चिल्लाती -झकझोरती पत्रकरिता की आत्मा-----------युगल से गुगल तक
*****************************
पत्रकारिता शब्द अंग्रेजी भाषा के शब्द जर्नलिज्म का हिंदी अनुवाद है ,और इसका मुल शब्द जर्नल है जिसका हिन्दी अर्थ दैनिक होता है। इस प्रकार से पत्रकारिता के तहत दैनिक हलचल से आम जनों को अवगत कराने के प्रयास और इसमें निहित विविध आयामों को हम देखते हैं।
पुरातन संस्कृति से निरंतर आज तक उपलब्ध व्यवस्थाओं को व्यवहार में लाकर जन व्यापकता के हित कि बात सरेआम प्रसारित किया जाता रहा है। इस मामले में आदिवासी संथाल समुदाय द्वारा सखुआ पत्ता बांटकर और डुगडुगी बजा कर जन चेतना को जागृत करने की बात तथा अपने समाज के पुरातन परंपरा को आज तक व्यवहारिक रुप से प्रयोग में लाने की बात को गंभीरता से विचार किया जा सकता है। मुगलकालीन खबरनवीसो के भी समकालीन संचार प्रसार में अहम योगदान थे।
आधुनिक काल यानी अंग्रेजों के आगमन और मुगल अवसादान काल से पत्रकारिता के वर्तमान स्वरुप का हम शुरूआत देखते हैं। 'उदंड मार्तंड' एक हिंदी समाचार पत्र जिसे पत्रकारिता के मामले में एक सुव्यवस्थित शुरूआत (30 मई1826) कहा जाता है और इसके संपादक थे युगल किशोर शुक्ल। इसी युगल से गुगल तक की पत्रकारिता ने अपने मौलिकता से समझौता सा कर लिया है--- कुछ तो इनकी जरुरत थी और कुछ बदलते दौर के बदलते तकनीक की आवश्यकता थी आज की पत्रकारिता। कलांतर में भारतेंदु हरिश्चंद्र जिसे हिंदी साहित्य और नवजागरण के अग्रदूत के रुप में ख्याति मिली उन्होंने हरिश्चंद्र मैग्जीन , हरिश्चंद्र चंद्रिका, कविवचन सुधा और समाधार सुधावर्षण जैसे समकालीन अनेकों माध्यम से पत्रकारों कि आवाज को जन जन तक पहुंचाने का कार्य किया।
1780 में जेम्स अगस्टस हिक्की द्वारा प्रकाशित बंगाल गजट तथा राष्ट्रीय प्रेस के संस्थापक राजा राम मोहन राय द्वारा संवाद कौमुदी और मिराउतुल अखबार सहित ये सभी भारतीय पुनर्जागरण और प्रगतिशील राष्ट्रीय जनतांत्रिक प्रवृत्ति को ही प्रसारित कर रहे थे। कलांतर में यही हिंदी पत्रकारिता राष्ट्रीय आंदोलन के अग्र पक्ति में संघर्षरत थे और ब्रिटिश शासकों के जनविरोधी नीतियों को जन जन तक पहुंचाने के लिए प्रयासरत रहे।
भारतीय लोकतंत्र के तीन मजबुत स्तंभ हैं ---- कार्यपालिका , न्यायपालिका और विधायिका । आजाद भारत में पत्रकारिता के महत्व को जन जन ने स्वत: स्वीकारा और इसे एक सजग प्रहरी , सच के सिपाही , लोकतंत्र के चौथे स्तंभ जैसे विशेषणों से इसे विभुषित किया गया है। लेकिन पत्रकारिता का वर्तमान स्वरूप क्या इन विशेषणों को और इनसे संबंधित उत्तरदायित्वों को ठीक ठीक वहन कर पा रहा है---? इसी क्रम में सोशल मीडिया के मंच पर स्वपत्रकारिता का आना पत्रकारिता के मौलिक स्वरूप को ही धाराशाही करता दिख रहा है। पत्रकारिता की आत्मा कभी भी सच से विचलीत होने की इजाजत नहीं देता है , भाषायी मर्यादा का पालन और व्यैक्तिक अनुशासन इनके हर शब्द में दिखनी चाहिए। लेकिन पत्रकारिता के गिरते स्तर ने ही पप्पु ,बुआ ,बबुआ, भक्त,अंधभक्त,चम्मचे, फेकु जैसे शब्दों को प्रतिस्थापित कर दिया है जिसे बखुबी एक दुसरे की भावना से खेलने और उत्तेजित करने के काम लाया जा रहा है और सच से वर्तमान को भटकाने के लिए इन शब्दों का प्रभावी प्रहार किया जा रहा है।
' कोबरा पोस्ट वेबसाइट ' नामक एक संस्था ने सन् 2018 में एक स्टिंग आपरेशन चलाया । इस स्टिंग आपरेशन में भारतीय मीडिया के सभी आयामों ( प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सोशल मीडिया ) के लगभग एक सौ छत्तीस प्रभावशाली मंचों पर -- पुष्प शर्मा ने अपने मनोनुकूल बातों को प्रसारित करवाने का प्रयास किया । आपरेशन 136 नाम से प्रकाशित अपने सार्वजनिक रिपोर्ट में इनका दावा है कि भारतीय मीडिया को लालच देकर आसानी से मनोनुकूल खबरें प्रसारित किया जा सकता है। जातीय दंगे, सरकारी कार्यों के प्रभाव को बदनाम और जनता के अनुकूल और प्रतिकुल बताना सब कुछ कराया जा सकता है-- लाभ पहुंचाने की सहमति पर। इस मामले में 136 में से सिर्फ 'दैनिक संवाद' और 'वर्तमान पत्रिका'
नामक दो जगहों पर इसे असफलता हाथ लगी थी। स्पष्ट है, पत्रकारिता के अंधे युग में भी सच वाली रोशनी की किरणें अभी भी कहीं न कहीं जुगनू कि तरह चमक रही है , जिसके वाहक कम हैं इसे बचाने की महती आवश्यकता है। विश्व प्रेस मीडिया इंडेक्स में भारतीय मीडिया के गिरते स्तर चौंकाने वाले हैं। 2018 में यह 136वे पायदान पर था और भविष्य में इसके और नीचे गिरने की संभावना बताया गया है।
आदर्शों और वुसुलो की पत्रकारिता का पाठ पढ़ाई करने वाले , युगल किशोर शुक्ल के उतंड मार्तंण्ड को आदर्श मानने वाले पत्रकारिता की शुरूआत करने वाले अनजाने में ही बातों बातों में अपना दबदबा इस तरह बढ़ाते चले आये हैं,मानिए वह सच में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की भुमिका के साथ साथ नीति नियंता की भुमिका में हों---- गरजन और डांट डपट तो आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का आवश्यक हिस्सा सा बन गया है। इन्हें मतलब है सिर्फ अपने टि आर पी से। पुंजीपति घरानों का राजनीतिक महकमों से अनुनय संबंध और इसी कड़ी में मीडिया का प्रवेश एक तिकड़ी समीकरण बनाता रहा है जो स्वहित के लिए सभी वसुलो और आदर्शों पर भारी साबित कर रहा है। जब सत्ता मीडिया को अपने चरणों में लेटने का इशारा कर रहा हो और मीडिया के अधिकांश घराने खुशी खुशी ऐसा करने को उत्साहित हो रहे हों तो खबरें कितनी सच और कितनी झुठ आ रही है इसका आकलन कर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। जहां जनता भी झुठ की खबरों को बगैर तर्क के चुपचाप सच मान सुनते ही गदगद हो जा रहा हो वहां सच के इक्के दुक्के सिपाही आखिर कब तक अपने दम पर इस अंधेरे से लड़ेंगे ।
पवन मिश्रा
दुमका झारखंड
पिन-- 814101
Email--
pawan19755@gmail.com
No comments:
Post a Comment