Saturday, May 24, 2025

प्रेम पथ

    नदीया के पार 

ऐ सुनो ना 
लिली मेरी बात सुनो
चलते हैं नदी के उस पार 
रेत पर कुछ सैर करने 
चलते चलते --
जब मैं और तुम 
थक जाऊँ 
तो रेत पर ही बैठ्ठका लगाऐंगे
दुनियादारी से दुर 
बहुत दुर -- बस अकेले 
मैं और तुम 
भींगे -- भी़ंगे रेतों से
बिल्कुल मेरे जैसा 
 बनाना एक गुड्डा 
मैं बना लुंगा तेरी ही जैसी एक गुड़िया
खुबसूरत-- बहुत खुबसूरत गुड़िया 
मानो तो वो गुड़िया भी होगी 
तेरी जैसी विश्वसुन्दरी 
फिर--
फिर अचानक से रेत से बने इस
गुड्डा और गुड़िया को 
ढ़हा  देना तुम -- 
और फिर से बनाना
मेरे जैसा बकलोल -- एक गुड्डा 
और बना लेना इस बार फिर
ठीक अपने जैसा एक कुशाग्र बुद्धि
वाली मेरी चहेती विश्वसुन्दरी -- लिली 
ताकि तुझमें कुछ -- कुछ -- बहुत कुछ मैं रह जाऊँ
मुझमें -- कुछ - कुछ -- बहुत कुछ तुम रहो जाओ --
और लाख हो तकरार हममें 
फिर भी 
तुझमें मैं और
मुझमें तुम 
कुछ -- कुछ ,बहुत कुछ 
एक दुसरे मे दिखता रहें 
जय हो 🚩
©®पवन मिश्रा



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