--------यादें----------
परिदृश्य देखो
ये मैं नहीं परिवेश बोल रहा है
मैं आप और सारा हालात यही कह रहा है
कोरोना भय और संशय के बीच
मानव को तड़पा तड़पा कर
बेचैन कर रहा है
कभी अनजाने नम्बर
तो कभी अपनों का फ़ोन
मन को कर देता है,
अशुभ,सशंकित और अप्रिय समाचारों
के संभावित खबरों से बेचैन
जानता हूं, इसपर नहीं है किसी का नियंत्रण--
और फिर अगले ही पल
सर्व स्नेहिल जनों के रक्षार्थ करता हूं सर्वशक्तिमान का स्मरण
फिर स्मरण करता हूं
धुंआ ---
सुखे पत्ते राख और
मोटे मोटे डालियों के साथ कैसे
अपनों से अपनों को तन्हा
कर उड़ता जा रहा है
ये यादें मेरे नये पुराने जख्मों
को कुरेद कर ताजा कर जा रहा है
हर दिन यादों के कुछ गुलदस्तों से
सुंदर सुंदर फुल मुरझा रहे हैं
पर यादें तो अब भी हैं ताजा
और ये यादें ही हैं
जिसे सिरहाने रख
सुनता हूं और सुनाता हूं
अपने को रोज एक कहानी
©पवन मिश्रा
दुमका- झारखंड
814101
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