कहानी
*वो सुबह*
आर्थिक विपन्नता ने इस कदर मुझे घेर सा लिया है ,कि अब दिमाग संठ सा होता जा रहा है.न कोई अनाज बचा और न ही गाय बकरी दिख रही जिसे बेच कर थोडा राहत महसुस कर लिया जाय. चुनिया माय को भी पगार मिलने में आरो आठ दिन शेष हैं. हे भगवान कुछ तो सोचा होगा आपने मेरे लिए.
ऐसे ही मन को कुंठित कर देने वाले ढेर सारे सोच के साथ मैं लंगडाते लंगडाते किसी तरह मनोज सर के घर का पता ठिकाना करते पहुंच चुका था. मैंने लगातार दो तीन बार काल बेल बजाया अंदर से शांत प्रकृति के साथ अवाज आ रही थी आप अंदर आ जायें दरवाजा खुला है. सकपकाते हल्के कदमों के साथ मैं अंदर प्रवेश कर ही रहा था कि पुरे शरीर चादर ओढे ,कुर्सी पर बागवानी में बैठे एक शख्स ने मुझे आवाज देते सरल लहजे मेंं पुछा --किनसे मिलना है श्रीमान् आपको--!
उ मनोज सर का घर येहे टो है हमरा मनोज सर से भेंट करना हैय--मैंने बोला.
हां बोलिए मैं ही मनोज सर हूँ.
सर हमरा नाम धनेशर हाजरा है और चुन्नी कुमारी हमरे बच्चीया है. जो पचमा कलास में पढती है .
हां बोलिए धनेशर जी मनोज सर ने सम्मान के साथ बोला.
उ मने कि मने बोलना चाह रहे थे चुन्नीयां को हम पढाना चाह रहे हैं, ओकरा आज फीस जमा नहीं हो पाया जही से उ बोल रही कि काल से सकुल उ अब नाय जा पाऐगी . चुन्नीया माय के पगार यहा आठ दिना बाद पहला तारीख को मिल जायेगा तब फीस दे पाती चुन्नीया.
धनेशर जी विद्यालय में फीस जमा करने का आज अंतिम दिन था, कोई बात नहीं मैं फीस जमा कर दुंगा आप चुन्नी को हर रोज विद्यालय भेजा किजिए . धनेशर जी आप क्या काम करते हैं -- मनोज सर ने पुछा.
सर इ लंगडा आदमी के कौन काम पर रखेगा मालिक. मालिक आपका बहुते प्रणाम करता हूँ, बच्चीया पर दया देते रहना सर.
मनोज सर ने कहा -- धनेशर जी आप काम खोजीए , आपको काम की बहुत जरूरत है और काम खोजने से जरूर मिल जायेगा .
यह सुनते हुए मुझे अंदर आत्मा से आवाज आयी की मुझे मनोज सर का गोड जरूर लगना चाहिए.
मैंने पास जाकर झुककर मनोज सर का गोड छुकर आशीर्वाद लेना चाहा.
मैं दंग रह गया चादर हटने के बाद जो दिख रहा था मनोज सर के दोनों पैर जांघ से ही गायब थे
वो सुबह धनेशर हाजरा के लिए एक नई सुबह थी.
©®पवन मिश्रा
05,दिसंबर 2023
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