Friday, December 15, 2023

कविता - मन

                मन
रे मन चल तुझे कहीं दुर ले चलते हैं
 तेरी प्रेयसी से तुझे आज मिलाता हूँ 
न होगा जगवालों का कोई पहेरा
न कोई अपना न कोई पराया
मेरा मन और मेरी प्रेयसी
से ही होगी वो
मेरे पल भर की  दुनिया

ढेर सारी बातें होंगी
मन भर मेरी निगाहें
एकटक तुझे निहारेगी
मैं अपने निगाहों से
तेरे चेहरे में छिपी , 
छलक रही वो जाम
अंतिम कश तक
पी जाना चाहता हूँ 
तुझे वो हर बात जो
अब कह जाना चाहता हूँ 
जो अन्तर्मन आज तक कह न पाया
मेरे भावनाओं को जो अब तक
न मिल सका वो मेरा लब
मेरी प्रयितमा तुम 
मेरे अंदर दिल की गहराईयों
में छिपे वो अरमान 
को एक बार खोजना जरूर--!
मेरे निगाहों में अपनी निगाहें
गहराई तक डालना और पढना
मेरे मन को
किताबों के अनपढे
पन्ने की भांति
हरेक पन्ने कहते मिलेंगे
तेरे नाम ,मोहबत ,सोहरत और थोडी
शरारत की इबादत लिखी मिलेगी वहां
जिसे न तु कभी पढ सकी
न मेरा मन कभी मिटा सका
मैं रहूं न रहूँ 
मेरा प्यार तुझे
अंदर से चिल्लाता 
आवाज देता मिलेगा
रग रग मे बसे 
तुम मेरे हो
©®पवन मिश्रा (दुमका झारखंड) 
दिसंबर 12,2023




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