#बेबाक सच
नागरिकता संशोधन कानून--2019
और नागरिकता संशोधन कानून रूपी बादल जब संपूर्ण भारतवर्ष पर छा गया है, तो निश्चित रूप से राजनीतिक घराने अपने फसल काटने के हिसाब से ही इनके फायदे और नुकसान के मदेनजर गणना करेगे ,-- और फिर अपनी प्रतिक्रिया देना आज के दिन में भारतीय राजनीति का अहम हिस्सा सा हो गया है, स्वभाविक रूप से सत्तारूढ सरकार और राजनीतिक पार्टी को इसके विरोध का पुरा आभास रहा ही होगा तभी तो गृह मंत्री पुरे मजबूती के साथ इस संशोधन बिल के पक्ष में हैं ।
संपूर्ण भारत वर्ष में मुस्लिम समुदाय के द्वारा इस बिल का विरोध निरंतर जारी है और जुलूस के साथ सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान भी पहुंचाया जा रहा है । विरोध के स्वर लोकतंत्र को मजबूती देता है और इसे निखरने का मौका भी । सरकार के किसी भी कदम का जनता विरोध कर सकती है या फिर समर्थन यह उनके कृत्य पर निर्भर करता है । यह बिल संसदीय व्यवस्थाओ के सारे पहलुओं को आत्मसात करने के उपरांत अस्तित्व में आया है । इसके बाद भी विरोध के कई मायने है,
लेकिन जनता के हर प्रकार के अधिकारों की समीक्षा की जाय तो किसी को भी सार्वजनिक सम्पत्ति के नुकसान का अधिकार नहीं है । सरकार के पास पर्याप्त कानूनी आधार है नुकसान की भरपाई नुकसान कर्ता द्वारा ही किया जायेगा ,जिस पर अमल होना शुरू हो चुका है।
--फिर इतने संवेदनशील मुद्दे पर जनता का सङक पर उतरना निश्चित रूप से उनके बौद्धिक सक्रियता को दिखाता है । कुछ राजनीतिक घराने जिनकी वर्तमान समय में प्रासंगिकता ही खत्म सा होता दिख रहा है उन्हें सरकार का हर स्तर पर विरोध करते हुए मीडिया में बने रहने के अपने एक अलग मायने हैं ।
ज्यादातर पब्लिक जो आज सङक पर उतर कर विरोध जता रहे हैं उन्हें अपने रोजी रोटी कमाने के अलावे कुछ नहीं दिखता है , वह सिर्फ गुमराह किये जा रहे हैं, जरूरत है मुस्लिम कौम को विवेकशीलता के साथ बाहर आने का,उन जनों को सार्वजनिक रूप से
बेनकाब किया जाय जो मुस्लिम समुदाय को बदनाम करते हैं ।
छिन कर लेगें आजादी, हमें चाहिए आजादी, अफजल तेरे कातिल जिन्दा हैं-हम बहुत शर्मिन्दा हैं, इस प्रकार के बोल आम भारतीय मुस्लिमों के हो ही नहीं सकते यह तो किसी षङयंत्रकारियो के इशारे पर संचालित होता दिख रहा है जिसे बेनकाब करने की जरूरत है।
दिसम्बर 2014से पूर्व आये हुए छह अल्पसंख्यक समुदाय जो (हिन्दु, सिक्ख ,इसाई, फारसी , बौद्ध ,जैन, ) पाकिस्तान ,बंगलादेश और अफगानिस्तान से हैं ,तथा नेहरू लियाकत समझौता में इनके हित की बात का जिक्र था जिसे अनदेखा किया गया है वहाँ के सरकारों द्वारा, उन्हें नागरिकता देने की बात उक्त संशोधन कानून में है । चुकी यही समुदाय वाले लोग उस देश में अल्पसंख्यक थे तथा ये वर्तमान में भारत में अवैध रूप से रह रहे हैं ,इसलिए इन्हें नागरिकता देने की जरूरत भारत सरकार को दिखाइ पङी ।
वर्तमान में भारत में जो नागरिकता कानून है वह 1955 के बने कानून से ही संचालित हो रहा है और इसके तहत विश्व का कोई भी नागरिक निर्धारित अहर्ता को पुरा करते हुए नागरिकता के लिए आवेदन कर सकता है,यह बात स्पष्ट है ।
एक घर के मुखिया को अगर अपने क्षमतानुसार दस जनों का भरण पोषण करना हो तो वह अपने योजना नुसार अतिरिक्त संसाधन को सुख सम्पदा वैभव और अन्य आधुनिक व्यवस्थाओ पर खर्च करता है , लेकिन उस दस जनों के अतिरिक्त अगर अवांछित व्यक्ति बराबर घुसपैठिया के रूप में आते रहे तो निश्चय ही एक अव्यवस्था की स्थिति हो रहा होता है और इसी अव्यवस्था से बचने का आयाम है नागरिकता संशोधन कानून-2019।
दरअसल ट्रिपल तलाक निषेध, नागरिकता संशोधन कानून, एन सी आर ,धारा 370, ये सभी तथ्य सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र में थे तथा देश की बहुसंख्यक जनता ने इन्हीं अपेक्षाओ के साथ चुना है कि वो अपने घोषणा पत्र को लागू करे और यही किया जा रहा है।
लेकिन चुनाव पश्चात सत्ताधारी व्यक्ति किसी पार्टी या किसी संप्रदाय विशेष का प्रतिनिधित्व नहीं करता है ,अपितु वह भारत देश का सरकार होता है उन्हें संपूर्ण देश की जनता को विश्वास में लेना ही चाहिए कि किसी के भी साथ अन्याय नहीं होगा ।
आमतौर पर भारत की सरकार सर्वजन हिताय की बात करता है और वसुधैव कुटुंबकम को ही आत्मसात करता आया है, किसी को भी इसपर निरर्थक चिंता नहीं करनी चाहिए ।
व्यक्तिगतविचार
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