एक कहानी
' एकतरफा प्यार-----'
' सुगंधा' यह नाम किस काम के, मैं ड्रेसिंग कक्ष में बैठे बैठे सोच मे पड गयी थी . कभी संदीप के साथ बिताये पिछले दिनों को याद कर रही थी तो कभी आज के अपने परिस्थिति पर , अपने भाग्य को मैं कोस रही थी.न चाहते हुए भी तरह तरह के अशुभ विचार मन मे हावी हो जा रहे थे.-- शायद मेरी मनोदशा इस पृथ्वीलोक को आज अंतिम प्रश्न छोड सदैव के लिए जाना चाह रही थी , एक औरत को अकारण अवहेलना , निरादर और परित्याग क्यों --? क्यों , क्योकि मैं एक औरत हूँ --!
जब मानव मन पर आपार दुख का पहाड टुट गया हो ,चारों ओर घोर अंधेरा दिख रहा हो तो चंचल मन सिर्फ़ अपने भाग्य को कोसता है और यही सुगंधा कर रही थी. भोजन मेज के ठीक उपर सुंदर सा तस्वीर जिसमें सुगंधा और संदीप खिलखिलाकर हंस रहे थे मानो उस हंसी पर अब पूर्ण विराम लग गया हो.अकारण संदीप ने शहर छोडकर महानगर में अपना घर बसा लिया और सुगंधा आज अकेली मानिए भीड भरे इस संसार में कोई कारण खोज रही है -- जीने का कारण --?
स्वयं से स्वयं के सवाल का जबाब पाना आसान नहीं होता है.ऐसे ही अनेकों सोच
भरे गंभीर सवाल दिमाग में बारंबार उपज रहे थे और मानो नेपथ्य से कोई संत्वाना दे रहा हो धैर्य रख --! संसार में तु अकेला ऐसा नहीं है --!
जाने कब से मेनका आंटि मेरे ठीक पिछे खडी होकर सिर्फ़ मुझे निहार थी. मेनका आंटी जो मेरे प्राईमरी ऐजुकेशन में अध्यापिका थीं और सबसे निकटतम पडोसी.,
बोल पडी क्या हो रहा है -सुगंधा बेटा .
मैंने हड़बड़ से जल्द उठकर उनका अभिवादन किया और उन्हें बैठने का अनुरोध किया. आंटी ने मेरे पसंद के भर कटोरी गाजर का हलवा ले आया था. खाने को मन न था लेकिन उनके अनुरोध में ही कड़ी आदेश वाली बातें छिपी होती थी सो मैं इनकार कर न पायी. हलवा समाप्त होते ही आंटी बोल पडी -- दस मिनट के अंदर कपड़े बदल कर तैयार हो जाओ तुझे मेरे साथ बाजार जाने हैं.
शायद दस मिनट से पहले ही आंटी के गाड़ी का हौरन मेरे दरवाजे पर बजने लगा था. मैं भी झटपट आधे अधुरे मन से ही घर मे ताला लगाते हुए निकल पडी और आंटी के साथ वाले सीट पर बैठ गयी. गाड़ी आंटी के ईशारे पर शहर से बाहर की ओर जा रही थी , मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था आखिर जाना कहां है--? गाडी़ गंतव्य को पहुंच चूकि थी.
मैं और आंटि संकरी गली से होते हुए अनेकों कमरे युक्त विशाल मकान में प्रवेश कर ली थीं. बड़ा सा बाग बगीचा विभिन्न प्रकार के पुष्प युक्त एक बड़ा सा खुले आसमान वाले बैठकखाना मे हम दोनों जाकर बैठ गये. ऐसा लग रहा था कि मेनका आंटी यहां बराबर आति हो और सभी उन्हें पहचान रहा हो.
हारे ,थके , बेजान , बेसाहारा बृद्धों की शरणस्थली थी यह जगह. जहां आंटी कुछ शारीरिक , मानसिक और आर्थिक सहयोग करा करती थी . ऐसा उनके चहलकदमी को देखकर मैं स्वत: समझ पा रही थी. उन्हीं बृद्धा मे से एक थरथराती हाथों से चाय छलकाती कप को पकड़े लौन में बैठी मुझे ईशारा करते हुए बोली 'इधर को आ मुन्नी'---मुन्नी--!
मैं आंटी की ओर देख इशारों में इजाजत मांग ली .
उस बृद्धा में गजब की तेज थी , हौसला सातवें आसमान पर , कडक रोबिले आवाज उसे भीड में असाधारण पहचान दिला रही थी.
मेरे पीठ पर हाथ सहलाते हुए मुझसे पुछीं --क्या करती है तुम. गजब की आत्मानुभूति और आत्मीयता उनके इन शब्दों में थी .उनके हथेली का मेरे पीठ को छुउन गजब की अनुभूति दे रही थी , संतोष शुकून भरा सहलाना था उनका यह छुउन. .मैंने लाख चाहने के बाद भी अपने को रोक न पाया , बिन कुछ बोले मैं फुट फुट कर रो पडी.
सत्तर पचहत्तर के उम्र में वो मुझ तीस साल की औरत को सहारा देते हुए एकांत की ओर ले गयी और मेरे सारे मनोविकार को बोलने के लिए बाध्य कर दिया .एक एक कर मैं अपने सारे परिस्थिति और संदीप के परित्याग को व्यक्त कर गयी.
आंटि आप इतने अच्छी हैं, आपका परिचय थोडा जानती--? सुगंधा ने उनसे अनुरोध किया. संदीप तुझे छोड के चला गया इसलिए बेजान हो तुम --!
सुनो मेरी कहानी ------ मैं देश के मशहुर डाक्टर रतनेशर की मां हुं. मैंने उसे पचीस साल तक पढाया. बारह से चौदह घंटा मैंने उम्र के पैंसठ साल तक काम किया . सुगंधा बोल पडी -- लेकिन इतने पैसे और सोहरत वाले डाक्टर साहब की मां यहां--!
उसके पास मेरे लिए कोई समय नहीं है . उनकी अपनी कुछ लचारी रही होगी इसलिए मैं यहां हूं. मैं आज भी रतनेशर को उतना प्यार ही प्यार करता हूँ . मैं कल जितना करता था आज उससे ज्यादा जानोगी क्यों --?
मैं प्रेम करता हूँ। नि:स्वार्थ प्रेम अपने बेटे से पोतहू से . बदले में प्यार मिलेगा इसकी अपेक्षा कहां है --?. अगर प्यार के बदले प्यार की आशा हो , बुढापे मे परवरिश की आशा हो तो वह प्रेम रहा ही कहां. वह प्रेम नहीं है जिसे दुनिया प्रेम मान रही है -- यह तो डर है अपने बुढापे का , यह तो स्वार्थ है समय परअपने को सहारा कोई दे इसलिए,प्रत्युतर में प्रेम पाने की भुख तो हरगीज प्रेम नहीं है. तुम संदीप से प्रेम नहीं करते तुम अपने खुशियाली खातिर उसपर आश्रित होना चाह रही हो .
तिनका तिनका बचा कर मैंने रतनेशर को संभाला है ,जब उनके पापा उसे छोड़ दिया अकेला . वह जिगर का टुकडा है मेरे लिए . प्यार द्विपक्षीय नही हो सकता है . हमेशा ही प्यार एकक्षीय ही होता आया है. हां कुछ समय के लिए यह आभासी रूप में प्रतित होता है , कि प्यार के दोनों पक्ष एक दुसरे को समान रुप से चाहते हैं. लेकिन यह सिर्फ आभासी होता है ,कलांतर में वह भ्रम बहुत बड़ा अवसाद का कारण भी बनता है. यह अवसाद तो प्यार के गहराईयों को अभिव्यक्त करता है और प्यार भुले नहीं भुलता.
अगर तुम संदीप से बदला लेने की सोचते हो , या उसके व्यवहार को तुम कोसते हो तो तुम उसे प्यार नही करते थे --!
प्यार तो हमेशा ही अगले के कल्याण और अच्छाई के कामना के लिए होने चाहिए. प्यार कुछ प्राप्ति के लिए हो तो वह प्यार कहां.
मैं रतनेशर से टुट गयी--- इसके बाद अपने सारे जमा पुंजी और पेंशन इसी वृद्धाश्रम को दान दे दी हूँ, ताकि बेसाहारा लोग यहां आश्रय ग्रहण करे --, तेरा सहारा है अभी ये तेरे मजबुत हाथ और पांव -- कुछ कर जिससे सुगंधा के पृथ्वी पर होने का अर्थ स्पष्ट हो .
©®पवनमिश्रा (दुमका झारखंड)
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