"कालेज वाला प्यार"
हाँ सहिये याद आया तैतरिया नाम था उनकर --गोरी , छरहरी काया ,मीठी मुस्कान, मीठी आवाज मानिये मने की सरोसती सवार थी उनके माथे ,उनके कठं ---इससे बेसी जो याद है मुझे वह मैं यहाँ लिख नहीं सकता ,कभी मिलिये तो जरूर बताऊंगा-----हाँ लेकिन स्टायल मारने में नम्बर एक और पढाय लिखाय में गोबर गणेश ऐतना तो खुलम्म खुल्ला कहिये सकते हैं आप सब को---
हाँ मने कि हम पगला जा रहे हैं तो तुम हमरे लिए कुछो नाय करेगा जी --भरदम रसगुल्ला और कलाकन्द मुझे खिलाने बाद मेरे सीनियर लालमुचून्द मुझसे बोल रहे थे --हाँ यह जगह था उ समय का 'कावेरी' शहर का सबसे बढियका मिठाय दुकान --!
बङी विनम्रता से जो कह पाये थे हम उनसे त कहिये ना हमको क्या करना होगा भैइया----
और रात आठ बजे हम लिख रहे थे लालमुचून्द भैया के नाम से प्यार इजहार वाला चिठ्ठी पत्री तैतरिया के वासते--!
हर दो तीन दिन बाद, मैं यह प्यार इजहार वाला चिठ्ठी पत्री लिखने लगा था और मुझे मिलने लगा था कभी आइसक्रीम तो कभी ङोसा ,समोसा और बढिया बढिया नाश्ता पानी ---,
हेय मायरी तोह लिख दो यार जो कहेगा तुझको देगा हम लेकिन झकास वाला चिट्ठी लिखो पढकर उछल जाये तोहर होय वाली भौजाई-----
बस फिर क्या था बङ जतन से लिखने लगे उनकर ---हाय लीला कथा प्यार का
कोई गंभीरता से पढ ले तो जरूरे कहेगा लङका बङा तेज है बहुते जल्दी लाल पीला बत्ती लगलका गाङी पर घूमेगा इ छोहरा---, तैतरिया बङी किस्मत के तेज है--
राजदुत फटफटिया पर भाय बाप संग सवार तैतरिया का अइसे पिछा होता था उ लालमुचून्द भैइया द्वारा सायकल और कभी कभार बजाज फोर स्ट्राक फाटफिटया से मने कि क्या कहा जाय ठीक वैसे जैसे मिग सेभनटीन पुरनका लङाकु विमान से भेद दिया अमेरिकी नयका लङाकू विमान -----को । ठीक तैतरिया के गाङी का धुल देखते मने ख्याली राजकुमार , मान लेता था जीत लिये जंग --कर लिया दुनिया मुट्ठी में ।
सीन देखकर ऐसे ही लगता था जैसे तेज गति से सफेद चमचमाती दौड़ती कार पर शिवपहाङ चौक पर कुकुर भौकियाता है, हपकने के लिए उछल पङता है, लेकिन भरपुर असक्षम प्रयास करता था बेचारा ।
आज रात सात बजे टीन बाजार चौक पर खङे खङे सोच ही रहा था , कि कास मै भी इस खिले गुलाब को उपहार कर दिया होता अपने जज्बात को , यह गुलाब अपने छाती में एक संकल्प कर रोप लिया होता जन्नत पाने को , अपनी मंजिल प्राप्ति को ,तो शायद आज दिन कुछ और होता , जिन्दगी ही गुलजार होता--!
तभी भारी भरकम झोला लिये खुब्बे मोटी सी औरत एकदम सामने रूक कर कहती है---
आयं हो मतलब पहिचाने ---
जी नही तो --प्रणाम (दोनों हाथ जोङकर) मैं कहता हूँ ।
एक ठो बात पुछना था मने की उ चिट्ठीया सब आपही लिखते थे का , उ ल्छेदार भाषा त आज भी यादे है----- , ----!
अरे हमहूं आपही के साथ जायेंगी--
लेकिन मेरे गाङी में तो पीछे अटकन नहीं है, कहीं फेंका गयीं तो--मैने कहा,
अरे नाही ना गिरून्गी ,दोनों हाथे से कसकर पकङलून्गी --!
मैंने कहा अरे अगर चिन्कुवा की मम्मी देख लेगी त --अभी अपने तीन चार फाईल पर रिसर्च कर उ रोज पूछ ताछ कर रही है अब ई नया माजरा माथे मोल लेना पङेगा---'मने मन सोच रहे थे तभी वो बोल पङी----
अरे धत् आप वही रह गये हमरा कोनो नियत नहीं ना गङबङ है ,-- जो कोई कुछ बोलेगी
बिना विलम्ब किये उ छपट कर बैठ गयी थी हमरे के टी एम मोटर सायकल के पिछले सीट पर और हम बिना देरी कर ले दु नम्बर गियर पर ही झटका मार के गाङी का एक्सलेटर दबा दिये ।
©® पवन मिश्रा ( दुमका)
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