Friday, June 28, 2024

(17) कहानी -- बीस साल बाद

द कहानी
                *बीस साल बाद* 
(इस कहानी के सभी पात्र ,घटनाक्रम और कथासार सौ फीसदी काल्पनिक हैं -- कहानी लेखन का एक मात्र मकसद मनोरंजन है तथा किसी के भी भावना को ठेस पहुंचाना इसका उधेश्य नहीं है . किसी भी तथ्य का कहीं से भी मिला जुला होना महज एक संयोग हो सकता है -- पवन मिश्रा)

        ' मानवी ' कालेज में सबसे चर्चित नाम. बद अच्छा बदनाम बुरा . किसी भी प्रकार के कोई हुडदंग हो उसमें मानवी एक चर्चित चेहरा का होना अब स्वभाविक था. प्राईमरी कक्षा से ही साथ साथ पढती मेरी अतरंगता कुछ अलग सी थी मानवी के साथ. लेकिन अब मुझे भी हर वक्त सावधान किया जाने लगा , शिक्षक , अन्य दोस्त , अभिभावक रह रहकर एक ही बात दोहराते जा रहे थे नीलु तु अच्छी बच्ची है  थोडा सावधान रह , गलत संगत से बच.
             अब ये गलत संगत क्या थी मुझे नही पता लेकिन मैं यह समझ पा रही थी, हर किसी का ईशारा बगैर नाम लिये मुझे मानवी से मिलने जुलने को लेकर थी.
                 फक्कड अंदाज ,बेबाक लाईफ स्टायल , बेफिक्र स्टायल , मदमस्त चाल , ये आदत इन्हें औरों से अलग करती थी. आम तौर पर इंटर की छात्रा नारियोचित गुणों से लबरेज होकर पुरुष मंडली से अपना ठौर ठिकाना अलग कर छात्राओं के बीच ही अपने को  सहज महसूस करती है ,लेकिन मानवी के अंदाज ही कूछ और थे  परिवेश में मानवी को लेकर काना फुशी अब आम बात हो चुका थी. 
बडे बुजुर्ग ,शिक्षक ,दोस्त सभी उनसे अब कन्नी काटने लगे थे. मैं स्वयं ने कई बार उसे अगाह करने का प्रयास भी किया लेकिन उसे मेरी बात की कोई परवाह न हुई. बदले में उसका जबाब मिला चल निलु जमाने में कौन क्या कह रहा है तु सुनते रह मुझे इसकी कोई परवाह नही, तु आ जा मेरे साथ तुझे भी यौवन रस का मजा चखा दुंगी. मानवी के इस बात को सुनकर ही मैं अंदर से डर गयी थी और बडी सलीके से मैं बचा निकाल पायी अपने को. कुछ ही दिनों बाद कालेज में पुलिस  पुछताछ के लिए आयी और पता चला कि मानवी किसी अज्ञात के साथ लापता हो गई है. और घरवाले भी उनके भाग जाने को लेकर  परेशान हैं. काफी खोजबीन के बाद भी कुछ पता न चल पायी.
        समयतंराल के बाद मैं संदीप से ब्याही गई. मेरे माता पिता के सभी अरमान पुरे हो गये. लडका सुशील ,सज्जन ,मृदुभाषी, और प्रचुर खानदानी धन दौलत वाला तथा स्वयं का बडा कारोबार से युक्त था. समाज,परिवार और परिवेश के नजर में संदीप आज सुयोग्य ही नही सर्वश्रेष्ठ दमाद की हैसियत से सबके प्रशंसा का पात्र था. लेकिन एक नवविवाहिता पत्नी को दुल्हा चाहिए होता है बिंदास स्टायल वाला , सभी गमों से दुर , कार्य चिंताओं से मुक्त , कम से कम शादी के शुरूआती दिनों में तो ये मनोदशा होने ही चाहिए. लेकिन संदीप हर वक्त अपने काम धंधों के सिलसिले में कुछ खोया खोया सा रहता था.  
              घर की जरुरत के सभी समान तो संदीप के स्टाफ ही पहुंचा जाते थे. लेकिन कुछ चीजें आदमी को स्वयं से खरीदने चाहिए, .इसी सोच के साथ मैं सिटी वाक माल  के लिए शाम के तीन बजे अकेले ही निकल पडी. लेडिज गारमेंट्स के लिए तीसरे तल पर मशहुर क्लोविया शोरूम के तरफ मेरे कदम बढते जा रहे थे. तभी एक अत्याधुनिक आकर्षण युक्त काफी हाऊस ने मुझे अपने ओर खींच लिया. ठंडी के दिनों में काफी की चुस्की ओह गजब के आनंद वाला पल था वो मेरे लिए.
              काफी की पहली चुस्की ओंठ से लगायी ही थी कि मैंने अत्यल्प संशय के साथ 
----- तु मानवी है न मुझे पहचानी मैं नीलु तेरा क्लासमेट, काफी पीते हुए सामने वाली जींस जैकेट मे खडी एक महिला को बोली.
अरे नीलु यार तु कैसी है ,तु तो एकदम न बदली . ये बीस साल बाद बहुत कुछ बदल गया पर तु और तेरा अंदाज आज भी वही है मानवी. मैंने एक पुराने दोस्त के हैसियत से मानवी को कही. 
       अच्छा ये बता मानवी तु तो बीस सालों से लापता हो गयी थी कहां थी ,कैसे हो --?
नीलु बोली -- मैं क्या करती ,--?, मैं इश्क में पागल सी हो गई थी  , और वो अपने माता,पिता को मेरे लिए राजी कर न सके. क्या अंतर पड़ता है , -? हम दोनों एक दुसरे के थे और हैं -- इसका नाम तुम लिव इन रिलेशनशिप कहो या संकल्प शादि कहो . मैं आजीवन उनके साथ हूं और वो आजीवन मेरे साथ. मेरे हर सुख दुख का ख्याल वो रखता है.  हां कार्याभार के कारण महिने का दो चार दिन ही वो मेरे साथ रह पाता है.मैंने उसका नाम ही प्रेम रख दिया . और तु बता नीलु चपडगंजु क्या हो रहा है --?
         अरे यार क्या जो बताऊं--! तेरा प्रेम अद्भुत है. मैं खुश हूँ अपने पतिदेव के साथ. मेरा बेटा दुन  पब्लिक स्कुल में पढ रहा है . दुनिया की सभी सुख सुविधाऐं नौकर चाकर गाडी बंगला यह सब उनके लिए आम सी बात है , रोहिणी सेक्टर थ्री में मेरा बंगलो है . अभी कुछ दिन में ही मेरे मां पिता वापस गांव जाने वाले हैं तब तु मेरे पास एक दिन भी आना जरुर . मैं तुझे अपने पतिदेव से मिलाऊंगा -- वो देवता समान हैं मेरे लिए. महिने का बीस पचीस दिन वो मेरे साथ रहते है , बिजनेस के सिलसिले में दोचार दिन ही मुझसे काफी कष्ट के साथ अलग होते हैं.
     अच्छा नीलु कल तु मेरे घर जरूर अईयो . भोगल के सेक्टर पांच  में मेरा कोठी है - 'प्रेम बाग' तु आयेगी न नीलु नहीं तो तेरे पति देवता को प्रेम बाग में मैं कैद कर लुंगी -- प्रोमीश कर मानवी के इन अंदाज, दोस्ताना जिद और अधिकार पर मैं ना बोल  न पायीं और बोल गयी प्रोमिश रहा मानवी मैं कल ही आ रही हूँ , भोगल  सेक्टर फाईव में पहुंचती हूँ. 
    
          अगले दिन वादे के मुताबिक मैं भोगल सेक्टर फाईव पर पहुंच चुकी थी. दरबान ने मुझे बडे ही सलीके से लान के गलियारे होते हुए गेस्ट रूम तक ले गया और बैठने का अनुरोध किया. देखते ही मैं दंग सा रह गई -- घर, लान ,बागवानी अतिथि कक्ष शायद इस उत्कृष्टता के स्तर वाले कोठी में मेरे जिंदगी का पहला प्रवेश था.मैं अपने आप को सहज करने का प्रयास कर ही रही थी तभी मानवी दिल खोलकर हंसते मेरे उपर ही धडाम् से गिर गयी और मुझे बांहों मे लिपट ली -- ये आत्मीयता जताने का उनका अपना अंदाज था. बातों और ठहाकों का सिलसिला चलते रहा . भुल गयी थी देश दुनिया और उन्मुक्त आबो, हवा कालेज और स्कुल वाली फीलींग में हमलोग फिर वापस हो लिये थे.
     तभी मानवी बोल उठी चल तु वादा निभा गयी ,और तेरा पति देवता बच गया मुझसे वरना तेरी तो ऐसी की तैसी मैं कर देती नीलु.
चलो नीलु अंदर को चलते हैं कहकर वह मुझे घर के हरेक हिस्से को दिखाना चाह रही थी. मैं गेस्ट रूम से चलकर ड्राइंग रूम में प्रवेश कर चुकी थी .
            अंदर के फरनीचर, फोटो फ्रेम सब के सब बहुत ही खुबसूरत सा दिख रहे थे. मैं अवाक् सा हो गयी , मानो धरती माता मेरे पैरों के तलवे के नीचे गायब सा हो गयी. चेतना शुन्य हो गई ,  दिमाग शांत सा होते चला गया कहीं शुन्य में --- मैं धडाम् से चारो खाने चीत गिर गयी थी . मेनका जिस प्रेम के साथ चिपकी हुई  फोटो ड्राइंग रूम के दीवार पर लगाई थी वह प्रेम कोई और नहीं  मेरा पति देवता  संदीप था.
   ©®पवन मिश्रा (दुमका-झारखंड)

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