Sunday, June 16, 2024

कविता -- भ्रम बनाये रखना

         भ्रम बनाये रखना

जब हो तेरा मन मुझसे दुर ,बहुत दुर जाने का
अचानक से ये इश्क तोड न जाना
अलग न हो जाना मुझसे ऐसे
जैसे विशालकाय पत्थर पहाडों से
टुटकर अचानक जमीन पर गिरा हो धडाम से

छोड जाना मुझे ऐसे कि पता न चल पाये मुझे
मेरे आस पास तेरे होने का
यह संशय तु बनाये रखना
दुरियां अगर बनाना चाहो
तो बनाना कुछ ऐसे
जैसे मताऐ़ं छल करती हैं
सोते हुए शिशुओं पर
अपनी खुशनूमा चुनर ओढा कर ----!

मुझे ऐसे मत त्यागना तुम
जैसे पेड छोड देते हैं सदैव के लिए
पतझड मे अपने पत्तों को
जैसे बरसात मे कोशी की विशाल जलराशि
बहा ले जाती है कोसों कोस बसे
बेखबर तटों  को, साथ-साथ बसे जीवन को .
ऐसे न जाना दुर कभी
जैसे कृष्ण चले गये मथुरा से बिन पलटे

जब हटाना ही हो मुझे दुर
तो थोडा कायदे से
धीरे धीरे शनै;शनै;
जैसे दुध जलते जलते खत्म कर देती है अपने स्वरूप
लेकिन एक झटके यकायेक न तोड लेना संबंध
जैसे पतंग अलग हो लेती है डोर से

मत छोड देना ऐसे
जैसे आकाश छोड देती है हमेशा के लिए
जल बुंद और ओले को
बिछडना कुछ ऐसे जैसे
पहाड त्यागती है निर्झरनी को
और निर्झरनी मगन रहती है
भ्रम मे उदगम से जुड़ी होने को
ये भ्रम बनाये रखना कि
तुम मेरे हो
तुम मेरे हो
--पवन मिश्रा (दुमका-झारखंड)
20फरवरी 2024








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