*जगजाहिर हुआ प्यार*
ऐ बहुरीया ऐन्ने आबो ------
अस्सी साल की वृद्धा बार-बार अपने पोतहू को अवाज देकर बुला रही है। शुरूआती अनसुना करने के बाद भी जब वो नहीं मानी और आवाज देती रही तो पोतहू को आना पड़ा।
पोतहू मन ही मन झल्लाते हुए बोल पड़ी ई बुढ़िया जीना हराम कर दि है ----- तन्नक झन्नक करते चन्नर मन्नर बतियाते आते ही बोल पड़ी -- बोलु माँ जी चैन नाय पडै़त अपनैय के सुत जियो नी ----
अरे ऐ बहुरीया बाहर सब्जी वाला अवाज दैयत रहल छैय तनी देखियो आर बैंगन ले लियो -- आज शनिचर हैत बढ़िया से खिचड़ी बनाऊ --- तैमें पंचफोरण,सरसों दाना , कड़ी पत्ता और शुद्ध घीयोर फोरण/ कड़क तड़का लगाय के बनाऊ आर वैमें बैंगन आग मे झरका/ के फोरन डाल के हरी मिर्ची के साथ भरूता बनायल जाय एकदम सोहना सोहना बड़ जी करत है ऐसन खाना खाय के -----
तु बनाओ बहुरीया ले लियो बैंगन---------!
ऐ सासु माँ अभी ई ना बनय सकत हैय -- जी मूंह जरा दाब के राखु । किचन मे अपने इतना गर्मी हैय उपर से ई फरमाईश । आयत रहैय आपन के बेटा -- बेटवे से कहु वोही बनाय दैयत --
आज हमरा से खाना नैय बनत , कुछ रूखा सुखा रेडिमेड चुड़ा भुजा से काम चलाऊ ----- कहते हुए बहुरीया वापस अपने कमरा में बुबुदाते चल गयी।
जीभ का स्वाद कचिया जैसा पतला चटर पटर खाने को आतुर क्या कहूँ ई बुढिया को-- मरबो ना करत है ----!
बृद्धा मनमसोस कर चुप हो गई -- कोई प्रत्युत्तर नहीं दि --।
तभी धीरे धीरे आहिस्ता आहिस्ता वृद्धा बिछावन से उठकर खिडकी किनारे खिडकी के रौड़ को पकडकर खड़ी हो गई और हाथ के साथ ईशारा करते हुए आवाज दी ऐ सब्जीवाला इधरे आओ ----- --
कैसे है बैंगन --! बढ़िया है न --!
पचास रूपैया किलो हैय माता जी ई भाटा बैंगन -- सब्जी वाला बोला।
तभी अपने आंचल के एक कोने की गठरी जो कमर मे खोंसी थी खोली और देखी ई तो दसे रूपा है -- क्या होगा इसमें--!
अच्छा ई बताओ दस रूपा मे किता बैंगन देगा--!
सब्जी वाला होशियार था, थोडा माजरा कुछ कुछ समझ गया बोला -- मायी दस रुपा मे पांच हो जायेंगा --!
वो वृद्धा माता राम दस रूपये का पांच बैंगन खरीदकर गुदड़ी कपडोंं मे लपेटकर तकिया बनाकर माथे के नीचे रखकर सो गयी -- और बैंगन भरूता का स्वाद अपने कल्पनाशील मानसिकता के साथ चखने लगी -- और --- और खो गई अपने कुछ यादो में कि ओहहहहह ये मेरे उसी बेटा की मेहरारु है जिसको भुखे पेटों मैने पाला पोसा -- अपने सारे सुख सुविधाओं को बस अपने संतान के लिए त्याग दिया था कभी -- हे भगवान अब ले चल मुझे अपने द्वार -- अब और जलालत मुझसे न सहन हो पायेगी -- ले चल अपने द्वार -- बस बिछावन पर पड़े पड़े सोचते रही और सोचते ही रही ------- अभी ही होना था मेरे प्यार को बेपर्दा -- जगजाहिर हुआ मेरा प्यार
तभी एक कटोरा नुन तेल चिऊडा और दालमोट लेकर बहुरीया अपने तथाकथित माते राम के पास कुसमय पहुंची और बोली खाय लियो माते जी शाम मे कुछ बनायल जायेगा ---खाय लियो
बहुरीया अपने माते राम को बिछावन से हिला रही थी जगा रही थी लेकिन माते राम तो सदैव के लिए सो चुकी थी ---
अर्थी बाहर निकाली गयी --आंगन मे मृत्त शरीर रखा गया।
लोगों की भीड़ जम गयी -- हाय तौबा मच गया -- बहुरीया छाती पीट पीट कर मृतक के प्रति अपने प्यार जगजाहिर कर रही थी तभी भीड के किसी पैर ने मृत्तक के सिराहने कागज मे लपेटे बैंगन पर भुल वश पैर रख दिया और बैंगन का भरूता सा बन गया और बहुरीया का चीखना चिल्लाना हाय मेरी माते चली गयी अब कैसे रह पाऊंगा की बोल दुर दुर तक गुंज रही थी
प्यार जगजाहिर हो चुका था । भीड़ मे सभी को बैंगन भरूता की लिप्सा का पता चल चुका था।
पवन मिश्रा (दुमका --झारखंड)
12/06/2024
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