Tuesday, January 16, 2024

     

आलेख
             *श्री राम आयेंगे*
           *#1बालकांड*
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         श्री राम के नायकत्व को समाहित किये हुए महाकाव्य रामायण के रचनाकार आदि कवि श्री वाल्मिकि जी हैं जिनका काल निर्धारण 600 ईसा पूर्व से लेकर 300 ईसा पुर्व के बीच माना जाता है जो संस्कृत में लिखित प्रथम महाकाव्य है , और सबसे प्राचीनतम तथा मौलिक माना जाता है. विद्वान और रामायण के जानकार तो यह भी मानते है़ कि माता सीता ने लव और कुश को जन्म ऋषि वाल्मिकि के ही कुटिया में दिया है. और संत तुलसीदास रचित रामचरितमानस 1574 ईस्वी के आस पास लोकभाषा में लिखा गया है. दोनों ही संत सह महाकवि ने अपने आप मे राम के नायकत्व को समाहित किये हुए समाजिक ,राजनीतिक समरसता,  त्याग,  धैर्य और शौर्य के अनोखे गाथा को जनसाधारण के बीच रखने का काम किया है. हां यह कहना अतिश्योक्ति न होगी की जनसुलभ के भाषा मे संत तुलसीकृत रामचरितमानस सर्वाधिक लोकप्रिय हैं और घर घर तक इनकी पहुंच बनी हुई है. यहां हम प्रभु श्री राम को स्मरण करते हुए संत तुलसीकृत रामचरितमानस को आधार बनाकर कुछ अवलोकन का प्रयास करेंगे.
       किसी भी ऐतिहासिक महाकाव्य  के रचनाकाल , और तत्कालीन समाजिक मनोदशा को ध्यानार्थ लिए बगैर उस पर कुछ भी कहना शायद यह पुरी ईमानदारी से अध्ययन करना न कहलायेगा. समकालीन दौर भारतवर्ष के  भुखंड पर मुगलों का शासन था जो एक सीमा तक हिंदुओं पर जोर जुल्म का काल कहा जाता है ,और भक्ति आंदोलन शैव संप्रदाय और वैष्णव संप्रदाय के बीच अनोखे प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रहा था. महान कवि संत तुलसीदास ने अपने महाकाव्य में भक्ति संतुलन का अतुलनीय समावेश यहां किया है और श्री राम  जी (विष्णु अवतार) , शिव जी को याद करते हुए उन्हें श्रेष्ठ मानते हैं तो शिव जी  श्री राम को श्रेष्ठ मानते हुए उनका वंदन करते हैं. संपूर्ण रामचरितमानस में कुल 4608 चौपाई और 1074 दोहा हैं. इस महाकाव्य को सात प्रमुख कांड /घटना परिचर्चा में बांटा गया है , जिसमें पहला कांड -- बालकांड है.
               #*बाल कांड*
                   बालकांड अपने व्यापकता और कथासार के महत्ता के आधार पर बहुत ही महत्वपूर्ण है. इसी महत्ता के आधार पर ब्रह्मवैवर्तपुराण में कहा गया है कि अगर किसी भी मनुष्य का मन काफी चंचल हो , असत् में लीन रहता हो तो उसे निरंतर बालकांड का पाठ करा दिजिए वो सत् की ओर आसक्त हो जायेगा और अच्छे  कार्यों में उनका ध्यान स्वत: केन्द्रीत  होता जायेगा. बालकांड में भगवान श्री राम के जन्म से लेकर श्रीराम सीता विवाह तक के घटनाक्रम को रोचकता के साथ भव्य भक्ति माहोल में पिरोया गया है. बालकांड में 341 दोहा और 358 चौपाई है.
 
         अयोध्या  में दशरथ नाम के राजा हुये जिनकी कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा नामक पत्नियाँ थीं। संतान प्राप्ति हेतु अयोध्यानरेश दशरथ ने अपने गुरु श्री वशिष्ठ की आज्ञा से पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया जिसे कि ऋंगी ऋषि ने सम्पन्न किया। भक्तिपूर्ण आहुतियाँ पाकर अग्निदेव प्रसन्न हुये और उन्होंने स्वयं प्रकट होकर राजा दशरथ को हविष्यपात्र (खीर, पायस) दिया जिसे कि उन्होंने अपनी तीनों पत्नियों में बाँट दिया। खीर के सेवन के परिणामस्वरूप कौशल्या के गर्भ से राम का, कैकेयी के गर्भ से भरत का तथा सुमित्रा के गर्भ से लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ. राजकुमारों के बड़े होने पर आश्रम की राक्षसों से रक्षा हेतु ऋषि विश्वामित्र राजा दशरथ से राम और लक्ष्मण को मांग कर अपने साथ ले गये। राम ने ताड़का और सुबाहु जैसे राक्षसों को मार डाला और मारीच को बिना फर वाले बाण से मार कर समुद्र के पार भेज दिया। उधर लक्ष्मण ने राक्षसों की सारी सेना का संहार कर डाला। धनुषयज्ञ हेतु राजा जनक के निमंत्रण मिलने पर विश्वामित्र राम और लक्ष्मण के साथ उनकी नगरी मिथिला (जनकपुर) आ गये। रास्ते में राम ने गौतम मुनि की स्त्री अहल्या का उद्धार किया। मिथिला में राजा जनक की पुत्री सीता जिन्हें कि जानकी के नाम से भी जाना जाता है का स्वयंवर का भी आयोजन था जहाँ कि जनकप्रतिज्ञा के अनुसार शिवधनुष को तोड़ कर राम ने सीता से विवाह किया। राम और सीता के विवाह के साथ ही साथ गुरु वशिष्ठ ने भरत का माण्डवी से, लक्ष्मण का उर्मिला से और शत्रुघ्न का श्रुतकीर्त से हुई.  
    कुछ दिन तक जनकपुरी प्रवास के बाद राजा दशरथ साज बाज के साथ अपने सभी पुत्र -- पुत्रवधु सहित वापस अयोध्या को चले.
रास्ते में बहुत भयंकर आंधी आई, उस आंधी को देखकर मिथिलावासी डर के मारे कांप उठे . उसी समय इस आंधी में से भगवान परशुराम जी निकल कर राम के आगे खड़े होकर कहने लगे. राम तुमने शिवजी के पुराने धनुष को तोड़कर अच्छा नहीं किया.
यह स्वयंवर की शर्त थी भगवान् परशुराम--.
मैं कुछ नहीं जानता, मुझे यह धनुष ठीक उसी प्रकार से बनाकर दो, जैसा पहले था नहीं तो मैं तुम्हें शाप दे दूंगा.
यदि आपकी यही इच्छा है, परशुराम जी तो यह लो उसी समय भगवान, राम ने ( वास्तव में परशुराम यह अब देख पा रहा था कि श्री राम तो साक्षात विष्णु भगवान हैं)अपनी शक्ति से उस धनुष पर बाण चढ़ाया और बोले । क्यों भगवन, यदि इस तरह से मैं आपकी शक्ति समाप्त कर दूं तो कैसा रहे .नहीं नहीं भगवान वास्तव में मैं नहीं, आप महान हैं। यह कहकर परशुराम जी वहां से चले गए.
क्रमश: श्रृखंला 2 में अयोध्यकांड
  धन्यवाद
पवन मिश्रा (दुमका-झारखंड) 

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