Thursday, June 5, 2025

कविता

        ब्लैंक चेक
दिन बीत जाने के बाद
सारे काम का निपटारा कर
बैठा था कुछ निश्चितं होकर 
कि कुछ चाय --वाय अब मिले 
 पत्नी देवी आई और बैठ गयी मेरे बगल
बिन कुछ बोले मुंह झुकायें 
मेरे सभी प्रश्नों और अपेक्षाओं को 
नज़र अंदाज़ करते रही -- मैं मनाता रहा
काफी मान मनौव्वल बाद 
वो बोल पड़ी 
तुम बहुत कुछ लिखते रहते हो 
लिखते हो मांँ को  पिता को बताते हो भगवान 
खेत खलिहान नदी समुद्र बाग बगीचा
और लिखते हो पड़ोस की लाचार बुढ़िया
और नहीं तो लिख देते हो 
महिलाओं के मन भाव को 
बता कर ये है महादेवी का झकझुम्मर 
पर मैंने क्या तेरा बिगाड़ा 
कभी तो कुछ लिख दिखाता
जो दिखलाता तेरा
 बातें कितना निकाल सकते हो प्यारा
मैंने कहा बस इतनी सी बात़ों पर हो रूठी 
मेरी जानेमन जाने जहाँ
पकड़ उसकी कलाई
निकाल अपनी लेखनी 
कर दिया  हस्ताक्षर उसके तलहथ पर
बोल पड़ा मैं जा लिख लें 
मनमाना, ठीक वैसे 
जैसे खाली चेक पर हस्ताक्षर कर 
बोल रहा हूं भर लें मनमाना रकम
यह हस्ताक्षर भी ठीक वैसा
जैसे कोरे कागज के नीचे ये मेरा 
हस्ताक्षर है और जब चाहो जो चीज चाहो
 उसे लिख लेना इस कोरे कागज  
रुपी हथेली पर
मैं उस हस्ताक्षरित कागज पर
लिखे तेरे सारे अरमान 
पुरे मनोयोग से निर्वाहुंगा
वादा रहा मेरे जानेमन
©®पवन मिश्रा 
दुमका - झारखंड 

Wednesday, May 28, 2025

कविता

कविता


*प्यार रहे बरकरार -- अगले जनम से सात जनम तक*

  शादी के उन्नीसवीं साल गिरह पर
मंदिर में हम दोनों ने माथा टेका
मंदिर बाहर बैठे दरिद्र नारायण  के हाथों 
दिये कुछ लड्डू और खुदरा  पैसे 
घर पहुँच सजीव और प्रत्यक्ष ईश्वर  के रुप
अपने  मम्मी -पापा के पैर छुए
आशीर्वाद मिला--
युग युग जोड़ी सलामत रहे
सातों जनम यही जोड़ी बनी रहे 
श्रीमती हुईं भरदम गदगद 
और मुझसे पुछीं -? 
आपने मंदिर में क्या मांँगा -? 
मैं रहा चुप -
वो फिर बोली मैंने तो अगले जनम से सातो जनम तक आपका ही साथ माँगा। 
वो फिर बोली 
आपने कुछ भी नहीं माँगा-? 
मैंने कहा वही जो ईश्वर से कामना किया
अब इस पवित्र सुअवसर पर कैसा झुठ बोलना -? 
प्रिये मैं तेरा साथ चाहता तो हूँ
बस इसी जनम भर 
अगले जनम सात जनम 
किसने है देखा  --? 
मैंने ईश्वर से मांँगा है 
जब तक ये आंखे खुली रहे 
साथ तेरा मुझे, हर पल मिले
चिलचिलाती धुप में घर प्रवेश करूँ
तो वाशरूम में बर्फ़ वाली ठंडी पानी का इंतजाम हो--
कमरा पहले से एसी चला कर ठंडा रखो 
कमरा में प्रवेश के साथ ही 
तुम मुझे पुछो
ऊफ ये गर्मी
तुरंत लाता हूँ आपके लिए ठंडय 
कपकपाती ठंड में 
काम निपटा कर जब मैं घर प्रवेश करूँ
तो वाशरूम में गरम पानी का इंतजाम हो
कमरा  हीटर से गरम कर दिया गया हो
और तुम सुसम पानी का ग्लास मुझे देते हुए
 बोलो ऊफ ये ठंडक
लाती हूँ झट से आपके लिए 
एक प्याली प्यारी सी काफी
मेरे घर आने की खबर 
और पक्के समय का अंदाज
मुझसे ज्यादा तुझे हो 
मेरे ऊपर आने वाली हर मुसिबतों
पर ढ़ाल बनकर तुम दृढ़ता से मुकाबला करो
मैंने ईश्वर से ये सब मांगा है --
इसी जनम तक 
अंतिम सांँस तक 
एक दुसरे को 
जीवन के संघर्ष पथ पर
हर पल साथी बन
हर संभव मदद कर सकूँ
मैंने प्रार्थना किया है 
तेरी हर अपेक्षाओं की पूर्ति 
कर सकूँ इतनी सामर्थ देना प्रभु
मैंने तुझे चांद - सितारे लाकर
देने की महती कामना नहीं कि
होंगे वो बड़े बड़े लोग 
जो पत्नी को चांद - तारे 
लाकर देने का भरोसा देते हैं
मैंने ईश्वर से मांगा है कि
इस भरोसा पर मै कायम रह सकूं
पत्नी के साथ 
सच्चा हमसफर भगवान मुझे बनाये रखना
इसी जीवन के अंतिम पल तक। 
अगले जनम को किसने देखा
सातों जनम की बातें हैं
कोरी कल्पना
बस तेरा साथ रहे इस जीवन भर
तो हर गम पी जाऊँ हँस हँस कर
धन्यवाद
  ©®पवन मिश्रा (दुमका- झारखंड़)

Saturday, May 24, 2025

प्रेम पथ

    नदीया के पार 

ऐ सुनो ना 
लिली मेरी बात सुनो
चलते हैं नदी के उस पार 
रेत पर कुछ सैर करने 
चलते चलते --
जब मैं और तुम 
थक जाऊँ 
तो रेत पर ही बैठ्ठका लगाऐंगे
दुनियादारी से दुर 
बहुत दुर -- बस अकेले 
मैं और तुम 
भींगे -- भी़ंगे रेतों से
बिल्कुल मेरे जैसा 
 बनाना एक गुड्डा 
मैं बना लुंगा तेरी ही जैसी एक गुड़िया
खुबसूरत-- बहुत खुबसूरत गुड़िया 
मानो तो वो गुड़िया भी होगी 
तेरी जैसी विश्वसुन्दरी 
फिर--
फिर अचानक से रेत से बने इस
गुड्डा और गुड़िया को 
ढ़हा  देना तुम -- 
और फिर से बनाना
मेरे जैसा बकलोल -- एक गुड्डा 
और बना लेना इस बार फिर
ठीक अपने जैसा एक कुशाग्र बुद्धि
वाली मेरी चहेती विश्वसुन्दरी -- लिली 
ताकि तुझमें कुछ -- कुछ -- बहुत कुछ मैं रह जाऊँ
मुझमें -- कुछ - कुछ -- बहुत कुछ तुम रहो जाओ --
और लाख हो तकरार हममें 
फिर भी 
तुझमें मैं और
मुझमें तुम 
कुछ -- कुछ ,बहुत कुछ 
एक दुसरे मे दिखता रहें 
जय हो 🚩
©®पवन मिश्रा



Thursday, February 20, 2025

कविता रूको जरा

अभी अभी ट्रेन पर यात्रा के दौरान अपने फेशबुक मित्र मनोरंजन झा जी के पोस्ट को पढ़ने के उपरांत एक अनुभूति आप भी अवलोकन करें -- सादर

   *रूको जरा*

बढ़ते उम्र थोड़ा आहिस्ता चल 

बचपन गुजर न पाया 

की जवानी अपनी शाम पर आ गयी 

ऐय मेरी उम्र 

थोड़ा आहिस्ता चल

बांकी हैं कयी हसरतें 

बचपन की नदानी

और बेबाक निर्बाध

मुझे बदमाशी कर लेने दे

जवानी की शाम आ जाये

इससे पहले 

ये इस जवानी

को बढ़िया बढ़िया 

कहानी बना लेने दे

ऐ उम्र थोड़ा आहिस्ता गुजर 

अभी मेरे जीवन की दुपहरीया 

थकी नहीं है 

शाम जो क्यों दस्तक देने पर

है आतुर 

ऐ शाम तुझको भी जीऊँगा

भरदम जीऊँगा

वो सारी कहानी खेल जाऊंगा

ज़ो बचपन और जवानी 

मे कर नहीं पाया

ऊन हसरतों को पुरा कर जाऊंगा

इससे पहले की पर्दा गिर जाय

सारे सपने सारे ख्वाब 

पुरे कर जाऊंगा

ऐ उम्र थोड़ा 

आहिस्ता गुजर

--पवन मिश्रा (झारखंड) 
12-12-2024

कविता

अभी अभी ट्रेन पर यात्रा के दौरान अपने फेशबुक मित्र मनोरंजन झा जी के पोस्ट को पढ़ने के उपरांत एक अनुभूति आप भी अवलोकन करें -- सादर

   *रूको जरा*

बढ़ते उम्र थोड़ा आहिस्ता चल 

बचपन गुजर न पाया 

की जवानी अपनी शाम पर आ गयी 

ऐय मेरी उम्र 

थोड़ा आहिस्ता चल

बांकी हैं कयी हसरतें 

बचपन की नदानी

और बेबाक निर्बाध

मुझे बदमाशी कर लेने दे

जवानी की शाम आ जाये

इससे पहले 

ये इस जवानी

को बढ़िया बढ़िया 

कहानी बना लेने दे

ऐ उम्र थोड़ा आहिस्ता गुजर 

अभी मेरे जीवन की दुपहरीया 

थकी नहीं है 

शाम जो क्यों दस्तक देने पर

है आतुर 

ऐ शाम तुझको भी जीऊँगा

भरदम जीऊँगा

वो सारी कहानी खेल जाऊंगा

ज़ो बचपन और जवानी 

मे कर नहीं पाया

ऊन हसरतों को पुरा कर जाऊंगा

इससे पहले की पर्दा गिर जाय

सारे सपने सारे ख्वाब 

पुरे कर जाऊंगा

ऐ उम्र थोड़ा 

आहिस्ता गुजर

--पवन मिश्रा (झारखंड) 
12-12-2024

Monday, February 17, 2025

कविता रूको जरा

अभी अभी ट्रेन पर यात्रा के दौरान अपने फेशबुक मित्र मनोरंजन झा जी के पोस्ट को पढ़ने के उपरांत एक अनुभूति आप भी अवलोकन करें -- सादर

   *रूको जरा*

बढ़ते उम्र थोड़ा आहिस्ता चल 

बचपन गुजर न पाया 

की जवानी अपनी शाम पर आ गयी 

ऐय मेरी उम्र 

थोड़ा आहिस्ता चल

बांकी हैं कयी हसरतें 

बचपन की नदानी

और बेबाक निर्बाध

मुझे बदमाशी कर लेने दे

जवानी की शाम आ जाये

इससे पहले 

ये इस जवानी

को बढ़िया बढ़िया 

कहानी बना लेने दे

ऐ उम्र थोड़ा आहिस्ता गुजर 

अभी मेरे जीवन की दुपहरीया 

थकी नहीं है 

शाम जो क्यों दस्तक देने पर

है आतुर 

ऐ शाम तुझको भी जीऊँगा

भरदम जीऊँगा

वो सारी कहानी खेल जाऊंगा

ज़ो बचपन और जवानी 

मे कर नहीं पाया

ऊन हसरतों को पुरा कर जाऊंगा

इससे पहले की पर्दा गिर जाय

सारे सपने सारे ख्वाब 

पुरे कर जाऊंगा

ऐ उम्र थोड़ा 

आहिस्ता गुजर

--पवन मिश्रा (झारखंड) 
12-12-2024

Sunday, February 16, 2025

प्रेम कहानी वो चुभन (भाग-1)

प्रेम कहानी
               वो चुभन
  प्रेम में अजीब सी ताकत होती है। वो आपको बेहतर करने के लिए प्रेरित करती है और आपमें जो सर्वोत्तम है उसे 
 निखार जाती है। प्रेम मे वो क्षमता है जो आपके अंतिम साँस तक आपका साथ नहीं छोड़ती है और यह भी बात गौर करने लायक है कि अगर प्रेम मे कोई एक पक्ष कठोर बन जाये तो यही प्रेम-विरह दुसरे पक्ष के अंतिम साँस का अप्रत्यक्ष कारण भी होता है। इसलिए प्रेम पुजारीयो  -- सावधान, इस ब्रह्मांड मे आपको आपके मम्मी -- पापा से कोई भी ज्यादा प्रेम कर ही नहीं सकता -- यह ईश्वरीय विधान है इसका उल्लंघन हो ही नहीं सकता। 
   तो चलिए इस प्रेम कहानी के नायक का नाम ही रख लेते हैं --प्रेम --! प्रेम अपने नाम के अनुरूप हर जगह प्रेम - भाव रखने वाला एक सहज और सुलभ इंसान था। 
   प्रेम हमेशा ही प्रेम की भुख में रहता था। और प्रेम रूपी शब्द और भावना के लिए उनका मन मष्तिष्क हर पल बेचैन रहता था, छटपट करता था मृग मरिचिका की तरह -- प्रेम की चाहत में। ऐसा नहीं कि प्रेम का जीवन विरान था। प्रेम के जीवन मे उनके मम्मी-पापा , पत्नी, बेटा -बेटी, भाई --भौजाई, बहन - बहनोई, चाचा - चाची, और दोस्त दोस्ताईन  अनेकों थे, पर प्यार की वो अनुभूति और ऐहसास उन्हें किसी से शायद कभी न मिल पाया। अब यह बात तो प्रेम को प्यार करने वाले ही जाने की प्रेम को कौन कितना प्यार करता है  - लेकिन प्रेम को अपेक्षित सहानुभूति - सद्भावना और आत्मीयता जीवन भर किसी से न मिला। 
प्रेम के जीवन में हरेक संबंधों का अपना अनमोल महत्व था । समाजिक मान्य परंपराओं का शत प्रतिशत अनुपालन उनकी प्रतिबद्धता थी और वह अपनी प्रतिबद्धताओं का बखुबी अपनी सर्वोत्तम क्षमताओं के अनुकूल निर्वाह करता था। 
       लेकिन प्यार और सहानुभूति के दो बोल जो किसी के सच्चे ह्रदय से कभी प्रेम के लिए निकले इसकी अभिलाषा हर पल प्रेम को बनी रहती थी। 
प्रेम जिस तन्मयता और तत्परता से अपने तमाम संपर्कित जनों के साथ सद्व्यवहार करता रहता था प्रतिक्रिया स्वरूप वही तन्मयता और समर्पण रुपी व्यवहार की अपेक्षा खुद के लिए भी प्रेम करता था पर प्यार के बदले प्यार ही मिले हर इंसान की ऐसी किश्मत कहाँ होती है -- ? और प्रेम के नसीब मे प्यार के बदले फरेब, चतुराई और कुटिलता ही मिलता रहा। 
प्रेम प्यार के अधुरे अभिलाषा मे ठोकरें खाता, हास्य पात्र बनता अपने जवानी के दिनों को विदा करते वानप्रस्थ आश्रम में इस संतोष के साथ प्रवेश कर रहा था कि कोई बात नहीं हर व्यक्ति के नसीब मे प्यार कहाँ लिखा होता है -- मैं खुद से खुद को बेइन्तहा मोहब्बत करूंगा और रच जाऊंगा एक ऐसी प्रेम कहानी जिसका नायक प्रेम रहेगा और नायिका भी प्रेम ही।  दुनिया छोड़ने  से पहले मैं जब देखुंगा  अपने बिते दिनों को तो मुझे गौरव होगा खुद पर और भगवान को बनाये गये अपने इस मानव पर कि ये भी अनोखा प्रेम - पुजारी है  , खुद ही  नायक   है और   खुद ही   नायिका। और मैं दुनिया वाले को चिल्ला चिल्लाकर कह पाऊंगा कि हां यह संभव है प्रेम मे -- ईश्क मे -- सेक्स में -- शत प्रतिशत ईमानदारी। दुनिया वाल़ो मुझको देखो --! 
        लेकिन प्रेम के जीवन को इतना कंचन और पवित्र बना के रखना भगवान को मंजुर ना था। भगवान श्री सोचने लगा  इंसान हो इंसान की तरह रहो, खबरदार जो मेरी बराबरी किये--! ऐसा कोई इंसान नहीं जो प्रेम पथ पर फिसला ना हो -- भला तेरी क्या औकात --। 
    ऐसे ही परिस्थिति में -- एक चुलबुली सी, हसीन सी, रंगीन सी, हर गम से- बेगम सी , एक मीठी मीठी प्यारी सी दस्तक प्रेम के ह्रदयपट  पर महसूस होती है। यह दस्तक प्रेम के जीवन का जो एक अदृश्य हिस्सा था उसमें हलचल पैदा कर चुका था। ऐसा लगने लगा कि उम्र के इस चरण में किसी अज्ञात का ऐसा दस्तक देना यह सहज संयोग मात्र नहीं हो सकता है -? इसके पीछे जरूर कोई ईश्वरीय सोच होगी। 'हर मानव मे भगवान की प्रतिमूर्ति होती है' इस सिद्धांत को मानने वाला प्रेम भला इस दस्तक पर अपने दिल का दरवाजा कैसे बंद रखता --? प्रेम ने जिंदादिली के साथ इस दस्तक का स्नेहिल अभिनंदन किया। 
चलिये इस चुलबुली को हमलोग 'भगजोगनी' नाम से आगे जानेंगे--! ---
क्रमशः अगले अंक मे (पार्ट -2, वो चुभन)