Friday, June 28, 2024
(19) कहानी --अनोखा ममत्व
(8) कहानी -- 'एकतरफा प्यार----'
एक कहानी
' एकतरफा प्यार-----'
' सुगंधा' यह नाम किस काम के, मैं ड्रेसिंग कक्ष में बैठे बैठे सोच मे पड गयी थी . कभी संदीप के साथ बिताये पिछले दिनों को याद कर रही थी तो कभी आज के अपने परिस्थिति पर , अपने भाग्य को मैं कोस रही थी.न चाहते हुए भी तरह तरह के अशुभ विचार मन मे हावी हो जा रहे थे.-- शायद मेरी मनोदशा इस पृथ्वीलोक को आज अंतिम प्रश्न छोड सदैव के लिए जाना चाह रही थी , एक औरत को अकारण अवहेलना , निरादर और परित्याग क्यों --? क्यों , क्योकि मैं एक औरत हूँ --!
जब मानव मन पर आपार दुख का पहाड टुट गया हो ,चारों ओर घोर अंधेरा दिख रहा हो तो चंचल मन सिर्फ़ अपने भाग्य को कोसता है और यही सुगंधा कर रही थी. भोजन मेज के ठीक उपर सुंदर सा तस्वीर जिसमें सुगंधा और संदीप खिलखिलाकर हंस रहे थे मानो उस हंसी पर अब पूर्ण विराम लग गया हो.अकारण संदीप ने शहर छोडकर महानगर में अपना घर बसा लिया और सुगंधा आज अकेली मानिए भीड भरे इस संसार में कोई कारण खोज रही है -- जीने का कारण --?
स्वयं से स्वयं के सवाल का जबाब पाना आसान नहीं होता है.ऐसे ही अनेकों सोच
भरे गंभीर सवाल दिमाग में बारंबार उपज रहे थे और मानो नेपथ्य से कोई संत्वाना दे रहा हो धैर्य रख --! संसार में तु अकेला ऐसा नहीं है --!
जाने कब से मेनका आंटि मेरे ठीक पिछे खडी होकर सिर्फ़ मुझे निहार थी. मेनका आंटी जो मेरे प्राईमरी ऐजुकेशन में अध्यापिका थीं और सबसे निकटतम पडोसी.,
बोल पडी क्या हो रहा है -सुगंधा बेटा .
मैंने हड़बड़ से जल्द उठकर उनका अभिवादन किया और उन्हें बैठने का अनुरोध किया. आंटी ने मेरे पसंद के भर कटोरी गाजर का हलवा ले आया था. खाने को मन न था लेकिन उनके अनुरोध में ही कड़ी आदेश वाली बातें छिपी होती थी सो मैं इनकार कर न पायी. हलवा समाप्त होते ही आंटी बोल पडी -- दस मिनट के अंदर कपड़े बदल कर तैयार हो जाओ तुझे मेरे साथ बाजार जाने हैं.
शायद दस मिनट से पहले ही आंटी के गाड़ी का हौरन मेरे दरवाजे पर बजने लगा था. मैं भी झटपट आधे अधुरे मन से ही घर मे ताला लगाते हुए निकल पडी और आंटी के साथ वाले सीट पर बैठ गयी. गाड़ी आंटी के ईशारे पर शहर से बाहर की ओर जा रही थी , मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था आखिर जाना कहां है--? गाडी़ गंतव्य को पहुंच चूकि थी.
मैं और आंटि संकरी गली से होते हुए अनेकों कमरे युक्त विशाल मकान में प्रवेश कर ली थीं. बड़ा सा बाग बगीचा विभिन्न प्रकार के पुष्प युक्त एक बड़ा सा खुले आसमान वाले बैठकखाना मे हम दोनों जाकर बैठ गये. ऐसा लग रहा था कि मेनका आंटी यहां बराबर आति हो और सभी उन्हें पहचान रहा हो.
हारे ,थके , बेजान , बेसाहारा बृद्धों की शरणस्थली थी यह जगह. जहां आंटी कुछ शारीरिक , मानसिक और आर्थिक सहयोग करा करती थी . ऐसा उनके चहलकदमी को देखकर मैं स्वत: समझ पा रही थी. उन्हीं बृद्धा मे से एक थरथराती हाथों से चाय छलकाती कप को पकड़े लौन में बैठी मुझे ईशारा करते हुए बोली 'इधर को आ मुन्नी'---मुन्नी--!
मैं आंटी की ओर देख इशारों में इजाजत मांग ली .
उस बृद्धा में गजब की तेज थी , हौसला सातवें आसमान पर , कडक रोबिले आवाज उसे भीड में असाधारण पहचान दिला रही थी.
मेरे पीठ पर हाथ सहलाते हुए मुझसे पुछीं --क्या करती है तुम. गजब की आत्मानुभूति और आत्मीयता उनके इन शब्दों में थी .उनके हथेली का मेरे पीठ को छुउन गजब की अनुभूति दे रही थी , संतोष शुकून भरा सहलाना था उनका यह छुउन. .मैंने लाख चाहने के बाद भी अपने को रोक न पाया , बिन कुछ बोले मैं फुट फुट कर रो पडी.
सत्तर पचहत्तर के उम्र में वो मुझ तीस साल की औरत को सहारा देते हुए एकांत की ओर ले गयी और मेरे सारे मनोविकार को बोलने के लिए बाध्य कर दिया .एक एक कर मैं अपने सारे परिस्थिति और संदीप के परित्याग को व्यक्त कर गयी.
आंटि आप इतने अच्छी हैं, आपका परिचय थोडा जानती--? सुगंधा ने उनसे अनुरोध किया. संदीप तुझे छोड के चला गया इसलिए बेजान हो तुम --!
सुनो मेरी कहानी ------ मैं देश के मशहुर डाक्टर रतनेशर की मां हुं. मैंने उसे पचीस साल तक पढाया. बारह से चौदह घंटा मैंने उम्र के पैंसठ साल तक काम किया . सुगंधा बोल पडी -- लेकिन इतने पैसे और सोहरत वाले डाक्टर साहब की मां यहां--!
उसके पास मेरे लिए कोई समय नहीं है . उनकी अपनी कुछ लचारी रही होगी इसलिए मैं यहां हूं. मैं आज भी रतनेशर को उतना प्यार ही प्यार करता हूँ . मैं कल जितना करता था आज उससे ज्यादा जानोगी क्यों --?
मैं प्रेम करता हूँ। नि:स्वार्थ प्रेम अपने बेटे से पोतहू से . बदले में प्यार मिलेगा इसकी अपेक्षा कहां है --?. अगर प्यार के बदले प्यार की आशा हो , बुढापे मे परवरिश की आशा हो तो वह प्रेम रहा ही कहां. वह प्रेम नहीं है जिसे दुनिया प्रेम मान रही है -- यह तो डर है अपने बुढापे का , यह तो स्वार्थ है समय परअपने को सहारा कोई दे इसलिए,प्रत्युतर में प्रेम पाने की भुख तो हरगीज प्रेम नहीं है. तुम संदीप से प्रेम नहीं करते तुम अपने खुशियाली खातिर उसपर आश्रित होना चाह रही हो .
तिनका तिनका बचा कर मैंने रतनेशर को संभाला है ,जब उनके पापा उसे छोड़ दिया अकेला . वह जिगर का टुकडा है मेरे लिए . प्यार द्विपक्षीय नही हो सकता है . हमेशा ही प्यार एकक्षीय ही होता आया है. हां कुछ समय के लिए यह आभासी रूप में प्रतित होता है , कि प्यार के दोनों पक्ष एक दुसरे को समान रुप से चाहते हैं. लेकिन यह सिर्फ आभासी होता है ,कलांतर में वह भ्रम बहुत बड़ा अवसाद का कारण भी बनता है. यह अवसाद तो प्यार के गहराईयों को अभिव्यक्त करता है और प्यार भुले नहीं भुलता.
अगर तुम संदीप से बदला लेने की सोचते हो , या उसके व्यवहार को तुम कोसते हो तो तुम उसे प्यार नही करते थे --!
प्यार तो हमेशा ही अगले के कल्याण और अच्छाई के कामना के लिए होने चाहिए. प्यार कुछ प्राप्ति के लिए हो तो वह प्यार कहां.
मैं रतनेशर से टुट गयी--- इसके बाद अपने सारे जमा पुंजी और पेंशन इसी वृद्धाश्रम को दान दे दी हूँ, ताकि बेसाहारा लोग यहां आश्रय ग्रहण करे --, तेरा सहारा है अभी ये तेरे मजबुत हाथ और पांव -- कुछ कर जिससे सुगंधा के पृथ्वी पर होने का अर्थ स्पष्ट हो .
©®पवनमिश्रा (दुमका झारखंड)
(1 )कहानी बेनामी रिश्ता
कहानी ---
*बेनामी रिश्ता*
यह बैंक की नौकरी भी जीवन को अजीबो अजीब सा ऐहसास दिलाते रहती है . कार्यभार और स्थानांतरण हम बैंककर्मीयों को चैन की सांसे नहीं लेने देती . यह तो भगवान का लाख लाख शुक्र है कि लिली जैसी हमसफर मुझे मिला वरना मेरा क्या होता--! भगवान मालिक .
अभी अभी भागलपुर से बसंत बिहार मेरा स्थानांतरण हो गया था. देश की राजधानी दिल्ली में स्थानांतरण हो पाना बडे ही संयोग की बात है. चीर प्रचलित पुरातन कहावत है दिल्ली दिल वालों की है मतलब कि यहां के आदमी कुछ ज्यादा उदार होते हैं -- उदारता यहां आम जनों के व्यवहार में दिखता है.
सर्वशक्तिमान को स्मरण करते हुए मैं अपना डेरा भाडे के मकान में ले लिया जहां से बैंक नजदीक ही था. पडोस के मकान से एक स्नेह संपर्क सा जल्द ही हो गया और उनका ये हिदायत की किसी अनजान को मकान के अंदर प्रवेश से परहेज किजीएगा अपनी जिंदगी अपनी सुरक्षा.
एक दिन बैंक के कामों में मैं व्यस्त सा था तभी लिली हडबडाते हुए फोन की और बोल उठी नही आप किसी भी सुरत में यथाशिघ्र घर आईए . मैंने भी अविलंब आवश्यक औपचारिकताओं को पुरा करते हुए तुरंत घर पहुचा . घर में किसी अज्ञात महिला के साथ मेरी पत्नी बैठी थी और बडी असमंजस में थी.
वो महिला बोल रही थी -- मैं रास्ता भटक गई हूँ. ये भुलने की मुझे बहुत बडी बिमारी है और चौबीस से छत्तीस घंटे में मेरी याददाश्त कभी भी वापस आ जाती है. मैं मानवता के नाम पर थोडा मददस्वरुप आपके यहां शरण चाहती हूँ.
विचित्र परिस्थिति थी , मैं उनके साथ ही,सोफे पर आमने सामने बैठ गया और लिली को ईशारे में कुछ चाय पानी के लिए बोला. लिली ने सुंदर सुंदर राजभोग और एक एक गलास पानी एक ट्रे में लायी और विनम्रता से उस अनजानी औरत को पहले और फिर मुझे लेने को अनुरोध किया. भगवान भी इंसान के लिए बेवक्त परीक्षा की घंटी बजा देते हैं . एक साधारण इंसान को भगवान के लीला की क्या हो समझ --?
मैंने उनसे ढेर सारी तहकीकात किये . लेकिन कहीं से भी संशय के कुछ भी बोल समझ न आया. वो कहती रही बेटा कुछ समय पश्चात ही मैं स्वयं यहां से चली जाऊंगी. मुझ पर कुछ भी संदेह न करो. तेरे जैसे गृह गृहस्थी से भरा संसार रूपी कटोरा छोड मैं फकीर जैसे बन गयी हूँ, बेफिक्र रहो बच्चे
यह कहकर वह लीली के साथ आपसी सौहद्रता बढाते चली गयी. और चेहरे के भाव भंगिमा भी कुछ ऐसी अभिव्यक्ति सी दे रही थी , कि समान्य इंसान क्या कोई भी उसे डपट कर बाहर जाने को कह पाने की स्थिति में न आ पाये.
मैंने गेस्ट रूम से अंदर आकर बेड रुम में लीली को अवाज दिया -- लीली इधर आओ. लिली के सामने ही मैंने पुलिस को फोन लगाकर सारी सुचनाऐं दी. और फिर उस अनजान के पास बैठ गया ताकि पुलिस के आने से पहले वह भाग न जाय. बातों ही बातों में कुछ मुझे भी आत्मीयता सी उनसे होने लगी. लेकिन मैने खुद को चौकन्ना किया. अपने दयाभाव वाले अंदर की स्थिति को बाहर लब पर आने न दिया.
तभी पुलिस भी वहां पहुंच चुंकि थी .ढेर सारी छानबीन की गयी . जब याददाश्त छोड जाती है दिमाग को तो फिर अकेले क्यों निकलना.--? घर वाले की कैसी लापरवाही.-? अब वो महिला भी डरे सकपके सी थी . वो इतना ही कह रही थी , मुझ पर कोई संदेह न किया जाय , मैं चोरीन या षडयंत्रकारनी न हूँ .मैं कुछ समय पश्चात ही याददाश्त वापस आते ही स्वतः चली जाऊंगी. पुलिस की कडक अवाज और अंदाज से शायद वो महिला रोने ही वाली थी , थरथराहट तो स्पष्ट सी दिख रही थी. लीली ने मेरे ओर देखते हुए, पुलिस से कुछ बातें कहनी चाही. पुलिस हेड को मैंने अलग जगह पर आने को अनुरोध किया. पुलिस के अलग होते ही लीली बोल पडी सर क्या ये कुछ देर की जो भी सीमा हो उसको देखा जा सकता है-? , क्या जबरदस्ती इसे भगाने के अलावा कोई और उपाय है --? बाद में अनुनय विनय के पश्चात कुछ जरूरी सुरक्षा के मानकों को अपनाते हुए , कुछ निर्देश जारी करते हुए उसे यहीं मेरे घर पर रहने दिया गया.
वो महिला लीली से घुलते जा रही थी ,सभी घरेलू कामों को बिना किसी निर्देश के निपटारा कर दे रही थी. रात्री भोजन में उन्होने ही लिली से इजाजत लेकर केला कोफ्ता , मेरे पसंद के वयंजनों में से एक बनायी. वो स्वाद अवर्णनीय थी,. चटपट खट्टी मिठी स्वादों युक्त बेहतरीन स्वाद और नरम नरम गरम गरम रोटी , शायद ऐसी सुस्वादु व्यंजन मैंने पहले कभी न चखा हो -- बिल्कुल पुरे ईमानदारी से बोल रहा हूँ. मैंने भोजनोपरांत अज्ञात को गेस्ट रुम में ही सोने का इंतजाम कर दिया कुछ जरूरी निर्देशों के साथ . और लीली से इस पर पैनी नजर रखने को बोलते हुए कब सो गया ,मुझे पता नहीं चला. सबेरे छह बजे निंद खुलने के साथ ही मैने गेस्ट रूम की ओर देखना चाहा. वो वहाँ नहीं थी. मैं हडबडा सा गया , बाथरूम में भी वो नहीं थी .मेरी खोजी निगाहें ढेर सारे बुरे ख्यालों के साथ उसे ढुंढने लगी .
मैंने अपने सभी जगहों को देखा जहां नकद रूपये और जेवर जेवरात जैसे मंहगे समान रखे जाते थे -- वो सभी सुरक्षित थे. तभी ऐसा लगा जैसे कोई गेस्ट रूम से अंदर प्रवेश कर रहा हो. मैंने झट से देखा वो वही महिला थी ,हाथ में पत्तल के प्लेट बनाये और उसमें कुछ विविध प्रकार के पुष्प थे , जो देखकर ऐसी लग रही हो मानिए पुजन करने की योजना हो. वो बोल उठी बेटा मुझे याद आ गयी अपनी जगह, मैं अब चली जाऊंगी. वो फुल के पत्तल वाले प्लेट को पुजा रुम के आगे श्रद्धा से रखी.सारे घर में साफ सफाई , पोछा लगाने के बाद बाल्टि से पुजा रूम और तुलसी मंडप को बडे श्रद्धा से धो दी.
मैं उनके हरेक काम पर पैनी निगाह बनाये हुए था. तभी वो अंदर लीली को जगाने गयी और बोल उठी उठो बहु मैं अब जा रही हूँ मुझे अपनी जगह याद आ गयी है.
झटपट वो उठी और पुजा रुम और अन्य सभी जगह को देखकर खुशी के साथ बोल पडी इतनी मेहनत की क्या आवश्यकता थी अम्मा. वो बोल पडी आप पुजा कर लेना बहु मैं अब चली और वो निकल पडी.
मुझसे रहा न गया मैं बोल पडा, मैं आपको छोड दुंगा मेरे गाडी में बैंठें आप. वो असमंजस भरे स्वभाव से बैठ गयी. मैं उनके बताये रास्ते पर गाडी चलाते रहा .तीन नंबर वाली गली के समाप्ति के मोड पर संकिर्ण गली के पास वो रूकने को बोली. रूकते ही झटके के साथ वो उतर कर बगैर कोई बात किये वो चल पडी. मैं बीच रास्ते पर कार खडी न कर सकता था. सो पार्किंग के जगह तलाशते हुए गाडी लगाने में मुझे पांच से सात मिनट लग गये थे. मैं तुरंत ही उस रास्ते पर तीव्र गति से जा रहा था , जिस ओर वो महिला गईं थी . मुझे वह दिखाई न दे रही थी. लेकिन मैं बढते गया और बढते गया .कुछ दुरी पर ही एक टुटे से दरवाजे के अंदर महिलाओं की मंडली नजर आ रही थी . मैं अपने आप को छिपाकर दरवाजे के अंदर झांकने का प्रयास किया. समझते देर न लगी यह एक वृद्धाश्रम है , जहां मेरी आंखे उसे देख रही है. वो हंसते हंसते बोल रही है -- मैंने बहुत बडी गलती की है कल , झुठ बोल के बहुत बडा पाप किया है मैंने. मैं एक अनजान के घर घुस गयी , बोल गयी कि मेरी याददाश्त खो गई है मुझे कुछ समय में याददाश्त वापस आ जायेगी और मैने वहाँ शरण ले लिया काफी मशक्कत के बाद. मै बेटा पोतहु और घर वाली जिंदगी जी करके आई हूँ, ईश्वर का धन्यवाद मेरे पाप अब वो ही माफ करना .मुझसे रहा न गया. मैं अंदर प्रवेश करके उनके हाथ पकड लिये और बोल उठा किसने कहा आपने झुठ बोला है , पाप क्या होता है --?- मैं ही हूँ आपका बेटा आज से आप मेरे साथ रहेंगी . इस बेनामी रिश्ता को क्या कहेंगे आप --? कोई बच्चे को तो गोद लेता ही है ,क्या कोई मां की भीआंचल ला पाता है --?
©®पवन मिश्रा (दुमका-झारखंड)
30दिसंबर 2023
(3)*गलत कौन--? *
(7)कहानी --- रोशनी
(17) कहानी -- बीस साल बाद
(10) कहानी --'अनकही दास्तां
(9) कहानी वो सुबह
Sunday, June 16, 2024
कविता -- भ्रम बनाये रखना
जब हो तेरा मन मुझसे दुर ,बहुत दुर जाने का
अचानक से ये इश्क तोड न जाना
अलग न हो जाना मुझसे ऐसे
जैसे विशालकाय पत्थर पहाडों से
टुटकर अचानक जमीन पर गिरा हो धडाम से
छोड जाना मुझे ऐसे कि पता न चल पाये मुझे
मेरे आस पास तेरे होने का
यह संशय तु बनाये रखना
दुरियां अगर बनाना चाहो
तो बनाना कुछ ऐसे
जैसे मताऐ़ं छल करती हैं
सोते हुए शिशुओं पर
अपनी खुशनूमा चुनर ओढा कर ----!
मुझे ऐसे मत त्यागना तुम
जैसे पेड छोड देते हैं सदैव के लिए
पतझड मे अपने पत्तों को
जैसे बरसात मे कोशी की विशाल जलराशि
बहा ले जाती है कोसों कोस बसे
बेखबर तटों को, साथ-साथ बसे जीवन को .
ऐसे न जाना दुर कभी
जैसे कृष्ण चले गये मथुरा से बिन पलटे
जब हटाना ही हो मुझे दुर
तो थोडा कायदे से
धीरे धीरे शनै;शनै;
जैसे दुध जलते जलते खत्म कर देती है अपने स्वरूप
लेकिन एक झटके यकायेक न तोड लेना संबंध
जैसे पतंग अलग हो लेती है डोर से
मत छोड देना ऐसे
जैसे आकाश छोड देती है हमेशा के लिए
जल बुंद और ओले को
बिछडना कुछ ऐसे जैसे
पहाड त्यागती है निर्झरनी को
और निर्झरनी मगन रहती है
भ्रम मे उदगम से जुड़ी होने को
ये भ्रम बनाये रखना कि
तुम मेरे हो
तुम मेरे हो
--पवन मिश्रा (दुमका-झारखंड)
20फरवरी 2024