बलात्कार -बलात्कारी मानसिकता और समाधान।
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'बेटी बचाओ बेटी पढाओ' के नारे तो हमने बहुत बुलंद किये -- आइए 'बेटा पढ़ाओ समाज बचाओ'को आवश्यक मनोदशा के रूप में विकसित कर बेटियों को सुरक्षित परिवेश देने की कोशिश करें।
रेप शब्द मुल रुप से अंग्रेजी भाषा का शब्द है, जिसका शब्द कोष में बहुआयामी अर्थ है लेकिन बलात्कार को जहां हिंदी भाषा में भी व्यवहारिक रूप से ढेर सारे तथ्यों के लिए इंगित किया जाता रहा है -- वहीं भारतीय दंड संहिता के धारा 375 में स्पष्ट रूप से वर्णित है कि, स्त्रियों से उनके इच्छा के विपरीत जबरदस्ती संभोग करना ही बलात्कार है। और इसके साथ साथ बलात्कार को विस्तार से परिभाषित किया गया है कि किन किन परिस्थितियों को बलात्कार के तहत संज्ञान में लिया जा सकता है।
हमारी संस्कृति औरतों को पुजनीय मानती है। हिन्दु संस्कृति और मानवीय व्यवस्था के बहुआयामी संरचनात्मक आधारगत पुरातन ग्रंथ मनु स्मृति को विभिन्न कालखंडों में विचारकों ने अपने अपने तरीके से हित साधने के रुप में परिभाषित करने का निरंतर प्रयास किया है। (मनु स्मृति 3.56) 'यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते --रमन्ते तत्र देवता' से स्पष्ट है कि नारियों को तत्कालीन समाज में सम्मानजनक स्थान देने और दिलाने की प्रयास रही है और इसकी महत्ता बतायी गयी है। (मनु स्मृति 3.57) ---
शोचन्ति जामयो यत्र विनष्यत्याषु तत्कुलम।
न शोचन्ति तुयत्रैषा वर्धते तछ्दि सर्वदा
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जिस समाज में स्त्रियां शोक और चिन्ता ग्रस्त रहती हैं ,वह समाज शिघ्र ही नष्ट हो जाती है और जिस समाज में स्त्रियां निश्चिंत और सुखी रहती हैं वह सदैव विकासोन्मुख रहता है। हजारों साल पहले लिखी यह बातें आज भी अपनी प्रासांगिकता दिखा रही है।
निर्भया ,डा रेड्डी , मनिषा वाल्मिकी जैसी बहुचर्चित इक्का दुक्का खबरें तो अखबारों और अन्य सभी मीडियाओं में चिल्लाती चिखती हुई हम देशवासियों को सुनाई देती हैं ---लेकिन जब इन प्रकार के वारदातों पर गंभीरता से विचार किया जाय तो आंकड़े हमारे तथाकथित सर्वोत्कृष्ट भारतीय समाज पर थू थू करता हुआ पुरूष समाज को कटघरे में खड़ा करता हुआ दिखेगा ।
अमेरिका की एक संस्था ' रेप क्राइसिस नेटवर्क' ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अवस्थित विविध गैर सरकारी संगठनों के सहारे सन् 2015 से सन्2017 तक इस संदर्भ में जो डाटा इकट्ठा किया है उनके अनुसार क्रमशः मध्यप्रदेश , महाराष्ट्र ,राजस्थान दिल्ली और उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक मामले रेप के दर्ज हैं। राजस्थान , दिल्ली और यु पी के कुल क्राईम में से लगभग 35% क्राईम रेप के हैं। और सर्वे में इसे असुरक्षित शहर के रुप में बताया गया है। सन् 2017 में ही
358849 मामलों में से 32500 मामले रेप के लिए दर्ज हुए हैं। ये सभी मामले तो पुलिस थाने और कोर्ट में दर्ज हैं।
हैरानी होगी आप सब को जानकर और आवाक् हो जायेंगे---पुरे भारत वर्ष में सिर्फ 15% मामला ही घर और समाज की चाहरदिवारी को लांघ कर न्यायालय और थाना पहुंच पाते हैं। और मामले जो हकीकत में घटित हो रहे हैं- हरेक सातवें सेकेंड में प्रताड़ना, हर चोदह मिनट में एक महिला रेप, हरेक घंटे में चार महिलाओं का रेप होता है। भारत में 52%रेप रिश्तेदार और जान पहचान वालों के द्वारा ही किया जाता है , जबकि अमेरिका में 85% रेप के मामले रिश्तेदार और नजदीकी जान पहचान के लोगों द्वारा अंजाम दिया जाता है। इस पर वैश्विक स्थिति को देखें तो रेप के मामले में अमेरिका ही सर्वोच्च स्थान पर है और वहां हरेक तीन में से एक महिला रेप पीड़िता है।
बालात्कार के लिए जिम्मेदार मानवीय मनोदशा के उत्प्रेरण में अनेकों कारक होते हैं- जो परिस्थिति वश अलग अलग होते हैं। फैलता नशा को रेप के 85% मामलों में एक महत्वपूर्ण तथ्य के रुप में देखा गया है । एकातं में मवालियों का चौकड़ी जमाना , पुरूषों की मानसिक दुर्बलता , लचर कानुन, महिलाओं का कमजोर आत्मविश्वास जैसे कारक इन रेप की घटनाओं के पिछे परोक्ष रूप से जिम्मेदार हैं।
पुरूष वादी मानसिकता आज भी महिलाओं को समानता के अधिकार से वंचित करता है। भारतीय समाज सहित संपूर्ण विश्व महिलाओं को 'भोग्या 'के नजरों से ही प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में देखना चाहता है। हरेक चीज़ों के विज्ञापनों में महिलाओं की नग्नता , कामुकता ,, और सीनेमा व सीरियलों में महिलाओं द्वारा ग्राहक सहित दर्शकों को आकृष्ट करने की एक आवश्यक विषय वस्तु सी बन गयी है। मुस्लिम समाज औरतों को बुर्का पहनना, देह दिखावा से परहेज धर्म सम्मत बताता है, और हिन्दू समाज तो औरतों को देवी के रूप में मानता है--- फिर ये औरतें कहां की हैं जो शरीर के नग्न प्रदर्शन को एक व्यापार के रुप में पोषित कर रहा है। दोष यहां विज्ञापन दाता कंपनियों की और औरतों की नहीं है। हमें सच्चाई स्वीकारना चाहिए हम आम आदमी वही देखना चाहते हैं जो वह दिखा रहा है। इन्टरनेट की सर्व उपलब्धता और इस पर पोर्न सिनेमा की व्यापकता, सेक्स भलगरिटी , सेक्स आबजेक्ट और सेक्सुअलिटी के हिट व उत्प्रेरण , लिव इन रिलेशनशिप,एक्सट्रा मेरिटल ऐफेयर , ये सभी प्रत्यक्ष कारक हैं बलात्कार के---जिस पर हमें गंभीरता से मंथन करना ही चाहिए।
राबिन मार्गन (अमेरिकी लेखिका) ने अपने प्रसिद्ध लेख " थ्योरी ऐंड प्रैक्टीस --पोर्नोग्राफी एंड रेप" में बड़े बेबाकी से उल्लेखित किया है कि पोर्नोग्राफी वह सिद्धांत की तरह मानसिकता में प्रवेश करता है -जो व्यवहार में बलात्कार को इंतजाम देता है ।
भारत में जब रेप और बलात्कार दबे जुबान से फुसफुसाहट भरे स्वर में ही सांकेतिक रूप से उच्चरित किये जाने की मान्य स्वीकृत परंपरा थी और इस शब्द को खुलेतौर पर बोलने से उसे अशिष्ट कहा जाता था, महिलाएं सरक कर दुर चली जातीं थी --- उस समय एंटी रेप ऐक्टीभीस्ट के रूप में महिला प्रताड़ना और बलात्कार के विरोध में ( ला फेकेल्टी) कानुन की अध्यापिका लोतिका सरकार ने महिलाओं के हक की आवाज को बुलंद किया और इसे जनांदोलन का रुप दिया था। इनका स्पष्ट कहना था ,कि सिर्फ कानुन और प्रशासन इसके सामाधान नहीं बन सकते ,इसके लिए मानवीय सोच में आमुलचूल बदलाव की आवश्यकता है , जिसे जनांदोलन से ही जागृत किया जा सकता है।
भारतीय दंड संहिता के धारा 376a 376b--c, d , इत्यादि में रेपिस्टों को विभिन्न प्रकार के सजा के प्रावधान किए गये हैं , जो अपराध के प्रकृति और महिला के उम्र पर पर्याप्त साक्ष्य के अनुसार निर्भर करता है । मैं कुछ साल पूर्व एक रेप और हत्या के आरोपों वाला मुजरिम से कचहरी कैंपस में मिला था --मैने उनसे इस जघन्य अपराध के कारन को जानने का प्रयास किया और उसके ज़बाब ने मुझे असहज कर दिया था। उनका ज़बाब था " रेप करने के बाद अगर मैं गुनहगार साबित हो जाता हुं , जो आम तौर पर नहीं हो पाता है तो मुझे फांसी मिलेगी और हत्या करने के बाद भी फांसी --- इसलिए मैंने दोनों ही वारदात एक साथ किया है --- जिसका कोई गवाह नहीं है।" मेरा मानना है हर घर से बच्चों में इस बात की सीख अवश्य विकसित हो -- कि बलात्कार का परिणाम औरत और मर्द दोनों के लिए ही जिंदगी बर्बाद होने जैसा है। औरतों को तो विभिन्न स्तर से राहत और पुनर्वास के उपाय दिये जाते हैैं -- लेकिन पुरूष बलात्कारी तो किसी भी काम का नहीं रह जाता है। हमारे देश के हुक्मरानों और नीति निर्माताओं को याद हो कि महात्मा गांधी ने जब "सत्यवादी हरिश्चंद्र" नामक नाटक देखा था तो उससे प्रभावित होकर ही उन्होंने जिन्दिगी भर सत्यवादी बनने का दृढ़ संकल्प लिया था।इसी तरह नैतिक शिक्षा का स्कुली शिक्षा में प्रभावी समावेश इस दिशा में आवश्यक बदलाव ला सकता है।
धन्यवाद
पवन मिश्रा
दुमका झारखंड
9931126996
Email - pawan19755@gmail.com
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