Tuesday, November 14, 2023

( 11) गैर मजरूआ प्यार

            *गैर मजरूआ प्यार*
     
          चौदह साल के वैवाहिक जीवनोपरांत आखिर आज मैंने खट्टे मन से बोल दिया -- 'बुलबूल मैं तुझे तलाक दे रहा हूँ ' -- 
        कुछ पल के लिए तुफान आने से पूर्व की जो आबो हवा होती है बिल्कुल वैसा ही शांत हो गया -- --! बगैर किसी प्रतिरोध के मद्धिम आवाज में बुलबूल बोल गयी -- तेरी मर्जी -- मिल जायेगी तलाक --- नो आब्जेक्शन --! 
लेकिन आखिर क्यों चाहिए तलाक --?
         मेरे लिए नामुमकिन था इस बात का जबाब देना -- सो मैं चुप रहा | प्रिया मेरे जिंदगी में एसे करीब होते जा रही थी कि अब कोई और चारा नहीं था मेरे लिए | एक मयान में दो तलवार आखिर कैसे रखा जा सकता है--?
       बारंबार अनुरोध के बाद भी मुझसे खाना खाया न गया | लेकिन बुलबूल की धैर्यशीलता भी अचंभित करने वाली थी । बच्चों के लिए खाना लगाना एक रुटिन वर्क जैसा ही हुआ | आखिर बच्चे तो अनजान थे , और कोई भी मां ये कष्ट अपने बच्चे तक कैसे रखे कि तुम्हारी माँ इस परिवार से जुदा हो रही है -!
खा लो खाना हर्ष -- मैं नापसंद हूँ,  तुझे तलाक चाहिए वो मिल जायेगा --हर्ष -- इसमें खाना की क्या गलती --!  मैं चाह कर भी कुछ बोल न सका | सफाई के लिए मेरे पास कोई शब्द न थे । 
  वो रात बडी परेशानी वाली रात रही | एक तरफ प्रिया -- और उनकी कसमें -- वादे -- तो दुसरी तरफ बुलबूल से चौदह साल का साथ | भगवान ही बचा सकता है मुझे इस ऊहापोह वाली परिस्थिति से | मैंने योजनानुसार तलाक के कागजात तैयार किये जिसमें सभी आवश्यक बातों को जगह दी गयी |
         इंतजार की घडी लंबी और उबाऊ होती है | आखिर अंधेरों में सुरज को जगने से रोकने की क्षमता है ही कहां | बुलबूल के पैरों की आहट और चुड़ियों की खनखनाहट से मैं चौकन्ना हो गया , और उनके द्वारा बेड रूम का लाईट आन करने के साथ ही मैंने जगने का नाटक किया | 
           फ्रेश होने के बाद बगैर समय गंवाये , बगैर यह सोचे कि बुलबूल पर क्या बितेगा--! मैंने तलाक के वो पेपर उनकी ओर  बढा दिये -- ये लो बुलबूल इस पर अपने हस्ताक्षर कर दो  | क्या है ये --! क्या लिखा है इसमें -हर्ष --?  
         
         इसमें तलाक के सभी शर्तें हैं, तुम्हारी जरूरत का ख्याल रखा गया है  | मेरे कुल वेतन का चालिस प्रतिशत और वो रोहिणी वाली तेरे पसंद का मकान आज के बाद से तेरी हो जायेगी --!  
 धत् तेरे की हर्ष -- तुमने मेरे प्यार का पुरा कबाड खाना जैसा सौदा कर दिया यार | 
मेरा प्यार न बिकाऊ था, न है , न रहेगा हर्ष | मेरा प्यार खुश रहे यही आरजु है -हर्ष |  मैं नापसंद हूँ -- ये एक बात है, , लेकिन मैं अपने प्यार का सौदा कर लूं , बेच दूं अपने प्यार को ये नहीं हो सकता | तुझे तलाक चाहिए वो मिल जायेगा -- बगैर किसी शर्त के -- --!
  मैं रहूं न रहूँ  -- आबाद रहे मेरा प्यार --- यही मेरी पहली और आखिरी शर्त है ,  
        'बुलबूल ने पुरे जोर से तलाक के कागजात को फाड  दिया |  
  हर्ष तुझे मैं नापसंद हूँ,  क्या तेरे बच्चे भी तुझे नापसंद हैं --?  इनके परीक्षा के पेपर चल रहे हैं  | सोचो उन पर क्या गुजरेगा इस खबर से | उनकी परीक्षा समाप्ति तक तलाक को रोक दो   | बच्चों के भविष्य को सोचो तुम  |
       मैं उनकी बातों को सुनकर आफिस के लिए निकल चुका था  | आफिस पहुंचते ही प्रिया ने तलाक के प्रगति पर चर्चा किया --! प्रिया खिलखिलाकर हंस पडी और बोल पडी मतलब वो समझ रही है कि उनकी चतुराई तलाक  को कैंसल करा लेगी --! आखिर कब तक टाल सकेगी वो ये तलाक --!
       इधर परीक्षा समाप्ति की तिथि नजदीक आ रही थी | घर के कामों में न चाहते हुए भी मुझे हस्तक्षेप करने पड रहे थे | कभी नाश्ता बनाना तो कभी रोजी और रौशन को कालेज तक पहुंचाना  मैं सुगमता से संपादित करने का प्रयास कर रहा था   ! शायद मानसिक शोक से बुलबूल  इस कदर प्रभावित थी वो चाह कर भी सभी काम ससमय नहीं कर पा रही थी  |
    पांच  मई को परीक्षा समाप्त होने थे , यह बात प्रिया को भी पता था  | आज एक मई  के शाम मैं आफिस से आया ही था  , अभी काफी बनाकर दो घुंट लिये ही था कि अचानक से बाथरुम में जोर से कुछ आवाज आई धडाम् सा | मैंने देखा बुलबूल फिसल कर वहीं गिरी पडी थी -- निसहाय पडी थी वो   |  निश्चेत , मुर्छित सी थी वो ----!
      मैंने उसे बाहों में उठाया -- बामुश्किल  पैतीस से चालीस किलो वजन मात्र था उनका  | शोफा पर उनको लेटाते ही वो होश में आ चुकी थी --!  उनका चेहरा संतृप्त सा लग रहा था -- मानिए जमाने भर की खुशी उनको मात्र मेरे द्वारा गोद में उठाने से मिल गया हो  |    मैं दवा और प्राथमिक उपचार के जुगाड में लग गया था -- वो बोल पडी हर्ष क्या तुम मुझे रोज गोद में उठाकर यों ही आलींगन करोगे -- बस परीक्षा समाप्ति के पांच मई तक  |  कमजोरी को दुर करने के लिए मैंने उसे ओ आर एस का घोल पिलाया | झटपट मैंने खिचडी बनाये और बुलबूल को भी अनुरोध किया मेरे साथ ही जल्द से खाना खा लो ठीक वैसे जैसे शादि के बाद एक थाल में ही हमलोग भोजन करते थे -- मेरे आफिस का समय हो चुका है   -!
          मैं लेट करके आफिस पहुंचा    | प्रिया ताने मारने के लहजे में करीब आकर बोल पडी क्या बात है -- जैसे जैसे पांच तारीख नजदीक आ रहे हैं वैसे वैसे तुम अलग अलग से नजर आ रहे हो --|
        चार मई के सुबह रोशनी ने मुझे जगाया और बोली पापा आप भुला गये ,आपने वादा किया है आप मम्मा को गोद पर हर रोज उठायेंगे  -- आप जल्द तैयार होईए और मुझे कालेज भी छोडना है आपको  | 
     मैने बुलबूल को गोद पर उठाया -- बहुत हल्की लग रही थी वो , चेहरा से चमकविहीन सी लग रही थी , चेहरे पर पडी झुर्रीयां मानो कह रहा हो -- झर  जाने दो सारे तेज को  -- वो सुंदरता किस काम के जो शौहर को न भाये --! नि:तेज  पडी बुलबूल बोल पडी कल पांच तारीख है शाम को तुम जहां चाहो हस्ताक्षर ले लेना -- मुझे कुछ नहीं चाहिए  ,सिर्फ़ तेरे खुशी के -- वैसा ही कागज बनाना और हां कुछ गवाह भी तैयार कल लेना  आगे तुझे कुछ दिक्कत न हो  |
      विविध सोच के साथ मैं छोटे मन से आफिस पहुंच चुका था  --  | कार्य निस्पादन के लेटलतिफी से मैने अपने बास से डाट डपट सुन लिया -- शायद आज पहली बार  | 
              पांच मई के सुबह , बच्चे भावी योजना से अनजान ---!- चौदह वर्ष का साथ आज विच्छेद हो जायेगा  |  मैने आज फिर निर्धारित वादा नुसार बुलबूल को गोद में उठा  लिया , वो मुस्कुरा रही थी -- न जाने क्यों --?  मैंने पुछा कोई आखरी इच्छा --?  वो चुप रही कुछ न बोली बस तेरा प्यार इतना ही बोल पायी और चेहरा पलट कर दुर कुछ और देखने लगी --! 
        आफिस से कुछ जरूरी काल आया  | मैंने झट से तैयार हो आफिस को चल पडा --! ये आफिस से त्वरित बुलावा प्रिया का एक षडयंत्र था --!  प्रिया ने तलाक के वो सारे पेपर मुझे बढाये जो उसने किसी वकील से तैयार कराये  थे और बोली आज पांच बजे इस पर तुम बुलबुलीया से हस्ताक्षर करा लेना ---|
        मैं कहीं खो चुका था , ओर वापस अपने दिमाग को सहारा देने का प्रयास कर ही रहा था कि मै अपने जुबान को रोक न पाया जोर  से चिल्ला कर बोल पडा -- ये तलाक नहीं  हो सकता ,नहीं हो सकता --तलाक--!
   प्रिया   ने मेरे गाल पर जोर से चाटा मारा -- मानिए किसी बदहोश  को होश में आने के लिए यह चाटा भी अमृत पेय का काम कर गया  हो - -- मैने फिर जोर से चिल्लाया  -- ये तलाक नहीं हो सकता  |
        अविलम्ब मैं अपने घर को भागा भागा आया -|  स्टडी टेबल पर माथा टिकाये बुलबूल शांत थी, मौन थी -- एक कागज के टुकडे पर कुछ संदेश लिखी थी --- जिसे बगैर  बुलबूल को  जगाये मैंने पढना  चाहा ---" मैं  केंसर के चौथे  चरण  को एक माह  पहले ही पार कर चुकी हूँ -- ये तेरा प्यार ही है जो सांसे चल रही है  |"
    मैंने बुलबूल को जगाने का असफल प्रयास किया -- बुलबूल सदैव के लिए जा चुकी थी --- 
और मुझपर  एक बदचलन बाप , बदचलन पति और बदचलन प्रेमि  का ठप्पा लगने से रोक गयी --वो सहन न कर सकती शायद ----!
  काश बुलबूल तुम आज भी मेरे होते --
सिर्फ तुम्हारा -गैर मजरूआ प्यार - अभागा हर्ष  |
©® पवन मिश्रा 
दिनांक 14 नवंबर 2023


     
       


        
           

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