*बार बार होता है प्यार*
इस दुनिया मे प्रेम ही है जो अमर है -- अदृश्य है , जो कभी मरता नहीं। किश्तो मे बंट कट कर ही सही पर जिंदा रहता है हर पल। समाज अपने परंपरा के पैनी धार वाले चाकू से प्रेम की --पहरेदारी करता है , प्रेम की हत्या करता है पर ये प्रेम ही है कि अपने खुद में से बह रहे लहु के हरेक कतरे से नये प्रेम को जन्म देता है । खत्म करने वालों, पनप रहे प्रेम को नश्तनाबुद करने वालों, प्रेम के आवाज को दबाने वालों की संख्या मानव समाज मे भले ही ज्यादा हो -- पर प्रेम करने वालों के हौसलों से ताकतवार आज तक कुछ नहीं बना -- न कोई परमाणु बम न हाड्रोजन बम और न कोई ऐसा फौज जो प्रेम को रोक सके -- प्रेम हरेक अवरोधों से परे होता है,यह पनपता है और अनजाने विशाल वटवृक्ष सा रूप धारण कर जाता है ,जो खत्म होने से पहले नये पौध सिंचित कर जाता है और प्रेम अजर अमर वायुमंडल मे आक्सीजन की भांति चलतं रहता है।
आरोही अपने विद्यालय से आते ही अपने मम्मी अकांक्षा से लिपट कर रोने लगी । मम्मी मेरे दोस्त कहते हैं कि तेरे नये पापा आने वाला हैं। तेरी मम्मी रौशन अंकल से शादी करने जा रही है।
अकांक्षा हडबडाहट में बोल पड़ी --- तु क्या बोल रही है मेरी बेटी --?, ऐसा कुछ भी नहीं है आरोही। आरोही तुझे तो रौशन अंकल खुब दुलार करते हैं -- रौशन एक अच्छा इंसान है भी, अगर रौशन तेरा पापा बन भी गया तो क्या परेशानी है आरोही। कहते हुए अकांक्षा ने आरोही को समझाने का प्रयास किया।
आरोही बोल पडी -- नहीं मम्मी, नहीं --! रौशन अंकल अच्छे हैं। लेकिन सभी कहते हैं सौतेले माँ और सौतेले पापा कभी भी प्यार नही दे सकते हैं - हरगीज नहीं। मम्मी तुम मुझे प्यार नहीं करती हो --?
गोद मे सर लिटाये आरोही के पीठ को सहलाते हुए अकांक्षा बोल पडी -- आरोही तु ही मेरी जीवन है और तु ही मेरी संसार--। तु क्या चाहती है--? नहीं मम्मी नहीं---! तुम शादी मत करना मम्मी ---, मेरी कसम। अकांक्षा गहरी और लंबी सांस ली और बोल पडी ठीक है आरोही बेटा मैं शादी नहीं करूंगी --! आरोही ने भी लंबी राहत की सांस ली कि चलो मेरे और मम्मी के बीच रौशन रुपी संभावित दिवार खडा न हो पाया।
अगले ही दिन आकांक्षा ने रौशन को अपना फैसला सुना दिया। दर असल चार साल पहले अकांक्षा के पति का आकस्मिक दुर्घटनावश इंतकाल हो गया था। उन्हीं के जगह पर कृषि विपणन कार्यालय मे आकांक्षा की नौकरी लगी थी। जीविकोपार्जन हेतु पैसों की कोई कमी नहीं थी। अकांक्षा ने मन ही मन अपने आरोही के सहारे ही जींदगी गुजर करने को मन बना लिया था। लेकिन पता नहीं विधाता को क्या मंजुर था --? दो साल उपरांत ही रौशन जो एक विधुर ( जिनकी पत्नी जिंदा न हो)था ने भी इसी कार्यालय मे नौकरी योगदान किया था। कार्य सहयोग और निष्पादन के दौरान दोनों ने एक दुसरे को समझा -- दोनों मे नजदीकीयाँ बढ़ीं-- बस फिर क्या था ---- --?प्रेम के बीज को मनोनुकूल आबोहवा नमी और दिल रुपी खाली खेत मिल गये जहाँ पौधा तो तैयार हो ही रहा था मगर क्या पता नियति को क्या मंजुर -----?
अब दो युगल प्रेमी एक जगह रहे , प्रेम परवान न चढ़े ऐसा होता है क्या---? लेकिन दो परिपक्व मानसिकता एक दुसरे को कभी भी समाज के नजरों मे गिरने नहीं देना चाहता है । शायद इसके लिए त्याग कि बडी़ से बड़ी सजा जो हो सकती है वह स्वत: आत्मसात कर लेता है--। रौशन ने चर्चा परिचर्चा का जल्द ही पटाक्षेप कर दिया -। रौशन ने त्वरित रूप से कार्यालय से छुट्टी ले ली और छुट्टी के दौरान ही अपना स्थानांतरण दुसरे राज्य करा लिया। बस समाज और परिवेश के तथाकथित सभ्य नेक मानव के आंखों पर, दिल पर सभ्यता और संस्कृति का सुंदर ऐहसास तृप्त हो गया। दो प्रेम करने वाले बिछड़ गये एक दुसरे से। रौशन वापस तो आया लेकिन आफिस से उसी दिन उनकी विदाई समारोह आयोजित की गई--- लंबे लंबे सुंदर सुंदर भाषाई मिठास मंच पर रौशन के प्रशंसा में रखे जा रहे थे।
रौशन और अकांक्षा एक दुसरे से नजर मिलाने का साहस न जुटा पाये। मंच पर जब अकांक्षा के बोलने की बारी आयी तो मतलब धैर्य जबाब दे चुका था --- मंच पर सिसक सिसक कर वो चढ़ी जरूर लेकिन फुटफुकर रोने लगी-- बोल पडी गुनाहगार मैं हूँ -- और इसके बाद वह कुछ बोल न पायी। रौशन जो अंत में मंच पर चढ़ा उसके पांव मे वो मजबुती न थे , लब थरथरा रहे थे बोल पडा़ --- मेरे जीवन के पतझड में इस कार्यालय ने ही एक बसंत की आश जगाई -- लेकिन प्रकृति कभी कभी अत्याचार कर जाते हैं , प्रकृति ने मुझ जैसे वृक्ष पर नये पत्ते को देखना अनुचित समझा --! मेरा जीवन अब ठुंठ वृक्ष से ज्यादा कुछ नहीं है-- और ये ठुंठ वृक्ष किसी के जीवन मे छाया न दे सका लेकिन दाह संस्कार मे तो ये ठुंठ वृक्ष नजर आ ही सकते हैं-- - ? एक ठुंठ वृक्ष समान ही रह गयी मेरी जिंदगी -- जिसमें समाजिक परिवेश मानवीय मजबुरी -- सब ने मिलकर रौशन तक रोशनी न पहुंचने दिया। सबका आभार -- जिंदगी रही नियती को मंजुर हुआ तो फिर मिलूंगा -- कहकर अत्यल्प संबोधन के साथ रौशन मंच छोड नीचे उतर गया।
समय अपने गति से चलते रहा -- अकांक्षा और रौशन एक दुसरे से बहुत दुर जा चुके थे -- कोई खोज न कोई खबर। आरोही बडी हो चुकी थी । अब इनकी शादी लग चुकी थी। लेकिन आरोही बारबार एक ही बात से परेशान थी मेरे शादी बाद मम्मी अकेली हो जायेगी। आरोही बीते दिनों के याद को सोचते ही मायुस हो जाती थी।
मम्मी आई एम गिल्टी मै ही दोषी हूँ तेरे एकांत के लिए मम्मी। मैं चली जाउंगी तु अकेले कैसे रहेगी --? रौशन अंकल को तुझसे दुर करने में मेरी ही गलती है--!
आरोही --- सेट अप। चुप रहो आरोही। आकांक्षा जोर से चिल्लायी। अब उन पिछले बातों के उच्चारण से क्या फायदा --आरोही। सब की अपनी अपनी अपनी किस्मत है। चलो शुभ शुभ तेरी शादी हो ससुराल बसे यही मेरी खुशी है।
अगले सुबह दरवाजे पर बारंबार काल बेल बज रही थी--। दरवाजा खोलते ही अकांक्षा सन्न रह गयी----! सामने रौशन खड़ा था। बोल पडी रौशन तुम यहाँ----? इतनी सबेरे--? कहाँ हो, कैसे हो--? रौशन बोल पडा जैसे दिल के अंदर कभी प्रवेश न दी क्या दरवाजे के अंदर भी जाने से रोकने का ईरादा है क्या अकांक्षा--?
अंदर सोफे पर बैग रख रौशन रिफ्रेश होने लगा। तभी आरोही भी जग गयी थी। तीनों ने एक साथ चाय पी। आरोही बोल पडीं -- अंकल और मम्मी मैं ने एक दृढ़ संकल्प लिया है ---
आप दोनों अगर शादी नहीं करते तो मैं भी शादी नहीं करूंगी आजीवन मम्मी के साथ यहीं रहुंगी। अकांक्षा ने कुछ न देखी-- जोर का तमाचा आरोही के गाल पर लगा दिया। और झट से अपने बेड रूम चली गयी। और वहीं से अवाज लगाई आरोही यहाँ आओ जल्दी--?
तुम क्या बोल रही हो आरोही तुझे पता है--? मुझे तेरी शादी करनी है-- इतनी बडी जिम्मेदारी है और मैं अभी इस उम्र में शादी करूँ -- तेरा दिमाग तो सही है ---। आरोही ने एक ग्लास पानी अकांक्षा को देते हुए कही मम्मी पहले पानी पीयो --। और मारेगी क्या --? मन है तो मार ले मम्मी--। अब चल गेस्ट रूम आये हुए मेहमान की बेईज्जती होती है अगर हमलोग उन्हें अकेला छोड देते हैं तो--!
अकांक्षा और आरोही कुछ नाश्ता लेकर रौशन के पास पहुंचती है -- और बातचीत के क्रम में अकांक्षा बोल पडती है समाज क्या कहेगा --? नहीं हरगीज नहीं मैं शादी नहीं करूँगी--।
अकांक्षा बढ़ते उम्र के साथ परिपक्व हो चुकी थी । बोली समाज ---? कौन समाज --? कैसा समाज --? वही समाज जो एक विलखती विधवा के एकाकी जिंदगी से हर रंग को खींच बेरंग करना चाहती है--। वो समाज जो विधवा होते ही औरतों को उनके हंसने बोलने तक पर प्रतिबंध लगाना चाहती है--? कैसा समाज जो विधवा को मायुस और रंगहीन करने के लिए हजार प्रतिबंध तो लगाने की सोचता है लेकिन वो जिंदगी कैसे जीये इस पर मौन रहता है। कैसा समाज --? जो पापा के श्राद्ध भोज में रसगुल्ले कम पड़ जाने पर हो हल्ला मचाते हो---।
अंकल आप मेरे अनुरोध पर यहाँ आये, काफी परेशानी सेआपके फोन उपलब्ध हो पाये। फैसला अंकल आप और मम्मी पर है, नहीं तो मै अपनी शादी नहीं करूंगी नहीं करूंगी -- मै मम्मी को अकेला नहीं छोड सकती। कुछ देर के लिए आरोही जानबुझकर गेस्ट रूम से निकलकर बाहर आ गयी --। और फिर एकाध घंटे उपरांत अकांक्षा अंदर आयीं। सारी दकियानूसी परंपराऐं टुट चुकी थीं -- अगले दिन मंदिर मे आरोही -- रौशन और अकांक्षा का गठबंधन कर रही थी -- मंत्रोच्चारण के बीच शंख फुंके जा रहे थे-- मानिए रौशन और अकांक्षा को सक्षात विष्णु भगवान आशिर्वाद दे रहा हो -- फिर दुसरे दिन रौशन शादी के विविध इंतजाम कर रहे थे और आरोही और दमाद के गठबंधन अकांक्षा कर रही थी--।
प्रभु तेरी जय हो-- प्रेम जीत गया --प्रेम अमर हो गया -- रौशन के जीवन मे पतझड से बसंत आने मे देर अवश्य लगी लेकिन आई भी अवश्य।
---पवन मिश्रा (दुमका -- झारखंड)
29मई 2024
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