हकीकत और संशय के बीच उलझता
कृषि कानून--2020
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वैश्विक स्तर पर अर्थव्यवस्था के जानकारों का मानना है कि भारत सन् 2030 तक विश्व की तिसरी सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बन कर उभरने जा रही है। विगत कुछ दशकों से भारत के हरेक क्षेत्रों में आमुलचूल बदलाव आया है। विश्व की महाशक्ति और विकसित देशों से कदमताल मिला कर चलने की सामर्थ्यता हासिल करने में भारत कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता है। और इसी कड़ी में व्यापक मंथन करने पर स्पष्ट रूप से जो दृष्टिगोचर है , वह सन् 1990 से शुरूआत हूए भारत के आर्थिक उदारीकरण का कदम जो वस्तुत: विश्व स्तर पर अर्थ व्यवस्था के भूमंडलीकरण या वैश्वीकरण का ही एक हिस्सा मात्र है। इसी नीति ने संपूर्ण भारत में बदलाव की आंधी सी ला दी है।
वर्तमान कृषि कानून -2020 भी कमोबेश उसी आर्थिक उदारीकरण सहित बदलते भारत में बदलाव की ओर बढ़ते कदम हैं।
हमेशा से वोट बैंक की धुरी रहे कृषक समुदाय ने सदैव से भारतीय समाज के गरीब तबकों को ही प्रतिबिंबित किया है। विडंबना देखिए सबके पेट को अन्न देने वाला यह समुदाय सदियों से भूखे पेट सोने को मजबुर थे , तो आज खाद्ध सुरक्षा अधिनियम 2013 द्वारा मुहैया कराये जा रहे सांकेतिक मुल्य मात्र पर उपलब्ध कराये जा रहे अनाज पर जीवनयापन को मोहताज हैं।
वर्तमान कृषि कानून शायद किसानों के इन्हीं परेशानीयो को दुर करने का एक प्रयास है।
लेकिन इन गरीब किसानों की संघर्ष गाथा देखिए --यथा लाखों की कीमत वाले ट्रैक्टरो को जलाकर विरोध प्रर्दशन करना, मोबाईल टावरों को जलाना, पसीने से मिट्टी को सिंचने वाले ,धुप की तपीश को बेअसर साबित करने वाले भारतीय कृषक जब , धरणास्थल पर वातानुकूलित संयंत्रों का सहायता लेते दिख जाय तो विरोधाभाषी यह परिदृश्य संघर्ष और संशय के साथ राजनीति को भी दृष्टांकित कराता दिखता है।
वर्तमान कृषि कानून--2020 के तीन महत्वपूर्ण संभाग हैं
*कृषक उपज ट्रेड और कामर्स (प्रमोसन और सरलीकरण) कानून--2020
इस संभाग में कृषकों को मंडियों से बाहर भी थोक रूप में अनाज बेचने की आजादी दी गयी है। कानून के अस्तित्व
में आने से पहले भी ऐसी बातें व्यवहार में थी। कानून के धारा 13और धारा15 के सम्यक अध्ययन से यह देखा जा सकता है कि असंतोष के किसी भी परिस्थिति में मामला न्यायिक दायरे से बाहर ही निष्पादित किया जायेगा। यानि कि जो इस कानून को लागू कराने वाला सक्षम प्राधिकारी होंगे (एस डी एम & एडिशनल कलेक्टर) वही सभी प्रकार के मामलों का अन्तिम निष्पादन कर्ता होगा।
किसान यूनियन न्यायपालिका की सर्वोच्चता से समझौता नहीं करना चाहता है।
भारत सरकार इस बिंदु पर सिविल न्यायालय के तहत मामले को न्यायिक सुनवाई के योग्य स्वीकारते हुए आवश्यक संशोधन की बात पर सहमत दिख रहा है।
* कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण ) कीमत अश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून--2020
यह संभाग कान्ट्रैक खेती , पूंजीपतियों और कृषकों के आपसी समन्वयात्मक सोच पर फसल उत्पादन से पूर्व दर निर्धारण, उत्पादन लागत व पूंजी की व्यवस्था जैसे कृषकों के सुगमता हेतू अनेकानेक उपाय हैं ।
लेकिन कृषकों में जमीन खोने की संशय वाली मानसिकता घर कर गरीब है-- कानून के विश्लेषकों का मानना है कि सभी तरह के अनुबंध कृषि उत्पाद से ही संबंधित होंगे , कृषकों के इस डर पर रणनीति कारों को आगे बढ़कर किसानों में यह विश्वास विकसित करने की आज महती आवश्यकता है।
* आवश्यक वस्तु (अमेंडमेंट) कानून 2020
--- कानून का यह संभाग उत्पादों के भंडारण पर कृषक और पूंजी पतियों को व्यापक आज़ादी प्रदान करती है।
उपरोक्त बिन्दूओं पर अढैती /मंडियों के आवश्यकता और समयानुसार सुधार पर यह कानून मौन है । अभी वर्तमान में संपूर्ण भारतवर्ष में लगभग 7000 मंडियां कार्यरत हैं जबकि आवश्यकता है लगभग 42000 मंडियों की। भंडारण की वर्तमान व्यवस्था को आवश्यक वस्तू अधिनियम के तहत और स्वतंत्र सा बना दिया गया है।
एक तरह से इस कानून द्वारा किसानों को विविध प्रकार के चुनौतियों से निपटने के लिए स्वकौशल के इस्तेमाल की छूट दी जा रही है ।
किसानों के हौसला अफजाई के लिए कभी हमारे सादगी प्रधान यशस्वी प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने कहा था --- "जय जवान --जय किसान" । लेकिन वास्तव में किसानों की जय-जयकार क्या कभी हो भी पाई ---? यह एक गंभीर प्रश्नगत मामला है, जो पूछता है भारत और यहां कि 52% आबादी जो सीधे सीधे आज भी कृषिगत कार्यों से अपना जीवीकोपार्जन करता है।
आजादी के बाद किसानों के व्यापक हित के लिए मंडी /अढैती और अनाजों के लिए तय किये जाने वाले न्युनतम समर्थन मूल्य (मिनीमम सपोर्ट प्राइस--एम एस पी) निश्चित रूप से किसानों के हक में लिया गया अच्छा फैसला था । लेकिन बदलते दौर के साथ बदलते हालात ने किसान रुपी समुदाय के बहुसंख्यक आबादी को सिर्फ़ भोट बैंक के तहत हमेशा से अपने पक्ष में भुनाने का प्रयास किया है । कुछ खास राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्र में हमेशा से अनवरत किसानों के हक में कर्जमाफी का प्रस्ताव रहता आया था --और कई बार इनके बहुसंख्यक मतदान के उत्तर में इन्हें कर्जमाफी की सौगात भी भेंट होती रही है।
किसानों के कर्ज माफी ने इन्हें आदतन सरकारों से मदद लेने के मामले में आशावादी बनाते गया और ये निरंतर लाचार होते गये और आज आत्मनिर्भर और आत्ममजबुती के मामले में ये पिछड़ सा गये हैं। शायद कभी भी गंभीरतापूर्वक इसे मजबुत और सम्मुनत बनाने के ईमानदार प्रयास नहीं किये गये।
आज के दिनों में सांसदों में से 38% सांसद सक्रिय किसान हैं और विडम्बना देखिए 52%आबादी कि प्रत्यक्ष --अप्रत्यक्ष निर्भरता कृषि पर है---जबकि सकेलु घरेलू उत्पाद (जी डी पी) में इनका योगदान 17% से 18% मात्र है। अब बात यह स्वभाविक रुप से उठता है कि इतने ज्यादा संख्या वाले कृषक सांसदों के रहते हुए किसानों की इतनी दुर्दशा क्यों--? क्या राजनीतिक दलों के सोची समझी साज़िश का परिणाम है वर्तमान कृषकों की दयनीय स्थिति--?
कृषक हित के लिये कार्यरत एक गैर सरकारी संगठन के अध्ययन के मुताबिक मल्टीनेशनल कम्पनियों में उपलब्ध कृषिगत कच्चे /अनप्रोसेस्ड सामग्रियों के दामों में कृषकों को प्राप्ति स्तर मात्र 23% से 30% है। यानि हमलोग जिस चीज को ₹100 में खरिदते हैं , उसमें से किसानों को उसका किमत मात्र 23 से 30 रूपैया तक ही मिल पाता है। लगातार लागत मुल्यों में वृद्धि और बाजार मुल्यों के अन अपेक्षित स्तर से तंग होकर सन् 2019 में दस हजार किसानों ने मजबुरन आत्महत्या कर लिया । आज के दिनों में हरेक किसानों की औसतन कमाई₹ 6400 प्रति महिना है ,जिसे वर्तमान सरकार सन् 2022 तक ₹13000 के औसत महिना की कमाई तक पर पहुंचाने की कार्ययोजना पर काम कर रही है । इसी तरह आज के दिनों में प्रति किसान लगभग औसतन ₹ 1.4 लाख कर्ज है, जिसे सरकार सन् 2022 तक आधा करने की ओर निरंतर प्रयासरत है।
"अन्नदाता सुखी भव: " की कामना सासंद भवन के विजिटिंग रजिस्टर पर अंकित करने वाले प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक पृष्ठभूमि का केन्द्र और आधार कभी भी किसान नहीं रहा। समग्र विकास में किसानों की अनदेखी न तो गुजरात में किया गया और न ही आज संपूर्ण भारत में किया जा रहा है। गुजरात और महाराष्ट्र के कपास कृषकों की व्यथा तथा इन्हें समय समय पर दिया गया प्रोत्साहन स्मरणीय हो।
किसानों के हक की आवाज बुलंद करने वाले राजनीतिक पार्टियों में से "अकाली दल" और एन सी पी-- "नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी" द्वारा हालिया कृषि सुधार बिल --2020 पर हो हंगामा मचाना --- रोड जाम आज सरे आम चर्चा में है। वर्तमान कृषि सुधार बिल के मुख्य तथ्यों को पंजाब विधान सभा चुनाव और लोक सभा चुनाव सन् 2019 में कांग्रेस सहित कई राजनीतिक पार्टियों ने अपने चुनावी घोषणापत्र में प्रमुखता से शामिल किया था। वर्तमान कृषि कानून--2020 में मूलतः: दशकों पूर्व कृषि सुधार हेतु गठित और उनके द्वारा अनुशंसित स्वामीनाथन कमिटि के ही सभी मौलिक बातों को शामिल किया गया है। फिर यह हो हंगामा क्या खोते जा रहे राजनीतिक आधार को हो हल्ला के माध्यम से विविध राजघरानों द्वारा अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का प्रयास कहा जा सकता है---?
देश के किसानों को यह याद हो उदारीकरण के शूरुआती दौर में बहुराष्ट्रीय कंपनीयों के बीज जब बाजार में आये थे, तो हजारों आशंकाएं जनमानस में दौड़ रही थी। आज यह साबित हो चुका है, किसानों द्वारा उत्पादित अनाज का बीज के रूप में उपयोग से ज्यादा फायदेमंद इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा उपलब्ध कराये जा रहे बीज की उत्पादकता है , जो ढाई से तीन गुणा अधिक ही नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक अभी तक कोई नुक़सान भी चिह्नित नहीं हो पाये हैं ।
तमाम आशंकाओं के बीच देश के गृह मंत्री बिन्दूवार सभी तथ्यों को स्पष्ट कर चुके हैं। किसानों को उनके उत्पाद पर ही अनुबंध करने की आजादी है --- जमीन पर कोई भी अनुबंध वर्तमान बिल का विषय वस्तु ही नहीं है। अनुबंध से निकल जाने की आजादी कृषकों के पास हर समय उपलब्ध होगा। किसानों के लिए वर्तमान में उपलब्ध अढैती--(मंडी) तथा न्युनतम समर्थन मूल्य की वर्तमान व्यवस्था (एम एस पी) आज के तरह ही आगे भी निरंतर चलते रहेंगे -- सरकारी महकमा इस बात का आश्वासन सार्वजनिक पटल पर दे चुकी है। वर्तमान कृषि सुधार बिल किसानों को अपने उत्पाद बेचने के लिए एक अन्य बेहतर और मजबूत विकल्प देने जा रही है। यही वह बिल है जो देश के किसानों को बदलते दौर के साथ समुन्नत कर देश के बहुसंख्यक जनता के विकास में ए टू जेड विटामिन साबित होगा।
तो फिर इस बिल को कतिपय जनों द्वारा "अन्नदाता के थाली में छेद---!" के रूप में देखा जाना कई एक प्रश्न खड़ा करता है। किसानों और बाजारों के बीच वर्तमान मध्यस्थ की भुमिका और मलाई चट कर जाने वाले लोगों के बीच अपने हित की बली चढ़ता देख उसी परिस्थिति को बचाने की छटपटाहट का यह नतीजा है तथाकथित जनांदोलन। गंभीर मंथन और अध्ययन हमें अच्छे परिणाम की आशा के साथ वर्तमान कृषि सुधार बिल के प्रति आश्वस्त करता है, जो किसानों को आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।
पवन मिश्रा
दुमका-- झारखंड
9931126996
email- pawan19755@gmail.com
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