'बेखबर'
हमीं से हमीं तक
रह गया वो
ख्वाब हमारा |
बेकदर सभी ने खोल डाला
बंद पिटारा हमारा |
आरमां थे संजोये मैंने ,
टुटते बिगडते रिश्ते
सब कि अथाह कद्र |
इस कदर सजोये ,
कि हवा के झोंकों में
कभी जो खुल सकते वो सारे पन्ने ,
खुशबूदार हरियाली का वो
कालखंड होता बडा निराला |
लेकिन मैं कागजी नोट तो नहीं
सही गलत हर जगह
सब को खुब पसंद आता |
मेरे दोस्ती की थी मांग ही इतनी
सांसों भर की आक्सीजन जितनी |
जमाने से ये हो न सका
दोस्त तो दोस्त
मेरे सगे , अपने , अपने न हो सके |
अपनत्व का वो बंद पीटारा
सभी अपनों ने खुब घसीटा |
मानवता से भी हुआ जो प्यारा
वहीं पहुंच गया प्यारा बंद पिटारा,
रहनुमाई दिखाता अधिकार जताता
पिटारा टुट गया सब जगह थोडा थोडा |
रूपयों खातिर ईमान उन सब ने छोडा मानवता का जो रखते थे मजबुत हथौड़ा |
पिटारा अब रह न सका
धुर्तता जो सह न सका ,
रुपैया वो सबको प्यारा था
पिटारा हमीं से अब न्यारा था |
माया खातिर सब पलट गया
जजबातों पर पर्दा सलट गया |
दुनियादारी सब होते फेल
माया खेलती जब अपनी खेल |
©®-पवन मिश्रा (दुमका)
13नवंबर 2023
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