Friday, August 28, 2020
स्वार्थ बनाम सेवाभाव
Saturday, August 1, 2020
आत्म निर्भरता की बुनियाद- नई शिक्षा नीति-2020
आत्मनिर्भरता की बुनियाद--
नई शिक्षा नीति -2020
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हरेक मानव के तीन मूलभूत आवश्यकताएं हैं-- भोजन वस्त्र और आवास। लेकिन किसी भी देश में अगर मानव संसाधन के विकास को समग्रता से देखा जाय तो इसके नींव में उस देश की शिक्षा व्यवस्था को ही पाया जायेगा जो हर पल उन्हें उन्नत सोच की ओर ले जाता है। हरेक देश के चतुर्दिक और सर्वागीण विकास में शिक्षा वहाँ के जनता के लिए भोजन ,वस्त्र ,आवास के बाद चौथी सबसे अहम कङी है,
शिक्षा कि महता को देखते हुए भारत सरकार ने समय समय पर इनके स्वरूप में बदलाव लाया है। सन् 1947 से पूर्व भी शिक्षा को मानव संसाधन के विकास में आवश्यक माना गया और पराधीन भारत सरकार के संचालकों ने इसे अपने हित के अनुकूल आम जनों को मुहैया कराया और इसके परिणाम में उन्हें दुभाषिये ( अंग्रेज़ी - हिन्दी के जानकार) , क्लर्क और अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार करने वाली स्वभाविक मानसिकता युक्त तैयार बहुजन मिलेे ब्रटिश सरकार ने इसी के अनुकूल परिणाम पर लगभग डेढ़ शतक साल तक शासन किया। हम भारत वासियों का यह दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि अभी तक जो शिक्षा नीति हमारे यहाँ संचालित है वह कमोबेश थोङे बहुत बदलाव के साथ पराधीन भारत में ब्रिटिश हित के लिए विकसित शिक्षा नीति ही है , जो हमारे चतुर्दिक विकास में समयानुकूल नहीं है। और यह आज अनुकूल हो भी कैसे सकता है ,सौ -ङेढ सौ साल पहले विकसित शैक्षणिक संरचना उस काल को ध्यान में ही रखकर तो बनाया गया था ।आज के आधुनिक तकनीकी दौर की संकल्पना उस समय किसी के भी समझ से परे रहा होगा।
बदलाव और समकालीन उपयुक्त नीति विकसित करने की कङी में ही हम आजादी के बाद सन्1986 के राष्ट्रीय शिक्षा नीति को पाते हैं । यहाँ कुछ सीमा तक ब्रिटिश कालीन शिक्षा नीति से बाहर निकलने की कशमकश छटपटाहट सी दिखती है और इसी के परिणाम स्वरूप अंग्रेजी विषय की अनिवार्यता को ऐच्छिक बना दिया गया और यह उस नीति के तहत राज्यों के अपने विवेक पर यह निर्भर करने लगा कि उनके यहाँ अंग्रेज़ी वैकल्पिक हो या अनिवार्य ।
सर्व शिक्षा अभियान (सन्-2001, 86वे संविधान शंसोधन)और राइट टू एजूकेशन एक्ट(04 अगस्त 2009 भारतीय संविधान की धारा 21ए ) के साथ ही भारत उन एक सौ पैतीस देशों की श्रेणी में आया गया जिसमेँ शिक्षा को मौलिक अधिकार स्वीकारा गया है। इनके व्यवहार मे आने से शिक्षा की पहुँच आम जनों तक समान रूप से हो इस हेतु यह एक बहुत ही गंभीर और प्रभावशाली प्रयास कहा जा सकता है। संविधान के भाग चार में वर्णित राज्य के नीति निदेशक तत्व में शिक्षा को सर्वशुलभ कराने की अपेक्षा राज्य सरकारों से अपेक्षित था लेकिन यह बाध्यकारी नहीं था। लेकिन राईट टू एजूकेशन एक्ट के आने के बाद शिक्षा अब सभी बच्चों का ( छह से चौदह उम्र वालों ) कानुनी अधिकार हो गया तथा अभिभावक और राज्य सरकार इस हेतु अब कानुन बाध्य हो गये। शिक्षा के प्रति राज्यों के ढुलमूल रवैये को देखकर इसे अब समवर्ती सूची में लाया गया है और इसके लिए राज्य और केंद्र दोनों ही नियम कानून बना सकते हैं । सर्व शिक्षा अभियान द्वारा हरेक बच्चों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया कराये जाने की प्रतिबद्धता का भी अभी तक के शैक्षणिक विकास में अहम योगदान कहा जा सकता है जिसके तहत कस्तूरबा विधालय , मध्याह्न भोजन ,सायकल, पोशाक ,जूता,कापी पुस्तक आदि की उपलब्धता केन्द्र और राज्य के सम्मिलित अंशदान से सर्व शुलभ विधालयो में कराया जा सका ।
आज के हालात में उपयुक्त नवीन शिक्षा नीति 2020 बहुत ही असरकारी और सभी प्रकारों के समस्याओं को समाधान करने के संदर्भ में गंभीर पहल कहा जा सकता है। अन्तराष्ट्रीय व्यवस्था में फिनलैंड की शैक्षणिक व्यवस्था को बहुत ही प्रशंसनीय व्यवस्था कहा जाता है। और नवीन शिक्षा नीति-2020 भी उनसे बहुत ही ज्याद प्रभावित दिख रही है।
अगर अच्छे गुणों की चर्चा की जाय तो स्थानीय भाषा में प्राथमिक शिक्षा, सरकारी स्कूली शिक्षा में प्ले स्कुल का संरचनात्मक विकास, फाउंडेशन कोर्स पर मजबूती से फोकस, विषय चयन की स्वतंत्रता , कोर्स से स्व आंशिक निष्कासन पर यथोचित चरणबद्ध ङिग्री, कोर्स की पूर्णतया विधार्थियों के सुविधानुसार, विषय युग्म का चयन रूचिनुसार, रटन्त व्यवस्था के जगह चनात्मकता का बढावा जैसे अनेकों नेक प्रयास यहाँ स्पष्ट दिख रहा है जिनकी अपेक्षा लम्बे समय से था। इस शिक्षा नीति की सबसे बड़ी विशेषता बच्चों में सर्टिफ़िकेट के साथ हुनर का समावेश होगा जो समय की मांग है और यही तथ्य संपूर्ण भारत को चाईना की तरह उत्पादन हब बनाने में सहयोगी होगा। बच्चों द्वारा साल भर के अध्ययन को तीन घंटे में परीक्षा द्वारा मूल्यांकन करना किसी भी बोर्ङ और तकनीक द्वारा अन्यायोचित कहा जायेगा ,और इसी के समाधान में यहाँ हम सतत मूल्यांकन और सेमेस्टर सिस्टम को पाते हैं । अध्ययन- अध्यापन के उच्च संस्थानों पर भी अब ए आई सी टी ई , एन सी टी ई, एन सी ई आर टी और यु जी सी जैसे विभिन्न नियामक इकाईयों की जगह एक मंचीय व्यवस्था का जिक्र काबिले तारीफ है। सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर शिक्षा को निजीकरण की ओर बढावा निश्चित रूप से एक ऐसा चिन्तनीय पहलू है। जो भारत के विविध
स्तरीय समाज के शैक्षणिक विकास पर गंभीर प्रभाव और इसपर चिंतन की ओर आकृष्ट करता है।
नवीन शिक्षा नीति 2020 भारत के कर्णधारो को इस अनुकूल विकसित कर पाने में सक्षम हो जहाँ हर हाथ को हुनर के मुताबिक काम, उत्कृष्ट जीवन शैली ,नैतिक रूप से सबल और अन्तराष्ट्रीय स्तर के कौशल प्रबंधन और प्रदर्शन में उत्कृष्ट मानक स्थापित करने वाला साबित हो और हम सभी देश वासी इसी की अपेक्षा करते हैं ।
पवन मिश्रा