पूछता है भारत --- कहां है रोजगार --?
कहते हैं असली दोस्ती की पहचान मुसीबत के समय होती है। और सच्चे दोस्त मुसीबत में आपके सहयोगी होते हैं, आपको मुसीबत से निकालने में मददगार। सच्चे दोस्त आपको भटकते मार्ग पर चलने से रोकते हैं, और नेक मार्ग पर चलने को विवश करते हैं ।
मन की बात (30अगस्त सन् 2020) के लाईव प्रसारण में जब देश की जनता ने सोशल मीडिया पर पसंद के बनिस्पत नापसंद बटन को लगभग डेढ़ गुणा ज्यादा बार दबाया हो ,तो परिवेश में गंभीर सवालात खड़े होने लाज़िमी हैं। इतना ही नहीं देश के बेरोजगार जनों ने सोशल मीडिया पर 'बेरोजगार मांगे रोजगार"और अपने अपने नामों के आगे बेरोजगार शब्द को लिखकर हैशटैग के साथ ट्रैंड कराया।
मई सन्2019 में जिस नरेंद्र मोदी को देश के कुल मतदाताओं में से 38-5% मतदाता ने 336 सीटों के साथ ढ़ेर सारी अपेक्षाओं को पुरी करने की जिम्मेदारी सौंपी थी , देश का राजसिंहासन सौंपा था क्या उससे जनता का मोह भंग हो गया--? जिस सोशल मीडिया पर मोदी अपने चुनावी नारे और देश के प्रति उनके भावी कार्यो का रोड मैप प्रभावी तरीके से रखने में कामयाब हो पाये थे , देश की बहुसंख्यक जनता का विश्वास अपने पक्ष में आकृष्ट कर पाने में सफल हो पाये थे, क्या वही जनता अब अपने को ठगा ठगा महसूस कर रहा है--?
क्या अब सोशल मीडिया पर पसंद और नापसंद देश के राजनीति की दशा और दिशा तय करेगा---? जिस सोशल मीडिया ने नरेंद्र मोदी को वैश्विक हीरो , जन जन का नेता और जादुई छवि वाले नेता के रूप में स्थापित किया था , वह सब क्या एक बालू के भीत की तरह धरधरा कर गिरने ही वाला है---? क्या देश एक नये विकल्प की ओर देख रहा है--? क्या हमारे पास विकल्प है भी--? सन् 2019 में जिस कांग्रेस को संपूर्ण लोक सभा के दस प्रतिशत सीट पर भी जनता ने न स्वीकारा हो, सत्तर साल तक भारतीय राजनीति की धुरी रहे, सत्तासीन रहे पार्टी जब पहली दफा तकनीक रूप से विपक्ष का तमगा तक हासिल करने में नाकामयाब रहा हो , लडखडाती ,डगमगाती कांग्रेस क्या बन पायेगी चरमराती अर्थव्यवस्था वाले वर्तमान संकट का खैवनहार---?
आईए गौर करते हैं, वर्तमान समस्या को। हालिया आए रिपोर्ट में दुसरी तिमाही का जी डी पी -23.9% पर पहुंच गया है। बिल्कुल स्पष्ट है-- यह दौर काफी संकट भरा है । जी डी पी यानी ग्रास डोमेस्टिक प्रोडेक्ट का यह डाटा अप्रैल --मई--जून माह के तमाम गतिविधियों पर आधारित है जहां हम कुल उत्पादकता को पाते हैं। और हमें यह याद रखना चाहिए कि यह काल वही समयकाल है जब देश में पूर्ण लाकडाऊन था , फैक्ट्रीयां, कल कारखाने , रेल , सहित लगभग सभी गतिविधियां पूर्ण रुप से बन्द थे और तमाम अर्थशास्त्री को इस बात का अंदेशा था।
आज के हालात में जब संपूर्ण विश्व सहित भारत , कोरोना प्रभाव कारण गंभीर रूप से प्रभावित है--- तो निश्चित रूप से ऐसी स्थिति में कोई भी व्यवस्था संचालक अपनी जिम्मेदारी के सूची में सर्वोच्च प्राथमिकता मानव जीवन की सुरक्षा को देगा । एक घर का मुखिया जब अपने परिवार में लगातार बिमारी का संक्रमण देख रहा हो तो वैसी स्थिति में परिवार के सभी सदस्यों के भोजन और चिकित्सा के अलावे , उसे क्या कुछ और दिख सकता है--? यही तो हमारे देश के प्रधानमंत्री जी कर रहे हैं। 'राइट टू फ़ुड' और 'वन नेशन वन राशन कार्ड' इसी दिशा की ओर बढ़ते कदम को तो इंगित करता है। एक बात बिल्कुल सच, जिसे हम हर भारतीय को स्वीकारना चाहिए कि हमारे आज के इकानामी की तुलना अमेरिका और चाइना के अर्थव्यवस्था से नहीं की जा सकती है । निरंतर सीमा संघर्ष, पाकिस्तान ,चाइना, नेपाल जैसे पड़ोसी देशों के जगजाहिर इरादा से निरंतर निपटना और चुनौती को कुशलता से समाधान करने के पीछे अर्थव्यवस्था का बड़ा सा हिस्सा जो गैर नियोजित है -हर रोज खर्च किये जा रहे हैं, और इसे किसी भी कीमत पर टाला नहीं जा सकता है। इस प्रकार से असंभावित , अनायास दो तरफा मुसिबत किसी भी देश के आंसुतलन के लिए प्रर्याप्त वजह हो सकते हैैं।
जी डी पी के गिरावट की वैश्विक स्तर पर अगर भारत से तुलना की जाय तो -- अमेरीका सहित लगभग संपूर्ण विश्व नकारात्मक जी डी पी के डाटा को ही दिखा रहे हैैं। वैश्विक मंदी के इस दौर में अमेरिका, फ्रासं , इटली आदि देशों में अबतक के अपने पिछले तमाम बेरोज़गारी के रिकार्ड को तोड़ दिया है--- भारत भी कमोबेश इसी वैश्विक मंदी को दृश्य पटल पर दिखला रहा है।
देश के इस चिन्ताजनक माहौल में भारत सरकार द्वारा 'CET'-- 'कौमन इलिजीबलिटी टेस्ट' की घोषणा बेरोजगारों के लिए निराशा के बीच एक आशा की खबर अवश्य है । इसी प्रकार से कल कारखाने, रेल आदि के आंशिक संचालन की शुरुआत , शेयर सूचकांक का ग्राफ बढना ये सभी अर्थव्यवस्था रुपी गाड़ी को वापस पटरी पर आने और सरपट दौड़ की तैयारी को दर्शाता नजर आ रहा है।
लोकतंत्र में असंतोष और विरोध के जायज तरीके हर समय स्वीकार्य होता है । हमारे देश को बिहार के जयप्रकाश नारायण का जन आंदोलन नहीं भूलना चाहिए--- एक ओर यह सत्ता पक्ष को तानाशाही करने से रोकता है तो दुसरी ओर जन जन को उनके अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने की सीख देता है। सोशल मीडिया पर यह असंतोष और नापसंद की बटन तो ज्वालामुखी के क्रेटर और लार्वा कि तरह है -- जिसे ससमय उचित निष्पादन न होने के स्थिति में भयंकर भूकंप और विस्फोट की संभावना को ही जताता है। हमें धैर्य के साथ विश्वास अपने द्वारा चुने हुए जनप्रतिनिधियों पर और प्रधानमंत्री पर होने चाहिए जो इस संकट से देश को बाहर निकालने कि दिशा में आगे बढ़ चले हैं।
------- पवन मिश्रा , दुमका ( झारखंड)
मोबाईल नम्बर --9931126996
Gmail--- pawan19755@gmail.com
सादर धन्यवाद
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