राम आयेंगे
विशेषांक22जनवरी 2024
कल तक वैश्विक मंच सहित संपूर्ण भारतवर्ष यह जान रहे थे , राम ल्ला चौबीस जनवरी को अयोध्या में आ रहे हैं. यह किसी को आकलन तक न था, कि नहीं श्री राम जी सिर्फ अयोध्या नही संपूर्ण भारत वर्ष के हरेक मोहल्ला ,हरेक शहर, हरेक ग़ाव , हरेक मंदिर और यकिन मानिए कि हरेक हिंदुस्तानी के भी दिल में आ रहे हैं-- और श्री राम आज इन सभी जगहों पर भी दिख गये.
दुमका ,गोड्डा ,साहबगंज ,पाकुड ,जामताड़ा , धनबाद , गढवा , चतरा , ,बिहार ,मध्यप्रदेश ,राजस्थान , उत्तारखंड ,उत्तरप्रदेश सहित हिंदी पट्टी के कोई भी जगह ऐसे न थे शायद जहां यह उत्सव व्यापकता और धूमधाम से न मनाया गया हो. लगभग सभी जगह के बाजारों से दीपक -बाती, महावीरी फताका , अबीर , प्रसाद वितरण के प्लेट इत्यादी बिक्री के लिए कम पड बगये. रामायण हनुमान चालिसा और सुंदर कांड की पुस्तकें बाजार में दो रोज पहले ही समाप्त हो गये. निरंतर पठाकों की गुंज , दीपावाली के तरह दीपक का जगमगना यह सब भारतीय जनमानस के उल्लास का प्रदर्शन था. सडक अबीर गुलाल से भरे पडे हैं. रैलियों मे , रथ ,घोडे ,बैंड बाजा ,डी जे बाजा की अवाज कोने कोने तक गुंज रही है. रैलियों में रिकार्ड स्तर के जनशैलाब की उत्सुकता , मंदिरों के भीड यह सब ऐतिहासिक परिदृश्य बनने जा रहा है. हो भी क्यों न संपूर्ण भारत वर्ष अपने नायक श्री राम के मंदिर पुनर्स्थापना पर खिशियां जो मना रहा है , और वह भी बगैर किसी निर्देशन के स्वत: नियंत्रित होकर.
आज का भारत वैश्विक परिपेक्ष्य सहित , बहु-आयामी तथ्यों में आमुल चूल बदलाव के साथ तेजी से अपने को बदल रहा है -- और यही बदलाव असल मायने में भारतीय पुनर्जागरण है. हम आप आज भारतीय पुनर्जागरण के दौर से गुजर रहे हैं.
Tuesday, January 23, 2024
Sunday, January 21, 2024
श्रंखला-4
आलेख
#*श्री राम आयें*
#*किष्किन्धाकांड़*
आज जो मानव धर्म को आत्मसात करने की वकालत हम करते हैं अगर मानव संस्कार के इतिहास से श्री राम और रामायण को अलग करके हम सोचें तो हम पायेंगे ब्रह्याण्ड में सुर्य और आक्सीजन के बगैर जीवन की कल्पना करना.
संत तुलसीकृत रामचरितमानस में अरण्यककांड के बाद किष्किन्धाकांड़ आता है. इस भाग में हम देखते हैं ,प्रभु श्री राम का हनुमान जी से मिलना , श्री राम सुग्रीव मित्रता ,बाली वध ,और बानरी सेना द्वारा माता जानकी की खोज के यतन.
माता सीता के खोज में भटकते श्री राम के पास बानरी राज्य प्रमुख सुग्रीव ने हनुमानजी को बतौर गुप्तचर सच्चाई खोजने को भेजा. हनुमानजी ब्रहा्म्ण वेश धारण कर पुछते हैं वन में भटकते आप हैं कौन--? ब्रह्मा ,विष्णु ,महेश ,नर- नारयाण हो कौन आप--? साधुओं के भेष लिए आप दोनों क्या के लिए आये हैं वन में--?अपना परिचय दें --!
श्री राम बोलते हैं -- हम दोनों अयोध्या नरेश दशरथ पुत्र राम और लक्ष्मण हैं, और पितृ आज्ञा से हम वन प्रवास मे आये हैं, हम जनक नंदनी सीता को खोज रहे हैं जिसका हरण हो गया है.
इतना सुनते ही हनुमान जी अपने वास्तविक रूप मे आकर प्रभु श्री राम के चरणों मे पड़ गये और बोल उठे आपकी ही माया है प्रभु, मैं पहचान न पाया मुझ अज्ञानी को माफ करें भगवान. भगवान श्री राम ने , हनुमानजी को उठाकर मित्रवत गले लगाकर आलिंगन किया. हनुमानजी कहते हैं राजा सुग्रीव माता सीता के खोज में अवश्य कुछ मदद कर सकते हैं.
हनुमान जी श्री राम और लक्ष्मण जी को पीठ पर चढ़ाकर सुग्रीव के पास ले गए और अग्नि को साक्षी मानकर दोनों की मैत्री करा दी . लक्ष्मण जी ने सुग्रीव जी से श्रीराम का सारा इतिहास कहा .सुग्रीव जी ने बताया कि मैं एक बार मंत्रियों के साथ बैठा हुआ था तो राम ! राम ! हा राम !कहते हुए एक स्त्री को पराये शत्रु के वश पड़े देखा . हमें देखकर राम ! राम ! पुकार कर एक वस्त्र गिरा दिया .श्रीराम ने वह वस्त्र मांगा तो सुग्रीव जी ने तुरंत श्रीराम को दे दिया.
श्री राम ने सुग्रीव से गुफा निवास का कारण जानना चाहा--? सुग्रीव ने अपने भाई बाली के साथ हुए वैचारिक मानसिक द्वंद और कलह को इसका कारण बतलाया. सुग्रीव ने बतलाया कि बाली द्वारा मेरे धर्म पत्नी को भी जबरन छिन ले गया है. बाली बहुत शक्तीशाली है.
श्री राम के सलाहनुसार सुग्रीव ने बाली को युद्ध के लिए चुनौती दिया. बाली और सुग्रीव देखने में एक जैसा थे और अंतर कर पाना बहुत कठीन था. भयंकर बलशाली बाली ने सुग्रीव को युद्ध के मैदान में एक ही झटके में वज्र के समान दहाडा और बाली युद्ध मैदान से बहुत दुर जा गिरा. सुग्रीव बोलते हैं प्रभु श्री राम मुझे इस तरह मार खिलाने से और बार बार बेइज्जती कराने से क्या फायदा ,आखिर ईरादा क्या है आपका--? प्रभु श्री राम ने कहा तुम दोनों भाई में अंतर कर पाना कठीन है , ये फुल माला बतौर चिन्ह पहचान हेतु सुग्रीव के गले में पहनाया और फिर से युद्ध मैदान में उन्हें भेजा गया. उचित मौका पर श्री राम ने धनुष से बाली पर प्रहार किया और मार गिराया. बाली बोलते हैं प्रभु श्री राम आप तो धर्म के रक्षार्थ पृथ्वीलोक पर आये है़ मेरे साथ ये छल और पक्षपात क्यों --! सुग्रीव के आप रक्षक और मेरे हत्यारा क्यों --?
श्री राम ने कहा कि छोटे भाई की स्त्री ,बहन ,पुत्र की स्त्री और कन्या एक समान है . इन पर बुरी दृष्टि डालने वाला पापी होता है और उन्हें मारने वाले को पाप नहीं होता .
बालि ने श्रीराम से वर मांगा कि मैं कर्म वश जिस भी योनि में जन्म लूं . मेरा आपके चरणो में प्रेम रहे . हे प्रभु मेरे पुत्र अंगद जो कि मेरे ही समान बलवान हैं . उसे अपना दास बना ले और इतना कह कर बालि ने अपने प्राण त्याग दिया .
श्री राम और लक्ष्मण के सहयोग से सुग्रीव अब बानरी राज्य के ताजधारी राजा थे और सिंहासन पर विराजमान थे तथा बाली पुत्र अंगद को युवराज घोषित कर दिया गया.
समयोपरांत वर्षा ऋतुभर लक्ष्मण और श्री राम ने पर्वर्षण पर्वत पर निवास किया और फिर से लक्ष्मण को सीता विरह की चर्चा करते हुए सुग्रीव को याद किया और बतलाया कहीं सुग्रीव मेरे दिये गये कार्य सीता की खोज को भुला तो नहीं दिया. लक्ष्मण क्रधीत होकर सुग्रीव के पास और हनुमान के पास आते हैं. हडबडाते और डरते सुग्रीव श्री राम के चरणों मे नतमस्तक होते अपनी हाजरी प्रस्तुत करते हैं और आश्वस्त करते हैं सारी बानरी सेना तभी राजदरबार में उपस्थित होंगे जब तक कि सीता माता को खोज नही लिया जाता है. सभी वानर निरंतर सीता खोज में व्याकुल भुख प्यास से परेशान थे. पहाड के एक गुफा मे पक्षी प्रवास का रास्ता देखकर हनुमान जी के निर्देशन में सभी अपने प्यास बुझाने को वहां पहुंच गये. वहीं गीद्धराज जटायु के भाई संम्पाती से वानरों की मुलाकात होती है. और सम्पाती वानरों को सीता के अपहरण और लंका के अशोक वाटिका में प्रवास की खबर अपनी गिद्ध योनी और दिव्य दृष्टि के कारण बतला पा रहा है को उच्चरित किया. संम्पाति कहता है ,मुझे चंद्रमा नाम के मुनि मिले . उन्होंने कहा कि त्रेता युग में जब साक्षात परब्रह्म मनुष्य का रूप धारण करेंगे उनकी स्त्री को राक्षसों का राजा हर कर ले जाएगा . उसकी खोज में दूत आएंगे . उनको मिलकर तू पवित्र हो जाएगा . तेरे पंख उग आएंगे . उन्हें तुम सीता जी को दिखा देना . मुनि की वाणी आज सत्य हो गई. सुनो त्रिकूट पर्वत पर लंका बसी है . वहां अशोक वाटिका में सीता जी सोच मगन बैठी हैं . मैं गीध की दृष्टि से उन्हें देख सकता हूं लेकिन तुम नहीं देख सकते . जो सौ योजन (चार सौ कोस) के समुंदर लांघ सकता है . वहीं यह कार्य कर सकता है . गीध अपनी बात कह कर चला गया . लेकिन हर किसी ने समुद्र लांघने में संदेह प्रकट किया . जाम्बवान् ने कहा कि मैं अब बूढा़ हो गया हूं . अंगद हमारा नेता है उसे ही कैसे भेजा जाए ?
जाम्बवान् ने हनुमान जी से कहा कि ," तुम पवन के पुत्र हो. जगत में ऐसा कौन सा कार्य है जो तुम नहीं कर सकते. तुम्हारा अवतार श्रीराम के कार्य के लिए हुआ है .
इतना सुनते ही हनुमान जी को अपने दिव्य शक्ति का ऐहसास हुआ और विशालकाय रूप धारण किया और कहा कि मैं इस समुद्र को खेल में ही लांघ सकता हूं . हनुमान जी ने जाम्बवान् जी से पूछा कि, "मुझे क्या करना चाहिए"? जाम्बवान् जी ने कहा तुम सीता जी का पता लगाकर लौट आओ और उनकी खबर श्री राम को कह दो .श्री राम अपने बाहुबल से सीता जी को ले आएंगे और राक्षसों का संहार करेंगे .
------
बहुत जल्द सुंदरकाड ,
श्रृखंला--4, श्री राम आयेंगे
पवन मिश्रा(दुमका-झारखंड)
Tuesday, January 16, 2024
आलेख
*श्री राम आयेंगे*
*#1बालकांड*
-------------------------------
श्री राम के नायकत्व को समाहित किये हुए महाकाव्य रामायण के रचनाकार आदि कवि श्री वाल्मिकि जी हैं जिनका काल निर्धारण 600 ईसा पूर्व से लेकर 300 ईसा पुर्व के बीच माना जाता है जो संस्कृत में लिखित प्रथम महाकाव्य है , और सबसे प्राचीनतम तथा मौलिक माना जाता है. विद्वान और रामायण के जानकार तो यह भी मानते है़ कि माता सीता ने लव और कुश को जन्म ऋषि वाल्मिकि के ही कुटिया में दिया है. और संत तुलसीदास रचित रामचरितमानस 1574 ईस्वी के आस पास लोकभाषा में लिखा गया है. दोनों ही संत सह महाकवि ने अपने आप मे राम के नायकत्व को समाहित किये हुए समाजिक ,राजनीतिक समरसता, त्याग, धैर्य और शौर्य के अनोखे गाथा को जनसाधारण के बीच रखने का काम किया है. हां यह कहना अतिश्योक्ति न होगी की जनसुलभ के भाषा मे संत तुलसीकृत रामचरितमानस सर्वाधिक लोकप्रिय हैं और घर घर तक इनकी पहुंच बनी हुई है. यहां हम प्रभु श्री राम को स्मरण करते हुए संत तुलसीकृत रामचरितमानस को आधार बनाकर कुछ अवलोकन का प्रयास करेंगे.
किसी भी ऐतिहासिक महाकाव्य के रचनाकाल , और तत्कालीन समाजिक मनोदशा को ध्यानार्थ लिए बगैर उस पर कुछ भी कहना शायद यह पुरी ईमानदारी से अध्ययन करना न कहलायेगा. समकालीन दौर भारतवर्ष के भुखंड पर मुगलों का शासन था जो एक सीमा तक हिंदुओं पर जोर जुल्म का काल कहा जाता है ,और भक्ति आंदोलन शैव संप्रदाय और वैष्णव संप्रदाय के बीच अनोखे प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रहा था. महान कवि संत तुलसीदास ने अपने महाकाव्य में भक्ति संतुलन का अतुलनीय समावेश यहां किया है और श्री राम जी (विष्णु अवतार) , शिव जी को याद करते हुए उन्हें श्रेष्ठ मानते हैं तो शिव जी श्री राम को श्रेष्ठ मानते हुए उनका वंदन करते हैं. संपूर्ण रामचरितमानस में कुल 4608 चौपाई और 1074 दोहा हैं. इस महाकाव्य को सात प्रमुख कांड /घटना परिचर्चा में बांटा गया है , जिसमें पहला कांड -- बालकांड है.
#*बाल कांड*
बालकांड अपने व्यापकता और कथासार के महत्ता के आधार पर बहुत ही महत्वपूर्ण है. इसी महत्ता के आधार पर ब्रह्मवैवर्तपुराण में कहा गया है कि अगर किसी भी मनुष्य का मन काफी चंचल हो , असत् में लीन रहता हो तो उसे निरंतर बालकांड का पाठ करा दिजिए वो सत् की ओर आसक्त हो जायेगा और अच्छे कार्यों में उनका ध्यान स्वत: केन्द्रीत होता जायेगा. बालकांड में भगवान श्री राम के जन्म से लेकर श्रीराम सीता विवाह तक के घटनाक्रम को रोचकता के साथ भव्य भक्ति माहोल में पिरोया गया है. बालकांड में 341 दोहा और 358 चौपाई है.
अयोध्या में दशरथ नाम के राजा हुये जिनकी कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा नामक पत्नियाँ थीं। संतान प्राप्ति हेतु अयोध्यानरेश दशरथ ने अपने गुरु श्री वशिष्ठ की आज्ञा से पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया जिसे कि ऋंगी ऋषि ने सम्पन्न किया। भक्तिपूर्ण आहुतियाँ पाकर अग्निदेव प्रसन्न हुये और उन्होंने स्वयं प्रकट होकर राजा दशरथ को हविष्यपात्र (खीर, पायस) दिया जिसे कि उन्होंने अपनी तीनों पत्नियों में बाँट दिया। खीर के सेवन के परिणामस्वरूप कौशल्या के गर्भ से राम का, कैकेयी के गर्भ से भरत का तथा सुमित्रा के गर्भ से लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ. राजकुमारों के बड़े होने पर आश्रम की राक्षसों से रक्षा हेतु ऋषि विश्वामित्र राजा दशरथ से राम और लक्ष्मण को मांग कर अपने साथ ले गये। राम ने ताड़का और सुबाहु जैसे राक्षसों को मार डाला और मारीच को बिना फर वाले बाण से मार कर समुद्र के पार भेज दिया। उधर लक्ष्मण ने राक्षसों की सारी सेना का संहार कर डाला। धनुषयज्ञ हेतु राजा जनक के निमंत्रण मिलने पर विश्वामित्र राम और लक्ष्मण के साथ उनकी नगरी मिथिला (जनकपुर) आ गये। रास्ते में राम ने गौतम मुनि की स्त्री अहल्या का उद्धार किया। मिथिला में राजा जनक की पुत्री सीता जिन्हें कि जानकी के नाम से भी जाना जाता है का स्वयंवर का भी आयोजन था जहाँ कि जनकप्रतिज्ञा के अनुसार शिवधनुष को तोड़ कर राम ने सीता से विवाह किया। राम और सीता के विवाह के साथ ही साथ गुरु वशिष्ठ ने भरत का माण्डवी से, लक्ष्मण का उर्मिला से और शत्रुघ्न का श्रुतकीर्त से हुई.
कुछ दिन तक जनकपुरी प्रवास के बाद राजा दशरथ साज बाज के साथ अपने सभी पुत्र -- पुत्रवधु सहित वापस अयोध्या को चले.
रास्ते में बहुत भयंकर आंधी आई, उस आंधी को देखकर मिथिलावासी डर के मारे कांप उठे . उसी समय इस आंधी में से भगवान परशुराम जी निकल कर राम के आगे खड़े होकर कहने लगे. राम तुमने शिवजी के पुराने धनुष को तोड़कर अच्छा नहीं किया.
यह स्वयंवर की शर्त थी भगवान् परशुराम--.
मैं कुछ नहीं जानता, मुझे यह धनुष ठीक उसी प्रकार से बनाकर दो, जैसा पहले था नहीं तो मैं तुम्हें शाप दे दूंगा.
यदि आपकी यही इच्छा है, परशुराम जी तो यह लो उसी समय भगवान, राम ने ( वास्तव में परशुराम यह अब देख पा रहा था कि श्री राम तो साक्षात विष्णु भगवान हैं)अपनी शक्ति से उस धनुष पर बाण चढ़ाया और बोले । क्यों भगवन, यदि इस तरह से मैं आपकी शक्ति समाप्त कर दूं तो कैसा रहे .नहीं नहीं भगवान वास्तव में मैं नहीं, आप महान हैं। यह कहकर परशुराम जी वहां से चले गए.
क्रमश: श्रृखंला 2 में अयोध्यकांड
धन्यवाद
पवन मिश्रा (दुमका-झारखंड)
#*श्रीराम आयेंगे*
श्रृंखला -2
#*अयोध्याकांड*
अखंड भारत के सांस्कृतिक विरासत को अपने मे समाहित किये , समाजिक समरसता , समाजिक बनावट ,मानवीय नैतिकता के सर्वोत्कृषट पैमाना, विविधता में एकता , कर्तव्य प्रधान ,कर्मंकांड और आडंबर विहीन जैसे विविध तथ्यों को उत्कृष्ट और सहज शैली में मानवीय सभ्यता के लिए धरोहर के रूप में अगर किसी एक काव्य में समाा हत में में आ जा -- है तो वह है श्री रामचरितमानस. यही कारण है कि भारतवर्ष के अंदर जितनी भी प्रमुख भ भाषाऐ़ं बोली बोली जाती हैं ,सभी भाषाओं मे श्री रामचरितमानस का अनुवाद व संकलन बगैर किसी राजकीय संरक्षण के उपलब्ध है. यहां तक कि विदेशों में फीजी ,त्रिनिदाद , टोबैगो कंबोडिया जैसे देशों मे यह सर्वोपयोगी और सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य के रूप मे आज भी अपनी उपादेयता बनाये हुए हैं.
अयोध्याकांड में 314 दोहा और 326 चौपाई हैं . महा काव्य श्री रामचरितमानस के इस पाठ में राजा दशरथ की विवशता, पति धर्म की लाचारी , पुत्र धर्म , मातृ धर्म, राज धर्म, और वचनबद्धता, पितृआदेश की पराकाष्ठा को यहां दर्शाया गया है.श्री रामचरितमानस के रचनाकार तभी तो अयोध्याकांड को इस महाकाव्य की ह्रदयस्थली मानते हैं. जब से श्री राम विवाह करके अयोध्या में आए हैं . तब से मानिए अयोध्यानगरी में खुशी के एक अलग वातावरण सा बन गया है.एक दिन राजा दशरथ ने दर्पण में अपने सफेद बाल देखे. उन्हें लगा कि अब मुझे श्री राम को युवराज पद देकर अपना जीवन सफल बना लेना चाहिए. उन्होंने अपनी इच्छा गुरु वशिष्ट जी को सुनाई.गुरु जी से आज्ञा मिलते ही उन्होंने मंत्रियों को श्री राम के राज्याभिषेक की तैयारी करने की आदेश दिया . यह खबर सुनकर पूरी अयोध्या में खुशी की लहर दौड़ गई .
जहां श्री राम के राज्याभिषेक की खबर सुनकर पूरी अयोध्यानगरी में बाज बज रहे थे .वहां दूसरी तरफ देवता सरस्वती जी से वंदना करते हैं कि कुछ ऐसा करें जिससे श्री राम राज्य त्याग कर वन चले जाएं.
सरस्वती ने मन्थरा नाम कैकेयी की एक दासी को अपयश की पिटारी बनाकर उसकी बुद्धि फेर दी.अवधपुरी में राज्याभिषेक की तैयारियां देखकर वह कैकई के पास गई
मंथरा कैकेयी से कहने लगी कि , "तुम्हारा पुत्र भरत ननिहाल में हैं". इस लिए कौशल्या ने मौका पाकर राजा को राम के राज्याभिषेक के लिए मना लिया होगा.वह बाद में तुम्हें दासी बना कर रखेगी .मंथरा ने कैकेयी से कहा कि, "तुम्हारे दो वरदान राजा के पास धरोहर हैं". तुम ऐसा करो कि राजा से भरत के लिए राज्याभिषेक और राम के लिए वनवास मांग लो. जब राजा राम की सौगंध खा ले तब तुम उनसे वह वरदान मांगना ताकि राजा अपने वरदान से पलट ना सके .अब तुम कोप भवन में जाओ.
कैकेयी का कोप भवन में जाना और राजा दशरथ से दो वर मांगना
राजा दशरथ को जब रानी कैकेयी के कोप भवन में होने की बात पता चली. तब वह रानी से बार-बार उनके क्रोध का कारण पूछते हैं .जब राजा दशरथ श्री राम की सौगंध खाकर कहते हैं कि अपनी मनचाही बात मांग ले. रानी कैकेयी ने राजा को दो वरदान के बारे में याद करवाया.
राजा दशरथ कहने लगे कि, " तुम दो के बदले चाहे चार वर मांग ले.रघुकुल की रीति सदा चली आई है प्राण भले चले जाएं पर वचन नहीं जाता". कैकेयी कहने कहा कि, "भरत का राज्य अभिषेक कर दें और राम को 14 वर्ष का वनवास दे .
राजा दशरथ कहने लगे सुबह ही दूत भेज कर भरत को ननिहाल से बुला लूंगा और अच्छा सा मुहूर्त देखकर उसका राज्याभिषेक कर दूंगा.लेकिन तुमने जो दूसरा वर मांगा है कि राम को वनवास .क्या तुम सच में ऐसा चाहती हो! क्योंकि तुम तो स्वयं राम से बहुत प्रेम करती हो?
कैकेयी कहती है ,"अगर कल सुबह राम वन नहीं गए तो मेरा मरना तय है" .
राजा दशरथ हे राम कहते धरती पर गिर पड़े. अगले दिन सुबह मंत्री सुमंत्र ने राजा की व्याकुलता को देखकर कैकेयी से इसका कारण पूछा . कैकेयी कहने लगी कि, "तुम जल्दी से राम को बुला लाओ ". सुमंत्र ने श्रीराम को राजा की आज्ञा सुनाई और अपने साथ ले आए.
श्री राम ने कैकेयी से राजा के दुख का कारण पूछा. कैकेयी कहने लगी, "मैंने राजा से दो वरदान मांगे थे". राजा पुत्र स्नेह के कारण धर्म संकट में हैं. तुम चाहो तो राजा का कलेश मिटा सकते हो . फिर कैकेयी ने दोनों वचन श्री राम को सुना दिए.
जब राजा ने सुना कि श्री राम पधारे हैं तो आंखें खोल कर उन्हें हृदय से लगा लिया. राजा महादेव का स्मरण करते हुए उन्हें कहने लगे कि,"आप श्रीराम को ऐसी बुद्धि दे कि वह मेरा वचन त्याग कर घर पर ही रह जाए ".
पर श्रीराम ने राजा से आज्ञा मांगी और कहा कि मैं माता जी से विदा लेकर आता हूं.
श्रीराम ने जाकर अपनी माता कौशल्या के चरणों में शीश झुकाया और आशीर्वाद लिया. श्रीराम कहने लगे मां मुझे पिताजी ने वन का राज्य सौंपा है. मुझे आज्ञा दे कि मेरी वन यात्रा आनंदमय हो .14 वर्ष वनवास में रहकर फिर लौटकर आपके दर्शन करूंगा.
श्री राम के कोमल वचन मां के हृदय में शूल से लगे . वह श्री राम से पूछने लगी कि, "तू तो पिता को प्राणों से भी प्रिय है" .तुम्हें वन जाने का आदेश क्यों दिया ?
श्री राम को चुप देखकर मंत्री के पुत्र ने सारा प्रसंग कौशल्या को सुनाया . माता कौशल्या ने विवशता और लाचारी जानकर वह धीरज धर कर कहती हैं कि, "तू पिता की आज्ञा का पालन कर" . माँ कौशल्या ने श्री राम को अपने हृदय से लगा लिया.
सीता जी और लक्ष्मण जी का वन जाने की आज्ञा मांगना
सीता जी को जब श्री राम के वन गमन की सूचना मिली तो उन्होंने भी वन में साथ चलने की आज्ञा मांगी। श्री राम ने उन्हें समझाया कि वन में भयानक सर्दी, गर्मी और वर्षा होगी। नंगे पांव चलने पर पांवों में कांटे चुभेगे। लेकिन जब किसी भी प्रकार सीता जी नहीं मानी तो श्री राम ने उन्हें वन में साथ चलने की आज्ञा दे दी। उधर जब लक्ष्मण जी ने श्री राम के वनवास का पता चला तो वह भी श्री राम के साथ चलने के लिए कहने लगे। श्री राम के बहु विधि समझाने पर भी जब वह नहीं माने तो श्री राम ने उन्हें मां से आज्ञा मांग कर आने के लिए कहा।
सुमित्रा से विदा मांगने गए. मां सुमित्रा कहती है कि ,"पुत्र जानकी तुम्हारी माता और श्री राम तुम्हारे पिता के समान हैं।"तुम वन में मन, वचन, कर्म से श्री राम सीता जी की सेवा करना।राम, लक्ष्मण जी और सीता जी का दशरथ जी से विदा माँगने गए।
वह सीता जी और दोनों पुत्रों को देखकर व्याकुल हो गये. कैकेयी ने मुनियों के वस्त्र लाकर श्री राम के आगे रख दिए. श्री राम तुरंत मुनि वेश बनाकर माता को प्रणाम करके चल दिए. राजा श्री राम को मुनी वेश में देखकर अचेत हो गए .
श्री राम का वन को जाना
जब राजा को चेतना आई तो उन्होंने सुमंत्र को कहा कि तुम रथ लेकर राम के साथ जाओ. वन दिखाकर चार दिन बाद लौटा लाना. सुमंत्र जी ने रामचंद्र सीता जी और लक्ष्मण जी को रथ पर चढ़ाया और अयोध्या को सीस निवा कर चल पड़े.
कुछ ही दुरी श्री रामचंद्र ने सुमंत्र से कहा कि रथ को इस प्रकार हांकिए की उसके पहियों से उसकी दिशा का पता ना चले .सुबह जब सब लोग उठे तो शोर मच गया कि श्रीराम हमें छोड़ कर चले गए हैं .
सीता जी और मंत्री सहित दोनों भाई श्रृंगवेरपुर पहुंचे और गंगा जी को श्री राम ने प्रणाम किया. जब निषादराज गुह ने समाचार सुना तो वह बंधुओं के साथ श्री राम से मिलने पहुंचे .रात्रि वहां पेड़ के नीचे विश्राम किया और सुबह बड़ का दूध मंगवा कर श्री राम और लक्ष्मण जी ने जटाएं बनवाई . मंत्री जी को बहुत प्रकार समझा-बुझाकर विदा किया .उसके पश्चात सभी गंगा किनारे आ गए और केवट ने श्री राम, लक्ष्मण और सीता जी को गंगा पार करवाई।
श्री राम फिर भारद्वाज मुनि के आश्रम पहुंचे। उनके पश्चात उन्होंने यमुना जी में स्नान किया और महर्षि बाल्मिकी जी के आश्रम में पहुंचे। उनसे आज्ञा लेकर श्री राम ने चित्रकूट की ओर प्रस्थान किया।
श्री राम का चित्रकूट में निवास
श्री राम ने लक्ष्मण जी से कहा कि कुटी बनाने का प्रबंध करो .जब देवताओं ने देखा कि श्रीराम का मन जहां रम गया है वह देवता विश्वामित्र जी के साथ चित्रकूट की ओर चल पड़े.
देवताओं ने कोल भीलों का वेश धारण करके दो सुंदर कुटिया बनाई . श्री राम, मां जानकी और लक्ष्मण जी इसमें शोभा मान हो रहे हैं.
मंत्री सुमंत्र का अयोध्या वापस लौटना
.सुमंत्र श्री राम के बिना ऐसा महसूस कर रहे हैं मानो कंजूस का धन का खजाना खो गया हो. सुमंत्र सोच रहे हैं अयोध्या वासी जब श्री राम चंद्र के बिना रथ को देखेंगे ,तो मैं उनको क्या उत्तर दूंगा? जब वह महल में पहुंचे तो सब व्याकुल हो गये.
सुमंत्र जी कौशल्या के महल में पहुंचे तो राजा दशरथ व्याकुल होकर पूछते हैं, "राम लक्ष्मण और सीता कहां है"? सुमंत्र ने उनको श्री राम की वन गमन की पूरी बात बताई.
श्रीराम का संदेशा दिया कि पिता जी को मेरा प्रणाम कहना और कहना कि मेरी चिंता ना करें. आपकी कृपा और पुण्य से मेरा मार्ग कुशल मंगल हो
राम -राम कह कर श्री राम की बिरहा में राजा दशरथ स्वर्ग सिधार गए .रानी शोक के मारे रो रही हैं . ऋषि विश्वामित्र ने नाव में तेल भरवा कर राजा के शरीर को उस में रखवा दिया.
भरत और शत्रुघ्न का ननिहाल से अयोध्या लौटना
ऋषि वशिष्ठ ने भरत शत्रुघ्न को बुलाने दूत भेजे. दूतों से कहा कि तुम जल्दी से भरत और शत्रुघ्न के पास जाओ और राजा की मृत्यु का समाचार किसी से मत कहना. दोनों भाइयों से बस इतना ही कहना कि गुरुजी ने बुलावा भेजा है.
दूतों से समाचार सुनते ही दोनों भाई अयोध्यापुरी की ओर चल पड़े .
पुत्र के आने की बात सुनकर कैकेयी आरती का थाल सजाकर आनंद से द्वार पर गई. भरत ने जब सबकी कुशल मंगल पूछी तो रानी कैकेयी कहने लगी कि मैंने मंथरा की मदद से सारी बात बना ली थी लेकिन जरा सा काम बिगड़ गया है . राजा देव लोग पधार गए हैं.
भरत जी पिता के मरण का कारण पूछने लगे. कैकेयी ने सारी करनी शुरू से अंत तक सुना दी. श्री राम का वन गमन सुनते ही भरत जी को पिता का मरण भूल गया.
भरत जी कहने लगे भगवान ने मुझे दशरथ जैसे पिताजी दिए और राम लक्ष्मण जैसे भाई दिए.लेकिन मुझे जन्म देने वाली माता तू क्यों हुई!
भरत जी का पिता का अंतिम संस्कार करना
तब वामदेव जी और विशिष्ट जी आए और भरत जी से राजा के संस्कार की सभी विधि करने को कहा. सरजू नदी के तट पर सुंदर चिता बनाई गई और विधि पूर्वक भरत जी ने तिलांजलि दी और ब्राह्मणों को दान दिया. सभी रीतियाँ होने के बाद विशिष्ट जी ने भरत जी से कहा कि राजा ने राजपाट आप को दिया . तुम्हें पिता का वचन सत्य करना चाहिए. भरत जी कहने लगे पिताजी स्वर्ग में हैं और भाई वन में ऐसे में मैं राज्य कैसे कर सकता हूं.
भरत जी का चित्रकुट की ओर प्रस्थान
आप मुझे आज्ञा दे कि मैं श्री राम के पास जाऊं.
आप लोग मुझे राज्य करने के लिए कह रहे हैं लेकिन श्री राम के दर्शन के बिना मेरे मन की जलन कम नहीं होगी . श्रीराम ही मेरे मन की बात जान सकते हैं . मैं प्रातः काल ही प्रभु श्री राम के पास चल दूंगा. भरत जी के वचन सुनकर मानो शौक समुंदर में डूबे हुए लोगों को किनारा मिल गया . भरत जी ने श्री राम के पास जाने की सारी व्यवस्था कर दी और तिलक का सम्मान भी साथ ले जाने को कहा ताकि गुरु वशिष्ठ श्री राम का राजतिलक कर सके .
सब लोग रथ पर चढ़कर चित्रकूट की ओर चल पड़े रात सही नदी के किनारे निवास करते.
भरत जी और निषादराज का मिलन
जब श्रृंगवेरपुर के समीप पहुंचे .जब निषाद राज को समाचार मिला कि भारत अपनी सेना के साथ आए हैं तो उन्हें लगा कि शायद श्री राम और लक्ष्मण को मार कर भरत निशकंटक राज करना चाहते हैं . उन्होंने सभी को आज्ञा दी कि सब घाटों को रोक लो नावों को कब्जे में कर लो. वह कहने लगे कि भरत से मैं खुद लडूंगा. जीते जी उन्हें गंगा जी के पार नहीं करने दूंगा.
फिर किसी बुजुर्ग ने सलाह दी कि पहले भरत जी से मिल लिया जाए . निषाद राज जी जब भरत जी के पास पहुंचे . भरत जी को जब पता चल निषादराज जी श्री राम के मित्र हैं तो उन्होंने यह सुनते ही उन्हें स्नेह से ऐसे गले लगा लिया . मानो लक्ष्मण जी के गले मिल रहे हो .
भरत जी निषादराज से कहते हैं मुझे वह स्थान दिखाओ जहां श्री राम में विश्राम किया था . भरत जी ने फिर अशोक वृक्ष के नीचे उस स्थान को प्रणाम किया .
अगले दिन सुबह सब लोग गंगा पार उतर गए भरत जी ने त्रिवेणी में स्नान कर कहा कि मुझे वरदान दे कि हर जन्म श्री राम के चरणों में मेरा स्नेह हो .भरत जी के भजन सुनकर त्रिवेणी से कोमल वाणी हुए कि तुम श्री राम को बहुत प्रिय हो . यह सुनकर भरत जी का शरीर पुलकित हो गया .
भरत जी भारद्वाज मुनि के आश्रम पहुंचे तो भरत की सोचने लगे कि मैं मुनि को क्या उत्तर दूंगा? लेकिन भरत जी को भारद्वाज ऋषि ने कहा कि पुत्र तुम गिलानी मत करो .
अगले दिन भरत जी चित्रकूट की ओर चल पड़े. भरत जी जमुना के तट पर पहुंचे. वहां स्नान कर अगले दिन सुबह चित्रकूट की ओर चल पड़े. रास्ते में भील, कोलों से श्री राम लक्ष्मण और सीता जी के बारे में पूछते हैं. निषादराज जी भरत जी को उस पर्वत के दर्शन कराते हैं जहां पर श्री राम निवास कर रहे हैं.
सब लोग जानकी जीवन श्री राम की जय हो कहकर रात को वही पर निवास करते हैं .
श्री राम को भरत जी का सेना सहित आने का समाचार मिलना
उधर सीता जी ने सवप्न में देखा कि भरत जी समाज सहित यहां आए हैं. सासुऔं को दूसरे के रूप में देखा
श्री रामचंद्र भी सोच में पड़ गए और लक्ष्मण जी से कहने लगे कि यह स्वपन अच्छा नहीं लगता .कोई अशुभ समाचार सुनाई देगा .उन्होंने महादेव जी का स्मरण किया.उसी समय भीलों ने आकर भगवान श्रीराम को भरत जी के चतुरंगी सेना के साथ आने का समाचार दिया.
लक्ष्मण जी कहने लगे कि भरतके मन में कोई को दुष्टता चल रही होगी तभी तो सेना सहित आया है .आप मुझे आज्ञा दे तो मैं इसे छोटे भाई सहित रण में पछाड़ दू. तभी अकाशवाणी हुई थी कोई भी काम उचित अनुचित के ज्ञान के यह बिना नहीं करना चाहिए नहीं तो पीछे पछताना पड़ सकता है.श्री राम लक्ष्मण जी से कहने लगे कि, "मैं पिता की सौगंध खाकर कहता हूं ,कि भरत के समान पवित्र और उत्तम भाई कोई नहीं है. भरत जी ने समाज सहित मंदाकिनी नदी में स्नान किया.
श्रीराम और भरत जी मिलन
भरत जी निषादराज जी के साथ वहां चल पड़े जहां श्री राम जी और सीता जी थे. भरत जी श्री राम के आश्रम जा पहुंचे . आश्रम में प्रवेश करते ही भरत जी का दुख मानो दूर हो गया और हे नाथ रक्षा करें ऐसा कह कर पृथ्वी पर दंड प्रणाम किया.लक्ष्मण जी ने जब श्री राम को सप्रेम भरत जी के प्रणाम करने के बारे में बताया. श्री राम प्रेम के अधीन हो गए कहीं वस्त्र गिरा, कहीं धनुष ,कहीं तरकस और तीर अर्थात श्री राम को अपने शरीर की सुध नहीं रही.
श्री राम ने भरत जी को उठाकर अपने ह्रदय से लगा लिया और श्री राम और भरत के मिलन को देखकर सब लोग पुलकित हो रहे हैं .
श्री राम और भरत का मिलन देखकर देवताओं की धुकधुकी धड़कने लगी. देव गुरु बृहस्पति ने उन्हें समझाया. श्री राम प्रेम से शत्रुघ्न, केवट और निषादराज से मिले .लक्ष्मण जी ने भरत और शत्रुघ्न दोनों भाइयों को हृदय से लगा लिया और सीता माता को प्रणाम कर दोनों भाइयों ने आशीर्वाद लिया.
जब केवट जी ने बताया कि प्रभु मुनि नाथ विशिष्ट, माताएं और अयोध्या वासी आप के वियोग में व्याकुल हैं. श्री राम लक्ष्मण जी बड़े वेग से वही चल पड़े . दोनों ने गुरु विशिष्ट और माता से बड़े प्रेम से मिले.
श्री राम जब माता कैकेयी मिले तो उन्हें सांत्वना दी कि जो कुछ हुआ उसमें किसी का कोई दोष नहीं है. सब ईश्वर के अधिन है .फिर गुरु पत्नी अरुंधति, माता कौशल्या और सुमित्रा जी को प्रणाम कर आशीर्वाद लिया फिर सीता जी ने सब को जब प्रणाम कर आशीर्वाद लिया . सब लोग प्रेम के वश हो कर व्याकुल हो गए.
वशिष्ठ ने श्री राम, लक्ष्मण और सीता जी को दशरथ जी के स्वर्ग गमन की बात कही . जिसे सुनकर सब लोग विलाप करने लगे मानो आज ही राजा स्वर्ग गए हैं. फिर गुरु जी के कहने पर श्रीराम ने निर्जल व्रत किया और अगले दिन प्रातःकाल पिता कि वेदों की रीति के अनुसार क्रिया की.
श्री राम वशिष्ठ जी और भरत जी के संवाद
गुरु विशिष्ट जी श्रीराम कहते हैं कि आप के बिना अयोध्या सूनी हैं . आप अयोध्या लौट आएं . भरत जी श्री राम से कहते हैं कि आपके लौटने में सब का स्वार्थ है. आप मेरी विनती सुनकर जैसा उचित हो वैसा ही करें. राजतिलक की सब सामग्री तैयार हैं आपका मन हो तो उसका प्रयोग करें . नहीं तो छोटे भाई शत्रुघ्न समेत मुझे वन भेज दें .
अयोध्या जाने को तैयार ना हो तो लक्ष्मण और शत्रुघ्न को लौटा दे मैं आपके साथ चलता हूं या फिर हम तीनों बन जाएं और आप सीता जी के साथ अयोध्या वापिस लोट आए.
प्रभु जिसे जो आज्ञा देंगे वह उसका पालन करेगा प्रभु श्री राम उस समय चुप रहे.
जनक जी का चित्रकूट में आगमन
उसी समय जनक जी के आगमन की सूचना मिली. श्री रामचंद्र जी ने भाइयों सहित जनक थी और जनकपुरी वासियों को प्रणाम किया.
जानकी जी को तपस्वी के भेष में देखकर सब लोग व्याकुल हुए और जनक जी ने अपने प्राणों से प्यारी पुत्री को हृदय से लगा लिया. माता-पिता से मिलकर जानकी जी विकल हो गई. सब लोग श्री राम और सीता जी का साथ पाकर बहुत प्रसन्न हैं.
एक दिन रघुनाथ जी गुरु वशिष्ट के पास गए और प्रणाम कर कहने लगे कि अयोध्या वासियों और मिथिला वासियों को वन में कलेश सहते हुए बहुत दिन हो गए. इसलिए उचित होगा कि आप वह करें जो सबके लिए उचित है.
गुरु वशिष्ठ और जनक जी भरत जी के पास गए और कहने लगे कि रामजी सत्यव्रत और धर्म का पालन करने वाले हैं. अब तुम ही आज्ञा दो क्या किया जाए भरत जी कहने लगे कि आप मेरे पिता समान पूज्य है..
भरत जी के हृदय में श्री राम निवास करते हैं जहां सूर्य का प्रकाश हो वहाां अंधेेरा टिक नहीं सकता है .देवराज इंद्र सोचने लगे कि अब काम बनाना और बिगाड़ना भरत जी के हाथ में है .
श्री राम और भरत जी संवाद
श्री राम भरत जी को कहने लगे कि तुम सबको कर्तव्य और मेरे धर्म हित पता है. हे तात तुम वही करो और मुझसे भी वही कराओ.सूर्यकुल के रक्षक बनो .
श्री राम की आज्ञा पाकर भरत जी स्नेहपूर्ण वाणी कहते हैं कि प्रभु अब जैसी आप आज्ञा दोगे मैं वही करूंगा . मैं आपके और पिताजी के वचनों का उल्लंघन कर समाज सहित यहां आया हूं . मैं आपके चरणों का दर्शन कर जान गया कि इतनी बड़ी चूक के बाद भी आपका मुझ पर बहुत अनुराग है.मुझे आज्ञा दे लेकिन अब मुझे कोई (अवलंबन) सहारा दे जिसकी सेवा कर में 14 वर्ष की अवधि पार कर सकूं. इतना कहकर भरत जी ने व्याकुल होकर श्री राम के चरणों में पकड़ लिया .
भरत जी के दीन वचन सुनकर बोले कि मेरा और तुम्हारा पुरुषार्थ इसी में है कि हम दोनों भाई पिता की आज्ञा का पालन करें .तुम गुरु वशिष्ट, माता और मंत्रियों की इच्छा मानकर राज्य और प्रजा की रक्षा करना.
तुलसीदास जी कहते हैं श्री राम कहते हैं कि, "मुखिया मुख के समान होना चाहिए, जो खाने पीने को तो एक हैं (अकेला) लेकिन विवेक से सभी अंगो का पालन करता है . श्री राम ने बहुत प्रकार से भरत जी को समझाया लेकिन बिना आधार (अवलम्बन) उनके मन को संतोष ना हुआ . श्रीराम ने अपनी खड़ाऊं भरत जी को दे दी . भरत जी के लिए मानो दोनों खड़ाऊं प्रजा की रक्षा के लिए पहरेदार हो.
अब भरत जी ने श्रीराम से विदा मांगी. यह दृश्य देखकर देवता से खुश हो रहे हैं मानो जो सेना लूटनेआई थी वही रक्षक बन गई हो. भरत ,शत्रुघ्न श्री राम को प्रणाम कर संपूर्ण समाज सहित अयोध्यापुरी को चले.
श्री रामचंद्र, लक्ष्मण जी और सीता जी सहित सब को विदा कर अपनी पर्णकुटी में आए. उधर भरत जी सहित सारा समाज श्रीराम की विरहा में बेहाल हैं . चौथे दिन सब लोग अयोध्या जी पहुंचे.
भरत जी का पादुकाओं की स्थापना करना
भरत जी ने शुभ मुहूर्त पर प्रभु श्रीराम के चरण पादुकाओं को सिंहासन पर विराजित कर दिया. वह स्वयं सिर पर जटाजूट और शरीर में मुनियों के वस्त्र धारण कर नंदीग्राम में पर्णकुटी बनाकर निवास करने लगे .
भरत जी प्रतिदिन प्रभु श्री राम की पादुकाओं का पूजन करते और पादुकाओं से आज्ञा मांग कर राज्य संचालन करते .