Sunday, June 16, 2024

कविता। -- भुख प्यास

     भुख --प्यास
भावनाऐं हैं कि थमती नहीं 
जोर  ओर से दिल को 
कुछ कुछ कह जा रहा हैं
कलम है कि रूके रूकती नही 
बहुत कुछ लिख जाने को 
मेरा मन कहता है
लेकिन वहां है ऐसा मन
जहां मेरी बातें सौ के सौ
 पहुंचती नही शायद 
साठ सत्तर प्रतिशत बातें 
तो युं हवा मे ही रह जाती है
जिसे न बोल पान मेरी अक्षमता
और वो न रिसिभ करे ये
उनकी होशियारी 
नहीं  नहीं अक्लमंद नहीं है वो
जरुर होगी कोई उनकी लाचारी
मेरी भुख है उनकी मोहब्बत
उनके दिल दिमाग धडकन
रग रग मे मेरी चाहत हो
वहां मैं सिर्फ़ मैं रहूं
पर समझता हूँ 
प्यार तो जीत हार की चीज नही
पर वो कहती है सर्वस्व समर्पण 
मेरे बस की बात नही 
युं अचानक से आना मिलना
और मेरे रग रग मे समा जाना
कोई टाईमपास वाली बात तो नही --!
हो सकता हो उधर के लिए मैं हूं टाईमपास 
मेरे लिए तो लिली बन चुकी लाइफटाईम प्यास
 ©®पवन मिश्रा (दुमका-झारखंड) 


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