Friday, June 28, 2024

(7)कहानी --- रोशनी

                     रोशनी

*कहानी हर घर की-- हर समाज कभी*
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   मास्टर साहब की बेटी रोशनी पढनें में अव्वल, अपनी मास्टर की डिग्री  पुरी कर भविष्य, के रंगीन संपने देखते हुए मन ही मन अपने को सबके सामने     प्रशंसनीय और आदर्श दिखाना संकल्प कर ली थी ।

      समयोपरातं खूब प्रतिष्ठित चौधरी खानदान की पोतहू बन गयी ।

कहा जाता है --

विवाह पूर्व   दुल्हा दुल्हन सहित दोनों के बपौती घर- खानदान की सिर्फ प्रशंसा  ही समाज में फैलती है ,
और बरतुहार (मिङियेटर) 
अगर ज्यादा धुर्त टाइप का चलाक हुआ तो दोनों ही खानदान टाटा बिड़ला जैसे ही  चर्चा में होते हैं फर्क सिर्फ , इनका प्रतिष्ठा अन्तराष्ट्रीय होता है --
और चर्चित दोनों परिवारों के तथाकथित महिमामंडन 
सिर्फ हम और आप तक या दलाल के संपर्क परिधि तक----

   लेकिन असली खानदानी परिचय तो शादी के उपरान्त दो तीन साल में ही  पता चलन लगता है----.

जो स्वतः बिना किसी  प्रेरक के जग जाहिर, चर्चा ए आम होता है -----

      चौधराइन बने रोशनी के अभी दो सप्ताह ही बिते थे , कि घर के नाना किस्म की जिम्मेदारी उनके हिस्से स्वतः आते गया और
हर रोज नयी नयी जिम्मेदारी स्वतः ---!

   सुबह के पाँच बजे उठकर ---

जेठ के दोनों बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना----
 स्कूल भेजना ---

   फिर जेठ के लिए नाश्ता और टिफीन का इंतजाम करना ---

   सासु अम्मा के लिए गरम पानी -- 
कङक वाली चाय तथा चिकित्सकीय सलाहनुसार कुछ हल्के अलग प्रकार के नाश्ते का इंतजाम होना वो भी अविलम्ब-----

     चौधरी साहब की जमींदारी ठाठ--बाट का क्या कहना --'

उपरोक्त सभी कामों के निपटारे से पूर्व ही चौधरी साहब की जमघट और उनके व्यक्तित्व अनुकूल बंगले की शान शौकत का निर्वाह कराना भी तो अब रोशनी के ही जिम्मे थी --- घर की नयी पोतहू जो थी -- और उसमें भी उसे सबका का प्रशंसा पाना था और अपना आदर्श रूप दिखाना था-----

   ओह क्या सुन्दर सोच और संकल्प है --!

    चाय पान और हल्का लेकिन सुन्दर और स्वादिष्ट  नाश्ता का निरंतर बंगले पर बखुबी पहुँचते रहना ही नयी बहु के योग्यता ,सुंदरता और सद्व्यवहार का प्रमाण पत्र सा बन गया था -----
सो यह हर रोज निरंतर चलता रहा----!

   संपूर्ण परिवार अपने अपने कार्यों में व्यस्त रहता था और समय की पाबंदी स्कुल कालेज और आफिस सभी जगह थी इसलिए जरा सी भी विलम्ब का मतलब था ----
          भविष्य के प्रति लापरवाही-,
कार्य के प्रति लापरवाही  और ,और  पोतहु के खानदान पर बडा सा प्रश्न चिन्ह ----!

और बहु की कार्यक्षमता----!

   ग्यारह बजे तक चौधरी साहब (ससुर) का पुरे साज बाज लाव लस्कर के साथ   निकलना तय रहता था, चौक चौराहे के लिए सो उनका पुरा इंतजामात---
 सुन्दर सुस्वादु भोजन,
कङक आयरण युक्त पहनावा ,इत्र  आदि सब का व्यवस्था समय पूर्व होना ही चाहिए----
भला घर और उस एरिया के नामी गिरामी चेहरा तथा भावी मुखिया भी यही तो हैं----

           ससुर के घर से निकलने के ठीक बाद सासु अम्मा-----
भी तो --
    फ्रयाड जिरा  राइस, मिक्सङ फ्रायङ दाल,
करैला का भरौवा, पोश्ते  की चटनी, पनीर पकौङा , जैसे विविध व्यंजन भरे भोजन की थाल होनी ही चाहिए आखिर चौधरी खानदान की इज्जत तो उस थाल में ही अब चिपक सी गयी थी----!

     सासु अम्मा के भोजन उपरान्त बच्चे का विधालय से घर पहुँचना---
पुनः उसका नाश्ता -भोजन ,

सासु अम्मा की सगी बहन का  हर रोज आना , अपने बहन से मिलना तथा हर रोज नये अंदाज में गर्म जोशी से आतिथ्य स्वागत का होना ---

आखिर चौधरी खानदान को इज्जत और शान शौकत भी तो यही सब से बनाना है -----!

 अब दिन भर का थके हारे आफिस की परेशानी लिये जेठ का घर आना ---हुआ-
  भूखे प्यासे को चाय नाश्ता पानी आदि -- देना तो नयी नवेली पोतहू के हि जिम्मे था.
 जेठानी तो आखिर जेठानी है ,
बड़े घर की बेटी है
घर की बङी पोतहू है--

 उनसे चूल्हा और रसोई का काम तो नहीं हो पाता है---!

देवर जी का कालेज से आना तथा भाभी से खाना की माँग---

  भाभी आप बहुत अच्छी हैं,
बहुत सुन्दर खाना ---
लेकिन कुछ ना कुछ काम आप भी तो किया कीजिए---!
परिवार के सभी सदस्य कुछ ना कुछ जरूर कर रहे हैं---

रोशनी ने सिर्फ ' हं' में जबाब दिया--

       ओह हो शाम के तीन बजे तक सीर्फ---
बिना किसी काम के मेरा समय तो ----!

     तभी जमींदारी ठाठ बाट को कन्धे पर सम्भालते हुए दुल्हे राजा 
 प्रकाश चौधरी का भी आगमन होता है----

 रोशनी चलो बहुत भूख लगी है थोङा गरमा गरम  लेकिन जल्द ---
दिन भर परेशान हूँ ,समय खराब होते जा रहा है जब से साक्षर भारत अभियान चला तभी से कोई किसी को नही गुदानता है---
हर आदमी पढ लिख लिया --
कोई कहने में अब रहता नहीं है तथा -----

    रोशनी तुम भी खाना ले लो अपना---

   तुरंत ---- दो मिनट रूकिये-- --

खाना का पहला कौर ही तो मुँह में ङाला था--

    कि पतिदेव भी बोल पङे ---
रोशनी तुम भी कुछ तो किया करो---

 कूछ ना कुछ तुझे करना चाहिए----

    रोशनी फफक कर रो पङी---

  बस इतना ही बोल पायी हाँ मुझे भी कुछ करना चाहिए----

  एक मास्टर की बेटी को बाप की शिक्षा-दीक्षा से ज्यादा पिताजी की इज्जत और अपने आदर्शतम रूप के भावना का ज्यादा ख्याल था ---!

    सो घर की सबसे ज्यादा योग्यता धारी रोशनी आज ङाइनिगं हाल में सुन्दर दुधिया प्रकाश से चकाचौंध-जगमग वातावरण  में
 घनघोर अँधेरा महसूस कर रही थी,
और  --
  खोज रही थी रोशनी  और खोज रही थी जबाब अपने ह्रदय तल से---
मुझे---

   "कुछ करना चाहिए "

©®पवन मिश्रा
   (दुमका)

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