भारतवर्ष अपने गौरवशाली इतिहास के साथ विश्व स्तर पर मानव सभ्यता के लिए हमेशा से अनुकरणीय रहा है । यहाँ कि विरासत और परंपरा ही संपूर्ण मानवता को सुखद रास्ते दिखाते आया है । इस हेतु हमें याद करना चाहिए विश्व प्रसिद्ध अपने 'रामायण' को । यद्यपि यह वैश्विक लोकाचारी ही कहिये की रामायण को अपने ही घटित क्षेत्र में सत्य साबित होने के लिए विभिन्न राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय मंच से होकर सुप्रीम कोर्ट --भारत सरकार के मंच पर सत्यापन साबित होने के लिए लम्बे मुकदमे का सहारा लेना पङा(संदर्भ-राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद-अयोध्या मामला), और रामायण एक लोक कथा अधारित धार्मिक महाकाव्य ही नहीं बल्कि तत्कालीन राजघराने के घटनाक्रम का सटीक वर्णन है ,जिसे समकालीन ऐतिहासिक जानकारी हेतु इतिहासकार और विद्वानों के द्वारा बहुमूल्य स्रोतों के रूप में भी बतौर साक्ष्य व्यवह्रत किया जाता रहा है। यहाँ एक संदर्भ है ,कि माता सीता को जब रावण के चुंगल से लाने का प्रयास किया जा रहा था तो उसी समय लक्षमण 'मूर्छा ' में चला जाता है-वस्तुतः यह मूर्छा अवस्था ,आधुनिक रूप में इसे आदमी के 'कोमा' की अवस्था को कहते हैं । राजवैध द्वारा इस मुर्छा रोग के उपचार हेतु संजीवनी बूटी को चिन्हित किया गया, जिसे हनुमान द्वारा लाया गया ,और लक्ष्मण मुर्छा अवस्था से स्वस्थ चंगा हो पाये थे। समकालीन चिकित्सा व्यवस्था को स्मरण करते हुए हमें गर्व होना चाहिए अपने गौरवशाली अतीत पर-- कि उस ऐतिहासिक काल में भी हमारे पास मुर्छा यानि की कोमा की अवस्था से चंगा होने हेतु पर्याप्त औषधीय जानकारी थी, जो पर्यावरण में ही उपलब्ध थे --जबकि आज तक अन्य किसी चिकित्सा पद्धति में 'कोमा' से बाहर आने हेतु कोई भी दवा उपलब्ध नहीं है और इसके निदान हेतु आज चिकित्सा जगत सिर्फ यही बोल पाता है--'वेट एन्ङ वाच'--उपर वाले का स्मरण करें ।
आज वैश्विक महामारी कोरोना ने मानव सभ्यता के विकास पर एक जोरदार प्रश्न चिन्ह खङा कर दिया है । अमेरिका, इटली ,फ्रांस जैसे वैश्विक महाशक्ति और सुसंपन्न देशो ने आज कोरोना के आगे मानिए घुटने टेक दिए हो । तमाम घोर निराशाओं के बावजूद भारत के पास संतोष करने के लिये यह बात हैं कि बचाव हेतु अपनाये गये उपायों का अन्तराष्ट्रीय स्तर पर काफी सराहना ही नहीं किया जा रहा है,अपितु मोदी जी से सलाह भी लिया जा रहा और विश्व समुदाय हमारी ओर आशा भरी निगाह से देख रहा है, इसी कङी में भारत से अमेरिका जैसी महाशक्ति क्लोरोफ्क्वीन नामक दवाई हेतु अनुरोध सह दबाब बना रहा है , यह हर हिन्दुस्तानीयों के लिए गर्व की बात है, भारत की सक्षमता हर्षित करने लायक है।
भारत के गौरवशाली अतीत को बर्बाद करने का काम मुस्लिम आक्रांताओं ने किया । बारहवीं शताब्दी तक भारत विश्व स्तर पर अपने ज्ञान पूजं से समकालीन संपूर्ण विश्व को आकृष्ट कर रहा था । समकालीन विश्वविख्यात विश्वविद्यालय--'नालंदा विश्वविद्यालय ' 'विक्रमशिला विश्वविद्यालय ' 'ओदन्तपुरी विश्वविद्यालय' और 'तक्षशिला विश्वविद्यालय ' वाराणसी के सुंदर और व्यापक चर्चे चीन और मध्य ऐशिया में दिखते हैं जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं । यही वह समय था जब बख्तियार खिलजी नामक एक युद्धक सेनापति के हाथों इन विश्व धरोहर रूपी विश्वविद्यालय में आगजनी और लुटकान्ङ किया गया था । और पारंपरिक धरोहर को नष्ट कर दिया गया था।
अथर्ववेद, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, महर्षि वागभट्ट कृति अष्टांग ह्रदयम्,, अष्टांग संग्रहम्, धन्वन्तरी जैसे अनेकों नेक और उत्कृष्ट चिकित्सक अपने चिकित्सा पद्धति के लिए विश्व विख्यात थे।इन महर्षियों के चिकित्सा पद्धति के वाहक उपर वर्णित विश्वविद्यालय खंङहर में तब्दील हो गये। फिर भी जङी-बुटी, पेङ-पौधों, फल-फूल द्वारा बताये गये चिकित्सा पद्धति के लिए चरक संहिता,सर्जरी/शल्य चिकित्सा हेतु सुश्रुत संहिता,आज भी स्मरणीय है। खान पान पच अपच, संयम-नियम,योग ,आसन आदि के विषय में महर्षि पतंजलि द्वारा विस्तार से विश्लेषित किया गया है जिसे अपनाकर आम आदमी अपने जीवन शैली को स्वस्थ और हंसमुख बना सकता है।
सुश्रुत संहिता में कुल 121शल्य उपकरण का वर्णन है तथा 760 औषधिय पौधों का मानवपयोगी विशलेषण है। पुरातन भारत में राजवैध और चिकित्सकों को मोतियाबिंद, प्लास्टिक सर्जरी , टूटे हङ्ङीयो को जोङने की सफलतम तकनीक की विशेषज्ञता प्राप्त थी। सुश्रुत संहिता में गुर्दे के बिमारी को नमक विहीन भोजन देने की सलाह को प्रमुखता से चर्चा में लाया गया है। इसी प्रकार वात, पित्त और कफ के असंतुलित अवस्था ही रोग के कारक होते है और इन तीनों के मजबुत संतुलन को निरोगी काया हेतु आवश्यक बताया गया है वागभट्ट द्वारा । वागभट्ट ने 'भोजनंते विषम नीरे' का उल्लेख किया है--जिसका अर्थ होता है भोजन के तुरंत बाद पानी पीना हानिकारक है। यह बात आज भी ऐलोपेथ चिकित्सा पद्धति में बतलाया जाता है ,
जिसकी जानकारी हमारे पूर्वजों को हजारों हजार वर्ष भी भली भाँति थी।
तकरीबन अट्ठारहवीं शताब्दी के अन्तिम दशक की बात होगी , कर्नाटक के बेलगाँव आस पास हैदर अली और टीपू सुल्तान नामक दो बङा ही पराक्रमी भाई हुआ करते थे। एक बार कर्नल कुट और हैदर अली में व्यापक संग्राम हुआ। हैदर अली ने अपने तलवार से कर्नल कुट अँग्रेजी योद्धा के नाक काट दिये । क्योकिं हम भारतीय किसी के गर्दन काटने से ज्याद नाक काटने में प्रतिद्वन्द्वी के अपमानित होने को महसूस करते थे। कर्नल कूट हाथ में अपने नाक लिए घोंङे पर सवार हो भाग रहे थे --तभी किसी स्थानीय द्वारा उनसे तहकीकात किया गया --कर्नल कूट कहते हैं कि घोंङे से गिर जाने के कारण ऐसा हुआ है,लेकिन भारतीय सज्जन उसे कहता है ,नहीं यह तो तलवार के धार से कटा हुआ है--आप चाहें तो मैं इस कटे नाक को जोङ सकता हूँ । कूट को यह आश्चर्य हुआ चूँकि समकालीन ब्रिटेन में ऐसी कोई चिकित्सा व्यवस्था नहीं थी जो मानव शरीर के कटे अंग को फिर से जोङ पाये।पन्द्रह दिन के अन्दर उनका नाक जोङकर उन्हें फिर छोङ दिया गया। यह थी भारतीय उत्कृष्ट चिकित्सा पद्धति । जब समूचा विश्व प्लास्टिक सर्जरी से अनभिज्ञ था उस समय हमारे भारत में यह एक साधारण बात थी।
आज भी भील, गोन्ङ, संथाल ,सबर, हो, असुर जैसे आदिम जनजातियों के कुछ जनसमूहो द्वारा अपने चिकित्सकीय जरूरत को जंगल और पहाङो में उपलब्ध स्थानीय जङी बूटी अधारित चिकित्सकीय पादपों से पूर्ति करते हैं । इनके पास विकास और सभ्यता की पहुँच अब भी दूर है। कुछ समय पहले तक महिलायें अपने बच्चे का जन्म स्थानीय विशेषज्ञ के देख रेख में ही करते थे और जङी बुटी अधारित औषध से जल्द ही कुशल और स्वस्थ हो जाती थीं ।
आज एक प्रकार के आर्थिक औपनिवेशीकरण ने हमारे गौरवशाली पारंपरिक विशिष्टताओं को बर्बाद कर दिया है। पाश्चात्य जगत के गैरतार्किक अंधाअनुकरण ने हमें मानसिक गुलाम सा बना दिया और पिज्जा बर्गर की संस्कृति हावी होती जा रही है जिनके परिणाम तो अवसादयुक्त होने तय हैं ।
हमें जरूरत है हर घर में एक किचेन गार्डन और एक आरोग्य उपवन विकसित करने की । जहाँ सरकारी स्तर पर औषधिय पौधों की जानकारी का प्रसार हो , उपयोग के तरीकों का प्रसार हो , तथा पौधों का निःशुल्क वितरण हो तो भारत का बहुत सा पैसा बच सकता है -आदमी स्वस्थ रह सकता है ,प्रदूषण मुक्त रह सकता है। लेकिन हमारे यहाँ प्लास्टिक के आर्टिफिसयल पौधे और पुष्प घर में रखना तो आदमी शान समझते हैं लेकिन सदाबहार, तुलसी ,घृतकुमारी, गिलोय जैसे बहुपयोगी पौधों से अपनी दुरी बनाते हुए अपने को सुसभ्य दिखाने की होङ में स्वनुकसान करते जा रहे हैं । इस संदर्भ में हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश और झारखंड ने कुछ प्राथमिक स्तर पर अवश्य कदम उठाये हैं लेकिन यह नाकाफी है। सरकार को औषधीय पादप की पहचान और सर्वव्यापी उपयोग हेतु स्कूली शिक्षा के आवश्यक अध्ययन विषयों में इसे शामिल करना बहुत ही ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है ।
Beautifully composed article Sir.
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद् भाई साहब
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