कहानी
*प्रेम ही तो है*
सुधा हिंदी की अध्यापिका , ने सच में भाषा हिंदी को इतने सहजता और सुंदरता से अपने में आत्मसात किया है कि बगैर श्रृंगार किये वो सुंदरता की प्रतिमूर्ति सी दिखती है. हिंदी की मिठास , सहज अभिव्यक्ति, भाषाई भाव भंगिमा और इससे भी बढकर दैनिक योगाभ्यास तथा अनुशासित जीवन शैली ने उसे सच में पचपन के उम्र में भी उम्र पचीस वाली शारिरिक षैष्ठवता प्रदान किया था.
भारतीय संस्कारों से सुसज्जित चमकती दमकती सुधा रुपी फुलों पर वांछित अवांछित भौरें अक्सर ही मंडराते रहते थे -- लेकिन सौंदर्यता ईश्वर की अनुपम कृति होती है ,और उस सौन्दर्यता की रक्षा हेतु रक्षा कौशल से भी उसे स्वत:और स्वभाविक निपुणता ईश्वर प्रदान करता है .
छैला छिछोरा टाईप का एक छोरा पहनावे और चाल व्यवहार से मस्ताना कम ठिठोला ज्यादा पिछले कुछ दिनों से सुधा का पीछा ऐसा कर रहा था मानिए भौंरा पुष्प रस के सुगंध मात्र से मदांध सा हो गया है, और रस चुसने को लेकर निरंतर उनकी परिक्रमा कर रहा हो.
एक दिन अनायास ही इस अनजान छिछोरे ने भारी भरकम बाईक कवासाकी निन्जा चौदह सौ सीसी को तेज रफ्तार से सुधा मेम के ठीक सामने युं टर्न लेने के पोजीशन में रोक दिया और पुछ लिया मैम 'डु यू लभ मी'----
सुधा जो सौम्य व्यवहार अपने मुस्कान से सामने वालों के क्रोध को पी जाने की क्षमता रखती थी बिल्कुल भी न विचलीत हुई. उनकी प्रतिक्रिया ठीक वैसी थी जैसे अंगुलीमाल डाकु को महात्मा बुद्व ने कहा था --' मैं तो ठहर गया भला तु कब ठहरेगा--?'. सुधा बोल पडी --' मैं तो अध्यापिका होकर मानव जाति से ही अथाह प्रेम करता हूँ, तु उससे बाहर तो नहीं -- यु आर जस्ट लाईक माय चिल्ड्रन बाय योर ऐज' कहकर मंद मुस्कान के साथ सुधा अपने रास्ते निकल पडी . अब यह लडका नासमझ मानो इन्हें करोडों की लाटरी लग गई हो . गदगदी का तो अब कोई सीमा न था.
इसी तरह अपने ही चाल में विद्यालय के वार्षिक कार्यक्रम को संपन्न कराकर सुधा तेज कदमों के साथ आटो स्टैंड की ओर देर शाम को जा रही थी . आटो से सुधा हाइवे के रास्ते अपने घर की ओर जा रही थी. तभी भयंकर तेज रफ्तार से वो लडका आटो को ओभर टेक करके हाइवे पर चढना और आटो को जबरन रोकना चाहा. तेज रफ्तार से आ रही ट्रक के झटके से वो लडका वहीं गिर गया और करीब पचीस फीट घसीटते हुए वो लहुलहान हो गया. वो स्वयं से उठ खडा होने के परिस्थिति में नहीं था. सुधा आटो से झट उतर गयी और उस लहुलूहान लडके को गोद में उठा कर आटो पर बैठाया और उसे पारस हास्पीटल मे भर्ती कराया. तकरीबन दो घंटे के बाद उसे होश आ चुका था. वह लडका बिन कुछ बोले लज्जीत भाव से बेड पर पडे पडे हाथ जोड कर माफी मांगने की मुद्रा में था . सुधा बोल पडी़ तेरी उम्र मेरे संतान जैसी ही है. पुत्र तो कुपुत्र हो सकता है पर माता कभी कुमाता होती है क्या--? बस यही नारी के मातृत्व बोध के कारण तु यहां जिंदा है.
©®पवन मिश्रा (दुमका-झारखंड)
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