Saturday, December 30, 2023

(6)कहानी --'सिर्फ तुम---'

                      ' सिर्फ़ तुम----''

        बात बहुत पुरानी है. यादों के झरोखे से कुछ जो टटोल पा रहा हूँ ,बीस साल पहले ममता जब पहली बार मेरे घर आयी तो असमंजस ही असमंजस था परिवेश में . मन बडा बेचैन सा था , कैसे सामंजस्य बैठेगा एक नये परिवेश में ,एक हवेलीनुमा बडा सा प्राचीन शैली में निर्मित घर जिसे अब खंडहर कहना अतिश्योक्ति न होगा, में न सिर्फ रहना बल्कि नाना तरह की जिम्मेदारी संभालना कोई आसान काम तो था नहीं .
       सुबह उठने के साथ ही परिवेश में एक अलग खुशबूनूमा हवा बिखरी हुई थी . पुरे आंगन की गोबर से निंपाई ममता ने अपने हाथों की थी , बीच आंगन में रोपी गई एक छोटे  से तुलसी का पौधा ऐसी सज रही थी मानिए वह दुल्हन के माथे पर की भर नाक सिंदुर हो. सच मानिए ममता ने अपने ममत्व का श्रृंगार इस जर्जर खंडहर रुपी हवेली में इस कदर किया कि यह बेजान हवेली मानो बोल रहा हो --' सत्यम शिवम् सुंदरम् '
         गांव से बाजार दुर थे. सो अक्सर बजार से सभी के पसंद का समान एक साथ ही आ जाया करता था. मैंने ममता से पुछा -- तेरे पसंद का क्या लेते आऊं -- वो सिर्फ़ बोली जो आप चाहें.
     त्योहारों में पसंद के कपडे खरीदने की बारी आई ममता के पसंद को भी मैं जानना चाहा --- बस उनका एक ही जबाब मिलता -- आपकी पसंद , जो ले आवेंगे .
       कुछ महीने बित गये उनके किसी पसंद को मैं समझ न पाया .सावन का महिना था. घोर अंधेरा और बीच बीच में वज्रपात की चमक घर के अंदर तक आ रही थी.  लाल रंग की चुनरी ओढे आधे घुंघट मे मैंने जब उसे डिबीया के टिमटिमाती लौ,और आसमानी बिजली के चमक   में गौर करके देखना चाहा तो मुझे ऐहसास हुआ मैं क्या जो इसे दे सकता हूँ -- ममता तो साक्षात अप्सरा जैसे लग रही थी मानो अभी अभी इंद्रलोक से उतरी हो जिसे सक्षात त्रिपुर सुंदरी नेअपने हाथों  सवारा हो  , धरतीलोक को आलींगन करने भेजा हो.
       मैं स्तब्ध था इस गुजगुजीया अंधकार में इसके अप्सरा रूप को देखकर. टिमटिमाती ढिबरी को मेरे मनोवेग ने बुझा दिया या इंद्रपुरी से भगवान कामदेव ने रास रचा यह तो परम परमेश्वर ही कह सकते हैं. ममता ने माचिस की तिल्ली जलायी ढिबरी  के बाती को जलाने , मैं ने उसे भर बांह कस कर पकडा और फिर से पुछ लिया बोल ममता तेरी पसंद क्या है तेरे लिए दिन रात एक कर दुंगा तेरी पसंद तेरे हाथों में न ला दूं तो कहना -- ममता बोली सिर्फ़ तुम मैंने फिर पुछा कुछ मांगो , ममता बोलती रही-- सिर्फ़ तुम, और उस रात --फिर पुरे रात ढिबरी न जल सकी. 
©®--पवन मिश्रा (दुमका)
     
     

Friday, December 15, 2023

कविता - मन

                मन
रे मन चल तुझे कहीं दुर ले चलते हैं
 तेरी प्रेयसी से तुझे आज मिलाता हूँ 
न होगा जगवालों का कोई पहेरा
न कोई अपना न कोई पराया
मेरा मन और मेरी प्रेयसी
से ही होगी वो
मेरे पल भर की  दुनिया

ढेर सारी बातें होंगी
मन भर मेरी निगाहें
एकटक तुझे निहारेगी
मैं अपने निगाहों से
तेरे चेहरे में छिपी , 
छलक रही वो जाम
अंतिम कश तक
पी जाना चाहता हूँ 
तुझे वो हर बात जो
अब कह जाना चाहता हूँ 
जो अन्तर्मन आज तक कह न पाया
मेरे भावनाओं को जो अब तक
न मिल सका वो मेरा लब
मेरी प्रयितमा तुम 
मेरे अंदर दिल की गहराईयों
में छिपे वो अरमान 
को एक बार खोजना जरूर--!
मेरे निगाहों में अपनी निगाहें
गहराई तक डालना और पढना
मेरे मन को
किताबों के अनपढे
पन्ने की भांति
हरेक पन्ने कहते मिलेंगे
तेरे नाम ,मोहबत ,सोहरत और थोडी
शरारत की इबादत लिखी मिलेगी वहां
जिसे न तु कभी पढ सकी
न मेरा मन कभी मिटा सका
मैं रहूं न रहूँ 
मेरा प्यार तुझे
अंदर से चिल्लाता 
आवाज देता मिलेगा
रग रग मे बसे 
तुम मेरे हो
©®पवन मिश्रा (दुमका झारखंड) 
दिसंबर 12,2023