Sunday, February 2, 2020

इंसाफ के तराजू पर करहाती एक मां

इंसाफ के तराजू कराह रही मां 

इंसाफ के तराजू पर कराह रही एक बेबस लाचार मां , जी हाँ बिल्कुल सही पढ रहे हैं आप निर्भया की मां जिसने अपने बेटी को दरिन्दो द्वारा नोचे खरोचने को महसूस किया , न्यायालय में गुनाह साबित हुआ ,कबूल किया इन गुनाहगारों ने अपनी गुनाह, इसके बाद भी सजा मुक्कमल के नाम पर तय हो रहा है सिर्फ तारिख पर तारिख ।
      एक तरफ कानूनी दांव पेंच के पैंतरेबाजी  में हर बार बलात्कारियों के वकिल द्वारा नया पाशा फेंका जा रहा है और वह सफल भी हो जा हैं तथा उसे मिल जाता है उचित न्याय होता अगला तारिख।
              बेहद गंभीर और कारुणिक अपील बलात्कारियों के  वकील द्वारा--"देखना है न्याय व्यवस्था किसके साथ खङा है ,"चार मां अपने चार बेटे के जिन्दगी की भीख न्याय व्यवस्था से माँग रही है जबकि एक मां अपने एक बेटी के लिए न्याय"
      वाह क्या पाशा फेंका गया है,
उन तमाम मानवाधिकार के हिमायती जनों से और वकीलों से मेरा सीधा सवाल --जरा सोचिए क्या निर्भया के जगह आप की भी बेटी रहती तो  क्या आप यही माँग करते न्यायालय से और देश से,।
    अरे वह कैसा बेटा ,कैसा मानव जो मानव होकर राक्षस  और दैत्य वाला काम करे ।
   संविधान उन तमाम माताओ से माँग कर रही है ,आप बाहर निकालो उन बेटों को और चिल्ला कर कहो एक बलात्कारी मेरा बेटा नहीं हो सकता है इसे फाँसी दो जज साहब ।
   क्या ऐसे हालात पर पुलिस द्वारा हैदराबाद में ङा रेङ्ङी के बलात्कारियों को इनकाउंटर  कर देना न्याय नहीं था उन माता के लिए ,उन परिवार जनों के लिए जिनके सदस्य का बलात्कार हुआ हो।
    क्या अब भी हम कह पा रहे हैं कि संविधान पर्याप्त है न्याय के लिए ।  संविधान में आमूल-चूल संशोधन समय की माँग है, नहीं तो हर रोज बलात्कारी न्यायालय के दांव पेंच से बाहर आवेंगे और सभ्य समाज पर ठहाके लगा कर हंसेगा और बोल उठेगा देख मैं यहाँ हूँ क्या करेगा तू आयं बोलो बोलो----!

6 comments:

  1. reality of presser scanario,
    exactlly written my dear

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  2. How much one suffered by devil of
    human society,we can do nothing becouse we literate r tied wish law , If we r wish unlawfulf than
    should to burn him

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  3. कानून पर्याप्त है पर कानून को संचालित और सही तरीके से अनुशासित ढंग से लागू करना चाहिए ये भी एक आवश्यक है

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