Thursday, February 22, 2024

(5)कहानी --अधकचरा मोहब्बत

कहानी 
                   #*अधकचरा मोहब्बत*
                
           तैंतीस सालों बाद न जाने कहां से वो अचानक मेरे सामने आ गयी, वही मुस्करातें होंठ , मोती सी चमकदार दांतें पर माधुरी दीक्षित जैसी थोडी बडी बडी अग्रदंत पर अब मेरे मेंं से वो शरारत , जो शायद उस समय ही गायब हो गई  जब से वो ओझल हो गई  थीं. मैं अकबका गया हडबडा गया मानिए बेचैन हो गया उसे करीब देखकर ----------–-------------
     मैं बोल पडा --
       अरे ओ विश्वसुंदरी  --- मेरी लिली ----!
कैसी है तु यार ------!
कितना तडपा हूं यार तेरी यादों में तुझे कुछ पता भी है --?
 बस वो तैंतीस साल पुरानी शरारत भरी हरकतें बक बक करने की मेरी आदतें, शेरो शायरी कविता सब निकलने लगे मेरे आवाजों में ,सोचना समझना कुछ नहीं -- --!
                 लिली खो गई अपने  हि यादों  मानिए वह मन ही मन कह रही हो ----- जितना मजा तडपाने में उतना जताने मे नहीं होता रे पगले. हां ,प्रेम तु क्या बोले जा रहे हो -- मतलब कुछ भी ---------
                इन तैंतीस सालों में  बहुत कुछ बदल चुकी थी मै़ (लिली)लाईफ को लेकर , रिलेशनसिप को लेकर.
  चल काफी की चुस्की लेता हूँ ---,-प्रेम, के कहने पर हम दोनो पास के  कैफेटेरिया में प्रवेश किये --
           आमने सामने गोल टेबल के साथ लगे कुर्सी पर बैठ दोनों एक दुसरे को निहारते रहे, वो बोलता रहा मैं सुनती रही ,
                     तुम बदल गयी हो यार -----!, बहुत बदल गयी तु  लिली -- -! ऐसा लगा मानिए प्रेम ने मेरे अंदर के बदलाव को समझ लिया हो.  काफी कब के खतम हो गयी , दुबारा आडर दिया वो भी खतम ------! लेकिन बातों का अनवरत सिलसिला प्रेम के मुंह से निकलता रहा -- मानिए ग्यारह माह से सुखे पडे किसी नदी में बरसाती बाढ आ गई हो और --- तेज गती से हडबड हडबड बक बक सब कुछ कहना चाह रहा हो अब जो तैंतीस सालों के लंबी कालखंड में प्रेम के दिमाग ने लिली के लिए संचित कर रखा था..
                       बडी मशक्कत से अगले रविवार गौतम झील के किनारे समुचे दिन साथ साथ बिताने को प्रोमिश किया मैने तब जाकर प्रेम ने कहीं आधे अधुरे मन से शुभकामनाएँ व्यक्त करते हुए मुझे जाने को इजाजत दिया.
       तैंतीस साल एक लंबा सा कालखंड -------- लेकिन ऐसा तो पहले कुछ नही था . ऐसा था,  कुछ नहीं था उस समय --! या मेरा मन उस कुछ को समझ नहीं पा रहा था -------!
 नहीं नही नही नहीं ----- ये मुझे (लिली) क्या हो गया --!
  अच्छे दोस्त थे हम दोनों--- ! समय बितने  के साथ दोस्ती पर जो धुंध पर्दा स्वरूप चिपक सी गयी थी वही धुंध तो छट रही है --- और मैं क्या जो सोचे जा रही हूं.. प्रेम हैंडसम था ,आज भी है---- बोली विचार से  नैन नक्शों से बहुत ही सुंदर है लंबा छरहरा बदन . कहां  मैं पतलसुट्टी , लंबी लंबी दांतें , बडी बडी टांगे -- भला क्यों मुझे वो  -----------! वो बातुनी था--- आज ये बकबक करने की आदत बढ़ गई है और क्या ----! हंसते मुस्कुराते बात करने का ये प्रेम का अपना अंदाज है इसमें मेरे लिए विशेष क्या हो सकता है. मैं भी न पगली हूं इस उम्र में क्या क्या जो ख्यालात आ जा रहें. धत् तेरे कि समान्य सी तो बात है ये --- मिलना. हम दोनों मे आखिर साम्यता ही क्या है ---!  प्रेम बातुनी है और लिली श्रोता -- बस और क्या ------!
  ना  ना ना ना और क्या -------!
 लेकिन है तो प्रेम एक रोमांटिक लडका -----!
 उसने मुझसे बातों ही बातों मे एक बार कहा था
    यार लिली तु किसी से प्यार क्यों नहीं कर लेती ----?
तुम तो जानते हो प्रेम प्यार  व्यार मेरे बस की बात नहीं  है --! इस बदसुरती पतलसुट्टी से करेगा कौन प्यार --! रहने भी दो छोडो ---- चलो चेंज द टापिक ---!
    व्हाय चेंज द टापिक यार ---! 
  मैं हूं ना ----! होगी तुम औरों के लिए पतलसुट्टी , बदसुरती --! पर तु तो मेरे लिए है विश्व सुंदरी --!
     बिल्कुल सिनेमाई अंदाज मे उनका यह कहना ------- दिल की गहराईयों में सुकून सा देता महसुस करा गया . मैं कुछ बोल न पायी .
      हम रोज ही मिलने लगे.  दुनियां जहान की बातें करने लगे हम दोनों. पढाई, लिखाई ,कहानी, कविता , शायरी सुनना सुनाना देश दुनिया कि राजनीति, विश्व इकोनोमी , शेयर बाजार हर चीजो पर बातें होने लगी -- बातें बहाना मात्र था ,मिलना जुलना अब एक दुसरे को अच्छा लगने लगा था. एक दिन अगर किसी कारण मिलना न होता , दिन  भर बातें न होती तो रात में प्रेम मैसेज करता आई एम मिसींग यु यार ---! लगता है मिलना जरुरी है.--!
     मैं लिखकर मैसेज भेजी----मुझे नहीं लगता मिलना जरुरी है।  अरे प्रेमी थोडे ही हो तुम प्रेम --- दोस्त हो दोस्त की तरह रहो ------ और----क्या---!
अरे ऐ विश्वसुंदरी----! मैं ही कहां सिरियस हूँ --- मजाक कर रहा था तुमसे ----! कौन करेगा तुझसे प्यार --!प्रेम का मैसेज आया.
 बस यही सारा बकवास बकर बकर करते न जाने दो तीन घंटे कितनी जल्दी से बित गये पता ही नहीं  चला .
         एक बार बस वहीं (जहां मुझे रविवार को उनसे मिलना है) गौतम झील किनारे बैठ प्रेम मुझसे बोल पड़ा -- कुछ बोलूं --- सुनेगी ---?
मै़ (लिली) बोल पडी  न भी बोलुं तो तु कहां मानने वाला है -- बोल --?
   मैं और मेरी तन्हाई अक्सर ये बातें करती रहती हैं ------  ( मेरी ओर एकटक निहारते )तुम होती तो कैसा होता ------, तुम ये कहती -----, तुम वो कहती ----, तुम इस पर हैरान होती ----, तुम ---!
 बस बस बस बस भी करो प्रेम ----!  तुम्हें सिनेमा में होना चाहिए,  प्रेम कर लेना चाहिए और शादी भी कर लेने चाहिए ---!
प्रेम बोल पडा ---तो ठीक है बस आगे का सुनाऊं -----!
   अरे यार प्रेम फिर कभी सुनाना -- बोर मत करो यार कान पका दिया तुने --!
     अरे विश्वसुंदरी तेरी एक भी बातें आज तक न टाली मैंने , ये भी स्वीकारता हूं , लेकिन आज हो या कल या हो दस बीस साल बाद तुझे -- तुझे मेरी पुरी कहानी तो सुननी होगी. 
      ऐसे ही न जाने कितने ही अनगिनत यादें प्रेम से जुड़ी हुई थी जो मेरे दिल दिमाग को बारंबार मीठी चुभन सा देते जा रही थी आज के दिनों में.
    आफिस मे ,और सोसायटीज के सहेलियों में अब चर्चे होने लगी थी. मेरी सबसे नजदीकी सहेली  सुगंधा एक दिन पुछ बैठी तेरा कुछ चक्कर ऊक्कर है क्या रे लिली ---,  मैं अक्कड़ अंदाज मे डपटते हुए उसे चुप कर दिया.
स्त्री और पुरुष अच्छे फ्रेंड नहीं हो सकते. कितनी घटिया सोच है तुम लोगों की.”
उसी दिन मेरी और एक सहयोगी मुन्नी जो मेरी बहुत अच्छी फ्रेंड भी थी, बोली, “सच कहूं तो स्त्री-पुरुष दोस्ती के बीच बहुत बारीक रेखा होती है. गहरी दोस्ती कब प्यार में बदल जाती है, पता भी नहीं चल पाता.”
“अब तू भी शुरू हो गई मुन्नी   . तुम लोगों की सोच कितनी छोटी है यार. वो प्रेम मेरा एक अच्छा दोस्त है, बस और कुछ नहीं---!.”

       आज पता नहीं क्यों उससे जुड़ी यादें पीछा ही नहीं छोड़ रही थीं. सच कहूं तो मैं उसकी यादों से पीछा छुड़ाना भी नहीं चाहती थी. इन्हीं यादों के साथ तो जी पाई हूं इतने दिनों से-------! 

फिर उन दिनों की ही बात है, अचानक से वो आया और बोला, “यार घर पर अब शादी के लिए बहुत प्रेशर डाल रहे हैं. कल ही एक लड़की को फाइनल कर लिया उन्होंने. क्या करूं, कुछ बताओ यार.”
“शादी कर लो और क्या करोगे. इतना क्या सोचना.”
“ये फाइनल ़फैसला है मेरे लिए तुम्हारा. सच कर लूं शादी.”
“बिल्कुल.”
“और तुम?”
“मैं इस शादी, प्यार-मोहब्बत पर यक़ीन नहीं करती, जानते हो न तुम.”
“ठीक है. आज तक तुम्हारी  कोई बात नहीं टाली मैंने. अब भी नहीं टालूंगा…” और उसने उसी क्षण अपनी मां को फोन लगाया और शादी के लिए हां कर दी. पर वो ख़ुश नहीं लगा मुझे, पता नहीं क्यों.----!
एक महीने बाद ही उसकी शादी थी. चूंकि शादी गांव में थी, इसलिए जाने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था. पता चला शादी के लिए छुट्टी भी नहीं ली उसने , त्यागपत्र दे दिया. पूछने पर इतना ही बोला, “नई ज़िंदगी बिल्कुल नए तरह से शुरू करना चाहता हूं. पुरानी बातों को भुलाकर. तभी उसे ख़ुश रख पाऊंगा.”
पता नहीं उस दिन उसकी आंखों में क्या नज़र आया मुझे, जिसने बेचैन कर दिया. अजीब-सी बेचैनी महसूस होने लगी. कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. लगा ऐसा जैसे मानिए सालों साल से दिल में बसे किसी परींदे को अपने हाथों पिंजरा खोलकर बोल रहा हूँ --जा तु आजाद है ---! 
उसने पूछा भी, “आर यू ऑलराइट?” क्या तुम ठीक हो-- ---! मैंने हां तो कर दी, लेकिन मैं ऑलराइट नहीं थी. दिल के अंदर छटपटाहट और अजीब सी बेचैनी हो रही. घर लौटी, तो ख़ूब रोई, ऐसा लगा कि कोई बहुत प्रिय वस्तु हाथ से छिन गई… हमेशा के लिए… जैसे कोई बहुत बड़ी ग़लती कर दी हो मैंने.

    वो रांची शिफ्ट हो गया फाइनली. उसके जाने के बाद एक अजीब-सा खालीपन आ गया ज़िंदगी में. हर पल बस वो ही यादों में बसा रहता. उसकी ही बातें याद आती रहतीं. सच कहूं तो उसे खोने के बाद महसूस हुआ कि उसे प्यार करने लगी थी मैं. बहुत ज़्यादा प्यार ---! 
            मुन्नी से मेरी हालत छिपी नहीं रही. उसने एक दिन पूछ ही लिया, “तुम प्रेम को मिस कर रही हो ना? जानती हूं. लेकिन तुम्हारी वो प्यार पर यक़ीन नहीं करती, शादी नहीं करूंगी, वाली झूठी बातें हैं  न… तुमने ख़ुद ही अपने साथ अन्याय किया.”
बस मैं उससे लिपटकर रो पड़ी, “इस बात का एहसास तो बहुत पहले ही हो गया था मुझे कि मैं प्रेम को प्यार करने लगी हूं. पर हमेशा डरती रही कि कहीं वो मुझे रिजेक्ट न कर दे. कहां वो हैंडसम बंदा और कहां मैं. बस कभी कुछ कह नहीं पाई. लेकिन अब बहुत तड़प रही हूं यार उसके लिए.”
“तू जानती भी है लिली, प्रेम कितना प्यार करता था तुझे. कई बार कहना भी चाहा तुझे उसने. पर तूने कभी उसे मौक़ा ही नहीं दिया. बड़ी देर कर दी यार तूने.”
         जानती थी कि अब प्रेम को कभी हासिल नहीं कर पाऊंगी मैं. तो बस उसकी यादों के सहारे ही ज़िंदगी बिताने का फैसला कर लिया. ख़ुद को बस काम में झोंक दिया. हां, इस बीच में पूरी तरह बदल ज़रूर गई थी. प्यार के मायने समझने लगी थी. लोगों को समझाने लगी थी.
            प्रेम मेरे जीवन का हिस्सा नहीं बन पाया था, पर मेरे हर अकेले से लम्हों में स़िर्फ वो ही होता. कई बार तो ऐसा लगता कि उसने विश्‍वसुंदरी कहकर पुकारा…हो ---लेकिन वो स़िर्फ एक ख़्याल ही रहा.
इसलिए उस दिन जब वो मिला और उसने मुझे पुकारा तो मैंने समझा फिर वही ख़्याल… लेकिन वो तो साक्षात सामने खड़ा था और मुझे यक़ीन ही नहीं हुआ.
अब तो बस रविवार का इंतज़ार था. मन में पता नहीं कैसे-कैसे ख़्याल आ रहे थे. प्रेम शादीशुदा है. अब उससे मिलना ठीक रहेगा क्या? लेकिन फिर सोचा उसे कौन-सा अपने एहसास बतानेवाली हूं. दोस्त की हैसियत से तो मिल ही सकती हूं. इसी बहाने प्यार के एहसास के साथ थोड़ा समय तो उसके साथ बिताऊंगी.
आख़िर रविवार आ ही गया. सुबह से मन में कुछ अजीब-सा हो रहा था. शायद प्रेम से मिलने की व्यग्रता थी, उतावलापन था. हमें शाम को एक कॉफी शॉप में मिलना था.
वो उसी अंदाज़ में मिला.

“हे विश्‍वसुंदरी, बड़ी बेसब्री से इंतज़ार किया इस संडे का. चलो कॉफी पीते हैं.”
सामने बैठा वो मुझे देखे ही जा रहा था, लेकिन मेरी आंखों में इतना साहस नहीं था कि उसकी आंखों का सामना कर पाऊं.
“और बताओ, कैसी चल रही है लाइफ.” मन में तो आया कह दूं तुम्हारे बिना लाइफ चलती तो है, पर अब तक मंज़िल पर नहीं पहुंच पाई, लेकिन फिर सोचा अब क्या फ़ायदा ये सब कहने का. बेवजह किसी की शादीशुदा ज़िंदगी में हलचल क्यों मचाना.
“ठीक हूं.”
“फैमिली में कौन है तुम्हारे? पति क्या करते हैं तुम्हारे..? बच्चे?”
“अरे, इतने सारे सवाल… इतना उतावलापन. अब तक नहीं बदले तुम. कहा तो था तुमसे शादी पर यक़ीन नहीं करती, तो शादी करने का सवाल ही कहां आता है.” मैं भरसक कोशिश कर रही थी कि कहीं वो मेरी आंखों में ख़ुद के लिए प्यार के लफ्ज़ न पढ़ ले.
“तुम सुनाओ, तुम्हारी ज़िंदगी कैसे चल रही है. तुम्हारी पत्नी, बच्चे…?”
“सब ठीक हैं. मैं भी, ज़िंदगी भी. बस…”
“बस क्या प्रेम -----?”
“बस तुम नहीं हो और तुम्हारे बिना ज़िंदगी की कहानी अधूरी है. कल भी थी. आज भी है.”
“पागल हो तुम. मुझे बहकाना कब छोड़ोगे. अब तो शादीशुदा हो. ये शरारतें छोड़ दो.”
“आज एक अधूरी कहानी पूरी करना चाहता हूं. कुछ बात अधूरी ही छोड़ गया था उसे पूरा करने दो.” और वो फिर शुरू हो गया अपने फिल्मी अंदाज़ में.
“मैं और मेरी तन्हाई अक्सर ये बातें करती रहती हैं… तुम होती तो कैसा होता… तुम ये कहती तुम वो कहती, तुम इस बात पर
हैरान होती.
तुम इस बात पर कितना हंसती… तुम होती तो ऐसा होता… हां तुमसे मोहब्बत है --मोहब्बत है…मोहब्बत है-----“
“ये क्या मज़ाक है प्रेम ---?”
“मज़ाक नहीं, सच है. जो उस दिन नहीं कह पाया. अधूरी ही रह गई मेरे प्यार की कहानी उस दिन, जिसे आज पूरी करना चाहता हूं.”
मेरी आंखों से आंसू बहने लगे. ये कुछ खोने का दर्द था.
अब क्या फ़ायदा इन बातों का. प्रेम अब कहां हासिल होता मुझे. वो तो  पहले ही किसी और का हो गया था.
“प्रेम प्लीज़, सुधर जाओ. तुम शादीशुदा हो. इस तरह का मज़ाक मत करो मेरे साथ.”
“मज़ाक नहीं कर रहा. सच कह रहा हूं. तब नहीं कह पाया, क्योंकि नहीं जानता था कि तुम क्या सोचती हो मेरे बारे में. पर अब मुन्नी ने सब बता दिया है.”
मुन्नी---? वो कब मिली तुम्हें.”
वो मुझसे फेश बुक पर मिली और सब बातें बता दिया है मुझे --!
“और तुम्हारी शादी?”
“वो तो तुमसे दूर हो जाने का एक बहाना था. यार तुम मान नहीं रही थी और मैं हिम्मत नहीं कर पा रहा था तुम्हें डायरेक्ट पूछने की. क्या करता, ख़ुद को दूर कर लिया तुमसे. ये सच है कि मां ने लड़की पसंद कर रखी थी, पर मेरी पसंद तो स़िर्फ तुम थी न लिली -मेरी विश्व सुंदरी --!.”
मेरी आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे.
आख़िरकार उसने पूछ ही लिया, “मेरी अधूरी कहानी पूरी
करोगी न?”
मैं उससे लिपट गई. कहानी पूरी हो गई थी अब.

        तभी जोर का झटका लगा मेरी पत्नी देवी  ने झकझोरते हुए ,झल्लाते हुए मुझे  निंद से जगाया बोली जल्दी उठ ,गदहा की तरह आठ बजे तक सोया है -- बच्चों को स्कुल छोडने हैं और मेरा सपना टुट चुका था---! सच कहते हैं सपना सपना होता है -- और कभी न पुरा हो पाया मेरा अधकचरा प्यार ----!
पवन मिश्रा-(दुमका झारखंड) 

  धन्यवाद

No comments:

Post a Comment