कविता
*बेचारा पुरूष*
सुना तो होगा आपने भी
ये पुरुष समाज है--!
जहाँ पुरुषों के होते हैं विशेषाधिकार
और पुरूष प्रधान ही होता रहा है ,मानव समाज
पर मेरे नजरों में सच शायद थोड़ा अलग है
देखा है मैंने बड़े करीब से बहुतों को
इस पुरूषत्व का भारी भरकम बोझ ढ़ोते
मन मसोस कर इच्छाओं को दबाते
और चुपचाप आंसूओ और सिसकियों को
बनावटी मुस्कान में छिपाते
जीवनपथ पर सरपट दौड़ लगाते पुरूष
वास्तविकता के चाबुक से मार खाते उनके सपने
रोजी रोटी के जुगाड़ से ही
जुटते उनके सारे रिश्ते अपने
उनके कमाई से ही तौला जाता उनका व्यक्तित्व
व्यवहार से सिर्फ नहीं जुड़ा होता इनका अपनत्व
क्यों--! क्योंकि ये पुरूष जो है
ये पुरूष किसी भी अनजानी स्त्री को
अपलक गौर नजरों से
कुछ पल ही सही निहार तो ले
अगले ही क्षण बन जाते हैं ये
तौहीन, हिकारत और दुत्कार भरी
नजरों का शिकार ---!
किसी को कोई वास्ता नहीं
पुरूषों के इन नजरों से
कोई नहीं पुछता पुरूषों के मन का विचार
क्यों --! क्योंकि ये पुरूष जो हैं।
प्रेम करते उन पुरूषों को भी मैंने गंभीरता से पढ़ा है
वो बेइंतहां प्रेम करता है
लेकिन अपनी भावनाओं को लबों से बाहर
निकालने का नहीं है साहस उनमें
फौलादी सीना के अंदर
कोमल आवरण से प्रेम को छिपा लेता है ये
चेहरे पर कायरों का मुखौटा पहन
क्यों--? क्योंकि ये पुरूष हैं।
एक पुरूष प्यार में
हकीकत ऐ जिंदगी में
असफल होते अपने मंसुबों के साथ
फुट फुट कर भरदम रो लेना चाहता है
पर उसे रोने की है मनाही
अपनी कमजोरी जगजाहिर करने की है
सख्त पाबंदी उन्हें
क्यों --! क्योंकि ये पुरूष जो हैं
विद्वान -- लेखकों और कवियों ने
किया है तेरे साथ नाइंसाफी -- ऐ पुरूषो
माना कि औरत होना और औरत धर्म को निर्वाह
करना है बेहद कठिन
पर पुरूष बनना और पुरूष को जीना भी है कहाँ आसान
औरतों के झुठे प्रतिस्पर्धी बनते हो तुम
तुम स्वीकारो इसे --!
तुम औरतों के पूरक हो
दिल खोल कर स्वीकारो इसे
क्यों --! क्योंकि तुम पुरूष हो।
--पवन मिश्रा
(दुमका- झारखंड)
धन्यवाद🙏💕
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