नदीया के पार
ऐ सुनो ना
लिली मेरी बात सुनो
चलते हैं नदी के उस पार
रेत पर कुछ सैर करने
चलते चलते --
जब मैं और तुम
थक जाऊँ
तो रेत पर ही बैठ्ठका लगाऐंगे
दुनियादारी से दुर
बहुत दुर -- बस अकेले
मैं और तुम
भींगे -- भी़ंगे रेतों से
बिल्कुल मेरे जैसा
बनाना एक गुड्डा
मैं बना लुंगा तेरी ही जैसी एक गुड़िया
खुबसूरत-- बहुत खुबसूरत गुड़िया
मानो तो वो गुड़िया भी होगी
तेरी जैसी विश्वसुन्दरी
फिर--
फिर अचानक से रेत से बने इस
गुड्डा और गुड़िया को
ढ़हा देना तुम --
और फिर से बनाना
मेरे जैसा बकलोल -- एक गुड्डा
और बना लेना इस बार फिर
ठीक अपने जैसा एक कुशाग्र बुद्धि
वाली मेरी चहेती विश्वसुन्दरी -- लिली
ताकि तुझमें कुछ -- कुछ -- बहुत कुछ मैं रह जाऊँ
मुझमें -- कुछ - कुछ -- बहुत कुछ तुम रहो जाओ --
और लाख हो तकरार हममें
फिर भी
तुझमें मैं और
मुझमें तुम
कुछ -- कुछ ,बहुत कुछ
एक दुसरे मे दिखता रहें
जय हो 🚩
©®पवन मिश्रा
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