'अनोखा ममत्व'
कार्य भार हो तो परेशानी और न हो तो खाली दिमाग शैतान का अड्डा | कार्यों के प्रति बेशुमार समर्पन अच्छा चीज है , लेकिन अत्यधिक पैसा कमाना और गलत पैसा कमाना ,आदमी को दोस्त ,परिवार और समाज से अलग और जुदा करके रख देता है | पैसे कमाने के चाहत ने ही तो आदमी को एक मशीन समान यंत्र में तब्दील कर दिया --! और सच पुछिये तो ऐसे आदमी
न परिवार का होता है न अपने शरीर का और न अपने मन का मतलब वो होता है -- सिर्फ और सिर्फ पैसों का |
ठंडक भरी दिन और उसमें अगर बारिस हो जाय तो वह दिन थोडा अलग ऐहसास दिलाने वाला दिन होता है. झटपट आफिस के काम खतम कर मैंने रघु को प्याज वाले गरम पकौडे लाने को कहा .
कुछ ही मिनटों में गरमा गरम लजीज पकौडे मेरे टेबल पर था . ओह अवर्णनीय अनोखे स्वाद जिससे कभी मन नहीं भरता.
पेट की तृप्ति और मन की तृप्ति ये दोनों दो चीज होती है. और जहां मन की तृप्ति न हो वहीं होता है असीम लगाव -- अथाह स्नेह -- हर पल उस स्नेह को भोगने की इच्छा .
आप स्वयं के अंदर झांकिए - अगर आप संवेदनशील और भावना प्रधान व्यक्ति हैं,तो आपके मनो मस्तिष्क में दो चार शख्सियत ऐसे अवश्य होंगे जिनके करीब आप अपने को रखने की चेष्टा अवश्य करना चाहेंगे -- उनके बातों में वो स्नेह और आत्मीयता आपको दिखेगा जिससे आपका मन कभी न भरेगा - ये लेखक के अपने विचार हैं--.
खैर मैं नहीं कह सकता वो रघु के हाथों लाया गया वो पकौड़े को मैं प्यार करता था या पकौडे ही मुझसे प्यार करने लगे थे -- यह एक अद्भुत संयोग था.
जब जब मैं फुरसत पाता मुझे पकौडे की चाहत होती और मैं रघु को आदेश करता -- तब तब एक ही प्रकार के संतुलित मशाले से बनी मेरे हरेक पसंद की चीज रहती उस प्लेट में , यथा धनियां और सरसों की चटनी , प्लेट की सजावट , परोसने के तरीके -- ओह हो अवर्णनीय -- कमाल की तहजीब होती थी .
मैंने पुन: एक प्लेट और रघु को बोला. बस कुछ ही मिनटों में उसी अंदाज में रघु ने पकौडे मेरे टेबल पर हाजिर किये. पकौडे बनाने वाले से मिलने की और उसे कुछ स्पेशल टिप्स देने की मेरी जोरों की इच्छा हुई.
हरेक बार की भांति इस बार भी रघु ने मुझे रोकने का हर संभव प्रयास किया. लेकिन मैं अपने नेचुरल रूप में अब आ चुका था और --- अब मै आफिसर था और रघु मेरा आदेशपाल --
एक आफिसर का सख्त आदेश अपने आदेशपाल से था -- 'तुरंत मिलाओ पकौडे बनाने वालों से---'
और कुछ ही मिनटों में मैं वहीं था जहां पकौडे तला जा रहा था. पकौडे बनाने वाली कोई और नहीं मेरी मां थी जिसके कोख से मैने पैदा लिया था ----- और परिवारिक रंजीश में उसे वृद्धाश्रमों दशकों पहले पहुंचा दिया गया था .
मैं स्तब्ध था , मैं आफिसर था , पैसे वाला था , शहर में मेरी तुती बोलती थी लेकिन मानवीय संवेदना मेरी मर चुकी थी -- मुझसे ज्यादा संवेदनात्मक मुल्य आदेशपाल रघु ने अर्जित किया था -- जो मेरी मां को रख पा रहा था.
©® पवन मिश्रा
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