Friday, June 28, 2024

(19) कहानी --अनोखा ममत्व

     'अनोखा ममत्व'


कार्य भार हो तो परेशानी  और न हो तो खाली दिमाग शैतान का अड्डा | कार्यों के प्रति बेशुमार समर्पन अच्छा चीज है , लेकिन अत्यधिक पैसा कमाना और गलत पैसा कमाना ,आदमी को दोस्त ,परिवार और समाज से अलग और जुदा करके रख देता है  | पैसे कमाने के चाहत ने ही तो आदमी को एक मशीन समान यंत्र में तब्दील कर दिया --! और सच पुछिये तो ऐसे आदमी 
न परिवार का होता है न अपने शरीर का और न अपने मन का मतलब वो होता है -- सिर्फ और सिर्फ पैसों का |
             ठंडक भरी दिन और उसमें अगर बारिस हो जाय तो वह दिन थोडा अलग ऐहसास दिलाने वाला दिन होता है. झटपट आफिस के काम खतम कर मैंने रघु को  प्याज वाले गरम पकौडे लाने को कहा . 
     कुछ ही मिनटों में गरमा गरम लजीज पकौडे मेरे टेबल पर था . ओह  अवर्णनीय अनोखे स्वाद जिससे कभी मन नहीं भरता.
पेट की तृप्ति और मन की तृप्ति ये दोनों दो चीज होती है. और जहां मन की तृप्ति न हो वहीं होता है असीम लगाव -- अथाह स्नेह -- हर पल उस स्नेह को भोगने की इच्छा .
               आप स्वयं के अंदर झांकिए - अगर आप  संवेदनशील और भावना प्रधान व्यक्ति हैं,तो आपके मनो मस्तिष्क में दो चार शख्सियत ऐसे अवश्य होंगे जिनके करीब आप अपने को रखने की चेष्टा अवश्य करना चाहेंगे -- उनके बातों में वो स्नेह और आत्मीयता आपको दिखेगा जिससे आपका मन कभी न भरेगा - ये लेखक के अपने विचार हैं--.
    खैर मैं नहीं कह सकता वो रघु के हाथों  लाया गया वो पकौड़े को मैं प्यार करता था या पकौडे ही मुझसे प्यार करने लगे थे -- यह एक अद्भुत संयोग था.
    जब जब मैं फुरसत पाता मुझे पकौडे की चाहत होती और मैं रघु को आदेश करता  -- तब तब एक ही प्रकार के संतुलित मशाले से बनी मेरे हरेक पसंद की चीज  रहती उस प्लेट में , यथा धनियां और सरसों की चटनी , प्लेट की सजावट , परोसने के तरीके -- ओह हो अवर्णनीय  -- कमाल की तहजीब होती थी .
      मैंने पुन: एक प्लेट और रघु को बोला. बस कुछ ही मिनटों में उसी अंदाज में रघु ने पकौडे मेरे टेबल पर हाजिर किये. पकौडे बनाने वाले से मिलने की और उसे कुछ स्पेशल टिप्स देने की मेरी जोरों की इच्छा हुई.
     हरेक बार की भांति इस बार भी रघु ने मुझे रोकने का हर संभव प्रयास किया. लेकिन मैं अपने नेचुरल रूप में अब आ चुका था और --- अब मै आफिसर था और रघु मेरा आदेशपाल --
एक आफिसर का सख्त आदेश अपने आदेशपाल से था -- 'तुरंत मिलाओ पकौडे बनाने वालों से---'
    और कुछ ही मिनटों में मैं वहीं था जहां पकौडे तला जा रहा था. पकौडे बनाने वाली कोई और नहीं मेरी मां थी जिसके कोख से मैने पैदा लिया था ----- और परिवारिक रंजीश में उसे वृद्धाश्रमों दशकों पहले पहुंचा दिया गया था .
  मैं स्तब्ध था , मैं आफिसर था , पैसे वाला था , शहर में मेरी तुती बोलती थी लेकिन मानवीय संवेदना मेरी मर चुकी थी -- मुझसे ज्यादा संवेदनात्मक मुल्य आदेशपाल रघु ने अर्जित किया था -- जो मेरी मां को रख पा रहा था.
   ©® पवन मिश्रा

(8) कहानी -- 'एकतरफा प्यार----'

      एक कहानी
                  ' एकतरफा प्यार-----'
     ' सुगंधा' यह नाम किस काम के, मैं ड्रेसिंग कक्ष में बैठे बैठे सोच मे पड गयी थी . कभी संदीप के साथ बिताये पिछले  दिनों को याद कर रही थी तो कभी आज के अपने परिस्थिति पर , अपने भाग्य को मैं कोस रही थी.न चाहते हुए भी तरह तरह के अशुभ विचार मन मे हावी हो जा रहे थे.-- शायद मेरी मनोदशा इस पृथ्वीलोक को आज अंतिम प्रश्न छोड सदैव के लिए जाना चाह रही थी , एक औरत को अकारण अवहेलना , निरादर और परित्याग क्यों --?  क्यों , क्योकि मैं एक औरत हूँ --!
              जब मानव मन पर आपार दुख का पहाड टुट गया हो ,चारों ओर घोर अंधेरा दिख रहा हो तो चंचल मन सिर्फ़ अपने भाग्य को कोसता है और यही सुगंधा कर रही थी. भोजन मेज के ठीक उपर सुंदर सा तस्वीर जिसमें सुगंधा और संदीप खिलखिलाकर हंस रहे थे मानो उस हंसी पर अब पूर्ण विराम लग गया हो.अकारण संदीप ने शहर छोडकर महानगर में अपना घर बसा लिया और सुगंधा आज अकेली मानिए भीड भरे इस संसार में कोई कारण खोज रही है -- जीने का कारण --?
          स्वयं से स्वयं के सवाल का जबाब पाना आसान नहीं होता है.ऐसे ही अनेकों सोच
भरे गंभीर सवाल दिमाग में बारंबार उपज रहे थे और मानो नेपथ्य से कोई संत्वाना दे रहा हो धैर्य रख --! संसार में तु अकेला ऐसा नहीं है --!
                   जाने कब से मेनका आंटि मेरे ठीक पिछे खडी होकर सिर्फ़ मुझे निहार थी. मेनका आंटी जो मेरे प्राईमरी ऐजुकेशन में अध्यापिका थीं और सबसे निकटतम पडोसी.,
बोल पडी क्या हो रहा है -सुगंधा बेटा .
  मैंने हड़बड़ से जल्द उठकर उनका अभिवादन किया और उन्हें बैठने का अनुरोध किया. आंटी ने मेरे पसंद के भर कटोरी गाजर का हलवा ले आया था. खाने को मन न था लेकिन उनके अनुरोध में ही कड़ी आदेश वाली बातें छिपी होती थी सो मैं इनकार कर न पायी. हलवा समाप्त होते ही आंटी बोल पडी -- दस मिनट के अंदर कपड़े बदल कर तैयार हो जाओ तुझे मेरे साथ बाजार जाने हैं.
               शायद दस मिनट से पहले ही आंटी के गाड़ी का हौरन मेरे दरवाजे पर बजने लगा था. मैं भी झटपट आधे अधुरे मन से ही घर मे ताला लगाते हुए निकल पडी और आंटी के साथ वाले सीट पर बैठ गयी. गाड़ी आंटी के ईशारे पर शहर से बाहर की ओर जा रही थी , मुझे कुछ भी  समझ में नहीं आ रहा था आखिर जाना कहां है--? गाडी़ गंतव्य को पहुंच चूकि थी.
     मैं और आंटि संकरी गली से होते हुए अनेकों कमरे युक्त विशाल मकान में प्रवेश कर ली थीं. बड़ा सा बाग बगीचा विभिन्न प्रकार के पुष्प युक्त एक बड़ा सा खुले आसमान वाले बैठकखाना मे हम दोनों जाकर बैठ गये. ऐसा लग रहा था कि मेनका आंटी यहां बराबर आति हो और सभी उन्हें पहचान रहा हो.
         हारे ,थके , बेजान , बेसाहारा बृद्धों की शरणस्थली थी यह जगह. जहां आंटी कुछ शारीरिक , मानसिक और आर्थिक सहयोग करा करती थी . ऐसा उनके चहलकदमी को देखकर मैं स्वत: समझ पा रही थी. उन्हीं बृद्धा मे से एक थरथराती हाथों से  चाय छलकाती कप को पकड़े लौन में बैठी मुझे ईशारा करते हुए बोली 'इधर को आ मुन्नी'---मुन्नी--!
           मैं आंटी की ओर देख इशारों में इजाजत मांग ली .
       उस बृद्धा में गजब की तेज थी , हौसला सातवें आसमान पर , कडक रोबिले आवाज उसे भीड में असाधारण पहचान दिला रही थी.
मेरे पीठ पर हाथ सहलाते हुए  मुझसे पुछीं --क्या करती है तुम. गजब की आत्मानुभूति और आत्मीयता उनके इन शब्दों में थी .उनके हथेली का मेरे पीठ को छुउन गजब की अनुभूति दे रही थी , संतोष शुकून भरा सहलाना था उनका यह छुउन.   .मैंने लाख चाहने के बाद भी अपने को रोक न पाया , बिन कुछ बोले मैं फुट फुट कर रो पडी.
           सत्तर पचहत्तर के उम्र में वो मुझ तीस साल की औरत को सहारा देते हुए एकांत की ओर ले गयी और मेरे सारे मनोविकार को बोलने के लिए बाध्य कर दिया .एक एक कर मैं अपने सारे परिस्थिति और संदीप के परित्याग को व्यक्त कर गयी.
          आंटि आप इतने अच्छी हैं, आपका परिचय थोडा जानती--? सुगंधा ने उनसे अनुरोध किया. संदीप तुझे छोड के चला गया इसलिए बेजान हो तुम --!
              सुनो मेरी कहानी ------ मैं देश के मशहुर डाक्टर रतनेशर की मां हुं. मैंने उसे पचीस साल तक पढाया. बारह से चौदह घंटा मैंने उम्र के पैंसठ साल तक काम किया . सुगंधा बोल पडी -- लेकिन इतने पैसे और सोहरत वाले डाक्टर साहब की मां यहां--!
         उसके पास मेरे लिए कोई समय नहीं है . उनकी अपनी कुछ लचारी रही होगी इसलिए मैं यहां हूं. मैं आज भी रतनेशर को उतना प्यार ही प्यार करता हूँ . मैं कल जितना करता था आज उससे ज्यादा जानोगी क्यों --?
         मैं प्रेम करता हूँ। नि:स्वार्थ प्रेम अपने बेटे से पोतहू से . बदले में प्यार मिलेगा इसकी अपेक्षा कहां है --?. अगर प्यार के बदले प्यार की आशा हो , बुढापे मे परवरिश की आशा हो तो वह प्रेम रहा ही कहां. वह प्रेम नहीं है जिसे दुनिया प्रेम मान रही है -- यह तो डर है अपने बुढापे का , यह तो स्वार्थ है समय परअपने को सहारा कोई दे इसलिए,प्रत्युतर में प्रेम पाने की भुख तो हरगीज प्रेम नहीं है. तुम संदीप से प्रेम नहीं करते तुम अपने खुशियाली खातिर  उसपर आश्रित होना चाह रही हो .
    तिनका तिनका बचा कर मैंने रतनेशर को संभाला है ,जब उनके पापा उसे छोड़ दिया अकेला . वह जिगर का टुकडा है मेरे लिए . प्यार द्विपक्षीय नही  हो सकता है . हमेशा ही प्यार एकक्षीय ही होता आया है. हां कुछ समय के लिए यह आभासी रूप में प्रतित होता है , कि प्यार के दोनों पक्ष एक दुसरे को समान रुप से चाहते हैं. लेकिन यह सिर्फ आभासी होता है ,कलांतर में वह भ्रम बहुत बड़ा अवसाद का कारण भी बनता है. यह अवसाद तो प्यार के गहराईयों को अभिव्यक्त करता है और प्यार भुले नहीं भुलता.
        अगर तुम संदीप से बदला लेने की सोचते हो , या उसके व्यवहार को तुम कोसते हो तो तुम उसे प्यार नही करते थे --!
  प्यार तो हमेशा ही अगले के कल्याण और अच्छाई के कामना के लिए होने चाहिए. प्यार कुछ प्राप्ति के लिए हो तो वह प्यार कहां.
          मैं रतनेशर  से टुट गयी--- इसके बाद अपने सारे जमा पुंजी और पेंशन इसी वृद्धाश्रम को दान दे दी हूँ,  ताकि बेसाहारा लोग यहां आश्रय ग्रहण करे --, तेरा सहारा है अभी ये तेरे मजबुत हाथ और पांव -- कुछ कर जिससे सुगंधा के पृथ्वी पर होने का अर्थ स्पष्ट हो .
©®पवनमिश्रा (दुमका झारखंड)

                 
  

               


      

(1 )कहानी बेनामी रिश्ता

         कहानी ---                 
                  *बेनामी रिश्ता*


           यह बैंक की नौकरी भी जीवन को अजीबो अजीब सा ऐहसास दिलाते रहती है . कार्यभार और स्थानांतरण हम बैंककर्मीयों  को चैन की सांसे नहीं लेने देती . यह तो भगवान का लाख लाख शुक्र है कि लिली जैसी हमसफर मुझे मिला वरना मेरा क्या होता--! भगवान मालिक .
                  अभी अभी भागलपुर से बसंत बिहार मेरा स्थानांतरण हो गया था. देश की राजधानी दिल्ली में स्थानांतरण हो पाना बडे ही संयोग की बात है. चीर प्रचलित पुरातन कहावत है दिल्ली दिल वालों की है मतलब कि यहां के आदमी कुछ ज्यादा उदार होते हैं -- उदारता यहां आम जनों के व्यवहार में दिखता है.



          सर्वशक्तिमान को स्मरण करते हुए मैं अपना डेरा भाडे के मकान में  ले लिया जहां से बैंक नजदीक ही था. पडोस के मकान से एक स्नेह संपर्क सा जल्द ही हो गया और उनका ये हिदायत की किसी अनजान को मकान के अंदर प्रवेश से परहेज किजीएगा अपनी जिंदगी अपनी सुरक्षा.


                   एक दिन बैंक के कामों में मैं व्यस्त सा था तभी लिली हडबडाते हुए फोन की और बोल उठी नही आप किसी भी सुरत में यथाशिघ्र घर आईए . मैंने भी अविलंब आवश्यक औपचारिकताओं को पुरा करते हुए तुरंत घर पहुचा . घर में किसी अज्ञात महिला के साथ मेरी पत्नी बैठी थी और बडी असमंजस में थी.


          वो महिला बोल रही थी -- मैं रास्ता भटक गई हूँ.  ये भुलने की मुझे बहुत बडी बिमारी है और चौबीस से छत्तीस घंटे में मेरी याददाश्त कभी भी वापस आ जाती है. मैं मानवता के नाम पर थोडा मददस्वरुप आपके यहां शरण चाहती हूँ.

 
     विचित्र परिस्थिति थी , मैं उनके साथ ही,सोफे पर आमने सामने बैठ गया और लिली को ईशारे में कुछ चाय पानी के लिए बोला. लिली ने सुंदर सुंदर राजभोग और एक एक गलास पानी एक ट्रे में लायी और विनम्रता से उस अनजानी औरत को पहले और फिर मुझे लेने को अनुरोध किया. भगवान भी इंसान के लिए बेवक्त परीक्षा की घंटी बजा देते हैं . एक साधारण इंसान को भगवान के लीला की क्या हो समझ --?


                 मैंने उनसे ढेर सारी तहकीकात किये . लेकिन कहीं से भी संशय के कुछ भी  बोल समझ न आया. वो कहती रही बेटा कुछ समय पश्चात ही मैं स्वयं यहां से चली जाऊंगी. मुझ पर कुछ भी संदेह न करो. तेरे जैसे गृह गृहस्थी से  भरा संसार रूपी कटोरा छोड मैं फकीर जैसे बन गयी हूँ,  बेफिक्र रहो बच्चे
यह कहकर वह लीली के साथ आपसी सौहद्रता बढाते चली गयी. और चेहरे के भाव भंगिमा भी  कुछ ऐसी अभिव्यक्ति सी दे रही थी , कि समान्य इंसान क्या कोई भी उसे डपट कर बाहर जाने को कह पाने की स्थिति में न आ पाये.


               मैंने गेस्ट रूम से अंदर आकर बेड रुम में लीली को अवाज दिया -- लीली इधर आओ.  लिली के सामने ही मैंने पुलिस को फोन लगाकर सारी सुचनाऐं दी. और फिर  उस अनजान के पास बैठ गया ताकि पुलिस के आने से पहले वह भाग न जाय. बातों ही बातों में कुछ मुझे भी आत्मीयता सी उनसे होने लगी. लेकिन मैने खुद को चौकन्ना किया. अपने दयाभाव वाले अंदर की स्थिति  को बाहर लब पर आने न दिया.


   तभी पुलिस भी वहां पहुंच चुंकि थी .ढेर सारी छानबीन की गयी . जब याददाश्त छोड जाती है दिमाग को तो फिर अकेले क्यों निकलना.--? घर वाले की कैसी लापरवाही.-? अब वो महिला भी डरे सकपके सी थी . वो इतना ही कह रही थी , मुझ पर कोई संदेह न किया जाय , मैं चोरीन या षडयंत्रकारनी न हूँ .मैं कुछ समय पश्चात ही याददाश्त वापस आते ही स्वतः चली जाऊंगी. पुलिस की कडक अवाज और अंदाज से शायद वो महिला रोने ही वाली थी , थरथराहट तो स्पष्ट सी दिख रही थी. लीली ने मेरे ओर देखते हुए,  पुलिस से कुछ बातें कहनी चाही. पुलिस हेड को मैंने अलग जगह पर आने को अनुरोध किया. पुलिस  के अलग होते ही लीली बोल पडी सर क्या ये कुछ देर की जो भी सीमा हो उसको देखा जा सकता है-? , क्या जबरदस्ती इसे भगाने के अलावा कोई और उपाय है --? बाद में अनुनय विनय के पश्चात कुछ जरूरी सुरक्षा के मानकों को अपनाते हुए , कुछ निर्देश जारी करते हुए उसे यहीं मेरे घर पर रहने दिया गया.


                   वो महिला लीली से  घुलते जा रही थी ,सभी घरेलू कामों को बिना किसी निर्देश के निपटारा  कर दे रही थी. रात्री भोजन में उन्होने ही लिली से इजाजत लेकर केला कोफ्ता , मेरे पसंद के वयंजनों में से एक बनायी. वो स्वाद अवर्णनीय थी,. चटपट खट्टी मिठी स्वादों युक्त बेहतरीन स्वाद और नरम नरम गरम गरम रोटी , शायद ऐसी सुस्वादु व्यंजन मैंने पहले कभी न चखा हो -- बिल्कुल पुरे ईमानदारी से बोल रहा हूँ. मैंने भोजनोपरांत अज्ञात को गेस्ट रुम में ही सोने का इंतजाम कर दिया कुछ जरूरी निर्देशों के साथ . और लीली से इस पर पैनी नजर रखने को बोलते हुए कब सो गया ,मुझे पता नहीं चला. सबेरे छह बजे निंद खुलने के साथ ही मैने गेस्ट रूम की ओर देखना चाहा. वो वहाँ नहीं थी. मैं हडबडा सा गया , बाथरूम में भी वो नहीं थी .मेरी खोजी निगाहें ढेर सारे बुरे ख्यालों के साथ उसे ढुंढने लगी .


    मैंने अपने सभी जगहों को देखा जहां नकद रूपये और जेवर जेवरात जैसे मंहगे समान रखे जाते थे -- वो सभी सुरक्षित थे. तभी ऐसा लगा जैसे कोई गेस्ट रूम से अंदर प्रवेश कर रहा हो. मैंने झट से देखा वो वही महिला थी ,हाथ में पत्तल के प्लेट बनाये और उसमें कुछ विविध प्रकार के पुष्प थे , जो देखकर ऐसी लग रही हो मानिए पुजन करने की योजना हो. वो बोल उठी बेटा मुझे याद आ गयी अपनी जगह, मैं अब चली जाऊंगी. वो फुल के पत्तल वाले प्लेट को पुजा रुम के आगे श्रद्धा से रखी.सारे घर में साफ सफाई , पोछा लगाने के बाद बाल्टि से पुजा रूम और तुलसी मंडप को बडे श्रद्धा से धो दी.

 
         मैं उनके हरेक काम पर पैनी निगाह बनाये हुए था. तभी वो अंदर लीली को जगाने गयी और बोल उठी उठो बहु मैं अब जा रही हूँ मुझे अपनी जगह याद आ गयी है.


     झटपट वो उठी और पुजा रुम और अन्य सभी जगह को देखकर खुशी के साथ बोल पडी इतनी मेहनत की क्या आवश्यकता थी अम्मा. वो बोल पडी आप पुजा कर लेना बहु मैं अब चली और वो निकल पडी.


         मुझसे रहा न गया मैं बोल पडा, मैं आपको छोड दुंगा मेरे गाडी में बैंठें आप. वो असमंजस भरे स्वभाव से बैठ गयी. मैं उनके बताये रास्ते पर गाडी चलाते रहा .तीन नंबर वाली गली के समाप्ति के  मोड पर संकिर्ण गली के पास वो रूकने को बोली. रूकते ही झटके के साथ वो उतर कर बगैर कोई बात किये वो चल पडी. मैं बीच रास्ते पर कार खडी न कर सकता था. सो पार्किंग के जगह तलाशते हुए गाडी लगाने में मुझे पांच से सात मिनट लग गये थे. मैं तुरंत ही उस रास्ते पर तीव्र गति से जा रहा था , जिस ओर वो महिला  गईं थी . मुझे वह दिखाई न दे रही थी. लेकिन मैं बढते गया और बढते गया .कुछ दुरी पर ही एक  टुटे से दरवाजे के अंदर महिलाओं की मंडली नजर आ रही थी . मैं अपने आप को छिपाकर दरवाजे के अंदर झांकने का प्रयास किया. समझते देर न लगी यह एक वृद्धाश्रम है , जहां मेरी आंखे उसे देख रही है. वो  हंसते हंसते बोल रही है -- मैंने बहुत बडी गलती की है कल , झुठ बोल के बहुत बडा पाप किया है मैंने. मैं एक अनजान के घर घुस गयी , बोल गयी कि मेरी याददाश्त खो गई है मुझे कुछ समय में याददाश्त वापस आ जायेगी और मैने वहाँ शरण ले लिया काफी मशक्कत के बाद. मै बेटा पोतहु और घर वाली जिंदगी जी करके आई हूँ,  ईश्वर का धन्यवाद मेरे पाप अब वो ही माफ करना .मुझसे रहा न गया. मैं अंदर प्रवेश करके उनके हाथ पकड लिये और बोल उठा किसने कहा आपने झुठ बोला है , पाप क्या होता है --?- मैं ही हूँ आपका बेटा आज से आप मेरे साथ रहेंगी . इस बेनामी रिश्ता को क्या कहेंगे आप --? कोई बच्चे को तो गोद लेता ही है ,क्या कोई मां की भीआंचल ला पाता है --?
©®पवन मिश्रा (दुमका-झारखंड)
30दिसंबर 2023
       

(3)*गलत कौन--? *

                   गलत कौन---? 

ये जो बाप का प्यार होता है न बेटा
वो हर प्यार का बाप होता है ------। 
                       ये कारपोरेट की नौकरी भी न आदमी को अति उपयोगितावादी बनाने मे कोई कोर कसर नही छोडता है। अमुमन ये उपयोगितावादी सोच सरल और दयालु ह्रदयवान आदमी के लिए कयी एक परिस्थितियों मे बडी असहज परिदृश्य को लाती है। 
         छैल छबीली महानगरों मे पली बढ़ी लडकी से अगर इलु इलु वैसे लडके को हो जाय जो अभी अभी कारपोरेट की नौकरी मे महानगर मे पदस्थापित हुए हों तो तत्क्षण जिंदगी  बडी हसीन और रंगीन लगती है और शादी उपरांत जिंदगी मे यही हसीन और रंगीन तथ्य पुरे जिंदगी को डिस्को कब बना जाती है पता ही नहीं चलता --! 
     मैं (प्रेम) और मेरी पत्नी (स्वघोषित) विश्वसुंदरी -- अन्नो ,लंबे समय बाद अपने पैतृक घर मनेर को आ रहा हूँ --माँ पिता के बगैर यद्यपि अब वो घर --घर ही कहाँ रहा --?, लेकिन जन्मभूमि की याद भला कौन है--!, जिसने मन से निकाल पाया --? अन्नो काफी उत्सुक थी क्योंकि वो पहली बार मनेर आ रही थी -- बट मेरी मनोदशा-- मानो माँ और पापा का चेहरा ही मानसिक पटल पर छाये हुए  था--और चुपचाप मैं उन्हें अपनी सोच में देख रहा था --! 
                    मैं घर घुसते ही रज्जो दादु के पैर छुये और उनको कहा -- दादु गाडी मे कुछ समान हैं उसे अंदर लेते आईए--! 
            प्रेमु तु कैसा है ---! कहकर रज्जो गाडी से समान निकालने लगा,  एक बडा सा भारी भरकम लगेज  को देखकर रज्जो बोल पडा प्रेमू ये वाला समान तो काफी भारी है इधर तुम पकडो उधर मैं पकडता हूँ -- और ले चलता हूँ अकेले मुझसे नहीं हो पायेगा --! 
     हाँ दादु चलिए कहकर आपसी सहयोग से उन दोनों ने सारे समान उतार घर के अंदर किये ---। 
      तभी अन्नो बोल पडी -- प्रेम तु इधर आओ --! जल्दी से आओ --! अन्नो (प्रेम)  मुझको हाथ पकडकर एक कमरे मे ले आयी -- और बली ---
    प्रेम  तुम्हारा ये दादु नौकर है न ---!   मैं बोला --हां। 
तो फिर क्या ये दादु दादु लगा रखा है। उसका पैर क्यों छुआ तुमने--!  मैं बोल पडा -- तो क्या हुआ तुझे नहीं पसंद तु नही छुना --बात खतम।  
     तभी अन्नो बोल उठी -- क्या व्यवस्था बना रखी है तुमने प्रेम
-- इस बुढ्ढे से क्या काम होगा  अब ---! अब इस उम्र में इनसे अपना शरीर संभलता नहीं ये क्या करता है यहाँ रहकर ---! 
  मेरा मानो इसकी अभी छुट्टी कर देते हैं --! 
ओहहहहहह हो रूक भी जाओ न अन्नो --! इतनी जल्दबाजी क्या है --! 
       नही होगी तुझे कोई जल्दबाजी--! हम नौकर को पैसा देते हैं  और बदले मे उनसे काम लेते हैं ।  पैसा कोई खैरात मे नही आता है प्रेम--! यहाँ हम रिश्तेदारी दादु और काकु बनाने के लिए नौकर के नामपर इसे नही रख सकते चलो उस बुढ्ढे को बुलाओ और छुट्टी करो उनकी ---! 
         बगैर कुछ सोचे अन्नो ने रज्जो को अवाज दी --- ऐ सुनिए आप -----! 
तभी रज्जो अपने हलके कदमों से कमरे मे प्रवेश किया और बोला जी बिटिया बोलो ---
     ‌‌ अन्नो का तेवर सातवें आसमान पर था --
          ऐ क्या ये कभी बिटिया --! कभी बहु --! ये क्या लगा रखा है, मैं तेरा बिटिया या बहु नही हूँ--- मुझे मैम  साहिब पुकारा कर---! तु नौकर है न ---! 
   बात बढता देखकर मै (प्रेम) ने अन्नो का हाथ कसकर दबाया और उसे चुप रहने को कहा ---! 
  मैने कहा -- दादु आप अपने गांव कितने दिन से नहीं गये हैं, अभी कोई संपर्क है वहाँ आपके --?आप जाईये न थोडा घुम वुम लिजिएगा अपना घर --! 
   कैसे जाऊंगा प्रेमु यहाँ इतने काम बिखरे पडे हैं -- तु लोग इतने लंबे समय के बाद यहां आ पाया है -- यहाँ का काम छोडकर कहाँ जाऊं --! नहीं नही बोलते रज्जो गंभीर हो गया --! 
     तभी अन्नो बोल पडी और हां अपना हिसाब विसाब कर लिजिए सब तुरंत नकद दे देती हूँ -- आप से भार नहीं उठाया जाता, आप की उम्र अब काम करने की नही --आप एकाध घंटे मे निकल लिजिए---। 
      मानो रज्जो दादु के शरीर पर हरेक रोंगटे खडे होकर यह कह रहा हो सत्य यही है ---!   रज्जो कम बोलने वाला आज अपने मन मष्तिष्क पर बेकाबु हो चुका था---! 
और बोलने लगा
   बहुत धन्यवाद बहु --ननननननननननननन भेरी शारी
मालकिन आपने होश दिलाया कि मैं नौकर हूँ इस घर में मेरी हैसियत को आपने याद दिलारा आपका शुक्रिया---! 
 आप मेरा हिसाब करेंगे---! कर पायेंगे मेरा हिसाब आप ----! 
तो सुनिए ---
   बीसो़ं साल -पहले , मैं बाबुजी (आपके श्वसुर)  के कहने पर अपना गांव घर सबकुछ छोडकर आ गया इस घर में और इसी को अपना घर मान लिया --!  बाबुजी ने आश्वस्त किया था  रज्जो अब तुझे यहीं रहना है --ये घर तेरा है -- मृत्योपरांत तु कहीं   नहीं  जायेगा। मालकिन आपके शसुर  अस्वस्थ थे मैं हर रोज प्रेम को इसी कंधे पर बैठा कर दुर दुर तक घुमाने का काम किया और प्रेम को ही अपना बच्चा माना --! और यह कंधा अब सही में नाकाम हो गया मालकिन -- अब ये किस काम का--! 
और प्रेमु नहहहह न --- भेरी शारी--- मालिक मेरे मालिक
सुनिए --
""ये जो बाप का प्यार होता है न बेटा
वो प्यार हर प्यार का बाप होता है "---खैर
    और सुनना चाहेंगे मालकिन --  ये जो मैं भार नहीं उठा पाता हूँ न यह मेरी उम्र का असर नही है--
मैंने अपना किडनी बाबुजी यानी तेरे शसुर  को दिया था और तब से मुझसे भार नही उठाया जाता है -- मालकिन
मालकिन ------अअअआआआआननन हहह
  कहते कहते रज्जो पसीने से तरबतर हो चुका था जमीन पर लुढक कर वो ढेर हो चुका --और रज्जो जा चुका था अपने गंतव्य को --- अब रज्जो फिर नही आ पायेगा कभी 
©पवन मिश्रा --दुमका झारखंड
 


   

       
   
           
      

(7)कहानी --- रोशनी

                     रोशनी

*कहानी हर घर की-- हर समाज कभी*
*******************************

   मास्टर साहब की बेटी रोशनी पढनें में अव्वल, अपनी मास्टर की डिग्री  पुरी कर भविष्य, के रंगीन संपने देखते हुए मन ही मन अपने को सबके सामने     प्रशंसनीय और आदर्श दिखाना संकल्प कर ली थी ।

      समयोपरातं खूब प्रतिष्ठित चौधरी खानदान की पोतहू बन गयी ।

कहा जाता है --

विवाह पूर्व   दुल्हा दुल्हन सहित दोनों के बपौती घर- खानदान की सिर्फ प्रशंसा  ही समाज में फैलती है ,
और बरतुहार (मिङियेटर) 
अगर ज्यादा धुर्त टाइप का चलाक हुआ तो दोनों ही खानदान टाटा बिड़ला जैसे ही  चर्चा में होते हैं फर्क सिर्फ , इनका प्रतिष्ठा अन्तराष्ट्रीय होता है --
और चर्चित दोनों परिवारों के तथाकथित महिमामंडन 
सिर्फ हम और आप तक या दलाल के संपर्क परिधि तक----

   लेकिन असली खानदानी परिचय तो शादी के उपरान्त दो तीन साल में ही  पता चलन लगता है----.

जो स्वतः बिना किसी  प्रेरक के जग जाहिर, चर्चा ए आम होता है -----

      चौधराइन बने रोशनी के अभी दो सप्ताह ही बिते थे , कि घर के नाना किस्म की जिम्मेदारी उनके हिस्से स्वतः आते गया और
हर रोज नयी नयी जिम्मेदारी स्वतः ---!

   सुबह के पाँच बजे उठकर ---

जेठ के दोनों बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना----
 स्कूल भेजना ---

   फिर जेठ के लिए नाश्ता और टिफीन का इंतजाम करना ---

   सासु अम्मा के लिए गरम पानी -- 
कङक वाली चाय तथा चिकित्सकीय सलाहनुसार कुछ हल्के अलग प्रकार के नाश्ते का इंतजाम होना वो भी अविलम्ब-----

     चौधरी साहब की जमींदारी ठाठ--बाट का क्या कहना --'

उपरोक्त सभी कामों के निपटारे से पूर्व ही चौधरी साहब की जमघट और उनके व्यक्तित्व अनुकूल बंगले की शान शौकत का निर्वाह कराना भी तो अब रोशनी के ही जिम्मे थी --- घर की नयी पोतहू जो थी -- और उसमें भी उसे सबका का प्रशंसा पाना था और अपना आदर्श रूप दिखाना था-----

   ओह क्या सुन्दर सोच और संकल्प है --!

    चाय पान और हल्का लेकिन सुन्दर और स्वादिष्ट  नाश्ता का निरंतर बंगले पर बखुबी पहुँचते रहना ही नयी बहु के योग्यता ,सुंदरता और सद्व्यवहार का प्रमाण पत्र सा बन गया था -----
सो यह हर रोज निरंतर चलता रहा----!

   संपूर्ण परिवार अपने अपने कार्यों में व्यस्त रहता था और समय की पाबंदी स्कुल कालेज और आफिस सभी जगह थी इसलिए जरा सी भी विलम्ब का मतलब था ----
          भविष्य के प्रति लापरवाही-,
कार्य के प्रति लापरवाही  और ,और  पोतहु के खानदान पर बडा सा प्रश्न चिन्ह ----!

और बहु की कार्यक्षमता----!

   ग्यारह बजे तक चौधरी साहब (ससुर) का पुरे साज बाज लाव लस्कर के साथ   निकलना तय रहता था, चौक चौराहे के लिए सो उनका पुरा इंतजामात---
 सुन्दर सुस्वादु भोजन,
कङक आयरण युक्त पहनावा ,इत्र  आदि सब का व्यवस्था समय पूर्व होना ही चाहिए----
भला घर और उस एरिया के नामी गिरामी चेहरा तथा भावी मुखिया भी यही तो हैं----

           ससुर के घर से निकलने के ठीक बाद सासु अम्मा-----
भी तो --
    फ्रयाड जिरा  राइस, मिक्सङ फ्रायङ दाल,
करैला का भरौवा, पोश्ते  की चटनी, पनीर पकौङा , जैसे विविध व्यंजन भरे भोजन की थाल होनी ही चाहिए आखिर चौधरी खानदान की इज्जत तो उस थाल में ही अब चिपक सी गयी थी----!

     सासु अम्मा के भोजन उपरान्त बच्चे का विधालय से घर पहुँचना---
पुनः उसका नाश्ता -भोजन ,

सासु अम्मा की सगी बहन का  हर रोज आना , अपने बहन से मिलना तथा हर रोज नये अंदाज में गर्म जोशी से आतिथ्य स्वागत का होना ---

आखिर चौधरी खानदान को इज्जत और शान शौकत भी तो यही सब से बनाना है -----!

 अब दिन भर का थके हारे आफिस की परेशानी लिये जेठ का घर आना ---हुआ-
  भूखे प्यासे को चाय नाश्ता पानी आदि -- देना तो नयी नवेली पोतहू के हि जिम्मे था.
 जेठानी तो आखिर जेठानी है ,
बड़े घर की बेटी है
घर की बङी पोतहू है--

 उनसे चूल्हा और रसोई का काम तो नहीं हो पाता है---!

देवर जी का कालेज से आना तथा भाभी से खाना की माँग---

  भाभी आप बहुत अच्छी हैं,
बहुत सुन्दर खाना ---
लेकिन कुछ ना कुछ काम आप भी तो किया कीजिए---!
परिवार के सभी सदस्य कुछ ना कुछ जरूर कर रहे हैं---

रोशनी ने सिर्फ ' हं' में जबाब दिया--

       ओह हो शाम के तीन बजे तक सीर्फ---
बिना किसी काम के मेरा समय तो ----!

     तभी जमींदारी ठाठ बाट को कन्धे पर सम्भालते हुए दुल्हे राजा 
 प्रकाश चौधरी का भी आगमन होता है----

 रोशनी चलो बहुत भूख लगी है थोङा गरमा गरम  लेकिन जल्द ---
दिन भर परेशान हूँ ,समय खराब होते जा रहा है जब से साक्षर भारत अभियान चला तभी से कोई किसी को नही गुदानता है---
हर आदमी पढ लिख लिया --
कोई कहने में अब रहता नहीं है तथा -----

    रोशनी तुम भी खाना ले लो अपना---

   तुरंत ---- दो मिनट रूकिये-- --

खाना का पहला कौर ही तो मुँह में ङाला था--

    कि पतिदेव भी बोल पङे ---
रोशनी तुम भी कुछ तो किया करो---

 कूछ ना कुछ तुझे करना चाहिए----

    रोशनी फफक कर रो पङी---

  बस इतना ही बोल पायी हाँ मुझे भी कुछ करना चाहिए----

  एक मास्टर की बेटी को बाप की शिक्षा-दीक्षा से ज्यादा पिताजी की इज्जत और अपने आदर्शतम रूप के भावना का ज्यादा ख्याल था ---!

    सो घर की सबसे ज्यादा योग्यता धारी रोशनी आज ङाइनिगं हाल में सुन्दर दुधिया प्रकाश से चकाचौंध-जगमग वातावरण  में
 घनघोर अँधेरा महसूस कर रही थी,
और  --
  खोज रही थी रोशनी  और खोज रही थी जबाब अपने ह्रदय तल से---
मुझे---

   "कुछ करना चाहिए "

©®पवन मिश्रा
   (दुमका)

(17) कहानी -- बीस साल बाद

द कहानी
                *बीस साल बाद* 
(इस कहानी के सभी पात्र ,घटनाक्रम और कथासार सौ फीसदी काल्पनिक हैं -- कहानी लेखन का एक मात्र मकसद मनोरंजन है तथा किसी के भी भावना को ठेस पहुंचाना इसका उधेश्य नहीं है . किसी भी तथ्य का कहीं से भी मिला जुला होना महज एक संयोग हो सकता है -- पवन मिश्रा)

        ' मानवी ' कालेज में सबसे चर्चित नाम. बद अच्छा बदनाम बुरा . किसी भी प्रकार के कोई हुडदंग हो उसमें मानवी एक चर्चित चेहरा का होना अब स्वभाविक था. प्राईमरी कक्षा से ही साथ साथ पढती मेरी अतरंगता कुछ अलग सी थी मानवी के साथ. लेकिन अब मुझे भी हर वक्त सावधान किया जाने लगा , शिक्षक , अन्य दोस्त , अभिभावक रह रहकर एक ही बात दोहराते जा रहे थे नीलु तु अच्छी बच्ची है  थोडा सावधान रह , गलत संगत से बच.
             अब ये गलत संगत क्या थी मुझे नही पता लेकिन मैं यह समझ पा रही थी, हर किसी का ईशारा बगैर नाम लिये मुझे मानवी से मिलने जुलने को लेकर थी.
                 फक्कड अंदाज ,बेबाक लाईफ स्टायल , बेफिक्र स्टायल , मदमस्त चाल , ये आदत इन्हें औरों से अलग करती थी. आम तौर पर इंटर की छात्रा नारियोचित गुणों से लबरेज होकर पुरुष मंडली से अपना ठौर ठिकाना अलग कर छात्राओं के बीच ही अपने को  सहज महसूस करती है ,लेकिन मानवी के अंदाज ही कूछ और थे  परिवेश में मानवी को लेकर काना फुशी अब आम बात हो चुका थी. 
बडे बुजुर्ग ,शिक्षक ,दोस्त सभी उनसे अब कन्नी काटने लगे थे. मैं स्वयं ने कई बार उसे अगाह करने का प्रयास भी किया लेकिन उसे मेरी बात की कोई परवाह न हुई. बदले में उसका जबाब मिला चल निलु जमाने में कौन क्या कह रहा है तु सुनते रह मुझे इसकी कोई परवाह नही, तु आ जा मेरे साथ तुझे भी यौवन रस का मजा चखा दुंगी. मानवी के इस बात को सुनकर ही मैं अंदर से डर गयी थी और बडी सलीके से मैं बचा निकाल पायी अपने को. कुछ ही दिनों बाद कालेज में पुलिस  पुछताछ के लिए आयी और पता चला कि मानवी किसी अज्ञात के साथ लापता हो गई है. और घरवाले भी उनके भाग जाने को लेकर  परेशान हैं. काफी खोजबीन के बाद भी कुछ पता न चल पायी.
        समयतंराल के बाद मैं संदीप से ब्याही गई. मेरे माता पिता के सभी अरमान पुरे हो गये. लडका सुशील ,सज्जन ,मृदुभाषी, और प्रचुर खानदानी धन दौलत वाला तथा स्वयं का बडा कारोबार से युक्त था. समाज,परिवार और परिवेश के नजर में संदीप आज सुयोग्य ही नही सर्वश्रेष्ठ दमाद की हैसियत से सबके प्रशंसा का पात्र था. लेकिन एक नवविवाहिता पत्नी को दुल्हा चाहिए होता है बिंदास स्टायल वाला , सभी गमों से दुर , कार्य चिंताओं से मुक्त , कम से कम शादी के शुरूआती दिनों में तो ये मनोदशा होने ही चाहिए. लेकिन संदीप हर वक्त अपने काम धंधों के सिलसिले में कुछ खोया खोया सा रहता था.  
              घर की जरुरत के सभी समान तो संदीप के स्टाफ ही पहुंचा जाते थे. लेकिन कुछ चीजें आदमी को स्वयं से खरीदने चाहिए, .इसी सोच के साथ मैं सिटी वाक माल  के लिए शाम के तीन बजे अकेले ही निकल पडी. लेडिज गारमेंट्स के लिए तीसरे तल पर मशहुर क्लोविया शोरूम के तरफ मेरे कदम बढते जा रहे थे. तभी एक अत्याधुनिक आकर्षण युक्त काफी हाऊस ने मुझे अपने ओर खींच लिया. ठंडी के दिनों में काफी की चुस्की ओह गजब के आनंद वाला पल था वो मेरे लिए.
              काफी की पहली चुस्की ओंठ से लगायी ही थी कि मैंने अत्यल्प संशय के साथ 
----- तु मानवी है न मुझे पहचानी मैं नीलु तेरा क्लासमेट, काफी पीते हुए सामने वाली जींस जैकेट मे खडी एक महिला को बोली.
अरे नीलु यार तु कैसी है ,तु तो एकदम न बदली . ये बीस साल बाद बहुत कुछ बदल गया पर तु और तेरा अंदाज आज भी वही है मानवी. मैंने एक पुराने दोस्त के हैसियत से मानवी को कही. 
       अच्छा ये बता मानवी तु तो बीस सालों से लापता हो गयी थी कहां थी ,कैसे हो --?
नीलु बोली -- मैं क्या करती ,--?, मैं इश्क में पागल सी हो गई थी  , और वो अपने माता,पिता को मेरे लिए राजी कर न सके. क्या अंतर पड़ता है , -? हम दोनों एक दुसरे के थे और हैं -- इसका नाम तुम लिव इन रिलेशनशिप कहो या संकल्प शादि कहो . मैं आजीवन उनके साथ हूं और वो आजीवन मेरे साथ. मेरे हर सुख दुख का ख्याल वो रखता है.  हां कार्याभार के कारण महिने का दो चार दिन ही वो मेरे साथ रह पाता है.मैंने उसका नाम ही प्रेम रख दिया . और तु बता नीलु चपडगंजु क्या हो रहा है --?
         अरे यार क्या जो बताऊं--! तेरा प्रेम अद्भुत है. मैं खुश हूँ अपने पतिदेव के साथ. मेरा बेटा दुन  पब्लिक स्कुल में पढ रहा है . दुनिया की सभी सुख सुविधाऐं नौकर चाकर गाडी बंगला यह सब उनके लिए आम सी बात है , रोहिणी सेक्टर थ्री में मेरा बंगलो है . अभी कुछ दिन में ही मेरे मां पिता वापस गांव जाने वाले हैं तब तु मेरे पास एक दिन भी आना जरुर . मैं तुझे अपने पतिदेव से मिलाऊंगा -- वो देवता समान हैं मेरे लिए. महिने का बीस पचीस दिन वो मेरे साथ रहते है , बिजनेस के सिलसिले में दोचार दिन ही मुझसे काफी कष्ट के साथ अलग होते हैं.
     अच्छा नीलु कल तु मेरे घर जरूर अईयो . भोगल के सेक्टर पांच  में मेरा कोठी है - 'प्रेम बाग' तु आयेगी न नीलु नहीं तो तेरे पति देवता को प्रेम बाग में मैं कैद कर लुंगी -- प्रोमीश कर मानवी के इन अंदाज, दोस्ताना जिद और अधिकार पर मैं ना बोल  न पायीं और बोल गयी प्रोमिश रहा मानवी मैं कल ही आ रही हूँ , भोगल  सेक्टर फाईव में पहुंचती हूँ. 
    
          अगले दिन वादे के मुताबिक मैं भोगल सेक्टर फाईव पर पहुंच चुकी थी. दरबान ने मुझे बडे ही सलीके से लान के गलियारे होते हुए गेस्ट रूम तक ले गया और बैठने का अनुरोध किया. देखते ही मैं दंग सा रह गई -- घर, लान ,बागवानी अतिथि कक्ष शायद इस उत्कृष्टता के स्तर वाले कोठी में मेरे जिंदगी का पहला प्रवेश था.मैं अपने आप को सहज करने का प्रयास कर ही रही थी तभी मानवी दिल खोलकर हंसते मेरे उपर ही धडाम् से गिर गयी और मुझे बांहों मे लिपट ली -- ये आत्मीयता जताने का उनका अपना अंदाज था. बातों और ठहाकों का सिलसिला चलते रहा . भुल गयी थी देश दुनिया और उन्मुक्त आबो, हवा कालेज और स्कुल वाली फीलींग में हमलोग फिर वापस हो लिये थे.
     तभी मानवी बोल उठी चल तु वादा निभा गयी ,और तेरा पति देवता बच गया मुझसे वरना तेरी तो ऐसी की तैसी मैं कर देती नीलु.
चलो नीलु अंदर को चलते हैं कहकर वह मुझे घर के हरेक हिस्से को दिखाना चाह रही थी. मैं गेस्ट रूम से चलकर ड्राइंग रूम में प्रवेश कर चुकी थी .
            अंदर के फरनीचर, फोटो फ्रेम सब के सब बहुत ही खुबसूरत सा दिख रहे थे. मैं अवाक् सा हो गयी , मानो धरती माता मेरे पैरों के तलवे के नीचे गायब सा हो गयी. चेतना शुन्य हो गई ,  दिमाग शांत सा होते चला गया कहीं शुन्य में --- मैं धडाम् से चारो खाने चीत गिर गयी थी . मेनका जिस प्रेम के साथ चिपकी हुई  फोटो ड्राइंग रूम के दीवार पर लगाई थी वह प्रेम कोई और नहीं  मेरा पति देवता  संदीप था.
   ©®पवन मिश्रा (दुमका-झारखंड)

(10) कहानी --'अनकही दास्तां

कहानी       
               *अनकही दास्तां*

  मालकिन बाहरे देहरी पर तोहर  बाबू खडा छतुन , तोहरा से मिलय  के दरकार छतिन  उनका , सेहे खातिर इजाजत मांगै छात -- कालु काका ने घर के पोतहू से विनम्र लहजे में 
इजाजत मांगा.  राधा ने हमेशा की तरह कही  नही और कभी नहीं , और इस जीवन में नहीं  जाकर बतला दें काका.
        आंगन में तुलसी माता को जल अर्पण करते सुर्यदेव की छटा राधा के चेहरे पर इस कदर चमक  रही थी मानिए सुर्यदेव सक्षात किसी सिंहासन के परी को दिव्यता देना चाह रहा हो और माता तुलसी सजीवता के साथ अपने हरे हरे छोटे छोटे पत्तीयों के साथ मुस्कान मारती जलपान ग्रहण कर रही हो . राधा सफेद साडी में अपनी मांग खो देने के बावजुद सक्षात सरस्वती की प्रतिमूर्ति सी लग रही थी और मानिए वह मन ही मन बोल रही हो, रे नियति और कोई भद्दा मजाक बचा हो मेरे किस्मत के नाम तो उडेल दे मेरे माथे. तभी कालु काका ने सकपकाते 
तुलसी मंडप से थोडी दुर खडा होकर राधा की ओर टकटकी लगाये था , कुछ कह पाने के लिए उचित क्षण के इंतजार में.
                इ कागज तोहरे बाबू देलकात , ऐकरा  रख लियौ . कालु काका ने एक कागज राधा की ओर बढाते हुए बोला. राधा  कागज लेते हुए अंदर घर मेंं प्रवेश की. पर्दा सटाकर उस कागज को खोलकर राधा देखने लगी.
कागज मे लिखा था--  राधा बेटा मां बाप बच्चे के अनगिनत गलती को माफ करते रहता है ,क्या बच्चे द्वारा मां बाप के एक गलती को माफ नहीं किया जा सकता --? मुझे एक बार माफ कर दो राधा.
      राधा पापा के भेजे वो पत्र को पढकर फफक कर रोने लगी थी. लेकिन यहां न कोई उनकी आंसु पोंछने वाला था न कोई चुप करके संत्वाना देने -वाला- और राधा रोते सिसकते खो गई अपने बिते उन दिनों में ------
          बारहवीं के कक्षा में पुरे राज्य में टाप की थी राधा , फिजीक्स कमेस्ट्री और मैथ में तो शत प्रतिशत नंबर आये थे और राष्ट्र स्तर के टाप रे़ंकर में उनका नाम चर्चा में था. बैचलर डिग्री इन बिजनेश ऐडमिनिसट्रेसन (बी बी ए) के लिए उनका चयन शहर के सर्वोत्तम संस्थान में हो पाया था जहां नमांकन ले पाना बहुत विद्वान छात्र और धनाढ्य अभिभावक का सिर्फ़ सपना रह जाता था. पढाई और प्रोजेक्ट तैयारी करने के सिलसिले में एक दिन गौतम राधा के घर आ गया था . बस चर्चे का बाजार तो गरम हुआ ही परिवार वाले आगबबुला हो गये. जल्दबाजी में त्वरित रुप से शादी की तैयरी आरंभ हो चुकी थी. एक बार भी राधा के मन को समझने का प्रयास किसी ने न किया, बस सबको एक ही भुत सा सवार हो गया था  मेरे घर की बेटी से मिलने कोई लडका कैसे आ सकता है --? यह नागवार गुजरा राधा के परिवार जनों को. सब का एक ही सोच था अब बहुत पढ लिख लिये तुम ,अब सारी पढाई यहीं और इसी समय बंद करो और अपने ससुराल बसाने की तैयारी कर.
       फिर ब्याहने के बाद राधा के विदाई में  वो सारे किताब ,कापी ,सर्टीफिकेट ,मैडल , और पुरष्कार के सभी प्रतिक  चिन्ह एक बडे से बक्से में बंद करके राधा के साथ ही ससुराल भेज दी गई. एक मेहनती विद्यार्थी के लिए उनके द्वारा अर्जित पुरष्कार और मेडल सदैव ही अनमोल होते हैं और आंखों के लिए सदैव प्रिय. 
       विधायक जी के बेटे की शान शौकत तो विधायक जी से भी बढ कर ही थे. आलोक हमेशा ही अपने धन दौलत और शोहरत के घमंड में चुर रहता था. एक बार राधा ने बडे ही साहस दिखाकर अपने सारे उपलब्धि आलोक को दिखाना चाहा और बक्सा खोलकर मैडल सर्टिफिकेट सब के चर्चे करने लगी. ये गोल्ड मैडल चेस इंटर स्टेट टुर्नामेंट में मैंने जीती है . मैंने राज्य में टाप किया था आई एस सी में , माननीय मुख्यमंत्री जी के हाथों यह पुरष्कार -- वगैरह वगैरह. और बोल पडी क्या मैं फिर से पढाई शुरू कर लूं.
       बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद-? आलोक बोल पडा तु अब पढने जायेगी कालेज.पढकर तु दो टके की नौकरी करेगी . अरे जो मेरे एक दिन की कमाई है वह तेरा पढाई और होने वाली तेरी नौकरी साल भर में भी नहीं कर पायेगी. बातें बिगडते बिगडते इस कदर बिगड गयी कि  राधा को लात घुंसो के साथ ढेर सारी अभद्र गाली पडने लगी. सभी कागजातों को आलोक ने जला दिया उसी समय. राधा ने इसी कालु काका के मदद से बडे मुश्किल से पानी छिटक छिटक कर कुछ अधजले से उन सभी अवशेषो़ को उसी बक्सा में फिर से सदैव के लिए बंद कर दिया और  और लगा लिया अपने  मन पर भी बडा सा ताला कि नहीं अब और ये उपलब्धि और मेरे कागजात अब किसी के सामने मैं चर्चा नहीं करूंगी.
        नियती ने भी राधा के किस्मत पर बार बार छल किया. आलोक एक संदेहास्पद ट्रक और कार के टक्कर में राधा के मांग को सुना कर परलोक पधार चुके थे.
     राधा के आंसु सुख चुके थे. बडे ही अटपटे ,उचटे मन से वो उस बक्सा को खोल कर उन अधजले और राख हुए अवशेष को हाथ में लेकर अपने पापा को मन ही मन बोल रही थी , पापा मैं तो आपको माफ कर दिया , क्या आप अपने को माफ कर पायेंगे --?
  क्या ये अधजले मेरे सभी प्रतिक और पुरष्कार फिर मेरे लिए सजीवता ला पायेंगे--?
  पापा पापा कहते हुए फिर से फफक कर वो रो पाने के मनोदशा में थी , लेकिन अब आंसु भी शायद रूठ गये हो राधा के आंखो से .

©®पवन मिश्रा (दुमका-झारखंड)
16-12-2023

(9) कहानी वो सुबह

                 कहानी 
               *वो सुबह*

              आर्थिक विपन्नता ने इस कदर  मुझे  घेर सा लिया है ,कि अब दिमाग संठ सा होता जा रहा है.न कोई अनाज बचा और न ही गाय बकरी दिख रही जिसे बेच कर थोडा राहत महसुस कर लिया जाय. चुनिया माय को भी पगार मिलने में आरो आठ दिन शेष हैं. हे भगवान कुछ तो सोचा होगा आपने मेरे लिए.
            ऐसे ही मन को कुंठित कर देने वाले ढेर सारे सोच के साथ मैं लंगडाते लंगडाते किसी तरह मनोज सर के घर का पता ठिकाना करते पहुंच चुका था. मैंने लगातार दो तीन बार काल बेल बजाया अंदर से शांत प्रकृति के साथ अवाज आ रही थी आप अंदर आ जायें दरवाजा खुला है. सकपकाते हल्के कदमों के साथ मैं अंदर प्रवेश कर ही रहा था कि पुरे शरीर  चादर ओढे ,कुर्सी पर बागवानी में बैठे एक शख्स ने मुझे आवाज देते सरल लहजे मेंं पुछा --किनसे मिलना है श्रीमान् आपको--!
        उ मनोज सर का घर येहे टो है हमरा मनोज सर से भेंट करना हैय--मैंने बोला.
       हां बोलिए मैं ही मनोज सर हूँ. 
सर हमरा नाम धनेशर हाजरा है और चुन्नी कुमारी हमरे बच्चीया है. जो पचमा कलास में पढती है .
      हां बोलिए धनेशर जी मनोज सर ने सम्मान के साथ बोला.
     उ मने कि मने बोलना चाह रहे थे चुन्नीयां को हम पढाना चाह रहे हैं, ओकरा आज फीस जमा नहीं हो पाया जही से उ बोल रही कि काल से सकुल  उ अब नाय जा पाऐगी . चुन्नीया माय के पगार यहा आठ दिना बाद पहला तारीख को मिल जायेगा तब फीस दे पाती चुन्नीया.
        धनेशर जी विद्यालय में फीस जमा करने का आज अंतिम दिन था, कोई बात नहीं मैं फीस जमा कर दुंगा आप चुन्नी को हर रोज विद्यालय भेजा किजिए . धनेशर जी आप क्या काम करते हैं -- मनोज सर ने पुछा.
   सर इ लंगडा आदमी के कौन काम पर रखेगा मालिक. मालिक आपका बहुते प्रणाम करता हूँ,  बच्चीया पर दया देते रहना सर.
  मनोज सर ने कहा -- धनेशर जी आप काम खोजीए , आपको काम की बहुत जरूरत है और काम खोजने से जरूर मिल जायेगा .
           यह सुनते हुए  मुझे अंदर आत्मा से आवाज आयी की मुझे मनोज सर का गोड जरूर लगना चाहिए.
       मैंने  पास जाकर झुककर मनोज सर का गोड छुकर आशीर्वाद लेना चाहा.
        मैं दंग रह गया चादर हटने के बाद  जो दिख रहा था मनोज सर के दोनों पैर जांघ से ही गायब थे 
     वो सुबह धनेशर हाजरा के लिए एक नई सुबह  थी. 
©®पवन मिश्रा 
05,दिसंबर 2023


  


          



Sunday, June 16, 2024

कविता -- भ्रम बनाये रखना

         भ्रम बनाये रखना

जब हो तेरा मन मुझसे दुर ,बहुत दुर जाने का
अचानक से ये इश्क तोड न जाना
अलग न हो जाना मुझसे ऐसे
जैसे विशालकाय पत्थर पहाडों से
टुटकर अचानक जमीन पर गिरा हो धडाम से

छोड जाना मुझे ऐसे कि पता न चल पाये मुझे
मेरे आस पास तेरे होने का
यह संशय तु बनाये रखना
दुरियां अगर बनाना चाहो
तो बनाना कुछ ऐसे
जैसे मताऐ़ं छल करती हैं
सोते हुए शिशुओं पर
अपनी खुशनूमा चुनर ओढा कर ----!

मुझे ऐसे मत त्यागना तुम
जैसे पेड छोड देते हैं सदैव के लिए
पतझड मे अपने पत्तों को
जैसे बरसात मे कोशी की विशाल जलराशि
बहा ले जाती है कोसों कोस बसे
बेखबर तटों  को, साथ-साथ बसे जीवन को .
ऐसे न जाना दुर कभी
जैसे कृष्ण चले गये मथुरा से बिन पलटे

जब हटाना ही हो मुझे दुर
तो थोडा कायदे से
धीरे धीरे शनै;शनै;
जैसे दुध जलते जलते खत्म कर देती है अपने स्वरूप
लेकिन एक झटके यकायेक न तोड लेना संबंध
जैसे पतंग अलग हो लेती है डोर से

मत छोड देना ऐसे
जैसे आकाश छोड देती है हमेशा के लिए
जल बुंद और ओले को
बिछडना कुछ ऐसे जैसे
पहाड त्यागती है निर्झरनी को
और निर्झरनी मगन रहती है
भ्रम मे उदगम से जुड़ी होने को
ये भ्रम बनाये रखना कि
तुम मेरे हो
तुम मेरे हो
--पवन मिश्रा (दुमका-झारखंड)
20फरवरी 2024








कविता

             प्यार करना नही है पाप

कभी कभी मैं हो जाता हूं  मायुस
हो जाता हूँ ओझल जगवालों से
लापता हो जाता हूँ अपने घर से
अपने किरदारों से भी हो जात हूँ गुम
लोग ढुंढते थक जाते हैं

     मैं रणछोड इश्क नहीं हूँ 
     मैदान को पीठ दिखा 
भागना  मुझे  पसंद नहीं 
बेवफ़ाई का ठप्पा 
मेरे मैयत पर लगाने वालो
पुछना जगवालों से 
पुछ लेना मेरे 
कहानी कविताओं से
और पुछ लेना मेरे चाहने वालों से
जब लंबे समय तक न मिल पाऊं
तो मेरा संदेश बतला जाना सबसे
 प्यार करना नही  है पाप
प्यार किया तो होना होगा
जगवालों से ओझल 
कहना होगा अपनी बातें
छुप छुपकर 
कभी कविताओं में
कभी कहानीयों मे
तो कभी मेरे वह मौन
जो कभी फिर लब न खोल पाये
नेपथ्य से हमारी आत्मा को सुनना
चिल्लाता आवाज देता मिलेगा  
प्यार करना नही  है पाप
जगवालों ऐसा तुम सुनना जरूर.
प्यार के पहरेदारों को मेरे जाने बाद
तु बतलाना जरूर
प्यार करना नहीं  है पाप
 ©®पवन मिश्रा 
16-12-2023








कविता अंतिम माया

कविता
              *अंतिम माया*
 मैं  लिख नहीं पाया कभी अपनी अंतिम कविता
अपनी भावनाओं के दे नही पाया कभी वो 
अंतिम शब्द 
तुझसे बातें खतम होने के बाद भी नहीं होती
मेरी इच्छाऐं संतृप्त
घंटों घंटों भर की बातों बाद भी रह जाती है
कुछ स्मृति शेष
ठीक वैसे जैसे पृथ्वी पर खिले अंतिम फुल भी
छोड जायेंगे पृथ्वी के कोख अपनी बीज

लिली जब जीवन की चल रही होगी आखिरी  गुंज 
तेरे कंधे पर मेरा मस्तक दुनिया छोड अलविदा 
कहता मिलेगा , जाने क्यों -?
शायद तब भी  बनी रह जायेगी ये आश ये
जीवन तेरे साथ की आखिरी जीवन न हो.
©®पवन मिश्रा (दुमका-झारखंड) 






कविता। -- भुख प्यास

     भुख --प्यास
भावनाऐं हैं कि थमती नहीं 
जोर  ओर से दिल को 
कुछ कुछ कह जा रहा हैं
कलम है कि रूके रूकती नही 
बहुत कुछ लिख जाने को 
मेरा मन कहता है
लेकिन वहां है ऐसा मन
जहां मेरी बातें सौ के सौ
 पहुंचती नही शायद 
साठ सत्तर प्रतिशत बातें 
तो युं हवा मे ही रह जाती है
जिसे न बोल पान मेरी अक्षमता
और वो न रिसिभ करे ये
उनकी होशियारी 
नहीं  नहीं अक्लमंद नहीं है वो
जरुर होगी कोई उनकी लाचारी
मेरी भुख है उनकी मोहब्बत
उनके दिल दिमाग धडकन
रग रग मे मेरी चाहत हो
वहां मैं सिर्फ़ मैं रहूं
पर समझता हूँ 
प्यार तो जीत हार की चीज नही
पर वो कहती है सर्वस्व समर्पण 
मेरे बस की बात नही 
युं अचानक से आना मिलना
और मेरे रग रग मे समा जाना
कोई टाईमपास वाली बात तो नही --!
हो सकता हो उधर के लिए मैं हूं टाईमपास 
मेरे लिए तो लिली बन चुकी लाइफटाईम प्यास
 ©®पवन मिश्रा (दुमका-झारखंड) 


झूठ सबसे बड़ा झूठ *****************

झूठ सबसे बड़ा झूठ
       *****************

छुट्टी समाप्ति पर
इस रविवार की शाम जैसे ही 
मैंने झुककर मम्मी-पापा के पैर छुए  
किये प्रणाम और निकल पड़े
अपने काम पर ---

रास्ते भर सताता रहा 
मेरे मानस पट पर चलता
अपशकुन की कालीमा

 इनके चेहरे कि झुर्रीयां
पिला पड़ रहा चेहरे कि चमक
 हाड़ मांस को छोडती झूलती त्वचा
शरीर की दूर्बलतम काया
थका थका सा चेहरे का संकुचन,
और इस  परिस्थिति का अवलोकन‌ 
------------

महसूस करा रहा है
इन्हें है सख्त रूप से 
हमारे सहारे कि आवश्यकता
अवशेष जिंदगी में हमारे साहस-
हौसलों और हर पल के साथ की जरूरत ------

इसी से मिलेगा हन्हें
तृप्ति  संतूष्टि सुकून और चैन का एहसास----

इन सब को जानते हुए भी 
नहीं कर पा रहा हूं
अपने फर्ज और कर्त्तव्य का पुरा निर्वाह---

 एक संतान‌ होने के दायित्व को
जानता हूं ,जानता हूं ,----
हमारी क्या होनी चाहिए भूमिका -- लेकिन ----

जिंदगी की कशमकश -- 
भागमभाग--व्यस्तता और अनेकों लाचारी,- व्यक्त कराता है
सिर्फ संत्वाना के दो बोल--

 और बोल पाता हूं
कि जल्द ही हमलोग फिर मिलते हैं
चिंता मत करना
पापा और अम्मा अपना ख्याल रखना,

और ये हमारी खातिर बोल जाते हैं विश्व का सबसे बड़ा झूठ
 हमें खुश रखनें 
रूआंशे
स्वर में कंपकंपाते ओंठो से 
मद्धिम आवाज से -----

हम लोग ठीक हैं
अपना ख्याल रखना।

----- जरुर 

 और फिर कह जाता हूं
जल्द ही  मिलते हैं पापा अम्मा
-------------------
©पवन मिश्रा
दुमका - झारखंड
    814101

(माई मदर ऐट सीक्सटी सीक्स बाय -- कमला दास के अंग्रजी कविता की प्रकृति पर आधारित हिंदी कविता।)

Saturday, June 15, 2024

(20) कहानी-- कालेज वाला प्यार

"कालेज वाला प्यार"

हाँ सहिये याद आया तैतरिया नाम था  उनकर --गोरी , छरहरी काया ,मीठी मुस्कान, मीठी आवाज मानिये मने की सरोसती सवार थी उनके माथे ,उनके कठं ---इससे बेसी जो याद है मुझे वह मैं यहाँ लिख नहीं सकता ,कभी मिलिये तो जरूर बताऊंगा-----हाँ  लेकिन स्टायल मारने में नम्बर एक और पढाय लिखाय में गोबर गणेश ऐतना तो खुलम्म  खुल्ला कहिये सकते हैं आप सब को---

            हाँ मने कि हम पगला जा रहे हैं तो तुम हमरे लिए कुछो नाय करेगा जी --भरदम रसगुल्ला और कलाकन्द  मुझे खिलाने बाद मेरे सीनियर  लालमुचून्द मुझसे बोल रहे थे --हाँ यह जगह था उ समय का 'कावेरी' शहर का सबसे बढियका मिठाय दुकान --! 

      बङी विनम्रता से जो कह पाये थे हम  उनसे त कहिये ना हमको क्या करना होगा भैइया----

    और रात आठ बजे हम लिख रहे थे लालमुचून्द भैया के नाम से प्यार इजहार वाला चिठ्ठी पत्री  तैतरिया के वासते--!

   हर दो तीन दिन बाद, मैं यह प्यार इजहार वाला चिठ्ठी पत्री लिखने लगा था और मुझे मिलने लगा था कभी आइसक्रीम तो कभी ङोसा ,समोसा और बढिया बढिया नाश्ता पानी ---,

   हेय मायरी तोह  लिख दो यार जो कहेगा तुझको देगा हम लेकिन झकास वाला चिट्ठी लिखो पढकर उछल जाये तोहर होय वाली भौजाई-----

   बस फिर क्या था बङ जतन से लिखने लगे उनकर ---हाय लीला कथा प्यार का 

  कोई गंभीरता से पढ ले तो जरूरे कहेगा लङका बङा तेज है बहुते जल्दी लाल पीला बत्ती लगलका गाङी पर घूमेगा इ छोहरा---, तैतरिया बङी किस्मत के तेज है--

राजदुत फटफटिया पर भाय बाप संग सवार तैतरिया का अइसे पिछा होता था उ लालमुचून्द भैइया द्वारा सायकल और कभी कभार बजाज फोर स्ट्राक फाटफिटया से मने कि क्या कहा जाय ठीक वैसे जैसे मिग सेभनटीन पुरनका लङाकु  विमान से भेद दिया अमेरिकी नयका लङाकू विमान -----को । ठीक तैतरिया के गाङी का धुल देखते मने ख्याली राजकुमार , मान लेता था जीत लिये जंग --कर लिया दुनिया मुट्ठी में ।

   सीन देखकर ऐसे ही लगता था जैसे तेज गति से सफेद चमचमाती दौड़ती कार पर शिवपहाङ चौक पर कुकुर भौकियाता है, हपकने के लिए उछल पङता है, लेकिन भरपुर असक्षम प्रयास करता था बेचारा ।

       आज रात सात बजे टीन बाजार चौक पर खङे खङे सोच ही रहा था , कि कास मै भी इस खिले गुलाब को उपहार कर दिया होता अपने जज्बात को , यह गुलाब अपने छाती में एक संकल्प कर रोप लिया होता जन्नत पाने को , अपनी मंजिल प्राप्ति को ,तो शायद आज दिन कुछ और होता , जिन्दगी ही गुलजार होता--!

   तभी भारी भरकम झोला लिये खुब्बे मोटी सी औरत एकदम सामने रूक कर कहती है---
      
आयं हो मतलब पहिचाने ---
   जी नही तो --प्रणाम (दोनों हाथ जोङकर) मैं कहता हूँ ।

      एक ठो बात पुछना था मने की उ चिट्ठीया सब आपही लिखते थे का , उ ल्छेदार भाषा त आज भी यादे है----- , ----!

      अरे हमहूं आपही के साथ जायेंगी--

लेकिन मेरे गाङी में तो पीछे अटकन नहीं है, कहीं फेंका गयीं तो--मैने कहा,

    
  अरे नाही ना गिरून्गी ,दोनों हाथे से कसकर पकङलून्गी --!

मैंने कहा अरे अगर चिन्कुवा की मम्मी देख लेगी त --अभी अपने तीन चार फाईल पर रिसर्च कर उ रोज पूछ ताछ कर रही है अब ई नया माजरा माथे मोल लेना पङेगा---'मने मन सोच रहे थे तभी वो बोल पङी----

 अरे धत् आप वही रह गये हमरा कोनो नियत नहीं ना गङबङ है ,-- जो कोई कुछ बोलेगी

   बिना विलम्ब किये उ छपट कर बैठ गयी थी हमरे के टी एम मोटर सायकल के पिछले सीट पर और हम बिना देरी कर ले  दु नम्बर गियर पर ही झटका मार के गाङी का एक्सलेटर दबा दिये ।

  
©® पवन मिश्रा ( दुमका)

(18) कहानी -- भुतनी

कहानी

           *भूतनी*


अरे सुनने में आ रहा है छतरू मड़ैया को किचिन सवार हो गया है, वो किसी को नहीं पहचान रहा है ---रूक रूक कर बोलते जा रहा है हमको जाने दो भाई मत पकड़ो ---गंभीरता के साथ सुरो बनिया अपने दुकान पर आये ग्राहक राजू काका से बोलता है। इ जो पिछले साल पर्बतीया

फसरी लगा के मरी है तभी से इस गाँव में कुछ ना कुछ अनहोनी और विचित्र --विचित्र घटना घटित हो रहा है। अब इ ले लो परसों फगुआ है सब कोई पर्व त्योहार के तैयारी कर रहा है सुरो महाजन, त इसी समय छतरू मड़ैयापर पिचाश सवार हो गया है --भगवान करे सुरो महाजन उसे कुछो हो ना जाय।

ऐ दादा, थोड़ा लाल मिरचा -और दस टका का मरीच जल्दी से दीजिएगा --पापा बोले है पैसा बाद में पहुँचा देंगे --मंगरू मड़ैया हाँफते हुए कहता है। अच्छा मंगरू, छतरू के की हाल हौव --उ सबको पहचान सकता है-? छतरू भैया को चुड़ैल पकड़ लिया है--उ लोग रोज शाम उधर मुरदघट्टी के तरफ जाता था -मंगरू।

मंगरू जल्दी जल्दी लाल मिरचा और मरीच लेकर घर जाता है --उसकी मम्मी गोयठा(सुखे गोबर का जलावन)पर किरासन तेल डालकर जलाती है और लाल मिरचा और मरीच ड़ालकर समूचे घर धुआं करती है। दरअसल मंगरू की मम्मी पिछले महीने पहाड़गंज अपने मौसी घर गयी थी और वहीं इस तरीके को सीख कर आयी थी की, किसी पर भूत अगर सवार हो जाय तो उसे काली मरीच और लाला मिरचा जलाकर सुन्घाने से भूत भाग जाता है।

धुआँ सूंघाने के बाद छतरू की आँखे और लाल लाल हो गयी और विचित्र टाईप की अस्पष्ट आवाज निकालने लगा।

अरे ये तो जख यानि की पुरूष पिचास जैसा लग रहा है दीदी --छतरू की चाची बोल उठती है अपने जेठानी से--मेरे मैके में एक मस्तानी

 मौलाना है उससे बात करके देखिए उ जंतर मंतर झाड़ फूंक से सब नजर विजर ठीक करने में तुफानी सिद्धी हासिल किये है।

तभी छतरू के पापा फोन करते हैं--हैलो मौलाना साहब --

उधर से आवाज आता है --जय मस्ताना --अक्कड़ बक्कड़ त्रिकाल बुझक्कड़-- बोलो भाइ क्या बात है।

तभी छतरू के पिता सारा बात उसे बताते हैं और निवेदन करता है --कुछ उपाय किजिए मस्ताना साहब।

हाँ हम सब यहाँ से देख पा रहे हैं--छतरू को प्रेत छाया जकड़ कर पकड़ी है --गाँव के ही दक्षिण दिशा में बरगद का जो गाछ है वहाँ तीन भूतनी रहती है --उसी का इ खेला है। जान पर जोखिम है। एक भूतनी कभी कभी बोलती है छोड़ देते हैं तो दुसरा बोलती है --नहीँ खुन पियुन्गी ----हा हा हा बड़ा ही करकस और अभद्र ठहाका लगाया मस्ताना ने।

 बड़ी मिन्नत के बाद मस्ताना ने कई करार पर मौखिक सहमति लिया और आने को तैयार हुए।

 एक घंटे बाद मस्ताना अपने चेला के साथ काले गंदे कपड़े और गठ्ठर लिए हाजिर होता है और मोटर सायकल खड़ा करते ही बोलता है ---अक्कड़ बक्कड़ -त्री काल बुझक्कड़ 

मस्तानी मेरी हर पिशाच को काबू कर ककक्कड़।

आइये आइये हैय देखिये ना आज सबेरेये

 से ही छतरूवा को उ परबतीया जिदीया

 के पकड़ ली है --अरे इतने भटकना है तो जाओ अपना भ ईबा पर सवार हो जाउ हमरा उपर काहे लगले हो--- कहते कहते दिल में चल रही सभी संभावनाओं रूपी बात को बोल दिया।

काली पाठी(बकरी) सवा मीटर काली वस्त्र डेढ लीटर दारू और सात सौ रूपैया जल्दी से लाइए, हम वशीकरण तुफानकरणी इसका कर देते हैं --मस्ताना कहता है।

 तभी छतरू के पापा बोल उठते हैं इ ठीक तो हो जायेगा ना -सब समान तो कभिए मंगा दिए हैं--!

 इससे बड़का बड़का जिद्दी पिचाश को कितना बार बस किये हैं जी -'अक्खड़ बक्कड़ त्री काल बुझक्कड़ '

 ढेर सारे पैतरा और रहस्यवादी अनुष्ठान किया गया --लाल और काला चिन्ह भयावह रूप से दिखने वाला सृजित किया गया। एक बोतल में काला रंग और पानी ड़ालकर उसे छतरू के शरीर और काली बकरी पर बार बार स्पर्श कराया गया --और अक्कड़ बक्कड़ त्री काल बुझक्कड़ सब पिचाशी को बसकरे करकक्कड़।

ये देखिए अब यहाँ का काम खत्म हो गया है अब कब्रिस्तान में जाकर इस बोतल के पिचाश के प्यास को खुन से बुझा देगें,छतरू पहले जैसा ठीक हो जायेगा -- और सारा समान बाँध कर अक्कड़ बक्कड़ बोलते सात सौ रूपये पाकेट में ठूसते हुए चल दिये।

तभी पड़ोस के प्रकाश सर जो एक साइकोलोजीस्ट थे अभी होली में अपने माता पिता के घर आये थे उनके कान तक ये बात पहुँची।

प्रकाश जी छतरू को देखने आये। गाँव में अभी भी मानवता जिन्दा है अगर आपको समस्याएं आती हैं तो सहयोग और सहानुभूति के लिए कई कदम स्वतः आपकी ओर बढेंगे।

प्रकाश जी ने देखा छतरू को एक अंधेरे और बंद कोठरी में रखा गया था जहाँ अभी भी मस्ताना के करतूत और घरेलू टोटके के वजह से दुर्गंध और धुआं धुआं सा महक रहा था।

छतरू के खाट को खुले हवा में मंगाया गया। तभी कुछ ग्रामीणों ने चर्चा किया की लो अब देख लो पढे लिखे आदमी का दिमाग--छतरू के जिन्दा रहते ही उसे खाट पर लेटाया घर से बाहर आँगन में कर दिया गया( ऐसा आम तौर पर आदमी मर जाता है तब किया जाता है)

-------प्रकाश जी ने छतरू को गौर कर देखा। उसके आँखो के पलकों को उठा कर देखा। पेट और पीठ को दबाकर देखा --इसके बाद बोलता है एक जेनरल फीजिशयन को बुलाइये।

 प्रकाश जी ने उसके पेट को कस कर दबाया ---छतरू जोर से उल्टी करता है ऐसे आवाजों के साथ मानिए कुछ अनहोनी,विचित्र और अनसुलझा सा मामला हो।

 फिर पीठ को दबाया गया और छतरू लगातार उल्टी तीन चार बार करता है --दुर्गंध करता हुआ गंदगी लगभग समूचे आँगन में फैल जाता है।

 अभी कैसा लग रहा है छतरू---प्रकाश जी पूछते है।

अभी त बहु ते आराम लगा रहा है। 

प्रकाश जी ने सबको उस जगह से दूर हठने को कहा --दरअसल वह छतरू से अकेले में कुछ बात करना चाहते थे।

सभी के दुर हट जाने के बाद स्नेह पूर्वक प्रकाश जी पूछते है----

सबेरे से क्या खाये है --काफी कायदे से पूछने के बाद पता चला की छतरू सबेरे से खाली पेट में ही मुरारी चौंका पर गंजा पि लिया था अपने दोस्तों के साथ, गाजा पिने के बाद - जब घर आ रहा था तो होली छुट्टी में आये अपने सहपाठी दोस्त मणिलाल जो बी एस एफ में कास्टेबल था उनके घर बैठकर अँग्रेजी शराब भी पी लिया था ---दस बजे के आस पास कूछ दोस्तों के साथ होली की तैयारी करने के लिए भाँग भी कम मात्रा में खा लिया था।

छतरू के पिताजी को प्रकाश जी ने बतलाया कोई भूत बेताल नहीं होता है यह हमारे आपके कमजोर मानसिकता की अपनी सोच है --छतरू का नशा उतर चूका है -लेकिन उसको काफी कमजोरी लगता होगा। चिकित्सक से उसे दवा दिलवाइये --जो भी परेशानी होगी ठीक हो जायेगा।
पवन मिश्रा (दुमका-झारखंड)

(16)कहानी -- बहकती सोच

कहानी
                    *बहकती सोच*
मंदार हिल के तलहटी में बसे मेरे पैतृक गांव नैमतपुर से ढेर सारे सुंदर सुंदर सुखद अनुभव को लेकर मैं विक्रमशीला एक्सप्रेस के कोच संख्या ऐ सी वन के बर्थ नंबर तैईस और चौबीस पर लिली के साथ सवार होकर दिल्ली को निकल पडा था. दिल्ली से कैलिफोर्निया  के लिए इंडियन ऐयर लाईंस के एक्सक्युटिव क्लास में लिली के पी ए ने टिकट  बुक कराकर आवश्यक कामों से जल्द ही वापस आने का अनुरोध किया था. लिली का यह नैमतपुर जैसे गांव के समृद्ध परंपरा से लबरेज जगह पर जीवन में पहली बार आना हुआ था.

                         सुंदर सुंदर बातों और रमणिक वादियों को पिछे छोड रेल अपने ही धुन में चलते जा रही थी और मैं  पेटु की तरह इंतजार कर रहा था कि लिली इच्छा जाहिर करे. तभी आग की भट्टी पर सेंका हुआ लिट्टी, गरज गरजकर बेचता हुआ , जमालपुर स्टेशन पर दिखा. ओह मैं कहां जो रूकने वाला था - भाई लिट्टी के साथ सरसों या राई की  चटनी दिख जाय तो मैं अपने आप को रोक नहीं  सकता , सो मैंने चार -चार ,लिट्टी , राय की चटनी ,बैंगन भरता ,आलु चोखा , प्याज की कतरन , हरी हरी मिर्च ,दो प्लेट में लेकर अविलंब  अपने बर्थ पर पहुंच गया.
         गेरुवा वस्त्र पहने एक कमंडलधारी मेरे दाखिले से पहले ही सामने वाले 36 नंबर के बर्थ पर सवार हो गया था. लिली इस कमंडल धारी साधु को देखकर बडी असहज हो गई . वो कान में बुदबुदायी कैसा असभ्य है ये मानव . (हाउ केन ही डेयर टु ऐभल इटस फेयर---) कैसे इस आदमी ने इस मंहगे कंपार्ट का भाडा जुगाड कर पाया , असभ्य है ये. ये जरूर किसी जजमान को  चुना लगाया होगा--,ये ही भगवा आतंकवाद है. -- वगैरह वगैरह वो बोलती रही और मैं सुनता रहा -- मैं कर भी क्या सकता था--!. लिट्टी का मजा फीका हो चुका था. यद्धपि मैंने प्रयास किया कि ऐडजस्ट करो कोई उपाय नहीं है, लेकिन लिली के बकर बकर ने मेरा ही कान पका दिया था. मैनें उस साधु से रिक्वेस्ट किया कि कुछ पैसा ही ले लें और आप अपना बर्थ किसी और जगह ऐडजस्ट करा लें थोडा हम दोनों आपके सामने असहज सा हो गया हूँ.  शायद वो साधु सब समझ रहा था और वो बोल पडा रिलेक्स रहो  बच्चा ,  नैमतपुर की मिट्टी तो ऐसी नहीं है --! यह कहकर वह मंद मंद मुस्कान के साथ चुप सा हो गया मानिए , ढेर सारी बातें वो अपने चेहरे के भाव से कह गुया हो.
         किऊल जंक्शन में ही दो काफी स्मार्ट और भद्र युगल दंपति कोर्ट- पेंट और जींस टाप में सवार हो लिये और संयोग से वो आमने सामने बेठ लिये. हम दोनों ने ही मुस्कराकर उनका स्वागत किया . कुछ मिनटों में ही हम लोगों ने बातों का सिलसिला शुरू किया और अपने को भगवा आतंकवाद के असहज माहोल से निकाल पाया. लिली भी थोडा अच्छा महसुस कर रही थी.
              पटना से गाडी खुल चुकी थी , तभी उस सज्जन ने बडे विनम्रता से केक निकाला और अपना शादी सालगिरह सेलेब्रेट किया . हम सब को भी स्नेह और प्यार के साथ केक परोसा गया ,  तथा साथ में ही उस साधु को भी. 
          इसके बाद की बातें मुझ कुछ भी याद नहीं.  मैं लिली संग किसी आज्ञात हास्पीटल के आमने सामने के बेड पर था. मैं लिली को और लिली मुझे निहार रही थी. शरीर बेजान सा हो गया था. लग रहा था जैसे मैं गहरी निंद से जग पाया हूँ.  तभी मेरे सामने वो साधु दिखे और बडे ही सहज मुद्रा में मेरे बगल में खडे थे.
साधु बोल रहा था -- वो शादी सालगिरह सेलेब्रेशन वाली केक मुझे भी मिला था ,मैंने खाया नहीं उसे कमंडल में डाल दिया था. उसमें जहर था . वो अनजान दंपति नशाखुरानी गिरोह वाला था. आपलोग घबरायें नहीं आपके सारे समान लखनऊ रेलवे पुलिस  के लाकर रूम में है , और वो दंपति पुलिस कस्टडी में.
     एक बात सोचना जरूर बच्चा, खाली कटोरा देख ये मत सोच लेना कि कोई भिक्षा मांगने आया है , हो सकता है वह सबकुछ दान करके  चैन की सांस लेना शुरू कर रहा हो. नैमतपुर की मिट्टी की खुशबू कलंकित होने से बचाना , मैं उसी मिट्टी से निकला फकीर हूँ. अगर सच में कोई साधु , फकीर ,मौलाना और पादरी   है तो वह हर पल मानवता की रक्षा करने वाले ही होते हैं और सच झुठ तो आप बुद्धिमानों को फर्क करने हैं.
©® पवन मिश्रा (दुमका-झारखंड)

(15)कहानी-- *प्रेम ही तो है*

कहानी 
           
                    *प्रेम ही तो है*

       सुधा हिंदी की अध्यापिका , ने सच में भाषा हिंदी को इतने सहजता और सुंदरता से अपने में आत्मसात किया है कि बगैर श्रृंगार किये वो सुंदरता की प्रतिमूर्ति सी दिखती है. हिंदी की मिठास , सहज अभिव्यक्ति,  भाषाई भाव भंगिमा और इससे भी बढकर दैनिक योगाभ्यास तथा अनुशासित जीवन शैली ने उसे सच में पचपन के उम्र में भी उम्र पचीस वाली शारिरिक षैष्ठवता प्रदान किया था.
 भारतीय संस्कारों से सुसज्जित चमकती दमकती सुधा रुपी फुलों पर वांछित अवांछित भौरें अक्सर ही मंडराते रहते थे -- लेकिन सौंदर्यता ईश्वर की अनुपम कृति होती है ,और उस सौन्दर्यता की रक्षा हेतु रक्षा कौशल से भी उसे स्वत:और स्वभाविक  निपुणता ईश्वर प्रदान करता है . 
       छैला छिछोरा टाईप का एक छोरा पहनावे और चाल व्यवहार से मस्ताना कम ठिठोला ज्यादा पिछले कुछ दिनों से सुधा का पीछा ऐसा कर रहा था मानिए भौंरा पुष्प रस के सुगंध मात्र से मदांध सा हो गया है, और रस चुसने को लेकर निरंतर उनकी परिक्रमा कर रहा हो.
            एक दिन अनायास ही इस अनजान छिछोरे ने भारी भरकम बाईक कवासाकी निन्जा  चौदह सौ सीसी को तेज रफ्तार से सुधा मेम के ठीक सामने युं टर्न लेने के पोजीशन में रोक दिया और पुछ लिया मैम 'डु यू लभ मी'---- 
                सुधा जो सौम्य व्यवहार अपने मुस्कान से सामने वालों के क्रोध को पी जाने की क्षमता रखती थी बिल्कुल भी न विचलीत हुई. उनकी प्रतिक्रिया ठीक वैसी  थी जैसे अंगुलीमाल डाकु को महात्मा बुद्व ने कहा था --' मैं तो ठहर गया भला तु कब ठहरेगा--?'. सुधा बोल पडी --' मैं तो अध्यापिका होकर मानव जाति से ही अथाह प्रेम करता हूँ,  तु उससे बाहर तो नहीं -- यु आर जस्ट लाईक माय चिल्ड्रन बाय योर ऐज' कहकर मंद मुस्कान के साथ सुधा अपने रास्ते निकल पडी . अब यह लडका नासमझ मानो इन्हें करोडों की लाटरी लग गई हो . गदगदी का तो अब कोई सीमा न था.
       इसी तरह  अपने ही चाल में विद्यालय के वार्षिक कार्यक्रम को संपन्न कराकर सुधा तेज कदमों के साथ आटो स्टैंड की ओर देर शाम को जा रही थी . आटो से सुधा हाइवे के रास्ते अपने घर की ओर जा रही थी. तभी भयंकर तेज रफ्तार से वो लडका आटो को ओभर टेक   करके हाइवे पर चढना और आटो को जबरन रोकना चाहा. तेज रफ्तार से आ रही ट्रक के झटके से वो लडका वहीं गिर गया और करीब पचीस फीट घसीटते हुए वो लहुलहान हो गया. वो स्वयं से उठ खडा होने के परिस्थिति में  नहीं था. सुधा आटो से झट उतर गयी और उस लहुलूहान लडके को गोद में उठा कर आटो पर बैठाया और उसे पारस हास्पीटल मे भर्ती कराया. तकरीबन दो घंटे के बाद उसे होश आ चुका था. वह लडका बिन कुछ बोले लज्जीत भाव से बेड पर पडे पडे हाथ जोड कर माफी मांगने की मुद्रा में था . सुधा बोल पडी़ तेरी उम्र मेरे संतान जैसी ही है.  पुत्र तो कुपुत्र हो सकता है पर  माता कभी कुमाता होती है क्या--?  बस  यही नारी के मातृत्व बोध के कारण तु यहां जिंदा है. 
©®पवन मिश्रा (दुमका-झारखंड)

(14) बार बार होता है प्यार

            *बार बार होता है प्यार*
 इस दुनिया मे प्रेम ही है जो अमर है -- अदृश्य है , जो कभी मरता नहीं। किश्तो मे बंट कट कर ही सही पर जिंदा रहता है हर पल। समाज अपने परंपरा के पैनी धार वाले चाकू से प्रेम की --पहरेदारी करता है , प्रेम की हत्या  करता है  पर ये प्रेम ही है कि अपने खुद में से बह रहे लहु के हरेक कतरे से नये प्रेम को जन्म देता है ।  खत्म करने वालों, पनप रहे प्रेम को नश्तनाबुद करने वालों, प्रेम के आवाज को दबाने वालों की संख्या मानव समाज मे भले ही ज्यादा हो -- पर प्रेम करने वालों के हौसलों से ताकतवार आज तक कुछ नहीं बना -- न कोई परमाणु बम न हाड्रोजन बम और न कोई ऐसा फौज जो प्रेम को रोक सके -- प्रेम हरेक अवरोधों से परे होता है,यह पनपता है और अनजाने विशाल वटवृक्ष सा रूप  धारण कर जाता है ,जो खत्म होने से पहले नये पौध सिंचित कर जाता है और प्रेम अजर अमर वायुमंडल मे आक्सीजन की भांति चलतं रहता है। 

        आरोही अपने विद्यालय से आते ही अपने मम्मी अकांक्षा से लिपट कर रोने लगी । मम्मी मेरे दोस्त कहते हैं कि तेरे नये पापा  आने वाला हैं। तेरी मम्मी रौशन अंकल से शादी करने जा रही है। 
    अकांक्षा हडबडाहट में बोल पड़ी --- तु क्या बोल रही है मेरी बेटी --?, ऐसा कुछ भी नहीं है आरोही।  आरोही तुझे तो  रौशन अंकल खुब दुलार करते हैं -- रौशन एक अच्छा इंसान है भी, अगर रौशन  तेरा पापा बन भी गया तो क्या परेशानी है आरोही। कहते हुए अकांक्षा ने आरोही को समझाने का प्रयास किया। 
     आरोही बोल पडी -- नहीं मम्मी, नहीं --! रौशन अंकल अच्छे हैं। लेकिन सभी कहते हैं सौतेले माँ और सौतेले पापा कभी भी प्यार नही दे सकते हैं - हरगीज नहीं। मम्मी तुम मुझे प्यार नहीं करती हो --? 
                   गोद मे सर लिटाये आरोही के पीठ को सहलाते हुए अकांक्षा बोल पडी -- आरोही तु ही मेरी जीवन है और तु ही मेरी संसार--। तु क्या चाहती है--? नहीं मम्मी नहीं---! तुम शादी मत करना मम्मी ---, मेरी कसम। अकांक्षा गहरी और लंबी सांस ली और बोल पडी ठीक है आरोही बेटा मैं शादी नहीं करूंगी --! आरोही ने भी लंबी राहत की सांस ली कि चलो मेरे और मम्मी के बीच रौशन रुपी संभावित दिवार खडा न हो पाया। 

            अगले ही दिन आकांक्षा ने रौशन को अपना फैसला सुना दिया। दर असल चार साल पहले अकांक्षा के पति का आकस्मिक दुर्घटनावश इंतकाल हो गया था। उन्हीं के जगह पर कृषि विपणन कार्यालय मे आकांक्षा की नौकरी लगी थी। जीविकोपार्जन हेतु पैसों की कोई कमी नहीं थी। अकांक्षा ने मन ही मन अपने आरोही के सहारे ही  जींदगी गुजर करने को मन बना लिया था। लेकिन पता नहीं विधाता को क्या मंजुर था --? दो साल उपरांत ही  रौशन जो एक विधुर (  जिनकी पत्नी जिंदा न हो)था ने भी इसी कार्यालय मे नौकरी योगदान किया था। कार्य सहयोग और निष्पादन के दौरान दोनों ने एक दुसरे को समझा -- दोनों मे नजदीकीयाँ  बढ़ीं-- बस फिर क्या था ---- --?प्रेम के बीज को मनोनुकूल आबोहवा नमी और दिल रुपी खाली खेत मिल गये जहाँ पौधा तो तैयार हो ही रहा था मगर क्या पता नियति को क्या मंजुर -----? 
         अब दो युगल प्रेमी एक जगह रहे , प्रेम परवान न चढ़े ऐसा होता है क्या---? लेकिन दो परिपक्व मानसिकता एक दुसरे को कभी भी समाज के नजरों मे गिरने नहीं देना चाहता है ।  शायद इसके लिए त्याग कि बडी़ से बड़ी सजा जो हो सकती है वह स्वत: आत्मसात कर लेता है--। रौशन ने चर्चा परिचर्चा का जल्द ही पटाक्षेप कर दिया -। रौशन ने त्वरित रूप से कार्यालय से छुट्टी ले ली और छुट्टी के दौरान ही अपना स्थानांतरण दुसरे राज्य करा लिया। बस समाज और परिवेश के तथाकथित सभ्य नेक मानव के आंखों पर, दिल पर सभ्यता और संस्कृति का सुंदर ऐहसास तृप्त हो गया। दो प्रेम करने वाले बिछड़ गये एक दुसरे से। रौशन वापस तो आया लेकिन आफिस से उसी दिन उनकी विदाई समारोह आयोजित की गई--- लंबे लंबे सुंदर सुंदर भाषाई मिठास मंच पर रौशन के प्रशंसा में रखे जा रहे थे। 
   रौशन और अकांक्षा एक दुसरे से नजर मिलाने का साहस न जुटा पाये। मंच पर जब अकांक्षा के बोलने की बारी आयी तो मतलब  धैर्य जबाब दे चुका था --- मंच पर सिसक सिसक कर वो चढ़ी जरूर लेकिन फुटफुकर रोने लगी-- बोल पडी गुनाहगार मैं हूँ -- और इसके बाद वह कुछ बोल न पायी। रौशन जो अंत में मंच पर चढ़ा उसके पांव मे वो मजबुती न थे , लब थरथरा रहे थे बोल पडा़ --- मेरे जीवन के पतझड में इस कार्यालय ने ही एक बसंत की आश जगाई -- लेकिन प्रकृति कभी कभी अत्याचार कर जाते हैं , प्रकृति ने मुझ जैसे वृक्ष पर नये पत्ते को देखना अनुचित समझा --! मेरा जीवन अब ठुंठ वृक्ष से ज्यादा कुछ नहीं है-- और ये ठुंठ वृक्ष किसी के जीवन मे छाया न दे सका लेकिन दाह संस्कार मे तो ये ठुंठ वृक्ष नजर आ ही सकते हैं-- -  ? एक ठुंठ वृक्ष समान ही रह गयी मेरी जिंदगी -- जिसमें समाजिक परिवेश मानवीय मजबुरी -- सब ने मिलकर रौशन तक रोशनी न पहुंचने दिया। सबका आभार -- जिंदगी रही नियती को मंजुर हुआ तो फिर मिलूंगा -- कहकर अत्यल्प संबोधन के साथ रौशन  मंच छोड नीचे उतर गया। 
        समय अपने गति से चलते रहा -- अकांक्षा और रौशन एक दुसरे से बहुत दुर जा चुके थे -- कोई खोज न कोई खबर। आरोही बडी हो चुकी थी   । अब इनकी शादी लग चुकी थी। लेकिन आरोही बारबार एक ही बात से परेशान थी मेरे शादी बाद मम्मी अकेली हो जायेगी। आरोही बीते दिनों के याद को सोचते ही मायुस हो जाती थी। 
   मम्मी आई एम गिल्टी मै ही दोषी हूँ तेरे एकांत के लिए मम्मी। मैं चली जाउंगी तु अकेले कैसे रहेगी --? रौशन अंकल को तुझसे दुर करने में मेरी ही गलती है--! 
   आरोही --- सेट अप। चुप रहो आरोही। आकांक्षा जोर से चिल्लायी। अब उन पिछले बातों के उच्चारण से क्या फायदा --आरोही। सब की अपनी अपनी अपनी किस्मत है। चलो शुभ शुभ तेरी शादी हो ससुराल बसे यही मेरी खुशी है। 

       अगले सुबह दरवाजे पर बारंबार काल बेल बज रही थी--। दरवाजा खोलते ही अकांक्षा सन्न रह गयी----! सामने रौशन खड़ा था। बोल पडी रौशन तुम यहाँ----? इतनी सबेरे--? कहाँ हो, कैसे हो--? रौशन बोल पडा जैसे दिल के अंदर कभी प्रवेश न दी क्या दरवाजे के अंदर भी जाने से रोकने का ईरादा है क्या अकांक्षा--? 
        अंदर सोफे पर बैग रख रौशन रिफ्रेश होने लगा। तभी आरोही भी जग गयी थी। तीनों ने एक साथ चाय पी। आरोही बोल पडीं -- अंकल और मम्मी मैं ने एक दृढ़ संकल्प लिया है ---
       आप दोनों अगर शादी नहीं करते तो मैं भी शादी नहीं करूंगी आजीवन मम्मी के साथ यहीं रहुंगी। अकांक्षा ने कुछ न देखी-- जोर का तमाचा  आरोही के गाल पर लगा दिया। और झट से अपने बेड रूम चली गयी। और वहीं से अवाज लगाई आरोही यहाँ आओ जल्दी--?
       तुम क्या बोल रही हो आरोही तुझे पता है--?  मुझे तेरी शादी करनी है-- इतनी बडी जिम्मेदारी है और मैं अभी इस उम्र में शादी करूँ -- तेरा दिमाग तो सही है ---। आरोही ने एक ग्लास पानी अकांक्षा को देते हुए कही मम्मी पहले पानी पीयो --। और मारेगी क्या --? मन है तो मार ले मम्मी--। अब चल गेस्ट रूम आये हुए मेहमान की बेईज्जती होती है अगर हमलोग उन्हें अकेला छोड देते हैं तो--! 
     अकांक्षा और आरोही कुछ नाश्ता लेकर रौशन के पास पहुंचती है -- और बातचीत के क्रम में अकांक्षा बोल पडती है समाज क्या कहेगा --? नहीं हरगीज नहीं मैं शादी नहीं करूँगी--। 
    अकांक्षा बढ़ते उम्र के साथ परिपक्व हो चुकी थी  । बोली समाज ---? कौन समाज --? कैसा समाज --? वही समाज जो एक विलखती विधवा के एकाकी जिंदगी से हर रंग को खींच बेरंग करना चाहती है--। वो समाज जो विधवा होते ही औरतों को उनके हंसने बोलने तक पर प्रतिबंध लगाना चाहती है--? कैसा समाज जो विधवा  को  मायुस और  रंगहीन करने के लिए हजार प्रतिबंध तो लगाने की सोचता है लेकिन वो जिंदगी कैसे जीये इस पर मौन रहता है। कैसा समाज --? जो पापा के श्राद्ध भोज में रसगुल्ले कम पड़ जाने पर हो हल्ला मचाते हो---। 
        
              अंकल  आप मेरे अनुरोध पर यहाँ आये, काफी परेशानी  सेआपके फोन  उपलब्ध हो  पाये। फैसला अंकल आप और मम्मी पर है, नहीं तो मै अपनी शादी नहीं करूंगी नहीं करूंगी -- मै मम्मी को अकेला नहीं छोड सकती। कुछ देर के लिए आरोही जानबुझकर गेस्ट रूम से निकलकर बाहर आ गयी --। और फिर एकाध घंटे उपरांत अकांक्षा अंदर आयीं। सारी दकियानूसी परंपराऐं टुट चुकी थीं -- अगले दिन मंदिर मे आरोही -- रौशन और अकांक्षा का गठबंधन कर रही थी -- मंत्रोच्चारण के बीच शंख फुंके  जा रहे थे-- मानिए रौशन और अकांक्षा को सक्षात विष्णु भगवान आशिर्वाद दे रहा हो -- फिर दुसरे दिन रौशन शादी के विविध इंतजाम कर रहे थे और आरोही और दमाद के गठबंधन अकांक्षा कर रही थी--। 
   प्रभु तेरी जय हो-- प्रेम जीत गया --प्रेम अमर हो गया -- रौशन के जीवन मे पतझड से बसंत आने मे देर अवश्य लगी लेकिन आई भी अवश्य। 
---पवन मिश्रा (दुमका -- झारखंड) 
29मई 2024

     

                 

(13) जिंदगी है कि चैन से मरने नहीं देती

      जिदंगी है कि चैन से मरने नहीं देती
          ( होली विशेषांक) 
गुलछर्रे उडाते , रंगरसिया होली मनाकर दिन भर दोस्तों और पडोसियों के संग धिंगडमस्ती करते फगुआ में उछल कुद करते कब का रात दस बज गये  पता ही नहीं चला । घर पहुंने के साथ ही पत्नी देवी और मातृदेवी की डर और चुपके से बिस्तरा में  प्रवेश कर जाना हुआ। बारंबार भोजन के लिए अनुरोध, दबाव और डांट डपट मिलते रहा पर पेट तो लगभग कंठ तक फुल्ल टाईट था । सो बोलते रहा अरे तुलोग सुतने दो रे इतना परेशान काहे को जो कर रही है ----------! 
     मैं सोने का प्रयास करते रहा। निद्रा देवी को गोड हाथ जोडते रहा, याचना करते रहा हे देवी थोडा सा भी रहम कर दे मेरे माई -----! 
        मैं पसीने से सरगद हो चुका था। सीने में दर्द हो रही थी। बेचैनी और अनियंत्रित धडकन मन और माथे को बेचैन कर दे रहा था। अनियंत्रित धडकन -- पसीना और बेचैनी आपस मे प्रतियोगिता कर रहे थे कि ये फक्कड़ मेरे गुलाम है -- सबसे ज्यादा मेरा प्रभाव है इस पर ------! 
      तभी दिमाग में जोर का झटका लगा, मुझे हर्ट स्ट्रोक आया - मुझे दिल का दौरा पडा है ----- अरे मैं अब  घंटे भर में परमधाम को जाने वाला-----! परलोक की रवानगी शुरू हो रही है ----! 
         अरे मैं तो भगोडा होने जा रहा हूँ, रणछोड----योद्धा - संघर्ष पथ से लापता --- बेपरवाह -- मानव का तमगाधारी इंसान के नाम से मैं कुछ घंटे बाद से ही मानव समाज में पुकारा जाऊंगा --- हे भगवान --- हे भोलेनाथ रूको जरा ---! 
बक्श दो -- मुझे--! 
     विद्यालय स्तर पर सैकडों बच्चों  का न सिर्फ शिक्षक बल्कि उनका नैतिक जिम्मेदारी को वहन करने वाले धर्मसम्मत बाप हू मैं ---! किसी का कैरियर काऊंसेलिंग करना है ----! किसी का हौसला अफजाई करना है--! किसी को उसे आगे पढाई जारी  रखनए के जरूरी साधन स्रोत विकसित कराने हैं---! मैं उन बच्चों के जीवन का आश हूँ ---!महादेव तु मुझे अपने धाम को खींच रहा है। ---- नहीं नही अभी रूको ---रूक जाओ जरा -----! 
   विद्यालय स्तर पर ढेर सारे रिपोरृटिंग पेडिंग है, सभी जगह ससमय रिपोटिंग को आश्वस्त किया है क्या होगा उनका --? 

    मेरे दोनों संतान गुड्डा गुड्डी का क्या होगा भविष्य  ---?! 
उसके पठन पाठन का क्या होगा--? उन्हें आगे बहुत आगे ले जाने का जो सपना बच्चो के साथ देखा है उसका क्या होगा--! 
 अरे न न न ना गुड्डी का कल ही  रिजल्ट आ रहा है--! रिपोर्ट कार्ड कल ही तो लाने है़--! हिंदी भी  कम नंबर आता है  उसे --!वो फिर रोयेगी अपना सर पटकेगी समझाऐगा कौन उसे--? 
ऐय महादेव----महादेव ---रूको जरा --ऐ महादेव -----!  अरे गुड्डा का स्कुल फी तो बकाया है -- कल ही तो नोटिस आया है -- वो भी चुकता करने हैं---ऐय महादेव -- अनर्थ होने जा रहा है --- रूको -- रूको --- रूक जाओ जरा ---! ऐ महादेव -- महादेव ----! मेरे महादेव--! 
   मेरे बुजूर्ग मां पिता का पैथोलोजी रिपोर्ट लाना है,उन्हें दवाई देनी है , अब क्या होगा उनका ---! पिताजी का सुगर , बीपी वो सब दवाई भी तो खतम ही हो गया है वो भी तो लाना है कौन लायेगा---! , माता राम को समझायेगा कौन इन दवाईयों के विषय में --! अरे ---ओ --मेरे महादेव कल मुझे माता राम को लेके जाना है डाक्टर के पास -- कल ही का तो नंबर मिला है ---! ऐय तुम मुझे ऐसे लेके जा नहीं सकते महादेव -- खबरदार मेरे महादेव----! 
    कल इलेक्ट्रीक बील भरने है़ं -- ! कुछ राशन दुकान का पैसा बकाया है -- उसे देना है,। दुध वाले का महीना पुरा हो गया है उसे पैसा देने हैं----! वेतन मिल जाय तोअपने पत्नी देवी को पसंदीदा झुमका देने हैं ---! वो कलेजे पर चढ़कर इसके लिए मुझे राजी करी थी- मैं कैसे इन सब को छोड दूं -- बोल तो---!वो बोलेगी मैं बेईमान हूंँ --- महादेव -- ऐय महादेव --- रूको रूको ----रूको ---रूको --- ऐय महादेव -- रूक जा जरा -- ऐय ---ऐय ---ऐय --मेरे ---महादेव --! 
      मैं छटपट पैर हाथ पटक रहा था ---! पसीना से सरोबार था---! धडकनें हडबडब  हडबड करते अनियंत्रित गति से तेज होते जा रही है ----! बेचैनी ऐसी ---मानिए दम टुटने ही वाला हो --- साला ये जिंदगी चैन से मरने भी नहीं दे रही है --- 
   अबे छोड मुझे --- अबे छोड मुझे ---! मै़ जा रहा हूँ --महादेव---- ऐय महादेव
      तभी जोर से झटका मारा मेरी --- पत्नी देवी जी ने -- एक लोटा पानी मेरे माथे उडेल दिया मैं शरगद बेड पर थोडा शांति महसुस कर रहा था -- 
     पत्नी चिल्ला रही थी -- तु चिल्ला क्यों रहा है -- महादेव महादेव क्यों कर रहा है --चोरी चोरी चुपके चुपके -- फ्रीज में रखा हुआ भांग वाले ठंडय का पुरा जार तुने ही गटक गया था--!! अब पता चला असलियत--!-- ये भांग का नशा अभी तेरा उतारती हूँ -- बुलाती हूँ तेरे पिताजी को ----! 
    मैं अब बिल्कुल होशो हवश में था -- मैं शयन कक्ष में लगे भीड को देखकर बस मुस्करा रहा था और बोल रहा था ये सब मेरी पत्नी देवी का कमाल है तिल को ताड बना दिया इसने
   जय हो मेरे महादेव--🙏
पवन मिश्रा (दुमका --झारखंड) 
      
        
            


    

(2)कहानी -- दारुबाज

       ( 2) कहानी
      *दारुबाज*
अपने ही मन सोचते -- सोचते , लडखडाते  पैरों से घर की तरफ बढ़ते जा रहा था। देर रात मैं सुनसान राहों पर चले जा रहा था। हर दिन चाहता हूँ कि नहीं अब शाम होते ही घर जल्दी आ जाना है ,रोज रोज ये देर रात्री घर पहुंचना  कोई  अच्छी  बात नहीं। न    चाहते हुए  भी  आज फिर रात्री के एक बज  गये  । यै बैठक्का लगाने वाले जो हैं न उसे दुनिया मे किसी के परेशानी से कोई वास्ता ही नहीं। अपनी जिद्द ये लो मेरे तरफ से --! ये स्पेशल बोदका --!   एक और चिअ्अर्स ---! अरे  ये ले  रसियन  ब्रांडी--!  बस ये बर्फ के साथ  एक   और पैग--! ये दारू न होता तो दुनिया होती भी क्या--? होती भी तो इतनी हसीन न होती---! तभी कोई दोस्त बोल पडता दारु ही है जो आदमी को आदमी से जोडता है-- समाज को समाज से जोडता है। जात--पात मिटाता है, उंच नीच भेद भाव मिटाता है ----
   दारू मानो इनसे बढकर संसार मे कोई अमृत नहीं-- संजीवनी है ये दारू -- दारू ही आदमी का आक्सीजन है -------! 
   बस दारू महिमा सुनते ग्लास पर ग्लास गटगटाते कब को रात ग्यारह बज गया पता ही नहीं चला। अब भोजन उपरान्त जैसे शरीर भारी सा हो जाता है ठीक वैसे दारु उपरांत शरीर में एक अलग प्रकार का आवेश प्रवाहित सा होने लगता है --! 
और यही आवेश दारु को महान बतलाता है -- न सिर्फ बतलाता है बल्कि बडे बडे सुंदर सुंदर काम भी ये दारु करा जाता है।  और कई बार तो ऐसा भी सुनने को मिला है कि दारु पीने से ही किसी की किस्मत खुली हो। 
    लडखडाते  हुए चलते चलते सुनसान राहों पर  दुर से धुंधला सा कुछ अजीब सा दिखा । मैं चलते रहा --चलते रहा नजदीक पहुंचा। देखता हूँ कोई जवान लडकी परेशान सा एक बिजली के खंभे को अपने शरीर से चिपका कर पकडे हुई है--! मैं बोल पडा --- ऐ कौन है तु, इतनी बडी रात यहाँ क्या कर रही हो--! कोई परेशानी है--? वो इशारों मे अपने ऊंगुली से दुर कुछ दिखाई--। 
      मुझे माजरा समझते देर न लगा। मैने दुर खडे तीन जनों को रोशनी मे स्पष्ट देखा।  गरजते हुए  मैं बोल पडा  कौन  है ---?  शेरु रे-----! भागले अभी देखेगा तु लोग --। वाहियात कहीं का। तीनों के तीनो सरपट दौड़ कर भाग गया। 
         डरे सहमे हुए अनजान लडकी को मैं गौर से देख रहा था --! उनके चेहरे पर अब भी डर साफ--साफ दिख  रहा था--? मुझे उसे इस हालत मे अकेले छोड कर जाना उचित न लगा। मैं बोल पडा तु चलेगी मेरे साथ--? लडकी कुछ न बोली --! मै फिर से बोला तु चलेगी तो चल मैं अकेला हूँ --! 
    कहावत है मरता क्या नहीं करता। भगवान लडकी को जवान होने से पहले एक स्पेशल गुण से संवारता है। लडकीयों की छट्ठी इंद्रीयां इतनी तेज काम करती है कि वह निन्यानबे प्रतिशत सटिक बैठता है--! अगर आप किसी लडकी को घुर रहे हो तो उस लडकी को यह पता चलते देर न लगती है कि आपका उसे देखने का नजरीया क्या है--? और अगर आप बात कर रहे हों तो चुटकी मे लडकीयां आपके सही या गलत मन को पढ सकने की क्षमता रखती है। पता नहीं लडकी ने इस दारुबाज मे क्या जो देखा बोल पडी हां मैं आपके साथ चलुंगी --! हाँ शायद लडकी की जो परिस्थिति थी वह आगे खदहा  पीछे कुंआ वाली --! वह करती भी क्या--! 
    एक हाथ पकडे अपने कदमों से लड़खडा़ते --लडखडाते लडकी को मानिए घसीटते घसीटते मैं घर को ले के जा रहा था। और लडकी चुं चां कुछ भी नहीं बोल पा रही थी -- शायद इतनी सशंकित थी कि वह बोलने के स्थिति मे थी भी नहीं  । मै घर पहुंचते ही घर के दरवाजे पर जोर से आवाज लगाया -- अरे उठो, कुम्हरार वाली -- उठो न रे पगली ---! 
   देख तेरे लिए तेरी बेटी ला दिया हूँ ---अब आज के बाद किसी की क्या मजाल--!जो तुझे कोई बांझ औरत कह ले --.।  ले संभाल अपनी बिटीया को। 
--पवन मिश्रा (दुमका -झारखंड) 



(4)*जगजाहिर हुआ प्यार*

                 *जगजाहिर हुआ प्यार*
 ऐ बहुरीया ऐन्ने आबो ------ 
  अस्सी साल की वृद्धा बार-बार अपने पोतहू को अवाज देकर बुला रही है। शुरूआती अनसुना करने के बाद भी जब वो नहीं मानी और आवाज देती रही तो पोतहू को आना पड़ा। 
       पोतहू मन ही मन झल्लाते हुए बोल पड़ी ई बुढ़िया जीना हराम कर दि है ----- तन्नक झन्नक करते चन्नर  मन्नर बतियाते आते ही बोल पड़ी -- बोलु माँ जी चैन नाय पडै़त अपनैय के सुत जियो नी ----
   अरे ऐ बहुरीया बाहर सब्जी वाला अवाज दैयत रहल छैय तनी देखियो आर बैंगन ले लियो -- आज शनिचर हैत बढ़िया से खिचड़ी बनाऊ --- तैमें  पंचफोरण,सरसों  दाना , कड़ी पत्ता और शुद्ध घीयोर फोरण/ कड़क  तड़का  लगाय के बनाऊ आर वैमें  बैंगन आग मे झरका/  के फोरन डाल के हरी मिर्ची के साथ भरूता बनायल  जाय एकदम सोहना सोहना बड़ जी करत है ऐसन खाना खाय के -----  

  तु बनाओ बहुरीया ले लियो बैंगन---------! 
     ऐ सासु माँ अभी ई ना बनय सकत हैय -- जी मूंह जरा दाब के राखु ।  किचन मे अपने इतना गर्मी हैय उपर से ई फरमाईश । आयत रहैय आपन के बेटा -- बेटवे से कहु वोही बनाय दैयत --
आज हमरा से खाना नैय बनत , कुछ रूखा सुखा रेडिमेड चुड़ा भुजा से काम चलाऊ ----- कहते हुए बहुरीया वापस अपने कमरा में बुबुदाते चल गयी। 
              जीभ का स्वाद कचिया  जैसा पतला चटर पटर खाने को आतुर क्या कहूँ ई बुढिया को--  मरबो ना करत है ----! 
बृद्धा मनमसोस कर चुप हो गई -- कोई प्रत्युत्तर नहीं दि --। 
              तभी धीरे धीरे आहिस्ता आहिस्ता वृद्धा बिछावन से उठकर खिडकी किनारे खिडकी के रौड़ को पकडकर खड़ी हो गई और  हाथ के साथ  ईशारा करते  हुए  आवाज दी ऐ सब्जीवाला इधरे आओ -----  --
   कैसे है बैंगन --! बढ़िया है न --! 
पचास रूपैया किलो हैय माता जी ई भाटा बैंगन -- सब्जी वाला बोला। 
  तभी अपने आंचल के एक कोने की गठरी जो कमर मे खोंसी  थी खोली और देखी ई तो दसे रूपा है -- क्या होगा इसमें--! 
    अच्छा ई बताओ दस रूपा मे किता  बैंगन देगा--! 
सब्जी वाला होशियार था, थोडा माजरा कुछ कुछ  समझ गया बोला -- मायी दस रुपा मे पांच हो जायेंगा --! 
     वो वृद्धा माता राम दस रूपये का पांच बैंगन खरीदकर गुदड़ी कपडोंं मे लपेटकर तकिया बनाकर  माथे के नीचे   रखकर   सो गयी -- और बैंगन भरूता का स्वाद अपने कल्पनाशील मानसिकता के साथ चखने लगी -- और --- और खो गई अपने कुछ यादो में कि ओहहहहह ये मेरे उसी बेटा की मेहरारु है जिसको भुखे पेटों मैने पाला पोसा -- अपने सारे सुख सुविधाओं को बस अपने संतान के लिए त्याग दिया था कभी -- हे भगवान अब ले चल मुझे अपने द्वार -- अब और जलालत मुझसे न सहन हो पायेगी -- ले चल अपने द्वार -- बस बिछावन पर पड़े पड़े सोचते रही और सोचते ही रही -------  अभी ही होना था मेरे प्यार को बेपर्दा -- जगजाहिर हुआ मेरा प्यार
      तभी एक कटोरा  नुन तेल चिऊडा और दालमोट  लेकर बहुरीया अपने तथाकथित माते राम के पास कुसमय पहुंची और बोली खाय लियो माते जी शाम मे कुछ बनायल जायेगा ---खाय लियो
   बहुरीया अपने माते राम को बिछावन से हिला रही थी जगा रही थी लेकिन माते राम तो सदैव के लिए सो चुकी थी --- 
      अर्थी बाहर निकाली गयी --आंगन मे मृत्त शरीर रखा गया। 
लोगों की भीड़ जम गयी -- हाय तौबा मच गया -- बहुरीया छाती पीट पीट कर मृतक के प्रति अपने प्यार जगजाहिर कर रही थी तभी भीड के किसी पैर ने मृत्तक के सिराहने कागज मे लपेटे बैंगन पर भुल वश पैर रख दिया और बैंगन का भरूता सा बन गया और बहुरीया का चीखना चिल्लाना हाय मेरी माते चली गयी अब कैसे रह पाऊंगा की बोल दुर दुर तक गुंज रही थी 
    प्यार जगजाहिर हो चुका था । भीड़ मे सभी को बैंगन भरूता की लिप्सा का पता चल चुका था। 
   पवन मिश्रा (दुमका --झारखंड) 
12/06/2024