Saturday, July 18, 2020

अंक शास्त्र में उलझता जीवन शास्त्र

        अंक शास्त्र में उलझता जीवन शास्त्र
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         सी बी एस ई बोर्ड, आई सी एस ई बोर्ड , दिल्ली बोर्ड, झारखंड जैक बोर्ड बिहार बोर्ड सहित  लगभग सभी राज्यों के दसवीं और बारहवीं के परीक्षा परिणाम घोषित होने आरंभ हो चुके हैं । सन् 2010 से पूर्व आप ऐसे परिणाम की कल्पना नहीं कर सकते थे और सन्2000 से पूर्व जिन्होनें भी मैट्रिक और इंटर की परीक्षा पास की हो उनके लिए तो समाजशास्त्र और भाषा साहित्य जैसे विषयों में ङिसटिन्कसन(75%)  मार्क्स लाना ही बहुत बड़ी उपलब्धि के तौर पर माना जाता था । आज परिस्थिति अलग है । नब्बे प्रतिशत नम्बर लाने वाली अनुष्का , जहान्वी, अक्षय जैसे हजारों  बच्चे-बच्ची इस लिए परेशान हो रहे हैं--रो रहे हैं कि उसे बढिया कालेज में दाखिला शायद नहीं मिल पायेगा, उसे और उनके अभिभावको को पन्चानबे (95%) प्रतिशत नम्बर की अपेक्षा थी।

               अपेक्षा और उनके अनुकूल मेहनत निश्चित रूप से बहुत ही ज्यादा अच्छा है--लेकिन महत्वकांक्षा का स्तर इतना ऊँचा कभी न होने चाहिए कि अगर यह पुरा ना हो पाये तो हमारे बच्चे डिप्रेशन का शिकार हो जाये और उनमें  निराशावादी मानसिकता घर कर जाये, कुछ गलत कर जाये।
 
       अंक शास्त्र के मायाजाल में समूचा जीवन शास्त्र ही आज उलझता जा रहा है। दिल्ली , प्रयागराज , रांची, पटना सहित कुछेक क्षेत्रों से बच्चों के आत्महत्या करने जैसी बुरी खबर हरेक परीक्षा फल प्रकाशन के बाद आना एक दुखद परिस्थिति को दिखाता है। इसके लिए बच्चों से ज्यादा हम अभिभावक , शिक्षक और इनके परिवेश इस हेतु जिम्मेदार हैं ।

        एक आकलन के मुताबिक सन् 2010 के बाद से मैट्रिक और इंटर  पास करीब करीब 60% ऐसे बच्चों की संख्या हमारे आस पास है जिनके प्राप्तांक 75% से उपर हैं । सन् 2020 में तो यह ङाटा और चौंकाने वाला है --90% से उपर अंक प्राप्त करने वालों की  छात्र संख्या इस वर्ष पास किये हुए  कुल छात्रों का 15% है।

     अब तर्क की कसौटी पर इन्हें समझने का प्रयास किया जाय । अखिल भारतीय स्तर पर मेङिकल और इन्जीनियरिन्ग के सर्वोच्च कालेजों  में नमाकंन के लिए आयोजित होने वाले प्रतियोगी परीक्षा सहित सिविल सेवा परीक्षा में 70% से 75% प्राप्तांक लाने वालों के लिए , अब तक यहाँ नमाकंन हेतु जगह सुरक्षित होता रहा है। मतलब आई आई टी और एम्स में  पढाई हेतु आयोजित किये जाने वाले परीक्षाओ में   बच्चों का उपलब्धि  स्तर 70-75% के बीच  ही रहता है।

        अब इसी तथ्य का दुसरा पहलू देखिए --- हमारे यहाँ उसी स्लेबस /पाठ्यक्रम पर  पास किये 60% बच्चे ऐसे हैं जिन्हें इन बोर्डों ने 75% से उपर का प्राप्तांक वाला अंक पत्र दे रखा है। इनमें अधिकांश बच्चे दर दर की ठोकर खा रहे हैं--कोचिंग संस्थानों में और कैरियर के लिए संघर्ष रत हैं । तार्किक आधार पर 85% और इससे उपर प्राप्तांक वाले बच्चों को किसी भी कोचिंग संस्थान की आवश्यकता ही नहीं महसूस होनी चाहिए--क्योंकि उसे उच्च संस्थानों में नमाकन हेतु लाने हैं मात्र60--65%  और उसी स्लेबस /पाठ्यक्रम पर कुछ ही दिन पूर्व उन्होंने हासिल किया है85% या इससे भी ऊपर।

      यही है अंकशास्त्र का माया जाल। रटन्त विधा और सलेक्टीव स्टङी परीक्षा में अंक का इजाफा अवश्य करा सकता है, प्राइवेट स्कूलों में लिये जा रहे अत्यधिक फीस के वनिस्पत हम अभिभावकों को संतुष्टि का ऐहसास भी कराते हैं  यह अंक शास्त्र का माया जाल --लेकिन संघर्ष पथ  पर व्यवहारिक तरीकों से हमारे बच्चे दौङ लगाने  में कितने सक्षम बन पा रहे हैं यह अभिभावक, शिक्षक  और हमारे बीच उपलब्ध सभी शैक्षणिक निकायों को गंभीरता से सोचना चाहिए।

   अंकों का यह मायाजाल मृगतृष्णा जैसा ही तो है। जरूरत है हम क्षमतावान बनें । पढाई में रचनात्मकता का समावेश हो । अंकों के मायाजाल रूपी इस प्रतिस्पर्धी परिवेश से हमें निकलने की आवश्यकता है । शैक्षणिक तौर तरीकों को इक्कीसवीं सदी के अनुकूल और अन्तराष्ट्रीय गुणवत्ता आधारित पैमाने पर विकसित करने की आवश्यकता है । तभी हम आने वाले उज्जवल भविष्य के साथ सम्मुन्नत भारत की कल्पना कर सकते हैं ।

           पवन मिश्रा
     

1 comment:

  1. अवस्निया प्रेरणा सभी अभिभावक, शिक्षक एवं होनहार बच्चो के लिए🙏🙏🙏बहुत बहुत आभार सर 🙏🙏

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