्टरो को जलाकर विरोध प्रर्दशन करना, मोबाईल टावरों को जलाना, पसीने से मिट्टी को सिंचने वाले ,धुप की तपीश को बेअसर साबित करने वाले भारतीय कृषक   जब , धरणास्थल पर वातानुकूलित संयंत्रों का सहायता लेते दिख जाय तो‌‌ विरोधाभाषी यह परिदृश्य संघर्ष और संशय के साथ राजनीति  को भी दृष्टांकित कराता दिखता है।

वर्तमान कृषि कानून--2020 के तीन महत्वपूर्ण संभाग हैं

*कृषक उपज ट्रेड और कामर्स (प्रमोसन और सरलीकरण) कानून--2020

    इस संभाग में कृषकों को मंडियों से बाहर भी थोक रूप में अनाज बेचने की आजादी दी गयी है।‌  कानून‌ के अस्तित्व
में आने से पहले भी ऐसी बातें व्यवहार में थी।  कानून के धारा 13और धारा15 के सम्यक अध्ययन से यह देखा जा सकता है कि असंतोष के किसी भी परिस्थिति में मामला न्यायिक दायरे से बाहर ही निष्पादित किया जायेगा। यानि कि जो इस कानून‌ को लागू कराने वाला सक्षम प्राधिकारी होंगे (एस डी एम & एडिशनल कलेक्टर) वही सभी प्रकार के मामलों का अन्तिम निष्पादन कर्ता होगा। 
   किसान‌  यूनियन न्यायपालिका की सर्वोच्चता से समझौता नहीं करना चाहता है।
     भारत सरकार इस बिंदु पर सिविल न्यायालय के तहत मामले को न्यायिक सुनवाई के योग्य स्वीकारते हुए आवश्यक संशोधन की बात पर सहमत दिख रहा है।

* कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण ) कीमत अश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून--2020
   यह संभाग कान्ट्रैक खेती , पूंजीपतियों और कृषकों के आपसी समन्वयात्मक सोच पर फसल उत्पादन से पूर्व दर निर्धारण, उत्पादन लागत व पूंजी की व्यवस्था जैसे कृषकों के सुगमता हेतू अनेकानेक उपाय हैं । 
       लेकिन कृषकों में जमीन खोने की संशय वाली मानसिकता घर कर गरीब है-- कानून के विश्लेषकों का मानना है कि  सभी तरह के अनुबंध कृषि उत्पाद‌ से ही संबंधित होंगे , कृषकों के इस डर पर रणनीति कारों को आगे बढ़कर किसानों में यह विश्वास विकसित करने की आज महती आवश्यकता है।

* आवश्यक वस्तु (अमेंडमेंट) कानून 2020
       --- कानून का यह संभाग उत्पादों के भंडारण पर कृषक और पूंजी पतियों को व्यापक आज़ादी प्रदान करती है।

    उपरोक्त  बिन्दूओं पर अढैती /मंडियों के आवश्यकता और समयानुसार सुधार पर यह कानून मौन‌ है । अभी वर्तमान में संपूर्ण भारतवर्ष में लगभग  7000 मंडियां कार्यरत हैं जबकि आवश्यकता है लगभग 42000 मंडियों की। भंडारण की वर्तमान व्यवस्था को आवश्यक वस्तू अधिनियम के तहत और स्वतंत्र सा बना दिया गया है।

       ‌एक तरह से इस कानून द्वारा किसानों को विविध प्रकार के चुनौतियों से निपटने के लिए स्वकौशल के इस्तेमाल की छूट दी जा रही है ।

    किसानों के हौसला अफजाई के लिए कभी हमारे सादगी प्रधान यशस्वी प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने कहा था --- "जय जवान --जय किसान" । लेकिन वास्तव में किसानों की जय-जयकार क्या कभी हो भी पाई ---? यह एक गंभीर प्रश्नगत मामला है, जो पूछता है भारत और   यहां कि 52% आबादी जो सीधे सीधे आज भी कृषिगत कार्यों से अपना जीवीकोपार्जन करता है।
          आजादी के बाद किसानों के व्यापक हित के लिए मंडी /अढैती और अनाजों के लिए तय किये जाने वाले न्युनतम समर्थन मूल्य (मिनीमम सपोर्ट प्राइस--एम एस पी) निश्चित रूप से किसानों के हक में लिया गया अच्छा फैसला था । लेकिन बदलते दौर के साथ बदलते हालात ने किसान रुपी समुदाय के बहुसंख्यक आबादी को सिर्फ़ भोट बैंक के तहत हमेशा से अपने पक्ष में भुनाने का प्रयास किया है । कुछ खास राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्र में हमेशा से अनवरत किसानों के हक में कर्जमाफी का प्रस्ताव रहता आया था --और कई बार इनके बहुसंख्यक मतदान के उत्तर में इन्हें कर्जमाफी की सौगात भी भेंट होती रही है।
किसानों के कर्ज माफी ने इन्हें आदतन सरकारों से मदद लेने के मामले में आशावादी बनाते गया और ये निरंतर  लाचार होते गये और आज आत्मनिर्भर और आत्ममजबुती के मामले में ये पिछड़ सा गये हैं। शायद कभी भी गंभीरतापूर्वक इसे मजबुत और सम्मुनत बनाने के ईमानदार प्रयास नहीं किये गये।
           आज के दिनों में सांसदों में से 38% सांसद सक्रिय किसान हैं और विडम्बना देखिए 52%आबादी कि प्रत्यक्ष --अप्रत्यक्ष निर्भरता कृषि पर है---जबकि  सकेलु घरेलू उत्पाद (जी डी पी) में इनका योगदान 17% से 18% मात्र है। अब बात यह स्वभाविक रुप से उठता है कि इतने ज्यादा संख्या वाले कृषक सांसदों के रहते हुए किसानों की इतनी दुर्दशा क्यों--? क्या राजनीतिक दलों के सोची समझी साज़िश का परिणाम है वर्तमान कृषकों की दयनीय स्थिति--?
              कृषक हित के लिये कार्यरत एक गैर सरकारी संगठन के अध्ययन के मुताबिक मल्टीनेशनल कम्पनियों में उपलब्ध कृषिगत कच्चे /अनप्रोसेस्ड सामग्रियों के दामों में कृषकों को प्राप्ति स्तर मात्र  23% से 30% है। यानि हमलोग जिस चीज को ₹100 में खरिदते हैं , उसमें से किसानों को उसका किमत मात्र 23 से 30 रूपैया तक ही मिल पाता है। लगातार लागत मुल्यों में वृद्धि और बाजार मुल्यों के अन अपेक्षित स्तर‌ से तंग होकर सन् 2019 में दस हजार किसानों ने  मजबुरन आत्महत्या कर लिया । आज के दिनों में  हरेक किसानों की औसतन कमाई₹ 6400 प्रति महिना है ,जिसे वर्तमान सरकार सन् 2022 तक ₹13000 के औसत महिना की कमाई तक पर पहुंचाने की कार्ययोजना पर काम कर रही है । इसी तरह आज के दिनों में प्रति किसान लगभग औसतन ₹ 1.4 लाख कर्ज है, जिसे सरकार सन् 2022 तक आधा करने की ओर निरंतर प्रयासरत है।

      "अन्नदाता सुखी भव: " की कामना सासंद भवन के विजिटिंग रजिस्टर पर  अंकित करने वाले प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक पृष्ठभूमि का केन्द्र और आधार कभी भी किसान नहीं रहा। समग्र विकास में किसानों की अनदेखी न तो गुजरात में किया गया और न ही आज संपूर्ण भारत में किया जा रहा है। गुजरात और महाराष्ट्र के कपास कृषकों की व्यथा तथा इन्हें समय समय पर दिया गया प्रोत्साहन स्मरणीय हो। 

         किसानों के हक की आवाज बुलंद करने वाले राजनीतिक पार्टियों में से "अकाली दल" और एन सी पी-- "नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी" द्वारा हालिया कृषि सुधार बिल --2020 पर हो हंगामा मचाना --- रोड जाम आज सरे आम चर्चा में है। वर्तमान कृषि सुधार बिल के मुख्य तथ्यों को पंजाब विधान सभा चुनाव और लोक सभा चुनाव सन् 2019 में कांग्रेस सहित कई राजनीतिक पार्टियों ने अपने चुनावी घोषणापत्र में प्रमुखता से शामिल किया था। वर्तमान कृषि कानून--2020 में मूलतः: दशकों पूर्व कृषि सुधार हेतु गठित और उनके द्वारा अनुशंसित  स्वामीनाथन कमिटि के ही सभी मौलिक बातों को शामिल किया गया है।  फिर यह हो हंगामा क्या खोते जा रहे राजनीतिक आधार को हो हल्ला के माध्यम से विविध राजघरानों द्वारा अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का प्रयास कहा जा सकता है---? 
         देश के किसानों को यह याद हो उदारीकरण के शूरुआती  दौर में बहुराष्ट्रीय कंपनीयों के बीज जब बाजार में आये थे, तो हजारों आशंकाएं जनमानस में दौड़ रही थी। आज यह साबित हो चुका है, किसानों द्वारा उत्पादित अनाज का बीज के रूप में उपयोग से ज्यादा फायदेमंद इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा उपलब्ध कराये जा रहे बीज की उत्पादकता है , जो ढाई से तीन गुणा अधिक ही नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक अभी तक कोई नुक़सान भी चिह्नित नहीं हो पाये हैं  ।

     तमाम आशंकाओं के बीच देश के गृह मंत्री बिन्दूवार सभी तथ्यों को स्पष्ट  कर चुके हैं। किसानों को उनके उत्पाद पर ही अनुबंध करने की आजादी है --- जमीन पर कोई भी अनुबंध वर्तमान बिल का विषय वस्तु ही नहीं है।‌ अनुबंध से निकल जाने की आजादी कृषकों के पास हर समय उपलब्ध होगा। किसानों के लिए वर्तमान में उपलब्ध अढैती--(मंडी) तथा न्युनतम समर्थन मूल्य की वर्तमान व्यवस्था (एम एस पी) आज के तरह ही आगे भी  निरंतर चलते रहेंगे -- सरकारी महकमा इस बात का आश्वासन सार्वजनिक पटल पर दे चुकी है। वर्तमान कृषि सुधार बिल किसानों को  अपने उत्पाद बेचने के लिए एक अन्य बेहतर  और मजबूत  विकल्प देने जा रही है। यही वह बिल है जो देश के किसानों को बदलते दौर के साथ  समुन्नत कर देश के बहुसंख्यक जनता के विकास में ए टू जेड विटामिन साबित होगा।
    
     तो फिर इस बिल को  कतिपय जनों द्वारा "अन्नदाता के थाली में छेद---!" के रूप में देखा जाना कई एक प्रश्न खड़ा करता है। किसानों और बाजारों के बीच वर्तमान मध्यस्थ की भुमिका और मलाई चट कर जाने वाले   लोगों के बीच अपने हित की बली चढ़ता देख उसी परिस्थिति  को बचाने की छटपटाहट का यह नतीजा है तथाकथित जनांदोलन। गंभीर मंथन और अध्ययन हमें अच्छे परिणाम की आशा के साथ वर्तमान कृषि सुधार बिल के प्रति आश्वस्त करता है, जो किसानों को आत्मनिर्भर   और  आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

पवन‌ मिश्रा
दुमका-- झारखंड
9931126996
email- pawan19755@gmail.com
    

         

Wednesday, January 6, 2021

               सत्य
कभी सोच न पाया था
सच को सच बोलना 
तथ्यों को जगजाहिर करना 
इतना भी कठीन हो जायेगा

सच के साथ बेबाकी से कलम चलाना
यह भी किसी खास को आहत पहुंचायेगा
सत्य चहेरा छिपाता जगह तलाशेगा
और असत्य की काली चादर 
चहुं ओर फैलेगी 
पीतल चिल्लाता शोरगुल मचा रहा है चौबीस कैरेट टंच सोना होने का दावा दिखा रहा है
और सोना -- बड़ी मुश्किल से
शरणागत हो अपनी इज़्ज़त बे आबरू होने से--
अपने आप को बचा पा रहा है।

 चमकता पीतल 
इस कदर कोहराम मचायेगा 
की सोने की आवाज और चमक
दर बदर गुमनाम होता दिखेगा
कभी सोच न पाया था
सत्य कह रहा हूं,
 कभी भी ऐसा 
सोच न पाया था ।

-- पवन मिश्रा
दुमका-- झारखंड