Saturday, February 3, 2024

     श्रीराम आयेंगे
श्रृंखला-6
                       लंकाकांड
संत तुलसीकृत रामचरितमानस में षष्टम् सोपान लंकाकांड है. लंकाकांड को युद्ध कांड भी कहा जाता है क्योंकि लंका मे राम रावण युद्व सहित रावण वध इसी कांड का हिस्सा है. इस भाग में जामवन्त के निर्देश पर नल नील वानर के अगुवानी में समुद्र पर पुल बनाना  , श्री राम जी द्वारा रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना और पुजन , लंका में राम जी का प्रवेश ,राम - रावण युद्ध , लक्ष्मण का मुर्छित होना , हनुमान जी के द्वारा औषध लाना , पुष्पक विमान पर श्री राम सीता और लक्ष्मण का वापस आने की कथा विस्तार से बतायी गई है.
         समुद्रदेव के वचन सुनकर श्री राम ने वानर सेना को शीघ्रातिशीघ्र पुल निर्माण  का आदेश दिया. जाम्बवन ने नल नील को पौराणिक कथा सुनाते हुए उन्हें उनके दिव्य शक्ति का याद दिलाया. वानरी सेना को बडे बडे चट्टान लाने को कहा गया और नल नील ने श्री राम का स्मरण ध्यान करते हुए सुंदर सेतु का निर्माण कर लिया.
       यहीं पर प्रभु श्रीराम ने शिवलिंग स्थापना की इच्छा जताई . सुग्रीव ने इस कार्यार्थ श्रेष्ठ मुनीयों को बुलवा शिवलिंग की स्थापना कराया और श्री राम ने प्रसन्न होकर शिवलिंग का पुजन किया. यहीं श्री राम जी कहते हैं जो मनुष्य शिवजी की अनादर कर मेरी पुजन करेंगे वह व्यर्थ होगा ,बगैर शिवभक्ति के श्री राम के कृपा की चेष्टा व्यर्थ और मुर्खता पूर्ण याचना है.
        श्री राम की आज्ञा पाकर संपूर्ण वानर सेना पुल के उस पार के लिए चल पडे.       चलचर ,नभचर सभी प्राणियो़ नें श्री राम जी उत्सुकता से स्वागत किया. श्री राम पुल पार अपने वानरी सेना सहित सुबेल पर्वत  पर आश्रय लेते है़.
      इधर राक्षसी सेनाओं द्वारा रावण को यह समाचार सुनाया गया कि वानरी सेना ने समुंदर पर पुल बना लिया है और राम अपने सेनाओं सहित  सुबेल पर्वत पर पहुंच गये हैं. इस पर रावण ने अट्टहास उठाया . रावण की पत्नी मंदोदरी बारंबार रावण को समझाती है कि आप कुनीति को त्याग नीति के शरण में आ जाईए. राम को सीता वापस कर क्षमा याचना कर लिजिए.पर रावण का अहंकार तो कुछ भी सुनने को तैयार न था. उल्टे मंदोदरी को डांट डपट का सामना करना पडा.रावण मंदोदरी से अपनी प्रभुता कहने लगा कि मैंने अपनी भुजाओं के बल पर देवता , दानव, वरुण, कुबेर , यमराज  आदि दिक्पालों को तथा काल को भी जीत रखा है. तुम्हे भय किस कारण उत्पन्न हुआ है. मंदोदरी जान गई कालवश होने के कारण ही उसके पति को अभिमान हुआ है.
              रावण का पुत्र प्रहस्त हाथ जोड़कर कहने लगा कि , "हे प्रभु! नीति के विरुद्ध कुछ नहीं करना चाहिए . एक बंदर समुद्र लांघ कर आया. उसका चरित्र उत्कृष्ट है .उस समय किसी को भूख ना लगी ( बंदर तो तुम्हारा भोजन है). नगर जलाते किसी ने नहीं पकड़ा. 

वह खेल में समुंद्र बांध और सुबेल पर्वत पर सेना सहित उतरे हैं .मुझे कायर ना समझे . नीति अनुसार दूत भेजकर सीता को श्री राम को दे दीजिए . अगर सीता पाकर वह लौट जाएं तो झगडा यहीं समाप्त कर लेवें.
रावण ने गुस्से में पुत्र से कहा कि तुझे ऐसी बुद्धि किसने सिखायी  ? पिता के कठोर वचन सुनकर प्रहस्त यह कहता हुआ सभा से चला गया की मृत्यु के वश व्यक्ति को दवा नहीं सुहाती.
             रात में श्री राम ने दक्षिण की ओर देखकर विभीषण से कहा कि दक्षिण दिशा में मानो बादल घूमड़ रहा है . बिजली चमक रही है . मीठे - मीठे स्वर में बादल गरज रहे हैं .  विभिषण बोले कि कृपालु ना तो यह बिजली है और ना बादल की घटा .लंका की चोटी पर एक महल है .वहां रावण ने सिर पर मेघ तडित जैसा छात्र धारण किया है . वही मानो बादलों की घटा है और मंदोदरी के कानों में कर्ण फूल हिल रहे हैं  वही मानो बिजली चमक रही है.रावण का अभिमान समझ के श्री राम ने धनुष पर बाण का संधान किया . एक ही बाण में छत्र ,मुकुटऔर कर्ण फूल कटकर जमीन पर गिर गए. किसी को भी इसका भेद ना लगा और रावण की सारी सभा भयभीत हो गई . 
             शत्रु की सूचना प्राप्त कर श्रीराम ने मंत्रियों को बुलाया और कहा कि लंका के चार द्वार हैं . उन पर किस प्रकार आक्रमण किया जाए .  तब विचार कर वानरों की सेना के चार दल बनाकर सबसे उचित सेनापति नियुक्त किए .वानर सेना श्री राम की जय ,लक्ष्मण जी की जय,  वनराज सुग्रीव की जय कहकर गर्जना करने लगी.
जब रावण को पता चला तो वह हंसकर कहने लगा बंदर काल की प्रेरणा से चले आए हैं . सब लोग चारों दिशाओं में जाओ और वानरों को खा जाओ ,मार भगाओ . रावण की आज्ञा पाकर राक्षस अपने अपने शस्त्र ले कर चले.                    
          उधर रावण की और इधर श्री राम की दोहाई बोली जा रही हैं . श्री राम के प्रताप से वानरों के समूह राक्षसों को मसल रहे हैं. वानरों  के समूह किले पर चढ़कर श्री राम की जय बोलने लगे. राक्षस युद्ध के मैदान से भागे और लंका में हाहाकार मच गई. 
जब रावण ने यह समाचार सुना तो उसने कहा कि युद्ध में जो भी पीठ दिखा कर भागेगा मैं उसे स्वयं तलवार से मारूंगा . यह वचन सुनकर सब युद्ध के मैदान में लौट गए .अब उन्होंने  प्राणों का मोह छोड़ दिया . वे ललकार कर  वानरों से भिड़ने लगे . जिससे वानर भयभीत सा हो गये.
        हनुमान जी ने जब अपने दल को विकल देखा तो वह पश्चिम द्वार गए.  जहां मेघनाद युद्ध कर रहा था. वह द्वार टूटता ना था . हनुमान जी ने युद्ध में मेघनाथ का रथ तोड़ दिया  . सारथी को मार गिराया. मेघनाथ की छाती में लात मारी तो दूसरा सारथी रथ मेंं मेघनाथ को डाल  घर ले गया . 
        तब अंगद ने सुना कि हनुमानजी किले पर अकेले हैं तो वह भी वहां किले पर चढ़ गए .  दोनों वानरों ने उत्पात मचाना आरंभ कर दिया.  राक्षसों को मसल रहे हैं .
          श्रीराम सब को अपने परम धाम भेज रहे हैं. शत्रु की सेना को कुचल कर फिर दिन का अंत होता देख सभी बंदर वहाँ आ गए जहाँ श्रीराम थे. रात में चारों सेनाएँ वहाँ आ गई जहाँ श्री राम थे.जब श्री राम ने सब को कृपा दृष्टि से देखा त्यों ही सब वानर थकान रहित हो गए. 
           लंका में रावण ने मन्त्रियों को बुला कर कहा कि वानरों ने आधी सेना का संहार कर दिया है. अब क्या विचार करना चाहिए?
        माल्यवान ने जो रावण का नाना था ने कहा कि तुम जब से सीता को हर लाए हो तब से अपशकुन हो रहे हैं. शिव जी और ब्रह्म जी जिनकी सेवा करते हैं, तुम ने उन से वैर किया  ? 
       वैर छोड़ कर जानकी श्री राम को दे दो और श्री राम का नाम भजो. रावण  को उनके वचन बाणों की तरह लगे. रावण ने कहा कि तू बूढ़ा हो गया है. नहीं तो मार देता. तब माल्यवान ने अनुमान लगाया कि इसे श्रीराम अब मारना ही चाहते हैं  . 
मेघनाद ने कहा कि सुबह युद्ध भुमि में  मेरी करामात देखना. सुबह मेघनाथ की सेना और लक्ष्मण की सेना में जोरदार भिडंत हुई. मेघनाथ की सेना चारों तरफ से परास्त होने को थी. तभी  कुनीति से मेघनाथ ने बाण चला लक्ष्मण को मुर्छित कर दिया. लक्ष्मण अरद्धमृत्त सा हो गया.
   श्री राम ने जब लक्ष्मण की स्थिति जाना तो काफी परेशान सा हो गये. श्री राम ने हनुमान को लंका से सुषेन वैध को ले आने का निर्देश दिया. सुषेण वैध ने पर्वत औषधि लाने का निर्देश हनुमानजी को दिया. हनुमान जी ने औषध न पहचान पाने की स्थिति में पर्वत ही उठा लाया.
उधर श्री राम कह रहे हैं कि आधी रात हो गई है हनुमान जी अभी नहीं आए.  उन्होंने ने लक्ष्मण जी को गले से लगा लिया. श्री राम कहने लगे कि, "धन, स्त्री, पुत्र, घर और परिवार बार - बार होते हैं लेकिन सहोदर भ्राता बार - बार नहीं मिलता  . तुम्हारी माता को मैं क्या उत्तर दूंगा. प्रभु के विलाप को सुन कर वानर विकल हो गए. उसी समय हनुमान जी आ गए  . मानो करूणा रस में वीर रस आ गया हो. वैद्य सुषेण ने तुरंत उपाय किया जिससे लक्ष्मण जी उठ कर बैठ गए. श्रीराम ने लक्ष्मण जी को हृदय से लगा लिया. हनुमान जी ने वैद्य को वहाँ पहुँचा दिया जहाँ से लाए थे  . 
           रावण ने अब अपने को कमजोर होता देख कुम्भकरण को जगाया .कुम्भकर्ण विलख कर कहने लगा कि तू जग जननी जगदंबा को हर लाया. अब तू अपना कल्याण चाहता है! तू उस देवता का विरोध कर रहा है जिसके शिव, ब्रह्म सेवक है  . हे भाई तू जी भर कर मुझ से मिल ले और मैं जाकर श्रीराम के दर्शन करू.
युद्ध के मैदान में उसे विभिषण  मिला तो कुम्भकर्ण कहने लगा कि तुम धन्य हो रावण तो काल के वश हो गया है. मैं भी मृत्यु के वश हूँ मुझे अपना पराया नहीं सूझता. इसलिए तुम जाओ  .प्रभु श्री राम ने कुम्भकरण के विशालकाय शरीर देख कर स्वयं ही उनसे लडना उचित समझा. विविध गतिविधियां के पश्चात कुम्भकरण को युद्ध के मैदान से सक्षात श्री राम ने परमधाम को भेज दिया.
          राक्षसों की सेना का विनाश देख रावण विचार करने लगा. मैं अकेला रह गया हूँ . इसलिए उसने अपार माया रची. इंद्र देव ने श्री राम को बिना रथ के युद्ध करते देख अपना रथ भेजा. श्री राम उस रथ पर चढ़ गए. 
रावण ने माया फैलायी और वानरों और लक्ष्मण जी ने बहुत से रामों को देखा. श्री राम ने जब सेना को आश्चर्य चकित देखा तो उन्होंने  सारी माया हर ली.
श्रीराम ने रावण के सारथी और घोडों को मार दिया और रथ को चूर - चूर कर दिया. रावण ने दूसरे रथ पर चढ़ कर श्रीराम पर नाना प्रकार के अस्त्र शस्त्र चलाएं.
श्री राम ने उसकी बीस भुजाओं और दसों सिरों पर एक साथ बाण चलाएं. बीसों भुजाएँ और दसों सिर कट कर पृथ्वी पर गिर पड़े.  लेकिन सिर और हाथ कटते ही नये हो जाते. प्रभु श्रीराम बार - बार उसके सिर और भुजाओं को काटते. आकाश में उसके सिर और भुजाएँ फैल गई. 
रावण ने विभिषण पर परम शक्ति छोड़ी तो श्रीराम ने विभिषण को पीछे कर शक्ति स्वयं पर सह ली  . विभिषण ने गदा से रावण पर प्रहार किया और फिर दोनों में मल युद्ध होने लगा. हनुमान जी ने विभिषण जी को थका हुआ जान कर रावण से भिड़ गए. 
रावण माया दिखाने लग गया और उसने अनेकों रूप प्रकट किए. जिस से भालू, वानर विचलित होने लगे तो श्रीराम ने बाण चला कर माया के रावणों को मार डाला.
.. जानकी का संदेश सुन कर प्रभु श्री राम ने विभिषण से कहा हनुमान के साथ जाओ और सीता को लेते आवें.
विभिषण जी सुंदर पालकी सजा कर सीता जी को ले आए. वानर, भालू सीता जी के दर्शन करने दौडे़. आकाश से देवताओं ने फूल बरसाए.
सीता जी के असली रूप को अग्नि में रखा था  . अब श्री राम उनको प्रकट करना चाहते हैं. प्रभु के चरणों में सिर निवास कर सीता जी ने लक्ष्मण जी से कहा कि तुम आग तैयार करो.
सीता जी की विवेक, धर्म और नीति से सनी वाणी सुन कर लक्ष्मण जी के नेत्रों में जल भर आया. परन्तु श्रीराम से कुछ कह ना सके.
लक्ष्मण जी आग तैयार करके लकड़ी ले आए. आग की लौ देख जानकी जी ने कहा कि, " मन  , वचन और कर्म से मेरे हृदय में रघुवीर को छोड़ कर कोई नहीं है तो यह अग्नि मेरे लिए चंदन के समान शीतल हो जाए  . कोशलपति की जय बोल कर सीता जी ने अग्नि में प्रवेश किया. सीता जी की छाया मूर्ति और लौकिक कलंक अग्नि में जल गए. प्रभु के इस  चरित्र को किसी ने नहीं जाना.
अग्नि ने शरीर धारण कर सीता जी को श्री राम को वैसे ही समर्पित किया जैसे क्षीर सागर ने विष्णु भगवान को लक्ष्मी जी को समर्पित किया था. वह श्री राम के वाम अंग में विराजित हुई. सभी देवताओं ने आकर नाना प्रकार से श्रीराम की स्तुति की.
      फिर देव राज इंद्र ने प्रभु की स्तुती की और कहा कि आज्ञा दीजिये कि मैं क्या  करूँ  ? प्रभु श्री राम ने कहा कि जिन वानर, भालुओं ने प्राण त्याग किये है आप सबको जिंदा दो. प्रभु श्री राम तो त्रिलोकी को जिला सकते हैं उन्होंने ने इंद्र देव को बड़ाई देने के लिए ऐसा कहा. इंद्र देव ने अमृत छिड़क कर सबको जिला दिया.
           सभी देवता विमान में चढ़ कर अपने - अपने लोक चले गए. फिर भगवान शिव हाथ जोड़ कर प्रभु श्री राम से विनती करने लगे. प्रभु आप मेरे हृदय में निवास करे और जब आपका राजतिलक होगा तो मैं आप की लीला देखने आऊंगा.
        विभिषण जी पुष्पक विमान ले आए. श्री राम, लक्ष्मण जी और सीता जी के साथ- साथ सुग्रीव, नल, जाम्बवन्त्, अंगद, हनुमान और विभिषण जी सहित सभी विमान में चढ़े . विप्र चरणों में प्रणाम कर उत्तर दिशा की ओर विमान चलाया. विमान चलते ही सब श्रीराम की जय कहने लगे.
श्री राम सीता जी को रणभूमि दिखा रहे हैं यहाँ भारी निशाचर  मेघनाद, कुम्भकर्ण और रावण मारे गये. श्री राम ने बताया जहां पुल बंधवाया और श्री शिव जी की स्थापना की. फिर श्री राम ने सीता जी सहित रामेश्वर महादेव को प्रणाम किया.
वन में जहाँ - जहाँ श्री राम ने निवास किया वह स्थान सीता जी को दिखलाये. विमान दण्डकवन पहुँचा तो प्रभु अगस्त्य आदि ऋषियों के स्थान पर गये. ऋषियों से आशीर्वाद प्राप्त कर चित्रकूट आये. ऋषियों को संतुष्ट कर विमान आगे चला. श्री राम ने जानकी जी को यमुना जी के दर्शन कराये . फिर गंगा जी के कर तीर्थ राज प्रयाग के दर्शन किए. त्रिवेणी में पहुँच कर प्रभु ने स्नान किया और हनुमान जी से कहा कि तुम ब्रह्मचारी का रूप धरकर अवधपुरी चले जाओ.  भरत को हमारी कुशल कह कर और उनका समाचार लेकर आना. हनुमान जी तुरंत चल दिये.
श्रीराम भरद्वाज ऋषि के आश्रम गए. उन्होंने ने प्रभु की अनेकों प्रकार स्तुति की. ऋषियों को प्रणाम कर गंगा जी की ओर चले. वहाँ सीता जी ने गंगा जी की पूजा की. गंगा जी ने आर्शिवाद दिया तुम्हारा सुहाग अखंड रहे. निषादराज जी को प्रभु के आने का समाचार मिला तो वह प्रभु के चरणों में गिर पड़े. प्रभु ने निषादराज को अपने हृदय से लगा लिया.
जय श्रीराम
बहुत जल्द श्रंखला 7 उत्तर कांड

















        

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