कहानी
*अनकही दास्तां*
मालकिन बाहरे देहरी पर तोहर बाबू खडा छतुन , तोहरा से मिलय के दरकार छतिन उनका , सेहे खातिर इजाजत मांगै छात -- कालु काका ने घर के पोतहू से विनम्र लहजे में
इजाजत मांगा. राधा ने हमेशा की तरह कही नही और कभी नहीं , और इस जीवन में नहीं जाकर बतला दें काका.
आंगन में तुलसी माता को जल अर्पण करते सुर्यदेव की छटा राधा के चेहरे पर इस कदर चमक रही थी मानिए सुर्यदेव सक्षात किसी सिंहासन के परी को दिव्यता देना चाह रहा हो और माता तुलसी सजीवता के साथ अपने हरे हरे छोटे छोटे पत्तीयों के साथ मुस्कान मारती जलपान ग्रहण कर रही हो . राधा सफेद साडी में अपनी मांग खो देने के बावजुद सक्षात सरस्वती की प्रतिमूर्ति सी लग रही थी और मानिए वह मन ही मन बोल रही हो, रे नियति और कोई भद्दा मजाक बचा हो मेरे किस्मत के नाम तो उडेल दे मेरे माथे. तभी कालु काका ने सकपकाते
तुलसी मंडप से थोडी दुर खडा होकर राधा की ओर टकटकी लगाये था , कुछ कह पाने के लिए उचित क्षण के इंतजार में.
इ कागज तोहरे बाबू देलकात , ऐकरा रख लियौ . कालु काका ने एक कागज राधा की ओर बढाते हुए बोला. राधा कागज लेते हुए अंदर घर मेंं प्रवेश की. पर्दा सटाकर उस कागज को खोलकर राधा देखने लगी.
कागज मे लिखा था-- राधा बेटा मां बाप बच्चे के अनगिनत गलती को माफ करते रहता है ,क्या बच्चे द्वारा मां बाप के एक गलती को माफ नहीं किया जा सकता --? मुझे एक बार माफ कर दो राधा.
राधा पापा के भेजे वो पत्र को पढकर फफक कर रोने लगी थी. लेकिन यहां न कोई उनकी आंसु पोंछने वाला था न कोई चुप करके संत्वाना देने -वाला- और राधा रोते सिसकते खो गई अपने बिते उन दिनों में ------
बारहवीं के कक्षा में पुरे राज्य में टाप की थी राधा , फिजीक्स कमेस्ट्री और मैथ में तो शत प्रतिशत नंबर आये थे और राष्ट्र स्तर के टाप रे़ंकर में उनका नाम चर्चा में था. बैचलर डिग्री इन बिजनेश ऐडमिनिसट्रेसन (बी बी ए) के लिए उनका चयन शहर के सर्वोत्तम संस्थान में हो पाया था जहां नमांकन ले पाना बहुत विद्वान छात्र और धनाढ्य अभिभावक का सिर्फ़ सपना रह जाता था. पढाई और प्रोजेक्ट तैयारी करने के सिलसिले में एक दिन गौतम राधा के घर आ गया था . बस चर्चे का बाजार तो गरम हुआ ही परिवार वाले आगबबुला हो गये. जल्दबाजी में त्वरित रुप से शादी की तैयरी आरंभ हो चुकी थी. एक बार भी राधा के मन को समझने का प्रयास किसी ने न किया, बस सबको एक ही भुत सा सवार हो गया था मेरे घर की बेटी से मिलने कोई लडका कैसे आ सकता है --? यह नागवार गुजरा राधा के परिवार जनों को. सब का एक ही सोच था अब बहुत पढ लिख लिये तुम ,अब सारी पढाई यहीं और इसी समय बंद करो और अपने ससुराल बसाने की तैयारी कर.
फिर ब्याहने के बाद राधा के विदाई में वो सारे किताब ,कापी ,सर्टीफिकेट ,मैडल , और पुरष्कार के सभी प्रतिक चिन्ह एक बडे से बक्से में बंद करके राधा के साथ ही ससुराल भेज दी गई. एक मेहनती विद्यार्थी के लिए उनके द्वारा अर्जित पुरष्कार और मेडल सदैव ही अनमोल होते हैं और आंखों के लिए सदैव प्रिय.
विधायक जी के बेटे की शान शौकत तो विधायक जी से भी बढ कर ही थे. आलोक हमेशा ही अपने धन दौलत और शोहरत के घमंड में चुर रहता था. एक बार राधा ने बडे ही साहस दिखाकर अपने सारे उपलब्धि आलोक को दिखाना चाहा और बक्सा खोलकर मैडल सर्टिफिकेट सब के चर्चे करने लगी. ये गोल्ड मैडल चेस इंटर स्टेट टुर्नामेंट में मैंने जीती है . मैंने राज्य में टाप किया था आई एस सी में , माननीय मुख्यमंत्री जी के हाथों यह पुरष्कार -- वगैरह वगैरह. और बोल पडी क्या मैं फिर से पढाई शुरू कर लूं.
बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद-? आलोक बोल पडा तु अब पढने जायेगी कालेज.पढकर तु दो टके की नौकरी करेगी . अरे जो मेरे एक दिन की कमाई है वह तेरा पढाई और होने वाली तेरी नौकरी साल भर में भी नहीं कर पायेगी. बातें बिगडते बिगडते इस कदर बिगड गयी कि राधा को लात घुंसो के साथ ढेर सारी अभद्र गाली पडने लगी. सभी कागजातों को आलोक ने जला दिया उसी समय. राधा ने इसी कालु काका के मदद से बडे मुश्किल से पानी छिटक छिटक कर कुछ अधजले से उन सभी अवशेषो़ को उसी बक्सा में फिर से सदैव के लिए बंद कर दिया और और लगा लिया अपने मन पर भी बडा सा ताला कि नहीं अब और ये उपलब्धि और मेरे कागजात अब किसी के सामने मैं चर्चा नहीं करूंगी.
नियती ने भी राधा के किस्मत पर बार बार छल किया. आलोक एक संदेहास्पद ट्रक और कार के टक्कर में राधा के मांग को सुना कर परलोक पधार चुके थे.
राधा के आंसु सुख चुके थे. बडे ही अटपटे ,उचटे मन से वो उस बक्सा को खोल कर उन अधजले और राख हुए अवशेष को हाथ में लेकर अपने पापा को मन ही मन बोल रही थी , पापा मैं तो आपको माफ कर दिया , क्या आप अपने को माफ कर पायेंगे --?
क्या ये अधजले मेरे सभी प्रतिक और पुरष्कार फिर मेरे लिए सजीवता ला पायेंगे--?
पापा पापा कहते हुए फिर से फफक कर वो रो पाने के मनोदशा में थी , लेकिन अब आंसु भी शायद रूठ गये हो राधा के आंखो से .
©®पवन मिश्रा (दुमका-झारखंड)
16-12-2023
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