Friday, August 28, 2020

स्वार्थ बनाम सेवाभाव

स्वार्थ बनाम सेवाभाव बनाम व्यवसाय
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            चलिए हम और आप चलते हैं, एक सफर पर ----
 आस -- पास के परिवेश को समझने ,
कोरोना त्रासदी से प्रभावित हुए कमोबेश हर घर की परेशानी को समझने ।

             झारखंड सहित संपूर्ण भारत के शैक्षणिक व्यवस्था में मिशनरीज स्कूलों का बड़ा ही व्यापक और महत्त्वपूर्ण योगदान है , हर गांव -- हर घर तक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा न्यूनतम दर पर  उपलब्ध कराना इनका उद्देश्य रहता आया है। ये मिशनरीज स्कूल मदर टेरेसा को अपना आदर्श मानते हैं । मदर टेरेसा के सेवा भाव की कहानी से मैं भी प्रभावित हूं और मैंने भी इन्हें आदर्श मान रखा है लेकिन इनकी सेवा भावना का प्रशंसक हूं , और इनके छुअन मात्र से कुष्ठ रोगी के चंगा हो जाने की कहानी का निन्दक  हूं, तर्क की कसौटी पर  इस बात के पीछे महिमा मंडन और धर्म प्रचार की प्रकृति को पाता हूं।

                मिशनरीज स्कुलो का संपूर्ण भारत वर्ष को एहसानमंद होना चाहिए -- क्योकि ये सभी विधालय जो  संपूर्ण भारत वर्ष के लगभग 65 % शैक्षणिक व्यवस्था को संभाले हुए हैं और मदर टेरेसा की सेवा भावना को आत्मसात करके निरंतर हमारी सेवा कर रहे हैैं।

        यहां तक की बातों से तो सभी मिशनरीज विधालय सहमत होंगे और गौरवान्वित भी महसूस करेंगे और करना भी चाहिए।

      लेकिन जब यही विधालय        व्यवस्थापक समूह  आपदा को पैसा कमाने वाले अवसर के रुप में देखने लगे तो आप क्या कहेंगे---? कहां गयी इनकी सेवा भावना----?  कहां है मदर टेरेसा के भावना की प्रकृति ---?

          आप में से किसी के पास ज़बाब हो तो तार्किक आधार पर अपने ज़बाब इसी पटल पर रखने का प्रयास करिएगा।


       दुमका सहित अन्य क्षेत्रों के लगभग सभी प्राइवेट विद्यालय अपने सभी कर्मचारियों  के वेतन को कम करते हुए 50  से 70 प्रतिशत ही भूगतान कर रहे हैैं।
 कई विधालय इनके वेतन बंद किये हुए हैं।

           अब इसी व्यवस्था के दुसरे पहलू को देखिए ---- मध्य मई के आस पास से सभी विद्यालयों ने आनलाइन कक्षा का संचालन आरंभ किया । करना चाहिए भी था ---पठन पाठन को जैसे भी हो फिर से संचालित करना बहूत बड़ी जिम्मेदारी थी।

           लगभग सभी कर्मी अपने घर से ही संरचनात्मक विकास (ऐंड्रॉयड मोबाईल , ट्रायपोड ,डाटा, ब्लैक -व्हाईट बोर्ड आदि,) कर पठन पाठन कर  अपने  दायित्वों का निर्वहन विभिन्न प्रकार के कठीन चुनौतियों का  सामना करते हुए कर  रहे  हैैं,और अपने आप को समयानुकूल अपग्रेड कर रहे हैैं।
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।        इस प्रकार से यह प्राइवेट शिक्षक समुदाय काफी परेशानी भरे स्थितियों के साथ संघर्ष कर रहे हैैं।

।       जबकि विधालय संस्थापक सह संचालक समूह इस आपदा कालीन परिस्थितियों में बच्चों के अभिभावकों से  सभी प्रकार के फीस  वसूल रहे हैैं  --किसी भी प्रकार की कोई रियायत , कोई सहानुभूति इनके मन में नहीं है -- इनके स्वभाव में नहीं है  ।

।     जबकि इस हेतु राज्य सरकार की मंशा है कि प्राइवेट विद्यालय इस कोरोना आपदा में सिर्फ ट्युशन फीस ही लें। सरकार की हर अपेक्षा कानुनी आदेश से ही लागु हो यह भी तो उचित नहीं।

।  हमें यह पता होना चाहिए कि इन सभी विद्यालयों का संचालन और निबंधन एक गैर लाभकारी संस्था के रूप में होता है और सरकार इन्हें विविध प्रकार की रियायतें भी  मूहैया कराती है।

।   इसी प्रकार से सरकार की यह अपेक्षा एक घोषित कानून के रूप में है, कि कोई भी प्राइवेट विधालय प्रत्येक साल नामांकन फीस नहीं ले सकता है --- इसके प्रत्युतर में कई विद्यालय ने नामांकन फीस का नाम बदलकर सलाना फी/ विविध फीस/ विकास कोष --आदि  कर लिया है और सरकारी आदेश को ठेंगा दिखा दिया।

  वर्तमान परिदृश्य में जब इनकी सेवा भावना जगजाहिर है, हरेक बच्चों से सभी फीस की वसुली कर रहे हैं तो फिर आप अपने शिक्षकों के वेतन को कम कर दें रहे हैैं ---यह कैसा न्याय-- ?

     ‌दुमका स्तर पर यह राहत है की अभिभावकों को फी के लिए नोटिस तो दिये जा रहे हैं -- लेकिन इनकी वसुली कड़ाई से नहीं हो रही है।

    अध्यापन के नाम पर बच्चों को आज जो मिल पा रहा है वह बहुत ही कम , अत्यल्प है तथा विधालय का अपना लागत और  संचालन खर्च भी आज के दिनों में बहुत ही कम है ।

    फिर ऐसे में अभिभावकों से सभी प्रकार के फीस वसूली ,  अध्यापन के नाम पर बच्चों को प्राप्ति स्तर का न्युन हो जाना, और  इन सब के बावजूद शिक्षकों का वेतन आधा कर देना , आप सभी के सेवा भाव और एक गैर लाभकारी संगठन का कैसे परिचायक हो पा रहा है -- समझ से परे है । जबकि आकलन के मुताबिक ट्युशन फीस मात्र ही शिक्षकों के वेतन भुगतान के लिए प्रर्याप्त राशि है।

  ---- पवन मिश्रा
  
            
         

Saturday, August 1, 2020

आत्म निर्भरता की बुनियाद- नई शिक्षा नीति-2020



आत्मनिर्भरता की बुनियाद--
             नई शिक्षा नीति -2020
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हरेक  मानव के  तीन मूलभूत आवश्यकताएं हैं-- भोजन वस्त्र और आवास। लेकिन किसी भी देश में अगर मानव संसाधन के विकास को समग्रता से देखा जाय तो इसके नींव में उस देश की शिक्षा व्यवस्था को ही पाया जायेगा जो हर पल उन्हें उन्नत सोच की ओर ले जाता है। हरेक देश के चतुर्दिक और सर्वागीण विकास में शिक्षा वहाँ के जनता के लिए भोजन ,वस्त्र ,आवास के बाद चौथी सबसे अहम कङी है,

    शिक्षा कि महता को देखते हुए भारत सरकार ने समय समय पर इनके स्वरूप में बदलाव लाया है। सन् 1947 से पूर्व भी शिक्षा को मानव संसाधन के विकास में आवश्यक माना गया और पराधीन भारत सरकार के संचालकों ने इसे अपने हित के अनुकूल आम जनों को मुहैया कराया और इसके परिणाम में उन्हें दुभाषिये ( अंग्रेज़ी - हिन्दी के जानकार) , क्लर्क और अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार करने वाली स्वभाविक मानसिकता युक्त तैयार  बहुजन मिलेे  ब्रटिश सरकार ने इसी के अनुकूल परिणाम पर लगभग डेढ़ शतक साल तक शासन किया। हम भारत वासियों का यह दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि अभी तक जो शिक्षा नीति हमारे यहाँ  संचालित है वह कमोबेश थोङे बहुत बदलाव के साथ पराधीन भारत में ब्रिटिश हित के लिए विकसित  शिक्षा नीति ही है , जो हमारे चतुर्दिक विकास में समयानुकूल नहीं है।  और यह आज अनुकूल हो भी कैसे सकता है ,सौ -ङेढ सौ साल पहले विकसित शैक्षणिक संरचना उस काल को ध्यान में ही रखकर तो बनाया गया था  ।आज के आधुनिक तकनीकी दौर की संकल्पना उस समय किसी के भी समझ से परे रहा होगा।
     बदलाव और समकालीन उपयुक्त  नीति विकसित करने की कङी में ही हम आजादी के बाद सन्1986 के राष्ट्रीय शिक्षा नीति को पाते हैं । यहाँ  कुछ सीमा तक ब्रिटिश कालीन शिक्षा नीति से बाहर निकलने की कशमकश छटपटाहट सी दिखती है और इसी के परिणाम स्वरूप  अंग्रेजी विषय की अनिवार्यता को ऐच्छिक बना दिया गया और यह उस नीति के तहत राज्यों के अपने विवेक पर यह निर्भर करने लगा कि उनके यहाँ अंग्रेज़ी वैकल्पिक हो या अनिवार्य ।
             सर्व शिक्षा अभियान (सन्-2001, 86वे संविधान शंसोधन)और राइट टू एजूकेशन एक्ट(04 अगस्त 2009 भारतीय संविधान की धारा 21ए ) के साथ ही भारत उन एक सौ पैतीस देशों की श्रेणी में आया गया जिसमेँ शिक्षा को मौलिक अधिकार स्वीकारा गया है। इनके  व्यवहार मे आने से शिक्षा की पहुँच आम जनों तक समान रूप से हो इस हेतु  यह एक बहुत ही गंभीर और प्रभावशाली प्रयास कहा जा सकता है। संविधान के भाग चार में वर्णित राज्य के नीति निदेशक तत्व में शिक्षा को सर्वशुलभ कराने की अपेक्षा राज्य सरकारों से अपेक्षित था लेकिन यह बाध्यकारी नहीं था। लेकिन राईट टू एजूकेशन एक्ट के आने के बाद  शिक्षा अब सभी बच्चों का (  छह से चौदह उम्र वालों  ) कानुनी अधिकार हो गया तथा अभिभावक और राज्य सरकार इस हेतु अब कानुन बाध्य हो गये। शिक्षा के प्रति  राज्यों के ढुलमूल रवैये को देखकर इसे अब समवर्ती सूची में लाया गया है और इसके लिए राज्य और केंद्र दोनों ही नियम कानून बना सकते हैं । सर्व शिक्षा अभियान द्वारा हरेक बच्चों तक गुणवत्तापूर्ण  शिक्षा मुहैया कराये जाने की प्रतिबद्धता का भी अभी तक के शैक्षणिक विकास में अहम योगदान कहा जा सकता है जिसके तहत कस्तूरबा विधालय , मध्याह्न भोजन ,सायकल, पोशाक ,जूता,कापी  पुस्तक आदि की उपलब्धता केन्द्र और राज्य के सम्मिलित  अंशदान से सर्व शुलभ विधालयो में कराया जा सका ।

        आज के हालात में उपयुक्त नवीन शिक्षा नीति 2020 बहुत ही असरकारी  और सभी प्रकारों के समस्याओं को समाधान करने के संदर्भ में गंभीर पहल कहा जा सकता है।  अन्तराष्ट्रीय व्यवस्था में फिनलैंड की शैक्षणिक व्यवस्था को बहुत ही प्रशंसनीय व्यवस्था कहा जाता है। और नवीन शिक्षा नीति-2020 भी उनसे बहुत ही ज्याद प्रभावित दिख रही है।
         

       अगर अच्छे गुणों की चर्चा की जाय तो स्थानीय भाषा में प्राथमिक शिक्षा, सरकारी स्कूली शिक्षा में प्ले स्कुल का संरचनात्मक विकास, फाउंडेशन कोर्स पर मजबूती से फोकस, विषय चयन की स्वतंत्रता , कोर्स से स्व  आंशिक  निष्कासन पर यथोचित चरणबद्ध  ङिग्री,  कोर्स की पूर्णतया विधार्थियों के सुविधानुसार,  विषय युग्म का चयन रूचिनुसार,  रटन्त व्यवस्था के जगह चनात्मकता का बढावा जैसे अनेकों नेक प्रयास यहाँ स्पष्ट दिख रहा है जिनकी अपेक्षा लम्बे समय से था। इस शिक्षा नीति की सबसे बड़ी विशेषता बच्चों में सर्टिफ़िकेट के साथ हुनर का समावेश होगा जो समय की मांग है और यही तथ्य संपूर्ण भारत को चाईना की तरह उत्पादन हब बनाने में सहयोगी होगा।  बच्चों द्वारा साल भर के अध्ययन को तीन घंटे में परीक्षा द्वारा मूल्यांकन करना किसी भी बोर्ङ और तकनीक द्वारा अन्यायोचित कहा जायेगा ,और इसी के समाधान में यहाँ हम सतत मूल्यांकन और सेमेस्टर सिस्टम को पाते हैं । अध्ययन- अध्यापन के उच्च संस्थानों पर भी अब ए आई सी टी ई , एन सी टी ई, एन सी ई आर टी और  यु जी सी जैसे विभिन्न नियामक इकाईयों की जगह एक मंचीय व्यवस्था का जिक्र काबिले तारीफ है। सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर शिक्षा को निजीकरण की  ओर बढावा निश्चित रूप से एक ऐसा चिन्तनीय पहलू है।                                                             जो भारत  के विविध
 स्तरीय समाज के शैक्षणिक विकास पर गंभीर प्रभाव और इसपर  चिंतन की ओर आकृष्ट करता है। 

       नवीन शिक्षा नीति 2020 भारत के कर्णधारो को इस अनुकूल  विकसित कर पाने में सक्षम हो जहाँ हर हाथ को हुनर के मुताबिक काम, उत्कृष्ट जीवन शैली ,नैतिक रूप से सबल और अन्तराष्ट्रीय स्तर के कौशल प्रबंधन और प्रदर्शन में उत्कृष्ट मानक स्थापित करने वाला साबित हो और हम सभी देश वासी इसी की अपेक्षा करते हैं ।

  पवन मिश्रा