**एक और प्रयास---
---मानवता------
गलतफहमियों का लगा यूँ ताता ,
बोलो कुछ सुना कूछ और जाता ,
इसमें कसूर कहाँ ,उस इंसा का,
जिसे इंसा में जानवर ही नजर आता,
शाखाओं से टूटते पत्ते को सबने देखा,
विरह और वेदना को कब किसी ने जाना,
एक जमाना था ,
कटी नाक,
आत्महत्या का कारण बन जाता था,
आजकल हर कटी नाक प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि का कारक बन जाता है,
कोने में सहमी चुपचाप
मानवता खङी तलाश रही,
हलात मे अपने मौजूदगी का एहसास,
तभी बङे करीब से दिखा,
दरिन्दे दरिन्दगी पुरजोर कर रहे ,
राष्ट्रवादी होने का शोर मचा रहे,
पत्थबाजो के पत्थर ने
खाकी वर्दी को लहू-लुहान किया,
पत्थबाजो के शान में
बेकरार दो मुँहे नेता आये मैदान में,
सच छिपता जा रहा ,
झूठों के ईस परिधान में,
निज अस्तित्व तलाशता
मानवता मानव को पुकारता
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स्वरचित मौलिक और सर्वाधिकार सुरक्षित
पवन मिश्रा
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