Tuesday, November 14, 2023

कविता -- 'बेखबर'

'बेखबर'


हमीं से हमीं तक 
रह गया वो  
ख्वाब हमारा |

बेकदर सभी ने  खोल डाला
बंद पिटारा हमारा |

आरमां थे संजोये  मैंने ,
टुटते बिगडते रिश्ते
सब कि अथाह कद्र |
 इस कदर सजोये ,
कि हवा के झोंकों में
कभी जो खुल सकते वो सारे पन्ने ,
खुशबूदार हरियाली का वो 
कालखंड होता बडा  निराला |

लेकिन मैं कागजी नोट तो नहीं 
सही गलत हर जगह 
सब को खुब पसंद आता |

मेरे दोस्ती की थी मांग ही इतनी
 सांसों भर की आक्सीजन जितनी | 

जमाने से ये हो न सका
दोस्त तो दोस्त
मेरे सगे , अपने , अपने न हो सके |

अपनत्व  का वो बंद पीटारा
सभी अपनों ने  खुब घसीटा | 

मानवता से भी हुआ जो प्यारा
वहीं पहुंच गया प्यारा बंद पिटारा,

रहनुमाई दिखाता अधिकार जताता
पिटारा टुट गया सब जगह थोडा थोडा |

रूपयों  खातिर  ईमान उन सब ने छोडा मानवता का जो रखते थे मजबुत हथौड़ा |

पिटारा अब रह न सका 
धुर्तता  जो सह न सका ,

रुपैया वो सबको प्यारा था
पिटारा हमीं से अब न्यारा था |

माया खातिर सब पलट गया 
जजबातों पर पर्दा सलट गया |

दुनियादारी सब होते फेल
माया खेलती जब अपनी खेल |

©®-पवन मिश्रा (दुमका)
13नवंबर 2023

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