प्रेम कहानी
वो चुभन
प्रेम में अजीब सी ताकत होती है। वो आपको बेहतर करने के लिए प्रेरित करती है और आपमें जो सर्वोत्तम है उसे
निखार जाती है। प्रेम मे वो क्षमता है जो आपके अंतिम साँस तक आपका साथ नहीं छोड़ती है और यह भी बात गौर करने लायक है कि अगर प्रेम मे कोई एक पक्ष कठोर बन जाये तो यही प्रेम-विरह दुसरे पक्ष के अंतिम साँस का अप्रत्यक्ष कारण भी होता है। इसलिए प्रेम पुजारीयो -- सावधान, इस ब्रह्मांड मे आपको आपके मम्मी -- पापा से कोई भी ज्यादा प्रेम कर ही नहीं सकता -- यह ईश्वरीय विधान है इसका उल्लंघन हो ही नहीं सकता।
तो चलिए इस प्रेम कहानी के नायक का नाम ही रख लेते हैं --प्रेम --! प्रेम अपने नाम के अनुरूप हर जगह प्रेम - भाव रखने वाला एक सहज और सुलभ इंसान था।
प्रेम हमेशा ही प्रेम की भुख में रहता था। और प्रेम रूपी शब्द और भावना के लिए उनका मन मष्तिष्क हर पल बेचैन रहता था, छटपट करता था मृग मरिचिका की तरह -- प्रेम की चाहत में। ऐसा नहीं कि प्रेम का जीवन विरान था। प्रेम के जीवन मे उनके मम्मी-पापा , पत्नी, बेटा -बेटी, भाई --भौजाई, बहन - बहनोई, चाचा - चाची, और दोस्त दोस्ताईन अनेकों थे, पर प्यार की वो अनुभूति और ऐहसास उन्हें किसी से शायद कभी न मिल पाया। अब यह बात तो प्रेम को प्यार करने वाले ही जाने की प्रेम को कौन कितना प्यार करता है - लेकिन प्रेम को अपेक्षित सहानुभूति - सद्भावना और आत्मीयता जीवन भर किसी से न मिला।
प्रेम के जीवन में हरेक संबंधों का अपना अनमोल महत्व था । समाजिक मान्य परंपराओं का शत प्रतिशत अनुपालन उनकी प्रतिबद्धता थी और वह अपनी प्रतिबद्धताओं का बखुबी अपनी सर्वोत्तम क्षमताओं के अनुकूल निर्वाह करता था।
लेकिन प्यार और सहानुभूति के दो बोल जो किसी के सच्चे ह्रदय से कभी प्रेम के लिए निकले इसकी अभिलाषा हर पल प्रेम को बनी रहती थी।
प्रेम जिस तन्मयता और तत्परता से अपने तमाम संपर्कित जनों के साथ सद्व्यवहार करता रहता था प्रतिक्रिया स्वरूप वही तन्मयता और समर्पण रुपी व्यवहार की अपेक्षा खुद के लिए भी प्रेम करता था पर प्यार के बदले प्यार ही मिले हर इंसान की ऐसी किश्मत कहाँ होती है -- ? और प्रेम के नसीब मे प्यार के बदले फरेब, चतुराई और कुटिलता ही मिलता रहा।
प्रेम प्यार के अधुरे अभिलाषा मे ठोकरें खाता, हास्य पात्र बनता अपने जवानी के दिनों को विदा करते वानप्रस्थ आश्रम में इस संतोष के साथ प्रवेश कर रहा था कि कोई बात नहीं हर व्यक्ति के नसीब मे प्यार कहाँ लिखा होता है -- मैं खुद से खुद को बेइन्तहा मोहब्बत करूंगा और रच जाऊंगा एक ऐसी प्रेम कहानी जिसका नायक प्रेम रहेगा और नायिका भी प्रेम ही। दुनिया छोड़ने से पहले मैं जब देखुंगा अपने बिते दिनों को तो मुझे गौरव होगा खुद पर और भगवान को बनाये गये अपने इस मानव पर कि ये भी अनोखा प्रेम - पुजारी है , खुद ही नायक है और खुद ही नायिका। और मैं दुनिया वाले को चिल्ला चिल्लाकर कह पाऊंगा कि हां यह संभव है प्रेम मे -- ईश्क मे -- सेक्स में -- शत प्रतिशत ईमानदारी। दुनिया वाल़ो मुझको देखो --!
लेकिन प्रेम के जीवन को इतना कंचन और पवित्र बना के रखना भगवान को मंजुर ना था। भगवान श्री सोचने लगा इंसान हो इंसान की तरह रहो, खबरदार जो मेरी बराबरी किये--! ऐसा कोई इंसान नहीं जो प्रेम पथ पर फिसला ना हो -- भला तेरी क्या औकात --।
ऐसे ही परिस्थिति में -- एक चुलबुली सी, हसीन सी, रंगीन सी, हर गम से- बेगम सी , एक मीठी मीठी प्यारी सी दस्तक प्रेम के ह्रदयपट पर महसूस होती है। यह दस्तक प्रेम के जीवन का जो एक अदृश्य हिस्सा था उसमें हलचल पैदा कर चुका था। ऐसा लगने लगा कि उम्र के इस चरण में किसी अज्ञात का ऐसा दस्तक देना यह सहज संयोग मात्र नहीं हो सकता है -? इसके पीछे जरूर कोई ईश्वरीय सोच होगी। 'हर मानव मे भगवान की प्रतिमूर्ति होती है' इस सिद्धांत को मानने वाला प्रेम भला इस दस्तक पर अपने दिल का दरवाजा कैसे बंद रखता --? प्रेम ने जिंदादिली के साथ इस दस्तक का स्नेहिल अभिनंदन किया।
चलिये इस चुलबुली को हमलोग 'भगजोगनी' नाम से आगे जानेंगे--! ---
क्रमशः अगले अंक मे (पार्ट -2, वो चुभन)
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