Thursday, February 20, 2025

कविता

अभी अभी ट्रेन पर यात्रा के दौरान अपने फेशबुक मित्र मनोरंजन झा जी के पोस्ट को पढ़ने के उपरांत एक अनुभूति आप भी अवलोकन करें -- सादर

   *रूको जरा*

बढ़ते उम्र थोड़ा आहिस्ता चल 

बचपन गुजर न पाया 

की जवानी अपनी शाम पर आ गयी 

ऐय मेरी उम्र 

थोड़ा आहिस्ता चल

बांकी हैं कयी हसरतें 

बचपन की नदानी

और बेबाक निर्बाध

मुझे बदमाशी कर लेने दे

जवानी की शाम आ जाये

इससे पहले 

ये इस जवानी

को बढ़िया बढ़िया 

कहानी बना लेने दे

ऐ उम्र थोड़ा आहिस्ता गुजर 

अभी मेरे जीवन की दुपहरीया 

थकी नहीं है 

शाम जो क्यों दस्तक देने पर

है आतुर 

ऐ शाम तुझको भी जीऊँगा

भरदम जीऊँगा

वो सारी कहानी खेल जाऊंगा

ज़ो बचपन और जवानी 

मे कर नहीं पाया

ऊन हसरतों को पुरा कर जाऊंगा

इससे पहले की पर्दा गिर जाय

सारे सपने सारे ख्वाब 

पुरे कर जाऊंगा

ऐ उम्र थोड़ा 

आहिस्ता गुजर

--पवन मिश्रा (झारखंड) 
12-12-2024

No comments:

Post a Comment