Thursday, May 7, 2020

कोरोना के वैश्विक कङुवाहट में भारतीय वित्त

कोरोना के वैश्विक कङुवाहट में भारतीय वित्त
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                         ( 01)
       कोरोना से उत्पन्न वैश्विक हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं । 13.6 ट्रिलियन डालर इकानामी की  विशाल अर्थव्यवस्था  के साथ दुनिया की दुसरी सबसे बङी इकानामी वाले चीन के विकास का आकलन जब विश्व बैंक ने 6,3 जी ङी पी के साथ ग्रोथ कर रहे देश को 0,1 से भी नीचे नकारात्मक विकास दर पर जाने का संकेत दिया हो तो निश्चित रूप से विश्व स्तर पर चिन्ता के बादल साफ साफ मंङराते हुए देखे जा सकते हैं । आज के दिन में चीन और अमेरिका विश्व व्यापार की दिशा और दशा तय करते हैं ।भारत अपने वैश्विक व्यापार का 43% चाईना से ही आयात करता है--65% दवाई और इससे समबद्ध रसायन , 90% मोबाईल और इसके एक्सेसरीज, 45% अन्य इलेक्ट्रॉनिक समान, तथा भवन निर्माण एवं फिनिसिन्ग  के 60% समान भारत चाइना से ही आयात करता आया है। विश्व के सबसे बड़े मेन्युफेक्चरर और निर्यातक चीन से अंतरराष्ट्रीय व्यापार अब भय और संशय के माहौल में है।  पूर्वी ऐशिया में एक करोङ दस लाख आदमी गरीबी रेखा से नीचे पुनः आ जायेंगे ऐसा विश्व बैंक का मानना है । मौत के हर रोज बढते आकङे ने विश्व महाशक्ति अमेरिका को लाचार सा कर दिया इस कोरोना तान्ङव ने।

          कच्चे तेल के दाम हर रोज गिर रहे हैं, खपत कमते जा रहा है । कार निर्माता के प्लान्ट बन्द पङे  हैं । बजार में  इनके खरीददार  अचानक चुप सा हो गये हैं ।  वैश्विक व्यापार कमोबेश बंद है । आई एम एफ के प्रमुख अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने वैश्विक विकास का आकलन इस वित्तीय वर्ष के लिए -3% तय किये हैं । विश्व स्तर पर 75लाख करोङ के नुकसान का तार्किक अनुमान लगाया है। 2020 में  विकसित देशो की अर्थव्यवस्था 6% तक गिरने का अनुमान लगाया है  ।  वैश्विक चिन्तनीय स्थिति से निकल चलिये भारत की स्थिति पर विचार किया जाय ।

                  भारत की लाइफ लाइन भारतीय रेल जहाँ 2करोङ 30लाख यात्री हर रोज यात्रा करते हैं--आज ठप है, यह यात्रा व्यवस्था । सम्पूर्ण भारतवर्ष में  मिङ ङे मिल(मध्याह्न भोजन) योजना परिस्थिति जन्य बाध्यता और संरचनात्मक अभाव के कारण बन्द पङे हैं ,और इससे लाभान्वित होने वाले बच्चे 12करोङ 69लाख 15हजार 460 बच्चों को हम महज 4 रूपये से लेकर सात रूपये के बीच का एक थाली  भोजन तक देने की सुविधाजनक स्थिति में नहीं हैं ।    कारखानों के चिमनी शान्त हुए 50दिन से उपर बीत गये। गोदामो में बने पङे हुए नये समानो की मांग रूक गयी है। निर्यात हो नहीं रहे और आयात करने की सुविधाजनक स्थिति में हम हैं नहीं । रईश जनों का शेयर बाजार औंधे मुंह भरभरा कर रोज गोते लगा रहे हैं और लगभग ₹45लाख करोङ कोरोना के जहर रूपी सागर में ङुब गये हैं । विदेशी निवेशकों ने एक लाख करोङ से ज्यादा की निकासी इन दिनों कर लिया है। भारतीय रूपये  अपने मूल्य ह्रास रोक नहीं पा रहे हैं और यह 01 ङालर 76रूपये की स्थिति में पहुँच चूका है । पर्यटन,  होटल, कालीन, वस्त्र--हैण्ङलुम से संबंधित सभी उधोग धंधे बन्द पङे हैं ।

                सम्पूर्ण देश में श्रमशील आबादी 60%  है, जिसमें से मात्र 09% ही नौकरी पेशा और अन्य संगठनात्मक कार्यों से जुटे हुए हैं,  गैर पंजीकृत और असंगठनात्मक कार्यों से जुटे हुए श्रमिक जो 59%है की वास्तविक संख्या 40से 45 करोङ है , जो घरों में बंद हैं । इनके पास खाना खाने को नहीं हैं और मददगारो के रहमोकरम पर आज इनका पेट पल रहा है। 3'50 करोङ से ज्यादा  श्रमीक कंस्ट्रक्शन कम्पनी में कार्य रत हैं, जो बंद पङे हैं। 20बङे शहरों से लगभग 2'50 करोङ श्रमीक अपने घर को वापस जाना चाह रहे हैं। हम व्यवस्था कर पा रहे हैं सैकङो हजारों के घर पहुँचाने की और तादाद में ये हैं करोङो में।  विदेशों में नीति परिवर्तन और उत्त्पन्न हलात के  मद्देनजर बेरोजगार हो चुके करोङो भारतीय अपने वतन वापसी की अनुकूल परिस्थिति के इंतजार में हैं ।    गौरवशाली विकासशील भारत की एक और सच को हमें निश्चित रूप से गौर करना चाहिए ।  भारत की तुलना अमेरिका और चाईना से करना बिल्कुल गैरतार्किक है। हम भूखे देशों की वैश्विक  सूची क्रमाक (Global hunger index), 117 देशों की सूची क्रमाक में से 102नम्बर पर हैं और पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका से भी हमारी स्थिति बदतर है, इस मामले में ।

हरेक घोर निराशाजन्य परिस्थितियों में कहीं ना कहीं आशा के किरण छिपे होते हैं । हम भारतीय  उसी आशा रूपी किरण से अपने अंधेरे को उजाले में बदलने की कोशिश करें ।

    आई एम एफ ने अभी कुछ समय पहले ही भारत के 2'94 ट्रिलियन ईकोनोमी वाली अर्थव्यवस्था  को समान्य जी ङी पी के आधार पर दुनिया की पाँचवी सबसे बङी अर्थव्यवस्था घोषित किया है, जबकि परचेजिन्ग  क्वालिटी के आधार पर भारत को नम्बर 03 की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था माना है। 
          अभी  विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भारत के विकास दर को 1'9 % विकास दर हासिल करने की संभावना जताया है।  IMF और RBI OF INDIA  ने कोरोना से उत्पन्न हालात पर विचार करते हुए इसे सन् 1929 के बाद सबसे बङी मंदी करार दिया है। आर बी आई ने ज्यादा वित्त उपलब्धता के लिए कई ठोस कदम उठाये हैं, मसलन ₹50 हजार करोङ नबार्ङ, सिङबी और एन एच बी को उपलब्ध कराया ,रिवर्स रेपो रेट को 4% से घटाकर 3'75% किया गया इससे भारतीय बाजार में धन की सुलभता बनी रहेगी ।
आर बी आई गवर्नर श्री शशिकान्त दास ने ₹476'5 बिलियन ङालर विदेशी मुद्रा की उपलब्धता से देश को अवगत कराया जिससे अगले एक साल तक जरूरी सामनो के निर्बाध आयात हो सकेंगे । खरीफ फसलों के  पैदावार में  37% वृद्धि  और अगामी मानसून की संतोषजनक भविष्यवाणी भारत के सुखद स्थिति को इंगित करता है। वर्तमान विषम हालात पर भी 91% ए टी एम मशीन कार्यरत हैं और देश में पैसे की कोई कमी नहीं है। लेकिन बिजली की मांग में 30% की कमी और निर्यात में 34%की गिरावट देश के कठिन और चिन्तनीय वित्तीय स्थिति को जरूर स्पष्ट करता है। होटल व्यवसाय को हर दिन पाँच करोङ से ज्यादा का नुकसान हो  रहा है जो अर्थव्यवस्था को कमजोर कर रहा है। इसके बावजूद भारत के पास खाद्यान्न के पर्याप्त बफर स्टॉक हैं जो देश के खाद्यान्न खपत के मामले में अगले तीन साल के लिए चावल , दो साल से ज्याद के लिए चीनी का प्रयाप्त भंडार है , जो देश के सुखद स्थिति को इंगित करता है।

      सङक परिवहन और राष्ट्र राजमार्ग मंत्रालय ने इन चिन्ताओ पर गौर करते हुए 22 मे से 7ग्रीन एक्सप्रेस हाईवे पर कुछ शर्तों के साथ काम शुरू कर दिये हैं, जिससे श्रमिकों के बेरोजगारी और भुखमरी पर नियंत्रण लाया जा सके। विभिन्न राज्य सरकारों और केन्द्र सरकारों ने भी गरीबी रेखा से नीचे जी रहे लोगों और जन धन खाता धारी को शुरूआती तौर पर कूछ कुछ रूपये उपलब्ध कराना शुरू कर दिये गये हैं ।

        सन्1918में स्पेनिश फ्लू भारत में भी फैले थे और हालात कमोबेस आज से ज्याद भयावह थे । इस महामारी में एक करोङ अस्सी लाख के मारे जाने की सरकारी सुचना थी। हमें उन स्थिति को याद करते हुए सबक लेने की और मजबुत टास्क फोर्स गठन करने की जरूरत थी । 30 जनवरी को भारत सहित विश्व बिरादरी ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के हाई एलर्ट को हल्के में लिया था । 27फरवरी और 11मार्च को जब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 'पेन्ङेमीक ' रिपोर्ट एलर्ट भारत के लिए जारी किया तब जाकर भावी खतरे की गंभीरता पर गौर किया गया । यद्यपि हम ब्रिटेन ,अमेरिका ,इटली, जैसे अन्य देशों से अच्छे स्थिति में हैं ,तो यह भारत की कुशल राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था को दर्शाता है ।

     हमें याद करना चाहिए अपने भूतकाल को --1947 में जब हम आजाद हो रहे थे तो भारतीय मुद्रा एक ङालर बराबर थे तीन रूपये के, यह वह परिस्थिति थी जब अंग्रेज  मनोनुकूल आर्थिक दोहन हमारे संसाधनों का कर चुके थे। हमारी समकालीनअर्थव्यवस्था पूर्णतया ग्रामीण और कृषि अधारित थी। आज भी कृषि और वनस्पति अधारित प्रोत्साहित उधोग धंधे संपूर्ण देश की बेरोजगारी को खत्म करने की क्षमता रखता है, जरूरत है ईमानदारी से इस ओर हम आगे बढें । निकट भविष्य की चुनौतियों पर भी हमें गंभीरता से तैयार होने चाहिए ।  विचारणीय- जो  रास्ते गांवो से महानगरों की ओर जाते हैं-वही रास्ते महानगरों से गाँवों की ओर भी आते हैं ।
*****************************शुभकामनाओं सहित सादर धन्यवाद्
@पवन मिश्रा

      

            

    

 

            

    

 

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