Saturday, June 15, 2024

(2)कहानी -- दारुबाज

       ( 2) कहानी
      *दारुबाज*
अपने ही मन सोचते -- सोचते , लडखडाते  पैरों से घर की तरफ बढ़ते जा रहा था। देर रात मैं सुनसान राहों पर चले जा रहा था। हर दिन चाहता हूँ कि नहीं अब शाम होते ही घर जल्दी आ जाना है ,रोज रोज ये देर रात्री घर पहुंचना  कोई  अच्छी  बात नहीं। न    चाहते हुए  भी  आज फिर रात्री के एक बज  गये  । यै बैठक्का लगाने वाले जो हैं न उसे दुनिया मे किसी के परेशानी से कोई वास्ता ही नहीं। अपनी जिद्द ये लो मेरे तरफ से --! ये स्पेशल बोदका --!   एक और चिअ्अर्स ---! अरे  ये ले  रसियन  ब्रांडी--!  बस ये बर्फ के साथ  एक   और पैग--! ये दारू न होता तो दुनिया होती भी क्या--? होती भी तो इतनी हसीन न होती---! तभी कोई दोस्त बोल पडता दारु ही है जो आदमी को आदमी से जोडता है-- समाज को समाज से जोडता है। जात--पात मिटाता है, उंच नीच भेद भाव मिटाता है ----
   दारू मानो इनसे बढकर संसार मे कोई अमृत नहीं-- संजीवनी है ये दारू -- दारू ही आदमी का आक्सीजन है -------! 
   बस दारू महिमा सुनते ग्लास पर ग्लास गटगटाते कब को रात ग्यारह बज गया पता ही नहीं चला। अब भोजन उपरान्त जैसे शरीर भारी सा हो जाता है ठीक वैसे दारु उपरांत शरीर में एक अलग प्रकार का आवेश प्रवाहित सा होने लगता है --! 
और यही आवेश दारु को महान बतलाता है -- न सिर्फ बतलाता है बल्कि बडे बडे सुंदर सुंदर काम भी ये दारु करा जाता है।  और कई बार तो ऐसा भी सुनने को मिला है कि दारु पीने से ही किसी की किस्मत खुली हो। 
    लडखडाते  हुए चलते चलते सुनसान राहों पर  दुर से धुंधला सा कुछ अजीब सा दिखा । मैं चलते रहा --चलते रहा नजदीक पहुंचा। देखता हूँ कोई जवान लडकी परेशान सा एक बिजली के खंभे को अपने शरीर से चिपका कर पकडे हुई है--! मैं बोल पडा --- ऐ कौन है तु, इतनी बडी रात यहाँ क्या कर रही हो--! कोई परेशानी है--? वो इशारों मे अपने ऊंगुली से दुर कुछ दिखाई--। 
      मुझे माजरा समझते देर न लगा। मैने दुर खडे तीन जनों को रोशनी मे स्पष्ट देखा।  गरजते हुए  मैं बोल पडा  कौन  है ---?  शेरु रे-----! भागले अभी देखेगा तु लोग --। वाहियात कहीं का। तीनों के तीनो सरपट दौड़ कर भाग गया। 
         डरे सहमे हुए अनजान लडकी को मैं गौर से देख रहा था --! उनके चेहरे पर अब भी डर साफ--साफ दिख  रहा था--? मुझे उसे इस हालत मे अकेले छोड कर जाना उचित न लगा। मैं बोल पडा तु चलेगी मेरे साथ--? लडकी कुछ न बोली --! मै फिर से बोला तु चलेगी तो चल मैं अकेला हूँ --! 
    कहावत है मरता क्या नहीं करता। भगवान लडकी को जवान होने से पहले एक स्पेशल गुण से संवारता है। लडकीयों की छट्ठी इंद्रीयां इतनी तेज काम करती है कि वह निन्यानबे प्रतिशत सटिक बैठता है--! अगर आप किसी लडकी को घुर रहे हो तो उस लडकी को यह पता चलते देर न लगती है कि आपका उसे देखने का नजरीया क्या है--? और अगर आप बात कर रहे हों तो चुटकी मे लडकीयां आपके सही या गलत मन को पढ सकने की क्षमता रखती है। पता नहीं लडकी ने इस दारुबाज मे क्या जो देखा बोल पडी हां मैं आपके साथ चलुंगी --! हाँ शायद लडकी की जो परिस्थिति थी वह आगे खदहा  पीछे कुंआ वाली --! वह करती भी क्या--! 
    एक हाथ पकडे अपने कदमों से लड़खडा़ते --लडखडाते लडकी को मानिए घसीटते घसीटते मैं घर को ले के जा रहा था। और लडकी चुं चां कुछ भी नहीं बोल पा रही थी -- शायद इतनी सशंकित थी कि वह बोलने के स्थिति मे थी भी नहीं  । मै घर पहुंचते ही घर के दरवाजे पर जोर से आवाज लगाया -- अरे उठो, कुम्हरार वाली -- उठो न रे पगली ---! 
   देख तेरे लिए तेरी बेटी ला दिया हूँ ---अब आज के बाद किसी की क्या मजाल--!जो तुझे कोई बांझ औरत कह ले --.।  ले संभाल अपनी बिटीया को। 
--पवन मिश्रा (दुमका -झारखंड) 



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