स्वार्थ बनाम सेवाभाव बनाम व्यवसाय
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चलिए हम और आप चलते हैं, एक सफर पर ----
आस -- पास के परिवेश को समझने ,
कोरोना त्रासदी से प्रभावित हुए कमोबेश हर घर की परेशानी को समझने ।
झारखंड सहित संपूर्ण भारत के शैक्षणिक व्यवस्था में मिशनरीज स्कूलों का बड़ा ही व्यापक और महत्त्वपूर्ण योगदान है , हर गांव -- हर घर तक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा न्यूनतम दर पर उपलब्ध कराना इनका उद्देश्य रहता आया है। ये मिशनरीज स्कूल मदर टेरेसा को अपना आदर्श मानते हैं । मदर टेरेसा के सेवा भाव की कहानी से मैं भी प्रभावित हूं और मैंने भी इन्हें आदर्श मान रखा है लेकिन इनकी सेवा भावना का प्रशंसक हूं , और इनके छुअन मात्र से कुष्ठ रोगी के चंगा हो जाने की कहानी का निन्दक हूं, तर्क की कसौटी पर इस बात के पीछे महिमा मंडन और धर्म प्रचार की प्रकृति को पाता हूं।
मिशनरीज स्कुलो का संपूर्ण भारत वर्ष को एहसानमंद होना चाहिए -- क्योकि ये सभी विधालय जो संपूर्ण भारत वर्ष के लगभग 65 % शैक्षणिक व्यवस्था को संभाले हुए हैं और मदर टेरेसा की सेवा भावना को आत्मसात करके निरंतर हमारी सेवा कर रहे हैैं।
यहां तक की बातों से तो सभी मिशनरीज विधालय सहमत होंगे और गौरवान्वित भी महसूस करेंगे और करना भी चाहिए।
लेकिन जब यही विधालय व्यवस्थापक समूह आपदा को पैसा कमाने वाले अवसर के रुप में देखने लगे तो आप क्या कहेंगे---? कहां गयी इनकी सेवा भावना----? कहां है मदर टेरेसा के भावना की प्रकृति ---?
आप में से किसी के पास ज़बाब हो तो तार्किक आधार पर अपने ज़बाब इसी पटल पर रखने का प्रयास करिएगा।
दुमका सहित अन्य क्षेत्रों के लगभग सभी प्राइवेट विद्यालय अपने सभी कर्मचारियों के वेतन को कम करते हुए 50 से 70 प्रतिशत ही भूगतान कर रहे हैैं।
कई विधालय इनके वेतन बंद किये हुए हैं।
अब इसी व्यवस्था के दुसरे पहलू को देखिए ---- मध्य मई के आस पास से सभी विद्यालयों ने आनलाइन कक्षा का संचालन आरंभ किया । करना चाहिए भी था ---पठन पाठन को जैसे भी हो फिर से संचालित करना बहूत बड़ी जिम्मेदारी थी।
लगभग सभी कर्मी अपने घर से ही संरचनात्मक विकास (ऐंड्रॉयड मोबाईल , ट्रायपोड ,डाटा, ब्लैक -व्हाईट बोर्ड आदि,) कर पठन पाठन कर अपने दायित्वों का निर्वहन विभिन्न प्रकार के कठीन चुनौतियों का सामना करते हुए कर रहे हैैं,और अपने आप को समयानुकूल अपग्रेड कर रहे हैैं।
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। इस प्रकार से यह प्राइवेट शिक्षक समुदाय काफी परेशानी भरे स्थितियों के साथ संघर्ष कर रहे हैैं।
। जबकि विधालय संस्थापक सह संचालक समूह इस आपदा कालीन परिस्थितियों में बच्चों के अभिभावकों से सभी प्रकार के फीस वसूल रहे हैैं --किसी भी प्रकार की कोई रियायत , कोई सहानुभूति इनके मन में नहीं है -- इनके स्वभाव में नहीं है ।
। जबकि इस हेतु राज्य सरकार की मंशा है कि प्राइवेट विद्यालय इस कोरोना आपदा में सिर्फ ट्युशन फीस ही लें। सरकार की हर अपेक्षा कानुनी आदेश से ही लागु हो यह भी तो उचित नहीं।
। हमें यह पता होना चाहिए कि इन सभी विद्यालयों का संचालन और निबंधन एक गैर लाभकारी संस्था के रूप में होता है और सरकार इन्हें विविध प्रकार की रियायतें भी मूहैया कराती है।
। इसी प्रकार से सरकार की यह अपेक्षा एक घोषित कानून के रूप में है, कि कोई भी प्राइवेट विधालय प्रत्येक साल नामांकन फीस नहीं ले सकता है --- इसके प्रत्युतर में कई विद्यालय ने नामांकन फीस का नाम बदलकर सलाना फी/ विविध फीस/ विकास कोष --आदि कर लिया है और सरकारी आदेश को ठेंगा दिखा दिया।
वर्तमान परिदृश्य में जब इनकी सेवा भावना जगजाहिर है, हरेक बच्चों से सभी फीस की वसुली कर रहे हैं तो फिर आप अपने शिक्षकों के वेतन को कम कर दें रहे हैैं ---यह कैसा न्याय-- ?
दुमका स्तर पर यह राहत है की अभिभावकों को फी के लिए नोटिस तो दिये जा रहे हैं -- लेकिन इनकी वसुली कड़ाई से नहीं हो रही है।
अध्यापन के नाम पर बच्चों को आज जो मिल पा रहा है वह बहुत ही कम , अत्यल्प है तथा विधालय का अपना लागत और संचालन खर्च भी आज के दिनों में बहुत ही कम है ।
फिर ऐसे में अभिभावकों से सभी प्रकार के फीस वसूली , अध्यापन के नाम पर बच्चों को प्राप्ति स्तर का न्युन हो जाना, और इन सब के बावजूद शिक्षकों का वेतन आधा कर देना , आप सभी के सेवा भाव और एक गैर लाभकारी संगठन का कैसे परिचायक हो पा रहा है -- समझ से परे है । जबकि आकलन के मुताबिक ट्युशन फीस मात्र ही शिक्षकों के वेतन भुगतान के लिए प्रर्याप्त राशि है।
---- पवन मिश्रा
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