Sunday, January 21, 2024

श्रंखला-4
आलेख
#*श्री राम आयें*
              #*किष्किन्धाकांड़*
आज जो मानव धर्म को आत्मसात करने की वकालत हम करते हैं अगर मानव संस्कार के इतिहास से श्री राम और रामायण को अलग करके हम सोचें तो हम पायेंगे ब्रह्याण्ड में सुर्य और आक्सीजन के बगैर जीवन की कल्पना करना.
      संत तुलसीकृत रामचरितमानस में अरण्यककांड के बाद किष्किन्धाकांड़ आता है. इस भाग में हम देखते हैं ,प्रभु श्री राम का हनुमान जी से मिलना , श्री राम सुग्रीव मित्रता ,बाली वध ,और बानरी सेना द्वारा माता जानकी की खोज के यतन.
       माता सीता के खोज में भटकते श्री राम के पास बानरी राज्य प्रमुख सुग्रीव ने हनुमानजी को बतौर गुप्तचर सच्चाई खोजने को भेजा. हनुमानजी ब्रहा्म्ण वेश धारण कर पुछते हैं वन में भटकते आप हैं कौन--? ब्रह्मा ,विष्णु ,महेश ,नर- नारयाण हो कौन आप--? साधुओं के भेष लिए आप दोनों क्या के लिए आये हैं वन में--?अपना परिचय दें --!
श्री राम बोलते हैं --  हम दोनों अयोध्या नरेश दशरथ पुत्र राम और लक्ष्मण हैं, और पितृ आज्ञा से हम वन प्रवास मे आये हैं, हम जनक नंदनी सीता को खोज रहे हैं जिसका हरण हो गया है.
       इतना सुनते ही हनुमान जी अपने वास्तविक रूप मे आकर प्रभु श्री राम के चरणों मे पड़ गये और बोल उठे आपकी ही माया है प्रभु, मैं पहचान न पाया मुझ अज्ञानी को माफ करें भगवान. भगवान श्री राम ने , हनुमानजी को उठाकर मित्रवत गले लगाकर आलिंगन किया. हनुमानजी कहते हैं राजा सुग्रीव माता सीता के खोज में अवश्य कुछ मदद कर सकते हैं.
हनुमान जी श्री राम और लक्ष्मण जी को पीठ पर चढ़ाकर सुग्रीव के पास ले गए और अग्नि को साक्षी मानकर दोनों की मैत्री करा दी . लक्ष्मण जी ने सुग्रीव जी से श्रीराम का सारा इतिहास कहा  .सुग्रीव जी ने बताया कि मैं एक बार मंत्रियों के साथ बैठा हुआ था तो राम ! राम  ! हा राम !कहते हुए एक स्त्री को पराये शत्रु के वश पड़े देखा . हमें देखकर राम ! राम ! पुकार कर एक वस्त्र गिरा दिया  .श्रीराम ने वह  वस्त्र मांगा तो सुग्रीव जी ने तुरंत श्रीराम को दे दिया.
    श्री राम ने सुग्रीव से गुफा निवास का कारण जानना चाहा--?  सुग्रीव ने अपने भाई बाली के साथ हुए वैचारिक मानसिक द्वंद और कलह को इसका कारण बतलाया. सुग्रीव ने बतलाया कि बाली द्वारा मेरे धर्म पत्नी को भी जबरन छिन ले गया है. बाली बहुत शक्तीशाली है.
      श्री राम के सलाहनुसार सुग्रीव ने बाली को युद्ध के लिए चुनौती दिया.  बाली और सुग्रीव  देखने में एक जैसा थे और अंतर कर पाना बहुत कठीन था. भयंकर बलशाली बाली ने सुग्रीव को युद्ध के मैदान में एक ही झटके में वज्र के समान दहाडा और बाली युद्ध मैदान से बहुत दुर जा गिरा. सुग्रीव बोलते हैं प्रभु श्री राम मुझे इस तरह मार खिलाने से और बार बार बेइज्जती कराने से क्या फायदा ,आखिर ईरादा क्या है आपका--? प्रभु श्री राम ने कहा  तुम दोनों भाई में अंतर कर पाना कठीन है , ये फुल माला बतौर चिन्ह पहचान हेतु सुग्रीव के गले में पहनाया और फिर से युद्ध मैदान में उन्हें भेजा गया. उचित मौका पर श्री राम ने धनुष से बाली पर प्रहार किया और मार गिराया. बाली बोलते हैं प्रभु श्री राम आप तो धर्म के रक्षार्थ पृथ्वीलोक पर आये है़ मेरे साथ ये छल और पक्षपात क्यों --! सुग्रीव के आप रक्षक और मेरे हत्यारा क्यों --?
श्री  राम ने कहा कि छोटे भाई की स्त्री ,बहन ,पुत्र की स्त्री और कन्या एक समान है . इन पर बुरी दृष्टि डालने वाला पापी होता है और उन्हें मारने वाले को पाप नहीं होता .
बालि ने श्रीराम से वर मांगा कि मैं कर्म वश जिस भी योनि में जन्म लूं . मेरा आपके चरणो में प्रेम रहे . हे प्रभु मेरे पुत्र अंगद जो कि मेरे ही समान बलवान हैं . उसे अपना दास बना ले और इतना कह कर बालि ने अपने प्राण त्याग दिया .
       श्री राम और लक्ष्मण के सहयोग से सुग्रीव अब बानरी राज्य के ताजधारी राजा थे और सिंहासन पर विराजमान थे तथा बाली पुत्र अंगद को युवराज घोषित कर दिया गया.
   समयोपरांत वर्षा ऋतुभर लक्ष्मण और श्री राम ने पर्वर्षण पर्वत पर निवास किया और फिर से लक्ष्मण को सीता विरह की चर्चा करते हुए सुग्रीव को याद किया और बतलाया कहीं सुग्रीव मेरे दिये गये कार्य सीता की खोज को भुला तो नहीं दिया. लक्ष्मण क्रधीत होकर सुग्रीव के पास और हनुमान के पास आते हैं. हडबडाते और डरते सुग्रीव श्री राम के चरणों मे नतमस्तक होते अपनी हाजरी प्रस्तुत करते हैं और आश्वस्त करते हैं सारी बानरी सेना तभी राजदरबार में उपस्थित होंगे जब तक कि सीता माता को खोज नही लिया जाता है.  सभी वानर निरंतर सीता खोज में व्याकुल  भुख प्यास से परेशान थे. पहाड के एक गुफा मे पक्षी प्रवास का रास्ता देखकर हनुमान जी के निर्देशन में सभी अपने प्यास बुझाने को वहां पहुंच गये. वहीं गीद्धराज जटायु के भाई संम्पाती से वानरों की मुलाकात होती है. और सम्पाती वानरों को सीता के अपहरण और लंका के अशोक वाटिका में प्रवास की खबर अपनी गिद्ध योनी और दिव्य दृष्टि के कारण बतला पा रहा है को उच्चरित किया. संम्पाति कहता है ,मुझे चंद्रमा नाम के मुनि मिले . उन्होंने कहा कि त्रेता युग में जब साक्षात परब्रह्म मनुष्य का रूप धारण करेंगे उनकी स्त्री को राक्षसों का राजा हर कर ले जाएगा . उसकी खोज में दूत आएंगे . उनको मिलकर तू पवित्र हो जाएगा . तेरे पंख उग आएंगे . उन्हें तुम सीता जी को दिखा देना . मुनि की वाणी आज सत्य हो गई. सुनो त्रिकूट पर्वत पर लंका बसी है . वहां अशोक वाटिका में सीता जी सोच मगन बैठी हैं . मैं गीध की दृष्टि से उन्हें देख सकता हूं लेकिन तुम नहीं देख सकते . जो सौ योजन (चार सौ कोस) के समुंदर लांघ सकता है . वहीं यह कार्य कर सकता है . गीध अपनी बात कह कर चला गया . लेकिन हर किसी ने समुद्र लांघने में संदेह प्रकट किया . जाम्बवान् ने कहा कि मैं अब बूढा़ हो गया  हूं .  अंगद हमारा नेता है उसे ही कैसे भेजा जाए ?

जाम्बवान् ने हनुमान जी से कहा कि ," तुम पवन के पुत्र हो. जगत में ऐसा कौन सा कार्य है जो तुम नहीं कर सकते. तुम्हारा अवतार श्रीराम के कार्य के लिए हुआ है . 


इतना सुनते ही हनुमान जी को अपने दिव्य शक्ति का ऐहसास हुआ और  विशालकाय रूप धारण किया और कहा कि मैं इस समुद्र को खेल में ही लांघ सकता हूं . हनुमान जी ने जाम्बवान् जी से पूछा कि, "मुझे क्या करना चाहिए"? जाम्बवान् जी ने कहा तुम सीता जी का पता लगाकर लौट आओ और उनकी खबर श्री राम को कह दो .श्री राम अपने बाहुबल से सीता जी को ले आएंगे और राक्षसों का संहार करेंगे .

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बहुत जल्द  सुंदरकाड ,
श्रृखंला--4, श्री राम आयेंगे
पवन मिश्रा(दुमका-झारखंड)





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